
प्रेम की गहराई हमेशा प्रेमी की अपनी चेतना जितनी होती है — जो जैसा है, उसका प्रेम भी वैसा ही होगा, चाहे उसे कितना भी पावन या अनोखा क्यों न मान लिया जाए। जिस चेतना ने खुद को कभी गहराई से नहीं जाना, वह प्रेम में भी सतह से आगे नहीं जा सकती। जो कोई अपने प्रेम को गहराई से परखने से बचता है, वह असल में खुद को परखने से बच रहा होता है — और यही बचाव, प्रेम के नाम पर पाला गया एक और भ्रम है।







साल भर जो निरंजन में जिया है, उसके लिए कल राम निरंजन; और साल भर जिसने मनोरंजन ही पाला है, उसके लिए फिर पर्व भी मनोरंजन। अंजन माने क्या होता है? कालिमा। तो राम निरंजन न्यारा रे, अंजन सकल पसारा रे। समझ रहे हो? अब आपको तय करना है कि सकल पसारा माने चहुदिश जो ये व्याप्त है, आपको इसका होना है या इससे न्यारा होना है। न्यारा माने अलग, अस्पर्शित।










































रामकृष्ण परमहंस ने ख़ूब प्रयोग किए। वे मानने वाले लोगों में नहीं थे। ये होता है आध्यात्मिक चित्त: वो जानने से, प्रयोग करने से नहीं डरता। रामकृष्ण कह रहे हैं, “जो तुम्हारी मान्यता है, उसी का परीक्षण करो। तुम्हारी वर्तमान स्थिति से ही तुम्हारी मुक्ति का मार्ग निकलेगा: यतो मत, ततो पथ।” जंगल से गुज़र कर ही जंगल से बाहर आते हैं न! यही वो कह रहे हैं कि जहाँ फँसे हो, उसी जगह को ठीक से देखो। मुक्त होने के लिए बंधन को ही साफ़-साफ़ देखना पड़ता है। उसको पहचान लिया, तो मुक्त हो जाओगे।
अंधविश्वास जीवन का ज़हर है। जिसके जीवन में अंधविश्वास आ गया हो, नहीं हो सकता कि वो हिंसक न हो जाए। जिसके जीवन में अंधविश्वास आ गया, उसके जीवन में प्रेम नहीं रह सकता। जिसके जीवन में अंधविश्वास आ गया, उम्मीद भी मत करना कि उसके पास साहस या ताक़त बचेगी। हाँ, क्रोध और प्रतिक्रिया दिखाई दे सकते हैं। अंधी प्रतिक्रिया वो कर सकता है। पर एक शांत, अदम्य साहस, अब उसमें नहीं दिखेगा।
यहाँ जीसस एक तरह से हँस रहे हैं उनके ऊपर। कह रहे हैं, सत्य थोड़ी छुपा हुआ है, दरवाज़ा थोड़ी बंद है। “नॉक एंड द डोर विल बी ओपनड।” हो सकता है दरवाज़ा खुला ही हुआ हो, नॉक करके तुमको पता चले कि ये तो पहले ही खुला हुआ था। और नहीं भी खुला हुआ है, तो तुम्हारे नॉक करने की देर है। दरवाज़े ने कोई ठान नहीं रखी है कि बंद रहना है। पूछो और जवाब मिलेगा। चाहो और मिल जाएगा। तो बात तुम्हारी चॉइस की है।
भारत में यह मान्यता रही है कि अध्यात्म बुढ़ापे का काम है। लेकिन जहाँ भी स्वामी विवेकानंद की मूर्ति खड़ी होगी, उस जवान आदमी का तेज गवाही देता होगा कि अध्यात्म बुढ़ापे का नहीं, जवानी का काम है। जवानी अगर, जो सबसे ऊँचा काम हो सकता है, उसको नहीं दी, तो और क्या काम आएगी? उन्होंने युवाओं से कहा, ज़रा चुनौती स्वीकार करना सीखो, प्रतिस्पर्धा करना सीखो। बल ही जीवन है और दुर्बलता ही मृत्यु है। उचित ही है कि युवा दिवस मनाया जाता है उन्हीं के नाम पर।
