क्या बुद्ध नास्तिक थे?

Acharya Prashant

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क्या बुद्ध नास्तिक थे?
आस्तिकता का अर्थ — वेदान्त के प्रति सम्मान। बुद्ध वेदान्त की जितनी गहराई तक पहुँचे थे, उतनी गहराई तक उस समय में कोई ऋषि-मुनि नहीं था जिसको वेदान्त समझ में आता हो। असली वेदान्ती वही हैं। वेद का मर्म कर्मकांड नहीं, वेदान्त है और वेदान्त को सबसे आगे बुद्ध ही बढ़ा रहे थे। वेदान्त अकेला है जो अमर है। अगर आप वेद को कर्मकांड बना दोगे, तो आज की पीढ़ी वेद को भुलाती जाएगी — यह सबसे बड़ा ख़तरा है। यह सारांश प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन के स्वयंसेवकों द्वारा बनाया गया है

प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी। सभी उपनिषद् और वेदान्त भी इसी मूल प्रश्न पर आते हैं कि, आप कौन हो? माने दुख में हो आप, और उद्देश्य एक ही है कि दुख से मुक्ति मिले। बुद्ध के भी चार आर्य सत्य इसी की घोषणा करते हैं — दुख है, कारण है, मुक्ति संभव है, उसका अष्टांग मार्ग है।

आचार्य प्रशांत: बहुत बढ़िया!

प्रश्नकर्ता: तो जब बुद्ध का पूरा दर्शन इसी पर आधारित है, तो उस वक़्त के सभी लोगों ने उनको नास्तिक कहा और ब्राह्मणों ने भी। और आज तक भी दर्शन के क्षेत्र में उनके दर्शन को नास्तिक बोल के ही बढ़ाया जाता है। समझना चाहता हूँ, क्यों?

आचार्य प्रशांत: कुछ नहीं है मूर्खता है, बुद्ध को नास्तिक बोलना पागलपन है।

प्रश्नकर्ता: क्योंकि मेरी समझ में मूल, असली और वेदान्ती वही हैं।

आचार्य प्रशांत: हाँ हाँ। बुद्ध वेदान्त की जितनी गहराई तक पहुँचे थे, उतनी गहराई तक उस समय में कोई ऋषि-मुनि नहीं था, जिसको वेदान्त समझ में आता हो। क्योंकि उनको समझ में नहीं आता था ख़ुद ही वेदान्त, तो जो असली वेदान्ती था उसको घोषित कर दिया, "ये तो नास्तिक है।" इनको लगा कि आस्तिक वो है, जो वेद के कर्मकांड को माने। और कर्मकांड के नाम पर लगे हुए हिंसा करने में, जानवर काटने में। असल में खेल सारा जानवर के ही कटने का था, समझो बात को। मूल बात वही थी, उनको काटने थे जानवर और लोगों से उगाने थे पैसे, धनधान्य और माँस तो है ही है।

बुद्ध ने कहा, "ये सब नहीं चलेगा। पहली बात, इसमें धर्म कहीं नहीं है। दूसरी बात, तुम सीधे-साधे लोगों को लूट रहे हो। और तीसरी बात, ये जानवरों को मारना तो मैं बर्दाश्त कर ही नहीं सकता।"

तो उन्होंने कहा, "तू नास्तिक है क्योंकि ये तो कर्मकांड है, हमारे उसमें लिखा हुआ है, वेद में तो हम करेंगे। और अगर तू इसको नहीं मान रहा है, तो माने — तू वेद को नहीं मान रहा है तो तू नास्तिक हो गया।" एकदम गलत बात है ना। वेदों का जो मर्म है, रस है, वो कर्मकांड थोड़े ही है। वो क्या है? वो तो वेदान्त है और वेदान्त को सबसे ज़्यादा आगे कौन बढ़ा रहे हैं? स्वयं बुद्ध। तो अगर कोई सबसे बड़ा आस्तिक है, तो कौन है?

श्रोता: बुद्ध हैं।

आचार्य प्रशांत: तो ये मत कहो कि, "बुद्ध को नास्तिक बोला।" ये पूछो कि, "किसने?" जो कर्मकांडी हैं, उनको तो बुद्ध नास्तिक ही लगेंगे। वो तो नास्तिक ही लगेंगे। और बुद्ध को नास्तिक जब आप बोलते हैं, तो आप एक बहुत ख़तरनाक बात खड़ी कर देते हैं। आप कह देते हैं कि, "वेद का अर्थ ही है बस कर्मकांड।" और जैसे ही आप वेद का अर्थ कर्मकांड कर देंगे, जानते हैं उसका असर क्या होगा? असर ये होगा कि वेद धीरे-धीरे खोते जाएँगे। कितने लोगों ने वेद पढ़ा है आज? क्योंकि कर्मकांड एक समय की चीज़ थी। जो उस समय कुछ लोगों को ठीक लगी। उस वक़्त ना विज्ञान बहुत विकसित था, ना सूचनाएँ थीं, कुछ नहीं।

