मन एक रस्सी की तरह है, जिसे दस दिशाओं से — भविष्य, अतीत, रिश्ते, सोशल मीडिया जैसी ताक़तें खींचती हैं। हर कोई हमें ग़ुलाम बनाना चाहता है, और हम बनते जाते हैं; यही तनाव है। इससे मुक्त होना कठिन नहीं, बस यह भ्रम छोड़ो कि कोई सहारा चाहिए, क्योंकि जो भी आएगा, वह अपने अनुसार ही खींचेगा। इसलिए साहस जुटाओ और अपने क़दमों पर चलो — दो-चार बार गिरो, चोट खाओ, पर रस्सी की तरह मत बनो: बेजान, मुर्दा, ग़ुलाम।
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प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, ऐसा क्यों होता है कि लोग बहुत परेशान, दुखी और तनाव से भरे हुए रहते हैं?
आचार्य प्रशांत: तनाव कहाँ से आता है?
एक रस्सी है वो अपना पड़ी हुई है, उसमें तनाव कब आएगा? जब उसके दो सिरों को दो ओर से विपरीत दिशाओं में खींचा जाएगा, आएगा कि नहीं आएगा?
आएगा! और अगर रस्सी को पाँच-दस लोग, पाँच-दस अलग-अलग दिशाओं में खींच रहा हो तो? मान लो, लंबी रस्सी है उसे पाँच-दस लोग, अलग-अलग दिशाओं में खींच रहे हों तो जम के तनाव आएगा। रस्सी कहीं जा नहीं पाएगी, कुछ कर नहीं पाएगी, किसी दिशा में बढ़ेगी नहीं, कभी इधर खिंचेगी, कभी उधर खिंचेगी, लेकिन तनाव भरपूर रहेगा, रहेगा कि नहीं रहेगा?
ये जो रस्सी है ना ये हमारा मन है। हमारे मन को दस दिशाओं से, दस ताकतों द्वारा खींचा जा रहा है लगातार, लगातार अब जैसे रस्सी बेजान होती है, मुर्दा। वो कह नहीं पाती है कि छोड़ो मुझे, खींचना बंद करो। मेरा जीवन है, मेरी अपनी भी कोई स्वेच्छा है, अपनी दिशा, अपनी गति मैं ख़ुद निर्धारित करूँगी। रस्सी ये कभी कह पाती है, कह पाती है क्या? नहीं कह पाती ना, चेतना नहीं है उसमें। चेतना माने जानना बोध युक्त होना, है नहीं उसमें।