जीसस धर्म को आमूल-चूल हिला देते हैं। प्रेम के नए अर्थ, सत्य के नए अर्थ, प्रार्थना के नए अर्थ सामने आने लगते हैं। सत्ताधीशों के लिए मुसीबत हो जाती है, साज़िश करी जाती है। ऐसा नहीं था कि वो मरना चाहते थे। पर अब मौत सामने आ ही गई है, तो भागना भी कैसा? जीते रहते तो बढ़िया ही रहता, मौज आ रही थी जीने में। पर मर भी गए तो कोई बुराई नहीं, क्योंकि जितना जिए, पूरा जिए। और हँसते-हँसते जीसस एक दिन सूली चढ़ जाते हैं।
श्रीमद् भगवत गीता प्रथम अध्याय अर्जुन विषाद योग
धृतराष्ट्र उवाच | धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः | मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत सञ्जय || 1.1 ||
धृतराष्ट्र ने कहा, “हे संजय! धर्मक्षेत्र, कुरुक्षेत्र में युद्ध करने के लिए एकत्रित हुए मेरे पुत्रों और पांडवों ने क्या किया?”
आचार्य प्रशांत: जिज्ञासा से आरंभ हो…
हम अपने आराध्यों की कथा, चरित्र, मूर्ति, छवि अपने ही हिसाब से बना देते हैं। हम अपनी सहूलियत, मान्यता और स्वार्थ के अनुसार कालातीत को भी बदल डालते हैं। यह समस्या राम के निर्गुण–निराकार रूप के साथ बिल्कुल नहीं है क्योंकि जो निर्गुण और निराकार है, उसकी कोई मूर्ति ही नहीं, कोई छवि ही नहीं; तुम उसको कैसे ख़राब कर लोगे? इसलिए ज्ञानियों ने कहा कि उनको तो ब्रह्मस्वरूप ही मानना — “राम ब्रह्म परमारथ रूपा, अबिगत अलख अनादि अनूपा।” मात्र वही राम हैं जो कालातीत हैं।
गीता आपको यह बताने के लिए है कि आपकी सब चिन्ताओं के साथ-साथ जो आपकी चिन्ताओं को नष्ट कर सकता है, वो भी आपको उपलब्ध है। आपको चुनाव करना है और मूल्य चुकाने को तैयार रहना है। अर्जुन के एक ओर माँ प्रकृति हैं जो कह रही हैं, ‘मेरे बहाव में बहो,’ और दूसरी ओर श्रीकृष्ण हैं जो कह रहे हैं, ‘मेरी ओर बढ़ो और रास्ते में जो भी आता है, उसे सहो।’ सही काम में जो पीड़ा मिले अगर उसे प्रेम का उपहार मान कर सीने से नहीं लगा सकते, तो उसे दवाई का कड़वा घूँट ही मानकर बस सह लो। सच्चाई के मार्ग पर जो तमाम अनुभवों में अडिग रहता है, वो आनन्द का अधिकारी है।
प्रचलित धारणा है कि अध्यात्म में आकर आदमी अकर्मण्य हो जाता है, यह धारणा बिल्कुल ग़लत है। अध्यात्म तो आलसी को भी कर्मनिष्ठ बना देता है। श्रीकृष्ण की पूरी सीख ही यही है — युद्ध सही रखो और परिणाम की परवाह मत करो। आध्यात्मिक समर्पण का अर्थ होता है — संग्राम। यदि संग्राम नहीं है तो जीवन कायरता भरा समर्पण है। आध्यात्मिक आदमी हमेशा चुनौतियों से जूझता हुआ मिलेगा। जो लड़ गया, वह समर्पित है और जो पीठ दिखा रहा है, वह घोर कर्ताभाव रखता है।