तो वो एक समय की बात थी, कि इस समय पर हमें लगता है कि इसी तरीक़े से पानी की ताकत को प्रसन्न करा जा सकता है, कड़कने वाली बिजली को प्रसन्न करा जा सकता है। वो इंद्र बैठा हुआ है जो सब देवताओं का शिरोमणि है उसको प्रसन्न कर सकते हैं। और अग्नि है, जो कि तरीक़े-तरीक़े से काम आती है, उसको हम ख़ुश कर सकते हैं। तो वो एक समय की बात थी, जब ज्ञान इसी स्तर पर था। समझ रहे हो? वो समय तो बीत गया।

अब आज की पीढ़ी कैसे उस चीज़ को स्वीकार करेगी? तुम बोलोगे, कि "हे इंद्र! तू हमारी फसलें ठीक कर दे," या "बारिश कर दे वरुण," या "मित्र" या कुछ भी। तो जो आज की पीढ़ी है, वो क्या बोलेगी? आज का जो जवान लड़का है वो क्या बोलेगा? बोलेगा — "भाई, अगर पानी चाहिए तो उसके लिए नहर है और बाँध है। आर्टिफ़िशियल रेन भी है।" बिजली चाहिए तो उसके लिए बोलो, न्यूक्लियर रिएक्टर है। प्रकाश चाहिए तो उसके लिए, ये बल्ब लगे हुए हैं। इसमें देवता लोग कहाँ से आ गए?

तुम्हें प्रकृति से संबंधित जो भी चीज़ें चाहिए, उसके लिए तो विज्ञान है। उसमें देवताओं की ज़रूरत कहाँ बची? कहते, "हमारी गाय ज़्यादा दूध दे।" गाय भी ज़्यादा दूध दे, तो उसके लिए तुमने जेनेटिकली मॉडिफ़ाइड गाय बना दी है। उसके लिए भी तुम्हें देवता नहीं चाहिए।

अगर आप वेद को वही बना दो — ये कर्मकांड, तो आज की पीढ़ी वेद को बिल्कुल भुलाती जाएगी, पीछे छोड़ती जाएगी। वो सबसे बड़ा ख़तरा है। लेकिन अगर आप वेद को वेदान्त मानोगे, तो वेद अमर हो जाएँगे। वेदों को बचाना है अगर, तो वेद से आशय वेदान्त होना चाहिए।

फिर आप कहते हो, "आज की पीढ़ी संस्कारहीन हो रही है, धर्म को भूल रही है।" कैसे धर्म को याद रखें? धर्म के नाम पर आप उसे ये सब बातें बताओगे अगर कि फ़लाना यज्ञ करने से वर्षा हो जाती है। तो वो साइंस पढ़ा हुआ लड़का आपका मुँह देखेगा, हँसेगा और क्या करेगा?

वेद की एक ही चीज़ है जो अमर है, जो कभी भी पुरानी नहीं पड़ेगी, वो कौन सी चीज़ है? वेदान्त। क्योंकि वेदान्त किसकी बात करता है? आदमी के मूल बंधन की। जब तक इंसान है, उसका मूल बंधन रहेगा। और जब तक वो मूल बंधन रहेगा, तब तक वेदान्त सार्थक रहेगा और प्रासंगिक रहेगा और उपयोगी रहेगा। तो वेदान्त अकेला है जो अमर है।

आस्तिकता का अर्थ होना चाहिए, वेदान्त के प्रति सम्मान। जो वेदान्त को सम्मान देता है, वो आस्तिक है। यही आस्तिकता की परिभाषा होनी चाहिए।

आस्तिकता की और कोई नहीं परिभाषा। आप बैठकर के यज्ञ करते हो लकड़ी जलाते हो, इससे आप आस्तिक नहीं हो गए। आप बाक़ी तमाम तरीक़े के मंत्रोच्चार करते रहते हो बैठे-बिठाए, उससे आप आस्तिक नहीं हो गए। आस्तिक माने वही, जो वेदान्त में आस्था रखता है। और अगर आप ये परिभाषा नहीं स्वीकार करोगे, हिंदू समाज अगर इस परिभाषा को नहीं मानेगा, तो नतीजा ये होगा कि आने वाली पीढ़ियाँ पूरे तरीक़े से वेद-विमुख हो जाएँगी। और वो हो चुका है।

