जब जीवन को चुनौती दिए बिना स्वयं को स्वतंत्र मान लिया जाता है, तो वह अध्यात्म नहीं, पलायन होता है। सच्ची ज़िंदगी जीना माने टूटना — 'आग का दरिया है, डूबकर जाना है।' अध्यात्म बड़े योद्धाओं के लिए होता है। बड़ी लड़ाई उठाइए, तब गीता को दिल से महसूस कर पाएँगे। आप कितने स्वतंत्र हो पता तो तब चलेगा न जब आप बेड़ियों को चुनौती दोगे। जो चुनौती नहीं दे रहा है उसे पता क्या!
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आचार्य प्रशांत: आप स्वतंत्र हो ये आपको पता ही कैसे चलेगा?
श्रोतागण: ज्ञान से।
आचार्य प्रशांत: आपका दिल कितना स्वतंत्र है बीमारी से, उसके लिए एक चीज़ कराते हैं, उसको बोलते हैं 'स्ट्रेस ईसीजी।' स्ट्रेस आता है तभी तो पता चलता है कि हाल क्या है। आप कुछ स्ट्रेस ही नहीं ला रहे हो जीवन में, तो आपको पता क्या चलेगा आपका हाल क्या है। बहुत सारे लोग सिर्फ़ इसलिए मरते हैं क्योंकि उनकी ज़िंदगी में कोई स्ट्रेसफुल फिज़िकल ऐक्टिविटी (तनावपूर्ण शारीरिक गतिविधियाँ) होती ही नहीं है, तो उनको भीतरी बीमारियाँ लगी होती हैं। वो एकदम लास्ट स्टेज (अंतिम चरण) तक पहुँच जाती हैं। लेकिन आप अपने शरीर से काम ही बस दस प्रतिशत कैपेसिटी का ले रहे हो, तो अगर बीमारी ने आपकी अस्सी प्रतिशत भी कैपेसिटी खा ली है, तो आपका शरीर तो काम करता रहेगा और आपको पता नहीं चलेगा। आप बात समझ रहे हो?
लेकिन जो अपने शरीर से अस्सी प्रतिशत काम ले रहा हो, उसको बीमारी का तुरंत पता चल जाता है। नहीं तो हो सकता है आपको फेफड़ों का कैंसर हो और आपको बिल्कुल अंत में आगे पता चले, क्योंकि साँस तो आपकी चल रही थी। साँस रुकनी तब शुरू हुई जब फेफड़ा पूरा जा चुका था। लेकिन अगर आप रोज़ सुबह दौड़ते थे पाँच किलोमीटर, तो फेफड़े का कैंसर तुरंत पकड़ में आ जाएगा। एकदम शुरू में पकड़ में आ जाएगा क्योंकि दौड़ने में बाधा देने लगेगा।