प्रश्नकर्ता: सर, नमस्कार। सर, बारह तारीख को स्वामी विवेकानन्द जी की अभी जयंती आने वाली है। तो बचपन से काफ़ी उनको पढ़ा है, उनकी जीवनी के बारे में। हमेशा काफ़ी अट्रैक्टिव(आकर्षक) रहा है उनको पढ़ना, उनको जानना। हालाँकि जितना मैंने उनकी जीवनी पढ़ी तो उनके बारे में पता लगा…
कर्म के परित्याग से, श्रेष्ठ है नियत कर्म। कर्मयात्रा पर चल पड़े, जिस क्षण लिया जीव जन्म।
श्रीकृष्ण भी तुम्हीं में हैं, और मीरा भी। इन्हें मिलने दो, फिर आफ़तों में भी नाचोगे जैसे मीरा नाचती थी। परिस्थितियाँ कैसी भी हों, तुम मौज में रहोगे। मीरा होना अनिवार्य है; जीवन मिला ही इसीलिए है कि हमारी मीरा और हमारे श्रीकृष्ण मिल सकें। जिनमें यह मिलन नहीं होता, वे सूखे, उदास जीते हैं। समझ ही श्रीकृष्ण है; जब समझ जागेगी, तब मीरा नाचेगी। यही मिलन, यही योग, यही जीवन जीने की कला है।
“यज्ञ” का अर्थ है — जो कुछ भी किसी निचले स्तर पर है, उसे उठाकर ऊँचे स्तर पर रख देना। जो भी संसाधन आपके पास है — समय, ध्यान, चिंतन, धन, श्रम — उसे उच्चतम को समर्पित कर देना, यज्ञ है। एक बार जान जाओ कि कोई चीज़ ऊँची है, सर्वस्व समर्पित कर दो। अपने लिए कुछ बचाकर मत रखो। “आरोहण है गीता” — नीचे से ऊपर की ओर बढ़ते चलो, यही यज्ञ है।
हर पर्व आपको यही बताने के लिए आता है कि बदलो, रुको, देखो कि तुम दुखी हो, बंधन में हो; श्रीकृष्ण का भी यही संदेश है। जन्माष्टमी को मनाने का सुंदर तरीक़ा यही है कि इसे श्रीकृष्ण का नहीं, अपना जन्म-दिवस मानें और स्वयं को पुनः जन्म दें — “मैं जैसे साल भर जीता आ रहा हूँ, अब वैसे नहीं जिऊँगा।” आप एक बार फ़ैसला तो कीजिए कि सच्चाई में जीना है, फिर जो ताक़त अपने आप उभरती है, उस ताक़त का नाम श्रीकृष्ण है।
बाहर से जो कुछ भी आ रहा है, सब अविद्या है। जानते हो, बड़े से बड़े विद्वान के वचन भी आपके लिए तो अविद्या ही हैं क्योंकि वो बाहर से आ रहे हैं। ऊँची से ऊँची बात भी अगर अभी किसी और की है, तो वो अविद्या है। और जिस क्षण आपने ध्यान में, अपना और उस बात का रिश्ता देख लिया, तब विद्या हुई।
धर्म के साथ कई तरह की परंपराएँ जुड़ी हैं, जिनका उद्देश्य होता है — मन को भ्रम और दुख से मुक्ति देना। ‘शिव’ परम सत्य का दूसरा नाम है। यदि तीर्थाटन करने से मन साफ़ हो रहा है, आपके मन में सच्चाई दृढ़ता से स्थापित होती है, तो तीर्थयात्रा बहुत शुभ है — चाहे वह कावड़ यात्रा हो, अमरनाथ यात्रा हो, या केदार यात्रा। लेकिन यदि शिव का अर्थ बस मानसिक तल पर कुछ मान लिया है, उस पवित्रता से प्रेम ही नहीं, तो फिर क्या ही लाभ।
आस्तिकता का अर्थ — वेदान्त के प्रति सम्मान। बुद्ध वेदान्त की जितनी गहराई तक पहुँचे थे, उतनी गहराई तक उस समय में कोई ऋषि-मुनि नहीं था जिसको वेदान्त समझ में आता हो। असली वेदान्ती वही हैं। वेद का मर्म कर्मकांड नहीं, वेदान्त है और वेदान्त को सबसे आगे बुद्ध ही बढ़ा रहे थे। वेदान्त अकेला है जो अमर है। अगर आप वेद को कर्मकांड बना दोगे, तो आज की पीढ़ी वेद को भुलाती जाएगी — यह सबसे बड़ा ख़तरा है।
