जीवन माने वृत्तियाँ और विकार, तो ऐसे जीवन से हटना है। माने किससे हटना है? वृत्तियों और विकारों से। तो मृत्यु का अर्थ ये नहीं होता कि कब तुम्हारी देह मिटेगी, जलेगी; मृत्यु का अर्थ होता है कि कब तुम्हारे जीवन से वृत्तियाँ और विकार हटेंगे। यही ज़िन्दगी जीने का उचित तरीका भी है — प्रतिपल ऐसा बिताओ कि तुम्हारे भीतर जो मलिनताऍं हैं, जो दोष हों वो कम, कम और कम होते जाऍं। ये सब वही पुराना चक्र है, वो चले जा रहा है। हाँ, तुम जान गये कि ये पुराना चक्र है, तो ये अनुकम्पा है, ये बोध है।
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प्रश्नकर्ता: प्रणाम, आचार्य जी। आचार्य जी, ओशो ने बताया है कि जीवन एक तैयारी है मृत्यु के लिए, इसका अर्थ क्या है?
आचार्य प्रशांत: जीवन तैयारी है उन सब चीज़ों से मुक्ति पाने की, जो जीवन को नर्क बनाती हैं। बच्चा निर्दोष, निर्विकार नहीं पैदा होता। बच्चा खुद बड़ी आफ़त में पैदा होता है, बड़ी वृत्तियाँ उसमें बैठी होती हैं। और फिर उन्हीं विकारों, उन्हीं वृत्तियों के अनुसार वो जीवन जीता है। जीवन में और कुछ होता ही नहीं है वृत्तियों और विकारों के अलावा। और वो हम जन्म से ही अपने साथ लाये होते हैं, तो जीवन माने वृत्ति और विकार। इस अर्थ में ज्ञानियों ने तुमसे कहा है कि मृत्यु की ओर बढ़ो।
जीवन माने वृत्तियाँ और विकार, तो ऐसे जीवन से हटना है। माने किससे हटना है? वृत्तियों और विकारों से। तो मृत्यु का अर्थ ये नहीं होता कि कब तुम्हारी देह मिटेगी, जलेगी; मृत्यु का अर्थ होता है कि कब तुम्हारे जीवन से वृत्तियाँ और विकार हटेंगे। उस मृत्यु की बात हो रही है। तो ओशो तुमसे कह रहे हैं कि समस्त जीवन तैयारी भर है जीवन से वृत्तियाँ और विकार हटाने के लिए। यही ज़िन्दगी जीने का उचित तरीका भी है — प्रतिपल ऐसा बिताओ कि तुम्हारे भीतर जो मलिनताऍं हैं, जो दोष हों वो कम, कम और कम होते जाऍं।




