आचार्य प्रशांत: बुद्ध जो हैं वो तो बुद्ध होकर के ही जाना जा सकता है। बुद्ध जो हैं उसको जानने का और कोई तरीक़ा नहीं है, उसके लिए बुद्ध ही होना पड़ेगा। लेकिन बुद्ध जो कह रहे हैं, बुद्ध ने जो भी कहा है, हमारी शुरुआत तो उसको ही समझने से होती है। उसमें जाने के लिए बुद्ध होना आवश्यक नहीं है। सच तो यह है कि एक बुद्ध उसमें जाने की कोई ज़रूरत समझेगा ही नहीं। दो ये अलग-अलग बातें हैं, इनमें आपस में सम्बन्ध है लेकिन बातें हैं अलग-अलग।
पहला है बुद्ध होना, बुद्ध क्या हैं। वही असली चीज़ है, वही सत्व है, वो कुछ पढ़कर नहीं जाना जा सकता। हम सब यहाँ पर 'धम्मपद' लेकर बैठे हुए हैं। बुद्ध क्या हैं, ये धम्मपद पढ़कर नहीं जाना जा सकता। बुद्ध क्या हैं, ये तो बुद्ध होकर ही पता चलेगा। अभी हम जो कर रहे हैं वो कुछ और कर रहे हैं, अभी हम एक प्रक्रिया से गुज़र रहे हैं, अभी हम एक प्रक्रिया से गुज़र रहे हैं।
बुद्ध ने क्या कहा है, बुद्ध क्या हैं नहीं, बुद्ध ने क्या कहा है, हम वो समझने की कोशिश करने वाले हैं। है न? बुद्ध ने — ध्यान दीजिएगा — क्या कहा है, बुद्ध क्या हैं नहीं। वो एक सम्बन्धित बात है, पर थोड़ी अलग बात है। अभी हम सिर्फ़ ये देखने जा रहे हैं कि बुद्ध ने क्या कहा है। किसी भी इंसान ने जो कुछ भी कहा होता है, एक परिप्रेक्ष्य में कहा होता है, उसका एक संदर्भ होता है, एक बैकग्राउंड (पृष्ठभूमि)। जो कहा जा रहा है, उसको उसके संदर्भ से हटाकर के नहीं समझा जा सकता। समझने की कोशिश करेंगे तो उल्टा-पुल्टा हो जाएगा। कहा कुछ होगा और हम अर्थ कुछ और निकाल लेंगे, क्योंकि अभी हम जिस प्रक्रिया से गुज़रने जा रहे हैं वो ध्यान की नहीं है, वो एक मानसिक प्रक्रिया है, वो मनन की प्रक्रिया है, ध्यान नहीं है, मनन है।
ध्यान प्रक्रिया होती है बुद्ध हो जाने की। मनन प्रक्रिया होती है बुद्ध ने जो कहा है उसको समझने की। अभी हम मनन करने जा रहे हैं। जब आप मनन करते हो तो वो जो शब्द आपके सामने आने जा रहे हैं, उन शब्दों का संदर्भ, आपको ठीक-ठीक पता होना चाहिए। उसके बिना मनन ठीक-ठीक हो नहीं पाएगा, क्योंकि मन तो जीता ही है समय में न। मन का तो अर्थ ही है अतीत, भविष्य। तो समझना पड़ेगा कि वो समय कौनसा था जिसमें बुद्ध ने ये सारे शब्द कहे, उसके बिना इनको ठीक-ठीक जाना नहीं जा सकता।