कहानी कहती है कि नारद जी बड़े चक्कर में पड़े — सोलह हज़ार रानियाँ, और जिसके भी पास जाएँ, उसके साथ श्रीकृष्ण को ही पाएँ। सोलह हज़ार रानियाँ अनंतता का प्रतीक हैं। रानियों की श्रद्धा है, और श्रीकृष्ण ही ऐसे हैं, जिनमें सैकड़ों, हज़ारों, लाखों लोग पूर्ण श्रद्धा रख सकें। स्वयं श्रीकृष्ण भी चाहें तो रानियों से अपने-आप को छीन नहीं सकते। यदि तुम सत्य के प्रेमी हो, तो सत्य तुम्हें पूरा का पूरा उपलब्ध हो जाएगा।
जिस किसी में सत्य के प्रति अर्जुन जैसी प्रगाढ़ निष्ठा होगी, उसे श्रीकृष्ण मिल ही जाएँगे। तुम्हारे भीतर वो प्रश्न उठें तो सही, जो अर्जुन में उठते थे। केन्द्रीय बात है मुक्ति और बोध की — वो अगर है, तो फिर कुछ-न-कुछ हो ही जाएगा। जिसे चाहिए, उसे मिल ही जाता है, चाह मूल है। हर मार्ग पर तुम्हें अपनी मुमुक्षा का, अपनी आतुरता का परिचय देना ही पड़ता है — उसके अलावा कोई रास्ता नहीं है।
‘अप्प दीपो भव’ — ‘अपने प्रकाश स्वयं बनो’ — यह एक बहुमूल्य वक्तव्य है, लेकिन आख़िरी है। उससे पहले बड़ी साधना करनी पड़ती है। ‘कोई गुरु आवश्यक नहीं है’, यह जानने के लिए भी कोई गुरु चाहिए। जब पूरी साधना, पूरी दीक्षा हो जाए और शिष्य की विदाई का समय आए तभी गुरु को कहना चाहिए — ‘अप्प दीपो भव’। और तभी शिष्य के कान में ये शब्द पड़ने चाहिए। भूलना नहीं, ये ‘आख़िरी’ शब्द हैं।
बुद्ध ने जितना काम किया, उतना बहुत कम लोग ही कर पाए। उनके आंतरिक ज्ञान को तो एक तरफ़ रखो — जो उन्होंने भौतिक तल पर भी कर दिखाया, वह उस समय का बड़े-से-बड़ा आश्चर्य था। इतना बड़ा संघ उन्होंने खड़ा कर दिया था और उसकी व्यवस्था चलाते थे। बुद्ध एक तरह से उसके सीईओ थे। उसके बहुत विस्तृत और सूक्ष्म नियम-क़ायदे थे, जो बुद्ध ने स्वयं तय किए थे — जैसे आज की किसी भी संस्था में होते हैं। बड़े-से-बड़े वेदांतियों में महात्मा बुद्ध का नाम लिया जाना चाहिए।
जैन धर्म का अनेकांतवाद या स्यादवाद, अहिंसा की बुनियाद है। मैं दूसरे के विपरीत तभी खड़ा होऊंगा जब मुझे अपनी हस्ती में दृढ़ विश्वास होगा — और यही बड़ा विश्वास ही हिंसा है। अनेकांतवाद का अर्थ है: कुछ भी पूरी तरह पक्का या निश्चित नहीं। जब कुछ निश्चित नहीं, तो दूसरे को गलत कैसे ठहराएं? और जब दूसरे को गलत नहीं ठहरा सकते, तो उनके प्रति हिंसक कैसे हो सकते हैं? अनेकांतवाद अहंकार की जड़ पर चोट करता है। दूसरे के प्रति तुम हिंसक तभी हो सकते हो, जब कहोगे — मैं सही, दूसरा गलत।
