
अन्तरिक्षचयाणां च दानवोत्तम पक्षिणाम्। उत्तिष्ठते यथाकालं मृत्युर्बलवतामपि।।
दानवश्रेष्ठ! आकाश में विचरणे वाले बलवान पक्षियों के समक्ष भी यथासमय मृत्यु आ पहुँचती है। ~ आजगर गीता, श्लोक १६
दिवि सञ्चरमाणानि ह्नस्वानि च महन्ति च। ज्योतींष्यपि यथाकालं पतमानानि लक्षये।।
आकाश में जो छोटे-बड़े ज्योतिर्मय नक्षत्र विचर रहे हैं, उन्हें भी मैं यथासमय…

इदमिदमिति तृष्णयाऽभिभूतं जनमनवाप्तधनं विषीदमानम् ।

बड़े मैच में उतरते ही हाथ बेड़ियों में जकड़े लगते हैं, और हम घबराहट सँभालने की कोई तरकीब खोजते हैं। पर मैदान बदल जाता है, भीतर का केंद्र नहीं बदलता। जो रोज़ की ज़िंदगी में हर काम से मनचाहा नतीजा माँगता है, वह बड़े दिन भी वही माँग लेकर उतरता है। मेडल पक्का होते ही दबाव उतर जाना भी यही बताता है, और जो जीत पर इतराता है, वही हार से घबराता है। ज़िंदगी की ऊँचाई हमेशा मेडल के रूप में सामने नहीं आती। क्या हम देख पाएँगे कि हम नतीजे को कितना पकड़े हुए हैं?
निपुणमनुनिशाम्य तत्त्वबुद्ध्या व्रतमिदमाजगरं शुचिश्चरामि ।।
जो ये मिले, वो मिले—इस तरह तृष्णा से दबे रहते हैं और धन न मिलने के कारण निरंतर विषाद करते हैं, ऐसे लोगों की दशा अच्छी तरह देख कर तात्विक बुद्धि से संपन्न हुआ मैं पवित्र भाव से इस आजगर-व्रत…

नवरात्रि आते ही हम सोचने लगते हैं कि क्या खाना है, क्या नहीं खाना, कौन-सा हवन करना है। पर व्रत का अर्थ है संकल्प, और शुभ संकल्प एक ही है: हम जैसे हैं, वैसे न रहें। इसीलिए ये नौ दिन दुर्गा सप्तशती को समझने के लिए हैं, केवल रस्मों के लिए नहीं। जिसे हम माँ कहते हैं, वह यह पूरी प्रकृति है, और उसके ही बच्चों को चोट पहुँचाकर उसका पर्व नहीं मनाया जा सकता। क्या इस बार हम नौ दिन अपने ही जीवन को ईमानदारी से देख पाएँगे?

कोई खिलाड़ी देश के लिए मेडल जीतकर लौटती है, और बधाई के साथ ही सवाल आता है कि खुशखबरी कब दोगी। उम्र का पैमाना और परिवार की अपेक्षा मिलकर उसकी पूरी मेहनत को एक देह की भूमिका तक सीमित कर देते हैं। पर सफलता केवल वह नहीं जिसे दूसरे गिन सकें। जब हम स्वयं को देह भर मान लेते हैं, तो हमारे विचार, लहजा और अपनी छवि तक उसी में बँध जाते हैं। इंसान बनकर जीना और किसी के हाथों न बिकना अपने आप में बड़ी और बिरली सफलता है। हमारे लिए असली खुशखबरी क्या है?

35 की उम्र आते ही खिलाड़ी महिला से कहा जाने लगता है कि अब खेल छोड़ो, बच्चों को मौका दो। हम मान लेते हैं कि यह उम्र और शरीर की मजबूरी है। पर ध्यान से देखें तो शरीर का तर्क टिकता ही नहीं। असल दबाव उस सिखाई गई मान्यता का है जो महिला को उसके शरीर और उससे जुड़ी भूमिकाओं से ही तौलती है, और जिसे हम अपनी ही सोच मान बैठे हैं। जो आवाज़ें हमें बताती हैं कि हमारी ज़िंदगी का क्या करना है, क्या हम ईमानदारी से देख पाएँगे कि वे आवाज़ें किसकी हैं?