मैं फिर पूछ रहा हूँ, बताओ ना किसने वेद पढ़े? आप में से ही किसने वेद पढ़ा है? बताओ। हाँ, आप में से कुछ लोगों ने अब वेदान्त जान लिया है, क्योंकि कुछ उपनिषद् जान लिए हैं, और भगवद्गीता जान ली है — यही हुआ है ना? अच्छा ठीक है। मैं आपसे कहूँ कि मैं कर्मकांड का एक कोर्स शुरू कर रहा हूँ, चलिए हाथ खड़े करिए कितने लोग आना चाहते हैं? ये क्या हो गया? कोर्स फ्लॉप हो गया! ये होगा।

और लगी हुई है पूरी जो हिन्दुओं की पुरोहितों की जमात है, कि इनको हम क्या बता दें? वो बता रहे हैं कि देखो, अथर्ववेद में जादू-टोना है तुम भी जादू-टोना सीखो। अरे नहीं सीखेगी ये पीढ़ी! नहीं सीखेगी। चारों तरफ़ विज्ञान ही विज्ञान है, तुम उनको नहीं कन्विन्स कर पाओगे जादू-टोने के लिए। कुछ समय तक कर भी सकते हो कुछ मूर्खों को, पर धीरे-धीरे वो सब इन बातों को पीछे छोड़ देंगे।

अरे! वेद वाला आइडिया तो फ्लॉप हो गया, अब वेदान्त वाले आइडिया पर। हाँ जी, वेदान्त पर है — कितने लोग आना चाहते हैं? (श्रोतागण हाथ उठाते हैं)। अरे ये सब तो लगता है, पहले ही गीता में हैं। ये अंतर है वेद और वेदान्त में।

वेदान्त हमेशा हमें प्यारा रहेगा, क्योंकि वेदान्त मनुष्य मात्र की प्यास है। बाक़ी सब बातें समय की धूल बन जानी हैं।

विश्व के जितने धर्म हैं, इनका कोई भविष्य नहीं है। जैसे विवेकानंद कहा करते थे ना, 'भविष्य का धर्म तो वेदान्त मात्र है।' जो बात मैं वैदिक कर्मकांड के लिए बोल रहा हूँ, वो मैं विश्व के सब धर्मों के लिए बोल रहा हूँ। जितने तुमने फालतू की रस्म, रवायत, परंपरा बाँध रखी है धर्म के नाम पर ये समय की धूल हो जानी है, बहुत जल्दी। हो चुकी है।

कितने ईसाई हैं जो ईसाइयत का वैसे ही पालन करते हैं जैसे 100 साल पहले होता था? बताओ। जो चर्च वाली ईसाइयत है जीसस वाली नहीं, जो चर्च वाली ईसाइयत है — उसको तो रेनेसाँ ने ही ख़त्म कर दिया था। 300 साल पहले ख़त्म हो चुकी वो। और अगर आप नई ईसाइयत नहीं ले कर आओगे, तो वही होगा जो हो रहा है। वो सारे जितने ईसाई हैं, वो अपने आप को अब एथिस्ट घोषित करते हैं।

ऐसे-ऐसे देश हैं जिनकी तिहाई आबादी अपने आप को एथिस्ट घोषित कर चुकी है — एथिस्ट और एग्नॉस्टिक। कहते हैं, हमें लेना-देना नहीं है क्रिश्चियनिटी से, हमें कोई मतलब ही नहीं। क्योंकि वो कहते हैं, क्रिश्चियनिटी का यही तो मतलब है कि वहाँ पर जाकर के बोल रहे हो कि ये कर दिया, वो कर दिया, वो गाने गा दिए और ईस्टर पर और क्रिसमस पर ये कर दिया। कहता है, ये सब हमें करना ही नहीं। हमें समझ में नहीं आता इसका मतलब क्या है, बेकार की बात है।

एक ही चीज़ है जो इटरनल है, मैन’स क्वेस्ट फ़ॉर लिबरेशन। उसके अलावा कुछ इटरनल नहीं है। बाक़ी सब जैसे एक दिन आया था, वैसे ही एक दिन चला जाता है।

वेदों को भी बचाना है तो बस एक ही तरीक़ा है, क्या? वेदान्त। पृथ्वी भर को ही अगर बचाना है तो एक ही तरीक़ा है, वेदान्त।

