राम कोई खिलौना थोड़ी ही हैं, जो कहीं से "मिल जाएँगे"। राम की प्राप्ति जैसा कुछ नहीं होता, अहंकार को मिटाना होता है, और इसी को ‘रामत्व’ कहते हैं। अपनी रोज़मर्रा की हरकतों को देखिए—सुबह से शाम तक क्या किया, क्या सोचा, क्या अनुभव किया; तो पता चलेगा कि बड़ा अंधकार है। और वह स्वयं को जानने से ही मिटेगा। उसके बाद जो शेष बचेगा, उसी को 'राम' बोलते हैं।
यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।
प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। सर, मेरा प्रश्न ये है जैसे कई लोगों को सांसारिक दुख बहुत मिलते हैं या जैसे माया में भी जिन लोगों को दुख बहुत मिलते हैं, तो उन्हें भक्ति मार्ग की तरफ ज़्यादातर जाते हुए देखा जाता है। या तो उन्हें संसार में कुछ नहीं मिल सका इसलिए भक्ति मार्ग की तरफ चले गए। क्योंकि उन्हें कुछ-न-कुछ तो करना था।
इस विषम परिस्थिति को, और इस कष्ट को कैसे दूर किया जाए? अज्ञान को भी कैसे दूर किया जाए, कि सच में श्रीराम मिल जाएँ और दुविधा न रहे कि “माया मिली न राम।”
आचार्य प्रशांत: नहीं, श्रीराम नहीं मिलते हैं, जो श्रीराम को माँगने वाला होता है वो समाप्त हो जाता है; श्रीराम नहीं मिलते। श्रीराम क्या हैं, खिलौना हैं, “लोगन राम खिलौना जाना” कि मिल जाएँगे? छोटे बच्चे को, झुन्नू ने झुनझुना बजा दिया श्रीराम का? श्रीराम कैसे मिल जाएँगे? श्रीराम को मिलने का कुछ मतलब ही नहीं होता। ये थोड़े ही है कि संसार में और कुछ नहीं मिला तो चलो अब श्रीराम को पाने निकल पड़े। श्रीराम की प्राप्ति जैसा कुछ नहीं होता, अहंकार को मिटाना होता है इसी को तो ‘रामत्व’ कहते हैं।
प्रश्नकर्ता: जी।