“फॉलो योर पैशन” तभी सार्थक है, जब वह सचमुच आपका अपना हो। अक्सर जिसे हम अपनी पसंद, पैशन या इच्छा मानते हैं, वह समाज, परिवार, संस्कार और परिस्थितियों से भीतर बैठा हुआ प्रभाव होता है। वास्तविक स्वतंत्रता न बाहरी दबाव में जीने में है, न भीतर की कंडीशनिंग का गुलाम बनने में। आत्मनिरीक्षण से सही कर्म की स्पष्टता आती है और बिना बिके, बिना डरे एक गरिमापूर्ण जीवन जिया जा सकता है।

स्वतंत्रता दिवस को केवल उत्सव नहीं, बल्कि आत्मावलोकन और सतर्कता दिवस की तरह देखने की आवश्यकता है। भारत की परतंत्रता के पीछे रहे आंतरिक कारणों को समझना ज़रूरी है, क्योंकि राजनीतिक स्वतंत्रता के बावजूद लोकधर्म, अंधविश्वास, जातिगत विभाजन, ज्ञान-विज्ञान की उपेक्षा, परंपरागत जड़ता और आत्मबल की कमी आज भी मौजूद हैं। वास्तविक देशभक्ति इन बंधनों को पहचानकर ज्ञान, आत्मनिर्भरता, वैज्ञानिक दृष्टि और जागरूक नागरिकता विकसित करने में है।

लोकतंत्र, गणतंत्र और स्वतंत्रता केवल संविधान में लिखे शब्द नहीं, बल्कि जागरूक नागरिक की चेतना पर निर्भर हैं। वास्तविक स्वतंत्रता मनमानी करने की छूट नहीं, बल्कि भीतर घुसे भय, लालच, अंधविश्वास, पूर्वाग्रह और बाहरी प्रभावों से मुक्ति है। जब नागरिक अपने ही विचारों और मान्यताओं की जाँच नहीं करता, तो लोकतंत्र भीड़तंत्र और संप्रभुता खोखली बन सकती है।

सही काम आनंद पाने के लिए नहीं, बल्कि इसलिए किया जाता है क्योंकि वही सही है। सही काम करते समय सुख मिले या बोरियत, दोनों को समान रूप से स्वीकार करना ही आनंद है। पढ़ाई, विशेषकर गणित, केवल परीक्षा का विषय नहीं बल्कि प्रकृति और जीवन की भाषा है, जो दुनिया को समझने की क्षमता देती है. गलतियाँ स्वाभाविक हैं और उनसे सीखना चाहिए, लेकिन बेईमानी कभी स्वीकार्य नहीं हो सकती। सच्ची सफलता पूर्णता में नहीं, बल्कि ईमानदारी में है।

मजबूरी एक झूठ है जिसे अहंकार स्वार्थ छुपाने के लिए गढ़ता है। जो दबता है वो किसी सौदे में दब रहा है। माँ-बाप की धमकी, समाज का दबाव - ये सब तभी काम करते हैं जब भीतर डर हो और डर तभी होता है जब कोई चीज़ पानी हो। आज़ादी के लिए आखिरी कीमत भी चुकाने की तैयारी ही असली जीवन है।

बहुत लोग होते हैं, जिनको दूसरों को तकलीफ़ देने में खुशी मिलती है। बहुत लोग हैं, जिन्हें जानवरों का गला काट करके खाने में खुशी मिलती है। वो कहेंगे, “मैं तो वही करूँगा, जिसमें खुशी मिलती है।” पहले तो यह सीखना पड़ेगा न कि यह जो मेरा खुशी का सिद्धांत है, यह आया कहाँ से? आज की समस्या है, ब्लाइंड फ़्रीडम; जहाँ आदमी बाहर वाली तो किसी ताक़त का ग़ुलाम नहीं है, पर भीतरी ताक़त का ग़ुलाम हो गया है। और वो भीतरी ताक़त क्या है? अहंकार।