राम कोई खिलौना थोड़ी ही हैं, जो कहीं से "मिल जाएँगे"। राम की प्राप्ति जैसा कुछ नहीं होता, अहंकार को मिटाना होता है, और इसी को ‘रामत्व’ कहते हैं। अपनी रोज़मर्रा की हरकतों को देखिए—सुबह से शाम तक क्या किया, क्या सोचा, क्या अनुभव किया; तो पता चलेगा कि बड़ा अंधकार है। और वह स्वयं को जानने से ही मिटेगा। उसके बाद जो शेष बचेगा, उसी को 'राम' बोलते हैं।
ज़कात माने दान, और दान वह नहीं जिसमें तुमने कुछ ऐसा छोड़ा जो तुम्हारे पास है। दान की महत्ता इसलिए है क्योंकि दान में तुम स्वयं को ही छोड़ देते हो। अहंकार तो व्यापारी होता है—वह कुछ देता भी है तो उसमें मुनाफ़ा देखकर देता है। सबसे निम्न कोटि का दान वह है जिसमें तुम देते हो और अपेक्षा करते हो कि बदले में कुछ मिले। उससे ऊपर वह दान है जिसमें यह उम्मीद नहीं बाँध रहे कि कुछ मिलेगा। ज़कात एक विधि है, जिससे ज़िंदगी में कुछ ऐसा करो जिसमें तुम्हें मुनाफ़ा नहीं चाहिए।
टूटफूट ही वो जरिया है जो आपको बताएगा कि आपके पास कुछ ऐसा भी है जो टूट नहीं सकता। जब सब बिखरा पड़ा होगा उसके बीच ही अचानक आपको पता चलेगा, अरे एक ऐसी चीज है जो नहीं बिखरी बड़ा मजा आएगा। उसके बाद यही लगेगा कि इसको और बार-बार पटको और जितना बार-बार पटको और जितना यह नहीं टूटता उतना इसमें विश्वास और गहरा होता जाता है और आदमी और खुलकर खेलता है। यह सबके पास है। यह सबके पास है। हमें इसका पता इसीलिए नहीं है क्योंकि हमने इसको कभी आजमाया ही नहीं।
हम वहाँ से शुरुआत करेंगे जहाँ पर कोई तर्क हो ही नहीं सकता। हम वहाँ से शुरुआत करेंगे जहाँ कोई मान्यता हो नहीं सकती और कौन सी हैं वो जगह ‘मैं’। बिल्कुल हो सकता है कि ये दीवारे न हो, ये मेरी मान्यता हो, आँखों का धोखा हो, सब कुछ झूठ हो सकता है। लेकिन एक चीज तो है न, जो है और उसी की खातिर मैं बात कर रहा हूँ, मैं हूँ और मैं हूँ। मुझे मेरे होने का दुख नहीं पता चलता है। मैं दुखी हूँ। यहाँ से सारा अध्यात्म शुरू होता है। बाकी सब नकली हो सकता है। आपको सामने वाले से एक बात पूछनी है दुखी हो? और ‘हो’। दुखी हो। उसमें अस्तित्व भी आ गया तुम्हारा। अहम। हो, हो माने अस्तित्व है तुम्हारा। अहम और दुख है। हाँ यही है अध्यात्म सारा।
मदद का एकमात्र अर्थ होता है चेतना को उसके अंजाम तक ले जाना। इसके अलावा मदद का कोई अर्थ नहीं होता। कमज़ोर की सेवा करने का अगर मतलब यह है कि कमज़ोर, कमज़ोर बना रहे, तो यह सेवा नहीं, साज़िश है। कमज़ोर की हमेशा मदद ही नहीं करनी होती, संहार भी बहुत ज़रूरी होता है। दुर्बल की तो एक ही सहायता हो सकती है कि उसको दुर्बल रहने ही मत दो। पर यदि कमज़ोरी ताकत बनना ही नहीं चाहती, तो उसका संहार करना भी सीखो।