क्योंकि हमारी जितनी समस्याएँ हैं, वो सारी समस्याएँ हमारे विक्षिप्त मन से उठ रही हैं। और मन का उपचार करता है, वेदान्त। तो मैं इसलिए वेदान्त को आगे ला रहा हूँ। और हैं कुछ पागल लोग, जो कहते हैं कि बुद्ध नास्तिक हैं। अब क्या बताएँ उनको? वो मुझे भी नास्तिक ही बोलते हैं। अभी ये बिल्कुल बाज़ार में चीज़ बढ़िया से फैल चुकी है कि, "ये नास्तिक है।"

प्रश्नकर्ता: एक और प्रश्न है, आपका जो विरोध कर रहे हैं, वो बड़ी-बड़ी ताक़तें हैं जो सो कॉल्ड अपने आप को धार्मिक कहते हैं। क्योंकि ज़्यादा जो मात्र मतलब उनके जो भोग हैं या उनका जो भी धर्म है, जो नकली धर्म है। जो लोग जाग रहे हैं, उसका विरोध कर रहे हैं तो उनको ज़्यादा नुकसान पहुँचता है।

ऐसे ही बुद्ध के समय पर हुआ था।

तो इसलिए जो नाम के उस वक़्त के ऋषि वग़ैरह थे, उन लोगों ने उनका विरोध किया। और वैसे आज के भी जो नाम के पंडित और पुरोहित हैं, वो आपका विरोध कर रहे हैं इसीलिए। और वही लोग जनता को भी मैनिपुलेट करते हैं इसके लिए।

आचार्य प्रशांत: हाँ जनता को भड़का रहे हैं, ठीक है। उनका काम उनको करने दो। हमारा काम हमें करने दो। बहुत बुद्ध हुए हैं। उसमें से किसी बुद्ध को कोई अशोक मिल जाता है, नहीं तो बुद्ध तो तब भी आनंदित ही हैं। अशोक कोई खड़ा हो गया, तो जो बात है वो फैल जाएगी चारों ओर। नहीं भी खड़ा होता, तो बुद्ध कोई एक थोड़े हुए हैं। आप तो बस उन्हीं बुद्ध को जानते हैं ना, जो प्रसिद्ध हो गए। ठीक है।

अपना काम करने वाले बाक़ी भी कोई कम नहीं थे, अपना वो मस्त रहे। बौद्ध धर्म में जब द बुद्धा बोलते हैं, तो उससे आशय होता है — बोध मात्र। उससे आशय ‘गौतम द बुद्धा’ नहीं होता। गौतम तो एक बुद्ध हैं और द बुद्धा माने रियलाइज़ेशन इटसेल्फ। तो कई बुद्ध हैं।

प्रश्नकर्ता: सभी आत्मज्ञान को...

आचार्य प्रशांत: और इस पर हमारा कोई बस है नहीं कि अशोक मिलेगा कि नहीं मिलेगा। हमारा जिस पर अधिकार है, हम वो काम अपना पूरे से करेंगे। उसके बाद ठीक है, खेल है। शाक्यमुनि बुद्ध बोलते हैं उनको। तो शाक्यमुनि के अलावा और भी कितने मुनि हुए हैं, सबको अशोक नहीं मिले। काम तो उन्होंने तब भी अपना करा।

प्रश्नकर्ता: धन्यवाद।

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। जैसे कि पिछले प्रश्न से ही संबंधित है कि हम आज से कई सौ वर्षों पुरानी बात कर रहे हैं, जब बुद्ध का समय था। आज समय दूसरा है, तकनीक है, तकनीक का युग है। तो आज के समय का अशोक कैसा होगा? जो उसको समर्थन देगा।

आचार्य प्रशांत: जिस किसी को भी बात समझ में आती हो और बात दूसरों तक पहुँचाने का दम रखता हो। अशोक कोई व्यक्ति नहीं है, अशोक एक भाव है। उसको अशोकत्व बोल दो — तो एक भाव है। वो एक व्यक्ति भी हो सकता है, वो एक संस्था भी हो सकती है, वो व्यक्तियों का एक समूह भी हो सकता है। वो कुछ भी हो सकता है। अशोक तो कुछ भी हो सकता है।

तो अशोक का मतलब है कि कोई ऐसा, जिसको समझ में भी आ गई बात और आगे उसको समझानी भी है — वो हुआ अशोक। तो वो कोई भी हो सकता है, सामर्थ्य और समझ जिसमें हो। समझ है और सामर्थ्य।

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मैं आपसे ये पूछना चाहूँगा कि असली अर्थ क्या है, आप ये जो संतों की वाणियाँ सिखा रहे हैं सर, ये हम स्कूल में, कॉलेज में, इंटरनेट पर बचपन से पढ़ते हुए आ रहे हैं, है ना? लेकिन जैसे-जैसे हम आगे बढ़ते रहते हैं, अर्थ चेंज होते रहते हैं हमारे लिए। बचपन में किसी चीज़ का अर्थ और था, अभी अलग है। और हो सकता है आने वाले समय के बाद कुछ अर्थ अलग होगा।

और ये हमारे एक्सपीरियंस के ऊपर भी डिपेंड करता है। और आप बोलते हैं कि, एक्सपीरियंस और एक्सपीरिएंसर दोनों छूटे हैं करके और संतों ने ये जो लिखा है सर, ये अपने ऊँचे स्तर के हिसाब से लिखा है, तो हम इसका असली अर्थ कैसे अनुमान लगा सकते हैं? असली अर्थ कैसे समझ सकते हैं? कैसे समझ में आएगा ये?