मैंने कहा है कि जिसको छोड़ने में तुम्हें देर लग रही हो, उसको पूरी तरह छूटने का इंतज़ार मत करो। उसको लिए-लिए भागो। यह थोड़ी कहा है कि उसको बाँध कर भागो। आप मान लीजिए, शरीर पर बहुत सारा फैट ढोए हुए हैं, उसको लिए-लिए ही तो भागोगे। लेकिन भागने की प्रक्रिया में क्या होगा? वो गलेगा। मैं तब तक इंतज़ार करूँगी जब तक सब ठीक… नहीं, नहीं, नहीं। जो भी तुम्हारी बुरी हालत है, जैसी भी है, अभी दुर्बल हालत है, शुरू अभी करो। कम ऐज़ यू आर एंड रन ऐज़ यू आर।

जब 'मोह-माया' कहते हैं, तो मोह से आशय होता है कि भीतर एकदम कोहरा फैल गया है, और माया से आशय होता है कि बाहर अब कुछ साफ़ दिखाई नहीं दे रहा। मोह माने जादू, जैसे किसी ने आपकी बुद्धि पर पर्दा डाल दिया हो। और जब बाहर सब धुंधला दिखाई देने लगता है, तो उसको कहते हैं — माया। आमतौर पर बाहरी चीज़ों को माया माना गया है, इसीलिए भीतर वाली माया को मोह कह दिया गया; नहीं तो मोह भी माया ही है।

आचार्य प्रशांत: तो आज हम दुर्गा सप्तशती के तीसरे चरित्र में प्रवेश कर रहे हैं और पिछले चरित्र का और पिछले अध्याय का अन्त किसके वध पर हुआ था?
श्रोता: महिषासुर।
आचार्य प्रशांत: महिषासुर के वध पर हुआ था, तो महिषासुर का वध हो गया था और देवता लोग प्रसन्न…

देवी कोई व्यक्ति नहीं हैं। आपके चित्त की मूल अहं–वृत्ति ही देवी महामाया हैं, जो संसार बनकर हमें दृष्टिगत होती हैं। वह देवी स्वयं संसार भी हैं और संसार की दृष्टा और अनुभोक्ता भी। उस मूल अहं–वृत्ति से अनेकों वृत्तियाँ निकलती हैं, जिनको अलग-अलग देवियों का नाम दे सकते हैं। मूल प्रकृति ही आगे चलकर तीन गुणों में विभाजित हो जाती है, जो तीन देवियों के नाम से जानी जाती हैं — सतोगुणी सरस्वती, रजोगुणी लक्ष्मी और तमोगुणी काली।

मन जहाँ बार-बार जाकर बैठे उसी का नाम माया है। जो ही विचार मन में लगातार भरे रहें, उसी का नाम माया है। कबीर साहब कहते हैं — ‘एक माया ऐसी भी है जो राम से मिला देती है।’ मन ही है जो यत्र-तत्र भागता है। इसी मन को ऐसा क्यों न कर दें कि ये राम की ओर भागे। यही कला है जीने की कि क्या चुनें और क्या न चुनें। उसको चुनो जो तुम्हें तुम्हारे क़रीब ले आता हो और उससे बचो जो तुम्हें तुमसे दूर ले जाता हो।