आम जनमानस में तो ये एक ही हैं, पर अध्यात्म की दुनिया में बाकी सारे नाम सिर्फ नाम हैं, और शिव सत्य हैं। शिव कोई चरित्र नहीं हैं; शंकर का चरित्र होता है। शंकर किसी पुराण के केंद्रीय पात्र हो सकते हैं, शिव नहीं। शंकर मन की जितनी अधिकतम ऊँचाई पर उड़ सकता है, वह हैं। और शिव हैं उस मन का आकाश में विलीन हो जाना। तो विचार का उच्चतम बिंदु हुए शंकर, और निर्विचार हुए शिव।
यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धन: | तदर्थं कर्म कौन्तेय मुक्तसङ्ग: समाचर ||3. 9||
अन्वय: यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र (यज्ञ के लिए किए कर्म के अलावा अन्य कर्म में) लोकोऽयं (लगा हुआ) कर्मबन्धनः (कर्मों के बन्धन में फँसता है) कौन्तेय (हे अर्जुन) मुक्तसङ्गः (आसक्ति छोड़कर) तत्-अर्थ (यज्ञ के लिए) कर्म (कर्म) समाचर (करो)
काव्यात्मक अर्थ: बाँधते…
महाशिवरात्रि का उत्सव मनाने का सार भीतर के अंधकार को पहचानना और उसे कम करने का प्रयास करना है, यह मानते हुए कि यह त्योहार केवल एक दिन का नहीं, बल्कि आत्म-जागरूकता की निरंतर यात्रा है। यह रात महत्वपूर्ण है क्योंकि यह विनाश की एक धारा और नए आरंभ की दूसरी धारा के मिलन का प्रतीक है। किसी भी नए आरंभ के लिए, पहले पुराने, सड़े हुए और झूठे तत्वों को समाप्त करना आवश्यक है।
शिव कोई ऐसी इकाई नहीं हैं, जो अपना कोई निजी, पृथक या विशिष्ट व्यक्तित्व रखती हो। हम सब जहाँ पहुँचना चाहते हैं, हमारी एक-एक गतिविधि जिस अवस्था को हासिल करने के लिए है, उसका नाम है—शिव। सब समय, सब स्थान मन का विस्तार हैं और शिव मन का केन्द्र हैं। शिव इसलिए नहीं हैं कि उनके साथ और बहुत सारे किस्से जोड़ दो। शिव इसलिए हैं ताकि हम अपने किस्सों से मुक्ति पा सकें। शिव कोई देवता, भगवान या ईश्वर नहीं हैं, शिव सत्य मात्र हैं।
सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिः । अनेन प्रसविष्यध्वमेषः योऽस्त्विष्टकामधुक् ॥ १० ॥
अर्थ: सृष्टि के आरंभ में ही ब्रह्मा ने कहा था कि यज्ञ के द्वारा ही वृद्धि को प्राप्त करोगे। यह यज्ञ ही तुम लोगों को अभीष्ट फल देगा और कामधेनुतुल्य सर्वाभीष्टप्रद होगा।
काव्यात्मक अर्थ:
सगुण हो बंधन चुना…
हमने ज्ञान को बड़ी एक परालौकिक चीज़ बना दिया है की ज्ञान माने आसमानों पर क्या हो रहा है। वही ज्ञान है। कभी मैंने आपसे कहा कि उपनिषद् साफ-साफ बताते हैं। विद्या और अविद्या दोनों चाहिए। और आसमानों की बात तो बाद में हो जाएगी। उपनिषद् कहते हैं कि जो ज़मीन की बात नहीं समझता, वो अगर आसमानों की बात करे तो दो चांटा लगाओ उसको।
जब-जब तुम सच्चाई की ओर नहीं बढ़ते, तब-तब जीवन दुख, दरिद्रता, कष्ट, रोग और बेचैनियों से भर जाता है। अधर्म अपने चरम पर चढ़ जाता है, और विवश होकर तुम्हें आँखें खोलनी पड़ती हैं। तब मानना पड़ता है कि तुम्हारी राह ग़लत थी, और ग़लत राह को छोड़कर तुम्हें सत्य की ओर मुड़ना पड़ता है। अतः जब तुम अंधेरे को पीठ दिखाते हो, तो श्रीकृष्ण को अपने समक्ष पाते हो। यही श्रीकृष्ण का अवतरण है।