आचार्य प्रशांत: जैसे-जैसे आपका दुख असली होता जाता है, वैसे-वैसे इसका अर्थ असली होता जाता है।

नकली दुख क्या होता है?

"सेल लगी थी, पहुँचने में देर हो गई, सेल हट गई।"

प्रश्नकर्ता: भौतिक चीज़ों का दुख।

आचार्य प्रशांत: हाँ, भौतिक में भी कई तरह के दुख होते हैं ना। तीन तरह के दुख तो हमको वेदान्त ने ही बता दिए हैं, याद है ना? आधिभौतिक, आधिदैविक और आध्यात्मिक। तो ये जो तीन दुख बताए हैं, इनके भी आप कई और तल बना सकते हैं बीच में कि भौतिक सबसे नीचे का दुख होता है, भौतिक में भी दो-चार और तल बना लीजिए ख़ुद ही। वैसे आधिदैविक में भी कुछ। ऐसे आध्यात्मिक में भी।

तो जैसे-जैसे आपके दुख का तल बढ़ता जाता है, वैसे-वैसे इनके शब्दों का अर्थ खुलता जाता है। कोई बड़ी बात नहीं कि जिसका सबसे बड़ा दुख यही हो, कि उसके सजना उसको शॉपिंग नहीं कराते। होते हैं बहुत सारे, उनको यही दुख है। उसके लिए इसका यही अर्थ हो कि "अमरपुर" जो है, वो कोई नई शॉपिंग मॉल है — "अमरपुर ले चलो सजना।" बिल्कुल हो सकता है। अब दुख ही आपका जब एकदम निम्न तल का है, तो इसमें से जो अर्थ आएगा वो भी निम्न तल का होगा।

साहब की बातों का अर्थ वही जान पाएगा जिसका दुख अब ना भौतिक है, ना दैविक है, बल्कि आध्यात्मिक है।

भौतिक दुख क्या होता है?

भौतिक दुख होता है, जहाँ आपको साफ़-साफ़ पता है कि किस पदार्थ से आपको दुख हो रहा है। पाँव में काँटा लगा है — एक पदार्थ आ गया, अतिरिक्त ज़बरदस्ती पाँव में घुस गया उससे, ये आधिभौतिक दुख है। ठीक है? बाज़ार में हीरा आया है, ख़रीद नहीं पा रहा हूँ — ये भी आधिभौतिक दुख है। पाँव में काँटा अधिक हो गया था, और हीरा जेब में कम है, तो एक के होने से दुख था एक के ना होने से दुख है। ये आधिभौतिक ही है।

आधिदैविक दुख होता है — जो होता तो भौतिक ही है, पर जिसका कारण पता नहीं है। तो आप कारण कह देते हो संयोगिक है, दैविक है। ठीक है?

बारिश ज़्यादा हो गई, फसलें चौपट हो गईं, तो इसको कह देते हैं आधिदैविक दुख है। बारिश ज़्यादा हो गई, ग़लत समय पर बारिश हो गई, फसल चौपट हो गई, ये आधिदैविक दुख हो गया। ठीक है? बाहर घूमने निकले थे, धूप ज़्यादा मिल गई। या टिकट कटा के कहीं गए थे हनीमून मनाने वहाँ पाँच दिन तक बारिश ही बारिश होती रही, कोई घूमने को नहीं मिला, ये सब। इनको बोलेंगे आधिदैविक, ये दैव प्रकोप है। ये सब भौतिक ही बातें हैं। टेक्नोलॉजी आगे बढ़ जाएगी तो ठीक-ठीक किसी जगह का भी जो मौसम है, वो फोरकास्ट कर पाओगे। सब पता रहेगा। सब भौतिक बातें हैं।

आप अभी अगर उसी हालत में हो कि आपके लिए कहीं सेल लगी है, कहीं का मौसम बहुत मायने रखता है, कहीं व्यापार में घाटा हो गया, नुकसान-फ़ायदा देख रहे हो, तो इन बातों के भी ये जो सब साखियाँ हैं, भजन हैं — इनके भी अर्थ आपके लिए बहुत निचले रहते हैं।