आकाश के अणु-अणु में ये बात बसी हुई है कि 'All is already and always perfect', सब कुछ सदा और सर्वथा पूर्ण है। हमें ये विचार है कि कुछ कमी है, और इस कमी को पूरा करने के लिए हम सुख की तरफ़ जाते हैं। ये मानना कि कुछ कमी है — यही कमी है। जहाँ देखा कि मान रहे हो कि कुछ कमी है, वहीं समझ लो — माया है। माया क्या है? कमी का आभास। प्रतीत होती है कि कुछ कम है, कुछ कम है। जबकि हवा में और रोशनी में, हर जगह लिखा हुआ है कि सब परफेक्ट है, पूरा है।

बाहर से जो कुछ भी आ रहा है, सब अविद्या है। जानते हो, बड़े से बड़े विद्वान के वचन भी आपके लिए तो अविद्या ही हैं क्योंकि वो बाहर से आ रहे हैं। ऊँची से ऊँची बात भी अगर अभी किसी और की है, तो वो अविद्या है। और जिस क्षण आपने ध्यान में, अपना और उस बात का रिश्ता देख लिया, तब विद्या हुई।

जब जीवन को चुनौती दिए बिना स्वयं को स्वतंत्र मान लिया जाता है, तो वह अध्यात्म नहीं, पलायन होता है। सच्ची ज़िंदगी जीना माने टूटना — 'आग का दरिया है, डूबकर जाना है।' अध्यात्म बड़े योद्धाओं के लिए होता है। बड़ी लड़ाई उठाइए, तब गीता को दिल से महसूस कर पाएँगे। आप कितने स्वतंत्र हो पता तो तब चलेगा न जब आप बेड़ियों को चुनौती दोगे। जो चुनौती नहीं दे रहा है उसे पता क्या!

मन एक रस्सी की तरह है, जिसे दस दिशाओं से — भविष्य, अतीत, रिश्ते, सोशल मीडिया जैसी ताक़तें खींचती हैं। हर कोई हमें ग़ुलाम बनाना चाहता है, और हम बनते जाते हैं; यही तनाव है। इससे मुक्त होना कठिन नहीं, बस यह भ्रम छोड़ो कि कोई सहारा चाहिए, क्योंकि जो भी आएगा, वह अपने अनुसार ही खींचेगा। इसलिए साहस जुटाओ और अपने क़दमों पर चलो — दो-चार बार गिरो, चोट खाओ, पर रस्सी की तरह मत बनो: बेजान, मुर्दा, ग़ुलाम।

जिस चीज़ को मज़ा बोलते हो और जिस चीज़ को बेमज़ा बोलते हो, जिसको सुख बोलते हो, जिसको दुख बोलते हो दोनों को समझो कि ये मामला चल क्या रहा है, और इस समझने में जो मौज है, वो आनंद है। तो दुख भी चल रहा है तो उसको समझो — दुख में भी आनंदित रहोगे, और सुख चल रहा है तब तो समझो ही समझो। कुछ भी चल रहा है, जो भी चल रहा है उसको समझो — वो आनंद है।

मात्र विशिष्ट संगीत है, जो बंधनों को काटता है। अधिकांशतः संगीत उत्तेजक ही होता है, क्योंकि वो तुम्हें नए तरीक़े के अनुभव दे जाता है। जबकि शास्त्रीय संगीत अलग आयाम का होता है, इसीलिए वो बाज़ारू नहीं होता। संगीत का सबसे सुंदर और प्रभावी मेल होता है — शास्त्रीय संगीत पर संतों के वचन। इनके अलावा, बाकी सबकुछ जो संगीत के नाम पर चल रहा है, वो तुम्हारे आंतरिक कोलाहल को ही बढ़ाएगा।

अध्यात्म के बिना, चाहे हम बाहर कितना भी कुछ पा लें — पद, प्रतिष्ठा, ज्ञान — फिर भी डर और तनाव से नहीं बच पाते। व्यक्ति के पास ऐसा कुछ होना चाहिए जिसे संसार का कुछ भी छू न सके — जिसका उल्लेख श्रीकृष्ण अर्जुन से करते हैं: ‘नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि’; न शस्त्र उसे काट सकते, न अग्नि जला सकती है। पहले झूठ काटना पड़ेगा। जैसे-जैसे वो कटता जाता है, वैसे-वैसे तुम उसको पाते जाते हो जो बिल्कुल तुम्हारा अपना है। उसके बाद कोई बाहरी दबाव तुमको परेशान नहीं कर पाएगा।