यह आदमी जो अपने ऊपर हंसना शुरू करता है, यह अकर्ता हो जाता है। नॉन-डूअर हो जाता है। नॉन-डूअर का मतलब यह नहीं कि अब नॉन-डूइंग हो गई। डूइंग तो बहुत होगी! ज़बरदस्त होगी! घनघोर होगी! कल्याणप्रद होगी! ऑसपिसियस होगी! डूइंग होगी, डूअर नहीं होगा। पर कर्ता नहीं होगा। और जो यह कर्ता-हीन कर्म होता है, "द डीड विदाउट डूअर", इसके क्या कहने! यह फिर अवतारों की लीला समान हो जाता है। यह जीवन को खेल बना देता है। यह पृथ्वी पर स्वर्ग उतार देता है। यह बहुत पुराना जो कैदी है, उसे आकाश की आज़ादी दे देता है।
मनुष्य की देह होने भर से आपको कोई विशेषाधिकार नहीं मिल जाता, यहाँ तक कि आपको जीवित कहलाने का अधिकार भी नहीं मिल जाता। सम्मान इत्यादि का अधिकार तो बहुत दूर की बात है, ये अधिकार भी नहीं मिलेगा कि कहा जाए कि ज़िन्दा हो।
गुरूनहत्वा हि महानुभावान् श्रेयो भोक्तुं भैक्ष्यमपीह लोके। हत्वार्थकामांस्तु गुरूनिहैव भुञ्जीय भोगान्तधिरप्रदिग्धान् ।।५।।
“मैं तो महानुभाव गुरुओं को न मारकर, इस लोक में भिक्षान्न भोजन करना कल्याणकर मानता हूँ, क्योंकि गुरुओं का वध करके मैं रक्त से सने हुए अर्थ और काम रूपी भोगों को ही तो भोगूँगा।“
~ श्रीमद्भगवद्गीता, श्लोक…
आचार्य प्रशांत: तो शंखनाद होता है दोनों सेनाओं की ओर से। और संजय बताते हैं कि शंखनाद ने विशेषतया धृतराष्ट्र के पुत्रों के, कौरवों के हृदय में हलचल कर दी। मन उनके कम्पित हो गये, हृदय विदीर्ण हो गया। ये सुनने के बाद अब आते हैं दूसरे पक्ष पर। अर्जुन…
मन नहीं चंचल होता, अहम् चंचल है और चंचल होना उसकी मजबूरी है, उसे चंचल होना पड़ेगा। रुककर, टिककर, थमकर तो वो बैठ सकता है न जिसको घर मिल गया हो, जिसको आश्वस्ति मिल गई हो। अहम् को न कोई घर है, न आश्वस्ति है। उसका तो यही है कि कहीं ज़रा सा कुछ खटका हुआ, उसकी नींद खुल जाती है, ‘मेरी चोरी पकड़ी तो नहीं गई? मेरी चोरी पकड़ी तो नहीं गई!’
प्रश्नकर्ता: बार-बार कृष्णमूर्ति साहब ये कहते हैं कि कोई गुरु की आवश्यकता नहीं है।
आचार्य प्रशांत: हाँ, क्योंकि सब अपना ही है, ज़िम्मेदारी सारी अपनी है, तो बाहर वाले का फिर नाम भी लेने की तकलीफ़ क्यों करनी है। और जो गुरु है वह सर्वप्रथम आंतरिक है। मैं कह रहा…
दो आँखें सबके पास होती हैं, और ये सिर्फ़ दुनिया को देखती हैं, स्वयं को नहीं। शिव की तीसरी आँख एक प्रतीक है, जो बताती है कि आपकी ज़िंदगी में दुनिया से परे कुछ होना ज़रूरी है। क्योंकि जो केवल दुनिया को देखेगा, वह उसमें फँसकर दुख पाएगा। इसलिए दुनिया को और स्वयं को एकसाथ देखो। यही शिवत्व और शिव के तीसरे नेत्र का अर्थ है।
स्वामी विवेकानंद को हम सब जानते हैं। लेकिन क्या आपने 'श्री आलासिंगा पेरूमल' के बारे में सुना है?