आध्यात्मिक दुख क्या होता है? आध्यात्मिक दुख होता है जब आप कहते हो, "भौतिक तो जो पाया जा सकता था, सब मिला ही हुआ है लगभग, लेकिन तब भी कुछ है जो कचोट रहा है।" ऐसे लोगों के लिए सचमुच फिर वरदान होते हैं संतों के शब्द। आध्यात्मिक दुख वो है, जिसका कोई भौतिक कारण नहीं है। समझ में आ गया है कि रुपए से, पैसे से, नई इमारत से, पाँच गाड़ियाँ और ख़रीद ली या कुछ भी और, जो भी भौतिक प्रपंच हो सकता है करने से दुख जा नहीं रहा है। एक सूनापन है, जो बना ही रहता है। वो कहलाता है आध्यात्मिक दुख।

संतों की बातें उनके लिए हैं, जिनको आध्यात्मिक दुख है। जिनको आधिभौतिक दुख है, उनके लिए मनरेगा (MGNREGA) है। ठीक है, तुम जाओ वहाँ से अपना जो भी ₹20 मिलता है, ले लो। तुम क्या करोगे वहाँ पर ये गीता के श्लोक पढ़ के? समझ में आ रही है बात?

लेकिन फिर ऐसे लोग भी इनके साथ जुड़े रहे, तो संतों ने फिर उसमें तरकीब लगाई। बोले "ऐसा करो, इनको ना मधुर गीत जैसा बना दो, तो गाना तो शुरू करें। और इनको अर्थ भी कई तलों के दे दो, ताकि जो निचले तल का आदमी है उसको भी इसमें से कुछ लाभ तो हो ही जाए।" तो फिर वही हुआ कि भाई जो है ना कि —

"बड़ा हुआ तो क्या हुआ जैसे पेड़ खजूर, पंथी को छाया नहीं, फल लागे अतिदूर।"

अब ये पाँचवीं क्लास में टीचरें पढ़ा रही होती हैं, और लाभ भी कुछ हो ही जाता है। पूरा लाभ नहीं होता, पर कुछ लाभ हो जाता है। ये एक युक्ति है। पाँचवीं क्लास में आप गीता का श्लोक नहीं पढ़ा पाओगे, बिल्कुल वो लाभहीन हो जाएगा। पर संतों ने करुणा के चलते अपनी बात को ऐसा कर दिया, कि पाँचवीं के बच्चे को भी पढ़ा सकते हो। भले ही उससे उसको लाभ नहीं होगा। पर आप उसको बता सकते हो। कम से कम उसके कान में घुस गया, मन में याद आ गया। अभी नहीं काम आएगा, धीरे-धीरे आगे परतें जब खुलेंगी, तो आगे काम आएगा।

तो ये मत सोचिएगा कि ये बात आपको समझ में आ गई। ये बात आपके लिए उतनी ही अभी सार्थक हुई है, जितनी गहरी आपकी पीड़ा है। ये टैंक है, और आपकी कुल लड़ाई है पड़ोस के झुन्नू लाल से। तो आइए, आपके कितना काम आएगा? ये सब बातें उनके लिए हैं, जिन्होंने जीवन में बड़े पंगे लिए हों। समझ में आ रही है बात?

जो अभी छोटे मुद्दों में उलझे हुए हैं, तो क्या उनका होगा? कुछ नहीं। “बगल वाले ने मेरे घर के सामने गाड़ी पार्क कर दी,” संयुक्त राष्ट्र संघ में ये बात उठाई जानी चाहिए! उनके लिए ये नहीं है, उनको तो बस अधिक से अधिक ऐसे ही है क्या कुछ भी, समोसा खिला दो खुश हो जाएँगे।

बड़ा दर्द! बड़ा दर्द जब हो, तब ये चीज़ें काम आती हैं।

प्रश्नकर्ता: सर इसके ऊपर ये एक फॉलो-अप क्वेश्चन रहेगा, कि ये बड़ा दुख उठाने के लिए बड़ी चुनौतियाँ उठानी पड़ेंगी।

आचार्य प्रशांत: ईमानदारी चाहिए, क्योंकि बड़ा दुख लाना थोड़ी पड़ता है। बड़ा दुख तो है। हर बच्चा वो बड़ा दुख लेकर पैदा होता है। बड़ा दुख है। बहुत सारे लोग उस बड़े दुख को - हाँ, शर्ट सस्ती मिल रही थी, ख़रीद लाए मज़ा आ गया, कोई दुख नहीं है। ₹4000 की शर्ट ₹2200 में लेके आए हैं, तीन दिन तक बिल्कुल मूड हरा-हरा है। तो ईमानदारी चाहिए न, कि क्या करेगा तू 1800 बचा करके? तेरी छाती में इतना बड़ा सुराख है। 1800 बचा के क्या मिल गया तुझे?