जिस किसी में सत्य के प्रति अर्जुन जैसी प्रगाढ़ निष्ठा होगी, उसे श्रीकृष्ण मिल ही जाएँगे। तुम्हारे भीतर वो प्रश्न उठें तो सही, जो अर्जुन में उठते थे। केन्द्रीय बात है मुक्ति और बोध की — वो अगर है, तो फिर कुछ-न-कुछ हो ही जाएगा। जिसे चाहिए, उसे मिल ही जाता है, चाह मूल है। हर मार्ग पर तुम्हें अपनी मुमुक्षा का, अपनी आतुरता का परिचय देना ही पड़ता है — उसके अलावा कोई रास्ता नहीं है।

‘अप्प दीपो भव’ — ‘अपने प्रकाश स्वयं बनो’ — यह एक बहुमूल्य वक्तव्य है, लेकिन आख़िरी है। उससे पहले बड़ी साधना करनी पड़ती है। ‘कोई गुरु आवश्यक नहीं है’, यह जानने के लिए भी कोई गुरु चाहिए। जब पूरी साधना, पूरी दीक्षा हो जाए और शिष्य की विदाई का समय आए तभी गुरु को कहना चाहिए — ‘अप्प दीपो भव’। और तभी शिष्य के कान में ये शब्द पड़ने चाहिए। भूलना नहीं, ये ‘आख़िरी’ शब्द हैं।

मैं ज़िन्दा हूँ और मैं अभी दुख में हूँ, ये दुख कैसे हटाया जाए — धर्म इसका विज्ञान है। मरने के बाद कोई जीवन होता है (आफ्टर लाइफ) — उससे धर्म का कोई रिश्ता नहीं है। इतना तो ज्ञानियों ने चेताया है कि “हीरा जनम अमोल है, कौड़ी बदले जाय।” तो जब तक जीवित हो, तब तक मुक्ति मिल सकती है — उसके बाद कुछ नहीं है।

नया उन्हीं के पास आता है, जिनमें हिम्मत होती है — पुराना ख़त्म करने की। क्योंकि तुम्हें असल में कुछ नया नहीं चाहिए, तुम्हें तो सिर्फ़ पुराने से मुक्ति चाहिए। हम अपने आप से और पुराने से ऊब चुके हैं, और इसके ख़त्म होने की चाह रखते हैं। यदि वास्तव में नया चाहिए, तो पुराने को जाने दो और श्रद्धा रखो — नया अपने आप आ जाएगा। अन्यथा सिर्फ़ नए की आकांक्षा करोगे, तो वही आकांक्षा पुराने को बनाए रखेगी।

फटी हुई जींस पहनने, और बाल रंगवाने से कोई कूल नहीं हो जाता। कूलनेस बहुत अच्छी चीज़ है, परंतु कूल हो नहीं, और ख़ुद को कूल कहो — यह समस्या है। कूल होना आध्यात्मिक बात है। कूल होने का असली मतलब है कि तुम श्रीकृष्ण का ज्ञान जानो। श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा — तू विगत-ज्वर हो जा। जिसे ज्वर न चढ़े, जो आवेश और आवेग से मुक्त हो, वही वास्तव में कूल है।

काम तनाव तभी देता है जब आप काम सही कारणों से न कर रहे हों। जब आप सही कारणों से काम नहीं करते तो आप दो ही चीज़ों का इंतज़ार करते हो — एक रविवार का और दूसरा सैलरी डे का। काम का अंतिम उद्देश्य पैसा नहीं हो सकता। आपको काम में अर्थ ढूँढना पड़ेगा। कुछ ढूँढिए जिसमें सौंदर्य हो, सार्थकता हो, बड़ी कोई चुनौती की बात हो। तब फिर उस काम में आप घंटे नहीं गिनते, उस काम में आप परिणाम की ओर भी नहीं देखते।