शायद नहीं। पर आलासिंगा ना होते तो स्वामी विवेकानंद कभी शिकागो का वो ऐतिहासिक भाषण नहीं दे पाते, जिसकी बदौलत उन्होंने विश्वभर में वेदान्त व हिंदू धर्म का नाम रोशन किया।
बात…
आचार्य प्रशांत: केतन हैं, गीता के पाँचवे अध्याय से अट्ठारवाँ श्लोक उद्दृत किया है। श्लोक कहता है-
विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनी | शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिन: ||
“वे ज्ञानीजन विद्या और विनययुक्त ब्राह्मण में तथा गौ, हाथी, कुत्ते और चाण्डाल में भी समदर्शी ही होते हैं।”
भगवद्गीता,अध्याय…
जिन्होंने कृष्णमूर्ति से मुलाक़ात की हुई है, वो बुल्लेशाह में और प्रगाढ़ता से प्रवेश कर पाएँगे, बल्कि मैं कहूँगा वही समझ पाएँगे बुल्लेशाह को। और जो बुल्लेशाह के कायल हैं, वो जब कृष्णमूर्ति के पास जाएँगे तो उन्हें ऐसा लगेगा किसी अपने के पास आएँ हैं, इनको तो हम जानते हैं, ये वही बात तो कह रहे हैं। ये वही बात कह रहे हैं, जिस पर हम नाच कर आये हैं। बस सफ़ाई से कह रहे हैं, ज़्यादा व्यवस्था के साथ कह रहे हैं, बिना रंगरोगन के कह रहे हैं।
स्वामी विवेकानन्द के जीवन का केन्द्र था —धर्म। जब तुम्हें धर्म से कोई मतलब नहीं, तो तुम उनके पास गये किस लिये हो?तुम उनके जीवन में ताका-झाँकी करने सिर्फ़ इसलिए गये हो कि कुछ ऐसा मिल जाये जिसका तुम दुरुपयोग कर सको, है न? वो तो लगातार ऊपर से नीचे तक भगवा ही धारण करे रहते थे, तुम्हें इस बात से मतलब है? नहीं। भगवा भी तुम्हारे लिए पिछड़ेपन का प्रतीक है, गुरु के सामने सर झुकाना भी तुम्हारे लिए पिछड़ेपन का प्रतीक है। तो तुम स्वामी विवेकानन्द का नाम भी क्यों ले रहे हो?
आचार्य प्रशांत: बिना सोचे रिफ्लेक्शन (अवलोकन) लिखना, देखना लिख पाते हो कि नहीं। बस जब लिखा जा रहा हो तो रोक न देना उसको कि साबित करने के लिए कि लिखा ही नहीं जा सकता।
दुनिया की एक-एक कविता ऐसे ही लिखी गयी है। कवि हाथ को ढीला छोड़ देता…
आचार्य प्रशांत: बुद्ध जो हैं वो तो बुद्ध होकर के ही जाना जा सकता है। बुद्ध जो हैं उसको जानने का और कोई तरीक़ा नहीं है, उसके लिए बुद्ध ही होना पड़ेगा। लेकिन बुद्ध जो कह रहे हैं, बुद्ध ने जो भी कहा है, हमारी शुरुआत तो उसको ही समझने…
प्रश्नकर्ता: मेरा प्रश्न नोट्स में से है: "बीइंग अवेयर ऑफ़ डिमांड्स ऑफ बॉडी, बीइंग अवेयर ऑफ़ स्ट्रे थॉट्स, दिस इज़ इंटेलिजेंस। इट ऑकर्स थॉट् इज़ एन इनेडिक्वेट रिस्पांस टू स्टिमुलस। एन एडीक्वेट रिस्पांस इज स्पॉनटेनिटी।" ("शरीर की माँगों के प्रति जागरूक होना, आवारा विचारों से अवगत होना, यह बुद्धिमत्ता है।…