स्वतंत्रता दिवस नहीं, सतर्कता दिवस

Acharya Prashant

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स्वतंत्रता दिवस नहीं, सतर्कता दिवस
स्वतंत्रता दिवस को केवल उत्सव नहीं, बल्कि आत्मावलोकन और सतर्कता दिवस की तरह देखने की आवश्यकता है। भारत की परतंत्रता के पीछे रहे आंतरिक कारणों को समझना ज़रूरी है, क्योंकि राजनीतिक स्वतंत्रता के बावजूद लोकधर्म, अंधविश्वास, जातिगत विभाजन, ज्ञान-विज्ञान की उपेक्षा, परंपरागत जड़ता और आत्मबल की कमी आज भी मौजूद हैं। वास्तविक देशभक्ति इन बंधनों को पहचानकर ज्ञान, आत्मनिर्भरता, वैज्ञानिक दृष्टि और जागरूक नागरिकता विकसित करने में है। यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। मेरा नाम कमलेश है। मैं राजस्थान, उदयपुर से आया हूँ, सर। मेरा क्वेश्चन स्वतंत्रता दिवस पर है। क्योंकि स्वतंत्रता दिवस आने वाला है तो मैं अपने गाँव से शुरू करूँ तो स्कूलों में देखूँगा तो मंच सजेंगे। धूमधाम से मनाया जाएगा, बहुत उत्साह दिखेगा। थोड़ा और बाहर निकलूँगा, तो तहसील लेवल पर या कॉलेजेस को देखूँगा, तो वहाँ पर भी मंच सजेंगे, उत्साह दिखेगा, रैलियाँ निकाली जाएँगी। अभियान चलेंगे कि हर घर तिरंगा, तिरंगे के साथ रैलियाँ निकलेंगी, देशभक्ति के नारे लगेंगे।

तो फिर उस दिन के लिए इतना उत्साह दिखता है देश के लिए, हम देश को बदल देंगे। देश को तरह-तरह से विकास के लिए प्रण लिए जाएँगे और बड़ी-बड़ी बातें होंगी। और फिर दूसरे दिन देखूँगा कि सड़क पर तिरंगे बिखरे हैं, जो बातें हुई थीं उनका कहीं नामोनिशान नहीं दिखेगा। बस वही लोग, जो बड़ी-बड़ी बातें कर रहे थे, वो या तो रिश्वत देने में संलिप्त रहेंगे या लेने में। वही लोग, जो बड़ी-बड़ी बातें कर रहे थे, वही लोग कहीं पर गंदगी फैला रहे होंगे। तो ऐसी-ऐसी चीज़ें कर रहे होंगे, जो देश को भीतर से खोखला कर रही हैं। तो मैं ये समझना चाह रहा था कि वास्तव में देशभक्ति कैसी होगी? हमें इस स्वतंत्रता दिवस को कैसे मनाना चाहिए और वास्तव में देशभक्ति का अर्थ क्या होगा?

आचार्य प्रशांत: भारत हो या दुनिया का कोई भी अन्य देश, जब उसकी स्थापना होती है तब उस दिन वो स्वतंत्र होता है या परतंत्र? स्वतंत्र या परतंत्र?

श्रोता: स्वतंत्र।

आचार्य प्रशांत: चलो और निकट से शुरू करते हैं। एक इंसान है, ठीक है? एक इंसान है, उसकी स्वाभाविक स्थिति क्या है? मुक्ति या ग़ुलामी? स्वाभाविक।

श्रोता: मुक्ति।

आचार्य प्रशांत: ठीक। इसी तरह से अगर कोई नेशन भी होता है, तो जैसा कुछ लोगों ने कहा कि अपने आरंभ में तो वह स्वतंत्र ही होता है न। स्वतंत्र नहीं होता तो अस्तित्व में कैसे आता? कैसे आता? स्वतंत्रता तो एक डिफॉल्ट है। डिफॉल्ट माने बेसिक स्टेट, बेसिक एंड नेचुरल स्टेट, स्वाभाविक स्थिति तो स्वतंत्रता है।

तो स्वतंत्रता दिवस इस दृष्टि से देखो, तो बात थोड़ी विचित्र-सी लगती है कि हम किस तरीके से मना रहे हैं। स्वतंत्र तो देश को होना ही चाहिए और अस्तित्व में कि मनुष्य हो, नदी हो, पहाड़ हो, पशु-पक्षी हो, बनते तो सभी स्वतंत्र हैं। सभी की जो डिफॉल्ट स्टेट है, वो तो स्वतंत्रता की ही है। है न? जानवर होते हैं जंगल में। जानवर जंगल में हैं, वहाँ वो कैसा है? पक्षी आसमान में है, वहाँ वह कैसा है?