हम छोटे-मोटे उत्सव करके सोचते हैं कि हमे खुशी मिल गई; काश कि मिली होती। ये बड्डे-गड्डे में ताली बजाने से खुशी नहीं मिलती, एक समस्या ज़रूर खड़ी हो जाती है — आप अपने आप को जता लेते हो कि आपको खुशी मिल गई। इंसान को वरदान ये मिला है कि उसे खुशी मिलेगी तो ऊँची मिलेगी। और अभिशाप ये मिला है कि उस ऊँची खुशी के लिए उसे दाम भी ऊँचा चुकाना पड़ेगा। दाम ये है कि अपनी कमज़ोरियों से जूझ जाओ, उनके विरुद्ध संघर्ष करो।

हमारी ज़िन्दगियाँ absurdity का ही एक endless narrative है। यह absurdity दिखाओ, लोग खूब हसेंगे। Comedy, entertainment ये सब बहुत अच्छी चीज़ें हैं यदि ये लोगों को अपनी मूर्खताओं पर, अपने prejudices पर हँसा दे। हमें ऐसी कॉमेडी की बहुत सख्त ज़रूरत है जो clarity देती हो। ऐसी कॉमेडी जहाँ उसको सुनकर सिर्फ़ आप हँसे नहीं हो, आप हल्के हो गए हो। यही तो होता है- ‘Cutting Your Own Inner Clutter.’

समाज ने हमें सिखाया है कि खुश रहना चाहिए। इस सीख को हमने इतना सोख लिया है कि यह बात बिल्कुल अंदर तक पैठ गई है। और जो जितना प्रकट करे कि वह प्रसन्न है, उसके बारे में जान लीजिएगा कि वह आनंदित तो नहीं ही है, वह वास्तव में भीतर से दुखी है। प्रकृति में सुख का अर्थ होता है 'भोग'। तो जो आपको सिखा रहे हैं कि हमेशा हैप्पी नज़र आओ, वे वही लोग हैं जो आपको भोग की तरफ़ प्रेरित कर रहे हैं।

जीवन को सँभालकर रखो तब तक, जब तक मुक्ति नहीं मिल जाती; लेकिन जीवन को सँभालने का उद्देश्य जीवन को लंबा ही करना कभी नहीं हो सकता। जीवन का उद्देश्य जीवन की लंबाई नहीं है; जीवन का उद्देश्य जीवन से मुक्ति है।

उम्र बढ़ जाने से तुम व्यस्क नहीं हो जाते। उसके लिए यहाँ दिमाग में कुछ होना चाहिए। कोई एक होता है जो बड़ा हो पाता है। कोई-कोई होता है जो वास्तव में बड़ा हो पाता है। उसको कहते हैं-खिलना, अपनी पूर्णता को प्राप्त होना। कोई-कोई होता है, बाकी तो सब ऐसे जैसे हमारे ऑफिस में डहेलिया है, ये लगे हुए हैं।

मुक्ति तुम्हारा स्वभाव है लेकिन स्वभाव में जीना है या नहीं जीना — ये तुम्हारा चुनाव है। आवश्यक नहीं है कि सब मुक्ति को चुनें। मुक्ति स्वभाव है इसीलिए सदा उपलब्ध है पर तुम उसको चुनोगे ही, ये कोई आवश्यक नहीं है। तुम कुछ और भी चुन सकते हो। ये इंसान पैदा होने की विडंबना है। जो इंसान पैदा हुआ है उसको दुर्भाग्यवश ये विकल्प मिला हुआ है कि स्वभाव में चाहे तो जिए और न चाहे तो न जिए।