बड़ा दुख सबको है, पर सब में इतनी ईमानदारी नहीं है कि स्वीकार करें कि वो गहरे दुख में हैं। कारण बिल्कुल स्पष्ट है — मान लिया कि गहरे दुख में हो, तो गहरी ज़िम्मेदारी उठानी पड़ेगी न।

ज़िम्मेदारी से बचता है अहंकार, नहीं मानते कि दुख है सब घूम रहे हैं, हैप्पी हैप्पी। अभी कोई बोल रहा था कि जो एक वो रैंकिंग निकलती है न हैप्पीएस्ट कंट्रीज़ ऑन द अर्थ, तो हैप्पीएस्ट कंट्रीज़ की रैंकिंग ली। नहीं-नहीं, वो तो ठीक है, उसका कोरिलेशन निकाला एंटी-डिप्रेसेंट कन्जम्प्शन से। बड़ा तगड़ा कोरिलेशन आया, जितनी हैप्पी कंट्री है उसमें एंटी-डिप्रेसेंट का उतना तगड़ा कन्जम्प्शन चल रहा है। झूठ बोलने में क्या जाता है? "हम हैप्पी हैं, हैप्पी हैं।" और फिर जाकर क्या करो? डिप्रेशन की गोली खा लो। "हम तो हैप्पी हैं!"

नहीं तो कैसे होगा कि जो देश सबसे अपने आप को हैप्पी बोलते हैं, वहाँ पर कैपिटा एंटी-डिप्रेसेंट कन्जम्प्शन एकदम चढ़ा हुआ है? ये कौन सी हैप्पीनेस है?

इधर कौन हैप्पी हुआ था?

प्रश्नकर्ता: सर, आपने एक पॉइंट बोला था अबाउट टेकिंग रिस्पॉन्सिबिलिटी, ज़िम्मेदारी। तो उसमें एक सवाल जो मेरे दिमाग़ में काफ़ी टाइम से है, और ये मैंने पर्सनली एक्सपीरियंस भी करा है कि ये ज़िम्मेदारी जो बोल रहे हैं, इस ज़िम्मेदारी का, रिस्पॉन्सिबिलिटीज़ का बर्डन कैरी करने के लिए, आई डोंट फील द स्ट्रेंथ, कि मैं उसके कॉन्सिक्वेंसेस क्या बियर कर सकता हूँ क्योंकि दिस सीम्स लाइक वन-वे पाथ। इट इज़। एक बारी जाता हूँ तो देयर इज़ नो लुकिंग बैक।

आचार्य प्रशांत: अब सुनिए, अच्छा कि आपने प्रश्न पूछ लिया। ज़िम्मेदारी आती है न, आपकी स्ट्रेंथ चेक करने नहीं, डेवलप करने भी नहीं, बल्कि रिवील करने। स्ट्रेंथ आप में है, पर वो छुपी रहेगी जब तक आप ज़िम्मेदारी नहीं उठाओगे। तो —

ज़िम्मेदारियाँ आपकी परीक्षा लेने भी नहीं आतीं, आपके बल का विकास करने भी नहीं आतीं, आपके बल का उद्घाटन करने आती हैं।

जो ज़िम्मेदारी नहीं ले रहा, उस बेचारे को कहीं पता ही नहीं चलेगा उम्र भर कि उसमें फौलाद कितना था। जो भीतरी चीज़ होती है वो बोलती है, "मैं प्रकट ही तभी होंगी जब मेरी कोई उपयोगिता हो।" जब मेरी ज़रूरत ही नहीं, जैसे कोई ऑटोमैटिक कार हो, आप उसको 20 पर चला रहे हो, उसमें पाँचवाँ गियर लगेगा ही नहीं। आप कह रहे हैं, "हमेशा सेकंड गियर में चलती रहती है।" वो कह रही है, "तुम एक्सेलरेटर दबाओ तो सही, तुम 100 पहुँचाओ तो सही, तुम 100 पहुँचाओ फिर देखो हम छठा लगाते हैं कि नहीं।"

आप में ताक़त कितनी है, वो प्रदर्शित ही होता है जब आप चुनौती उठाते हो। और चुनौती छुपी रहे, और ताक़त छुपी रहेगी जब तक आप चुनौती नहीं उठाओगे, एकदम छुपी रहेगी। और आपको यही भ्रम बना रहेगा कि "हम तो बलहीन हैं।"

