मन नहीं चंचल होता, अहम् चंचल है और चंचल होना उसकी मजबूरी है, उसे चंचल होना पड़ेगा। रुककर, टिककर, थमकर तो वो बैठ सकता है न जिसको घर मिल गया हो, जिसको आश्वस्ति मिल गई हो। अहम् को न कोई घर है, न आश्वस्ति है। उसका तो यही है कि कहीं ज़रा सा कुछ खटका हुआ, उसकी नींद खुल जाती है, ‘मेरी चोरी पकड़ी तो नहीं गई? मेरी चोरी पकड़ी तो नहीं गई!’
यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।
आचार्य प्रशांत: आज लाओत्ज़ु एक प्रश्न से शुरुआत कर रहे हैं और प्रश्न का उत्तर हम तभी दे पाएँगे, जब कुछ मूल बातें एकदम स्पष्ट होंगी। प्रश्न है — “क्या आप अपने मन को स्थिर रख सकते हैं? क्या आप मन के भटकाव के पार देख सकते हैं?”
उसके आगे और प्रश्न आते हैं, समय रहे तो और भी प्रश्न ले लेंगे; पहले मन की बात। “क्या आप अपने मन को स्थिर रख सकते हैं?” तो सबसे पहले कहा, ‘आप’, फिर कहा, ‘मन’ और फिर कहा, ‘स्थिर‘ — आप, मन और स्थिर। इसमें ऐसा लगेगा जैसे विषय वस्तु ‘मन’ है, जैसे केंद्रीय बात ‘मन’ है, जैसे मन का भटकना समस्या हो और उस समस्या के बारे में प्रश्न करा गया हो। अगर ऐसा लगेगा तो शुरू में ही गड़बड़ हो गई।
क्या कहा है? “क्या आप अपने मन को स्थिर रख सकते हैं?” तो मन से भी पहले कौन आता है? ‘आप’, आप माने — मैं, अहम्। मन यूँही नहीं होता, मन सदा ‘किसी का’ होता है। मन तो जैसे पालतू जानवर है या नौकर है या किसी वृत्त की परिधि है। सदा उसके केंद्र में कोई होता है, सदा उसका स्वामी कोई होता है। ‘आज मन खराब है,’ ‘आज मन चंचल है,’ ‘आज मन उदास है’ — जो मालिक है वो अपने आप को छुपाकर के सारी बात मन पर डाल देता है। है न?
‘अरे, मन तो बड़ा पापी होता है,’ ये ऐसा ही है जैसे अपराध करने वाले ने स्वयं को बचाकर के अपने उपकरण पर सारा दोष डाल दिया हो। जैसे बंदूक चलाने वाले हाथ ने अदालत में बंदूक हाज़िर कर दी हो कि यही गुनहगार है।



![क्या आप आचार्य प्रशांत की गीता कम्यूनिटी [इस सदी का एक अद्भुत आध्यात्मिक प्रयोग] के भाग हैं?](https://cimg.acharyaprashant.org/images/img-3dc72262-a991-4f45-a9d4-a0397e21022c/30/image.jpg)