प्रश्नकर्ता: बार-बार कृष्णमूर्ति साहब ये कहते हैं कि कोई गुरु की आवश्यकता नहीं है।
आचार्य प्रशांत: हाँ, क्योंकि सब अपना ही है, ज़िम्मेदारी सारी अपनी है, तो बाहर वाले का फिर नाम भी लेने की तकलीफ़ क्यों करनी है। और जो गुरु है वह सर्वप्रथम आंतरिक है। मैं कह रहा…

खुशियाँ बहुत स्तरों की होती हैं। खुशी पाने के लिए तुम्हें यह जानना चाहिए कि मुझे किस स्तर की खुशी चाहिए। आम आदमी की खुशी वह होती है जो अपने पीछे ग़म और उदासी लेकर आती है, जबकि बुद्ध की खुशी उच्चतर स्तर की और असली होती है। जो भी अपने सामर्थ्य से बढ़कर कुछ ऊँचा करता है, उसे ऊँची खुशी मिलती है। जितने ऊँचे स्तर की तुम खुशी चाहोगे, उतने ही ऊँचे स्तर का तुम्हारा जीवन होगा।

डर और तनाव मूलतः इसी भाव से निकलते हैं कि कोई दूसरा है जो मेरा कुछ छीन सकता है और कोई दूसरा है जो मुझे कुछ दे सकता है। जब तक तुमने यह धारणा बाँध रखी है, डर और तनाव से मुक्ति संभव नहीं। सदा अपने आपको यही बताओ — मैं लाख गिरूँ तो भी मेरा कुछ नहीं बिगड़ सकता। जब इस भाव में जियोगे, तब न डर रहेगा न तनाव।

आचार्य नागार्जुन की जीवन कथा का आंरभिक विवरण चीनी भाषा में उपलब्ध है, जिसे क़रीब 405 ई. में प्रसिद्ध बौद्ध अनुवादक कुमारजीव ने उपलब्ध कराया। यह अन्य चीनी एवं तिब्बती वृत्तांत से सहमत हैं कि नागार्जुन दक्षिण भारत में एक ब्राह्मण परिवार में जन्मे थे। ऐतिहासिक रूप से बचपन की…

जानना तुम्हारा स्वभाव है, करना तुम्हारी प्रकृति है। जब तुम कहते हो, ‘मैं काम कर रहा हूँ’, तो तुम ये मान के चलते हो कि जो कुछ हो रहा है, उसमें तुम्हारी भी कोई सत्ता है। तुम करने वाले हो ही नहीं। जो होना है, सो तो हो ही रहा है, “अनहोनी होनी नहीं, होनी होय सो होय”। जानो! तुम मात्र जानने वाले हो।

जीवन माने वृत्तियाँ और विकार, तो ऐसे जीवन से हटना है। माने किससे हटना है? वृत्तियों और विकारों से। तो मृत्यु का अर्थ ये नहीं होता कि कब तुम्हारी देह मिटेगी, जलेगी; मृत्यु का अर्थ होता है कि कब तुम्हारे जीवन से वृत्तियाँ और विकार हटेंगे। यही ज़िन्दगी जीने का उचित तरीका भी है — प्रतिपल ऐसा बिताओ कि तुम्हारे भीतर जो मलिनताऍं हैं, जो दोष हों वो कम, कम और कम होते जाऍं। ये सब वही पुराना चक्र है, वो चले जा रहा है। हाँ, तुम जान गये कि ये पुराना चक्र है, तो ये अनुकम्पा है, ये बोध है।

मोह इतना सघन हो जाता है कि तुम सत्य से इनकार करने लगते हो। बात सीधी है, कचरा है लेकिन उसके साथ बहुत रहे हो, उससे पहचान जोड़ ली है, तो अब कचरे को कचरा नहीं बोलोगे। क्योंकि कचरे को कचरा बोला तो खुद को कचरा बोला; पहचान जोड़ ली है न। यही अहंकार है– पहचान जोड़ लेना और फिर जिस वस्तु से सम्बद्ध हो, उसके सारे गुण अपने ऊपर ले लेना। चोट पड़ रही हो कर्मफल की, और सहारा मिल रहा हो गुरु का ग्रन्थ का, ये दोनों जब एकसाथ हो रहे हों तो फिर नासमझी छूट जाती है।