आप बलहीन नहीं हो। अगर कोई अपने आप को बलहीन मान रहा है, तो इसका मतलब है वो श्रद्धाहीन है। उसने कभी भरोसा करके चुनौतियाँ उठाई नहीं। इसीलिए कभी उसकी ताक़त सामने आई नहीं। उसमें कमी बल की नहीं, भरोसे की है। बल की कमी किसी में नहीं होती।

देखिए बाहर का नियम होता है कि बल पहले हो, चुनौती बाद में आएगी। यही होता है न? ये स्थूल जगत का नियम है। वहाँ कहते हैं, "भाई, जितनी जान हो, उतना ही वजन उठाओ।" आंतरिक जगत का नियम उल्टा है, 'जितना वजन उठाओगे, उतना स्वयं को बलि पाओगे।' हम बाहर का नियम भीतर में लगा देते हैं ग़लती हो गई। 200 किलो ऐसे उठा लोगे तो क्या होगा? टूट जाएगा। तो हम सोचते हैं, यही नियम भीतर लगता होगा। "ज़्यादा बड़ी चुनौती उठा ली तो हम टूट जाएँगे।" नहीं, ऐसा नहीं है।

ज़्यादा बड़ी चुनौती उठा लोगे, तो बस भ्रम टूटेंगे आपके और कुछ नहीं टूटेगा। और भ्रम आपका ये है कि, "आप तो पिद्दु बाबा हो।" मेरा नाम है, पिद्दु बाबा। हाँ, मैं जिसकी तिसकी गोद में बैठा रहता हूँ, क्योंकि मैं हूँ पिद्दु बाबा। चुनौती उठाओ और देखो क्या होता है। इसीलिए चुनौती उठाते नहीं, पिद्दु बाबा को गोदी की आदत लग गई है।

वो एक कहा है न किसी ने, बड़ा काव्यात्मक, 'आवर डीपेस्ट फीयर इज़ दैट वी आर पावरफुल बियॉन्ड मेज़र।' यहाँ से नहीं (बाजुओं की ओर इंगित करते हुए) ये तो कुछ भी नहीं है, ऐसे ही है यहाँ से (हृदय की ओर इंगित करते हुए)।

प्रश्नकर्ता: सर, हाउ कैन दैट बी अ फीयर?

आचार्य प्रशांत: पिद्दु बाबा नहीं रहोगे न फिर। पिद्दु बाबा तो ख़त्म ही हो जाएगा न, पावरफुल हो गया तो। तो डर किसको है? पिद्दु बाबा को। हाँ, पिद्दु बाबा को। "मैं तो नहीं बचूँगा न!" सेठ जी पैसा छुपा के रखते हैं, बताओ क्यों? वो बार-बार यही दिखाते हैं, "मैं तो पिद्दु बाबा हूँ।" बताओ क्यों? बहुत सारी ज़िम्मेदारियाँ उठानी पड़ेंगी और टैक्स भी देना पड़ेगा। अच्छा है कि ऐसे बन जाओ कि कुछ है ही नहीं।

प्रश्नकर्ता: सर, जब आप लोगों की रिस्पॉन्सिबिलिटी.. आपने एक और चीज़ बोली थी कि आपकी ग्रोथ में लोगों की रिस्पॉन्सिबिलिटी लेना वाज़ अ बिग स्टेप फॉर यू। क्या वो लोगों को कॉम्प्लेसेंट बनाता है?

मैं भी बहुत चाहूँगा कोई मेरे पास गुरु रहे, जो मुझे गाइडेंस दे। लेकिन अगर मुझे लगता है, गुरु इज़ कैरिंग माई वेट, देन मैं ख़ुश हूँ, वैसा।

आचार्य प्रशांत: वो कॉम्प्लेसेंट बनेंगे, तो मेरी ज़िम्मेदारी होगी उनकी कॉम्प्लेसेंसी तोड़ना। ले दे कर, वो ज़िम्मेदारी भी मेरी अपनी गरिमा के प्रति है। आप मेरे पास हैं, और मेरे पास होने के कारण आपका नुकसान हो गया, ये अपनी डिग्निटी, अपनी गरिमा के कारण मुझे अस्वीकार है न। आप अगर यहाँ आए हैं, तो आपको बेहतर होना पड़ेगा। आप यहाँ से वैसे ही लौट गए बल्कि बदतर होकर या खाली हाथ लौट गए तो कुछ न कुछ हमने भी ग़लत ही किया होगा फिर।

This article has been created by volunteers of the PrashantAdvait Foundation from transcriptions of sessions by Acharya Prashant
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