अध्यात्म के बिना, चाहे हम बाहर कितना भी कुछ पा लें — पद, प्रतिष्ठा, ज्ञान — फिर भी डर और तनाव से नहीं बच पाते। व्यक्ति के पास ऐसा कुछ होना चाहिए जिसे संसार का कुछ भी छू न सके — जिसका उल्लेख श्रीकृष्ण अर्जुन से करते हैं: ‘नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि’; न शस्त्र उसे काट सकते, न अग्नि जला सकती है। पहले झूठ काटना पड़ेगा। जैसे-जैसे वो कटता जाता है, वैसे-वैसे तुम उसको पाते जाते हो जो बिल्कुल तुम्हारा अपना है। उसके बाद कोई बाहरी दबाव तुमको परेशान नहीं कर पाएगा।
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प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, नमस्ते। मैं तनाव, दबाव माने प्रेशर सिचुएशन(तनावपूर्ण स्थिति) झेल नहीं पाता हूँ। जैसे ही मुझ पर दबाव पड़ता है बाहर से, मैं टूट जाता हूँ अन्दर से। अभी जवान हूँ तो ये हालत है और पूरी ज़िंदगी सामने पड़ी है। न जाने क्या-क्या चुनौतियाँ आनी हैं, कैसे झेलूँगा?
आचार्य प्रशांत: देखो, कोई भी बाहरी दबाव किसी ऐसी ही चीज़ को तोड़ सकता है जिसको वो स्पर्श कर सके, है न? बात समझ रहे हो? जो चीज़ जिस आयाम में है, वो उस आयाम के ही किसी बल द्वारा तोड़ी जा सकती है। आयाम समझते हो? तल। अब उदाहरण के लिए, ये जो मेज़ है मेरे सामने, ये एक आयाम है, एक तल है, एक डायमेंशन है। ठीक है? इसको मैं एक मुक्का मारकर शायद तोड़ सकता हूँ, लेकिन इसको तोड़ने के लिए ज़रूरी होगा कि मुक्का इसी तल पर आकर इस मेज़ से टकराए। है न?
अगर इससे कुछ दूर जाकर के या ऊपर जाकर के या नीचे जाकर के मैं मुक्केबाज़ी करूँ, मैं दीवार पर मुक्का मारूँ या मैं हवा में मुक्का चलाऊँ तो क्या ये मेज़ टूटेगी? नहीं न। कोई भी वस्तु अपने ही तल की किसी ताक़त का दबाव अनुभव कर सकती है।