बस ये देखिए कि क्या है जो चुभ रहा है। उसको हटाना ही जीवन का उद्देश्य है। सबसे पहले देखो कि अभी क्या है जो तुम्हें तंग कर रहा है? उसी से आज़ाद हो जाओ यही उद्देश्य है और कुछ नहीं।

चिंता का कोई कारण नहीं होता, चिंता बस होती है, और जो मन चिंताग्रस्त है वो चिंता के बहाने खोज लेता है। अगर किसी को रुपयों की चिंता हो, और वो सुलझ जाए, तो मन तुरंत नई चिंता का कारण ढूंढ लेता है। जब तुम पूरी तरह वही कर रहे हो जो उस समय जरूरी है, तो चिंता के लिए समय ही नहीं होगा। चिंता के लिए सोचना पड़ता है, और जब दिमाग पूरी तरह व्यस्त हो, तो सोचने का वक्त ही नहीं मिलता।

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी अकेलापन महसूस करती हूँ और पुरानी बातें याद आती हैं। इस पर आपने कहा था कि विद्रोह पूर्ण करना पड़ता है। हम जहाँ रहते हैं, जहाँ काम करते हैं, ये सारी जगह एक होती हैं तो विद्रोह पूर्ण करना पड़ता है।माताजी के गुजरने और घर के…

करीब-करीब हर कोई बंधन में है और मुक्ति चाह रहा है; बंधनों से मुक्ति चाह रहा है न और कई बार कुछ बंधनों से मुक्ति मिल भी जाएगी, इसीलिए तो आपका अपने पुरुषार्थ पर इतना भरोसा है। इंसान ने अपने ऊपर के कई बंधनों पर फ़तह हासिल की भी है, तो उसका भरोसा कायम रहता है उसे लगता है कि कुछ बंधन तो पीछे छोड़ ही दिये, तोड़ ही दिये और भी छोड़े जा सकते हैं। वो ये नहीं देख पाता कि पुराने को छोड़कर जो नये बंधन वो धारण कर लेता है वो और कुछ नहीं है पुरानों का ही एक नया रूप है और वो होना ही था क्योंकि बंधन बने रहें इसकी प्यास हममें है।

"प्रेम प्रेम सब कहैं, प्रेम न चीन्है कोय। जा मारग साहब मिलै, प्रेम कहावै सोय।" या जा मारग डायपर मिले प्रेम कहावै सोय? जिस मार्ग पर चलकर साहब से मुलाकात हो जाए, उस मार्ग का नाम है प्रेम (आकाश की ओर इशारा करते हुए) । या प्रेम उस मार्ग का नाम है जो *मैटरनिटी* (प्रसूति) वार्ड की ओर जाता है?

जो व्यक्ति अपनी पशुता को नहीं पहचानता और अपने भीतर के जानवर को मर्यादित करने के लिए कोई मेहनत नहीं करता। फिर उसकी सज़ा ये है कि वो जानवर की तरह जीता है और जानवर की तरह ही मरता है। अफ़सोस की बात ये है कि सज़ा सिर्फ़ उसको नहीं मिलती। उसके साथ-साथ पूरी दुनिया को मिलती है, वो फिर पूरी दुनिया को तबाह करता है।

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी, मैं अभी बैंक में जॉब कर रहा हूंँ, लगभग सात-आठ साल हो गये हैं। शुरुआत तो मैंने आजीविका के लिए करी थी; जैसे परिवार जो सोचता है कि आप पढ़ो और काम करो, उस हिसाब से।
लेकिन अभी, मतलब पिछले कुछ तीन से चार सालों में…