आस्तिकता का अर्थ — वेदान्त के प्रति सम्मान। बुद्ध वेदान्त की जितनी गहराई तक पहुँचे थे, उतनी गहराई तक उस समय में कोई ऋषि-मुनि नहीं था जिसको वेदान्त समझ में आता हो। असली वेदान्ती वही हैं। वेद का मर्म कर्मकांड नहीं, वेदान्त है और वेदान्त को सबसे आगे बुद्ध ही बढ़ा रहे थे। वेदान्त अकेला है जो अमर है। अगर आप वेद को कर्मकांड बना दोगे, तो आज की पीढ़ी वेद को भुलाती जाएगी — यह सबसे बड़ा ख़तरा है।
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प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी। सभी उपनिषद् और वेदान्त भी इसी मूल प्रश्न पर आते हैं कि, आप कौन हो? माने दुख में हो आप, और उद्देश्य एक ही है कि दुख से मुक्ति मिले। बुद्ध के भी चार आर्य सत्य इसी की घोषणा करते हैं — दुख है, कारण है, मुक्ति संभव है, उसका अष्टांग मार्ग है।
आचार्य प्रशांत: बहुत बढ़िया!
प्रश्नकर्ता: तो जब बुद्ध का पूरा दर्शन इसी पर आधारित है, तो उस वक़्त के सभी लोगों ने उनको नास्तिक कहा और ब्राह्मणों ने भी। और आज तक भी दर्शन के क्षेत्र में उनके दर्शन को नास्तिक बोल के ही बढ़ाया जाता है। समझना चाहता हूँ, क्यों?
आचार्य प्रशांत: कुछ नहीं है मूर्खता है, बुद्ध को नास्तिक बोलना पागलपन है।
प्रश्नकर्ता: क्योंकि मेरी समझ में मूल, असली और वेदान्ती वही हैं।