श्रोता: स्वतंत्र।

आचार्य प्रशांत: फिर आप पक्षी को पकड़ लाएँ उसे पिंजरे में डाल दें, तब वह परतंत्र होता है न, या पक्षी पैदा ही परतंत्र होता है? पक्षी को परतंत्र बनाना पड़ता है। बनाना पड़ता है ना। इसी तरीके से राष्ट्र को भी कभी परतंत्रता स्वीकार करनी पड़ी। अन्यथा राष्ट्र की भी स्वाभाविक स्थिति तो स्वतंत्रता की ही है। स्वतंत्रता स्वभाव है, जैसे मनुष्य का स्वभाव है मुक्ति, उसी तरीके से राष्ट्र भी मनुष्य का ही है। अगर मनुष्य का स्वभाव है मुक्ति, तो राष्ट्र का भी स्वभाव है, मुक्ति, स्वतंत्रता। मनुष्य के लिए मुक्ति, तो राष्ट्र के लिए स्वतंत्रता।

तो हम यह कहें कि हमने स्वतंत्रता हासिल करी। इसका उत्सव मनाओ या ज़्यादा आवश्यक है कि हम यह पूछें कि यह अनहोनी घट कैसे गई कि हम परतंत्र हो गए। बोलो न। क्योंकि सच पूछो तो स्वतंत्रता तो अस्तित्वगत है, अस्तित्व में ही सब कुछ स्वतंत्र है, कोई किसी का ग़ुलाम नहीं पैदा हुआ। तो पूछना तो यह चाहिए न कि जब जन्म से सब कुछ आज़ाद ही है, तो फिर आगे चलकर के ये ग़ुलामी नाम की चीज़ कहाँ से आ गई? वही ज़्यादा ईमानदार और ज़्यादा उपयोगी प्रश्न है। ये ग़ुलामी कहाँ से आ गई?

क्या भारत सदा से ग़ुलाम था? बोलो न। क्या भारत सदा से ग़ुलाम था?

श्रोता: नहीं।

आचार्य प्रशांत: तो ग़ुलामी कहाँ से आ गई? प्रश्न तो यह होना चाहिए। आज़ादी तो नैसर्गिक है, गिवन है, नेचुरल है। प्रश्न तो यह होना चाहिए कि ये ग़ुलामी नाम की चिड़िया कहाँ से आ गई? इतने बंधन कहाँ से आए? और कितनी अजीब, कितनी विचित्र बात है। कोई 10, 20, 50 या 100 साल की बात नहीं; अगर देखो तो लगभग 1000 साल, शुरुआत से लेकर अंत तक, कभी कोई हिस्सा और कभी पूरा ही हिस्सा दूसरों के आधिपत्य में। ये हो कैसे गया? हम सदा से तो ग़ुलाम नहीं थे, कि थे? ये कैसे हो गया कि इतने लंबे समय तक दूसरे लोग आकर के हम पर चढ़े रहे, कब्ज़ा करते रहे, ये कैसे हो गया? ये तो बहुत अबूझ बात है। ये बड़ी विचित्र बात है। अनहोनी है, जो होनी नहीं चाहिए थी। ये हुई कैसे?

और जब हम कहते हैं कि दूसरे आकर के भारत देश पर चढ़ बैठे, कब्ज़ा कर लिया, परतंत्र बना दिया, तो उसमें भी न जाने कितने लोग हैं। जैसे कि ग़ुलामी का कालखंड बहुत लंबा है, उसी तरीके से उन लोगों की सूची भी बहुत लंबी है, जो आते गए और कब्ज़ा करते गए। वास्तव में जो कोई आ सकता था सब आए, जो भी आ सकते थे सब आए। एक के बाद एक आते ही गए, आते ही गए। वही नहीं आए जो आ ही नहीं सकते थे, जो नहीं आ सकते थे सिर्फ़ वही नहीं आए, वरना सभी आए।

तुम गिनती गिनो, बताओ, कौन-सी बड़ी यूरोपियन ताकत थी, जो भारत नहीं आई और कब्ज़ा नहीं कर पाई? हमें अंग्रेज़ याद हैं। पर आप पुर्तगालियों को ले लो, आप फ्रेंच को ले लो, आप डच को ले लो। ये नहीं आए क्या? इन्होंने कब्ज़ा नहीं करा? बताओ। वहाँ यूरोप से चले आ रहे हैं और जितने हैं यूरोपियन, सब चले आ रहे हैं, एक के बाद एक, और सब सफल हुए जा रहे हैं कब्ज़ा करने में। ये अनहोनी कैसे घट गई?

फिर आप जब एशिया आ जाते हो, तो यहाँ पास से शुरू करो, तो अफ़ग़ानी, ईरानी, फिर तुर्क, अरब, सब आते गए, सब चढ़ते गए। ये कैसे हुआ? कैसे? और फिर आप मध्य एशिया को ले लो तो वहाँ से भी एक के बाद एक आ ही रहे थे, शक, हूण। यद्यपि वो भारत को आने के बाद वो भारत में रच-बस गए, पर आए वो भी बाहर से थे और वो भी सफलतापूर्वक यहाँ पर जीते और साम्राज्य स्थापित कर गए अपना। ये कैसे होता गया? कोई तो बात होगी।

और जब अंग्रेज़ चढ़े हुए थे उस समय में भी जापानी चढ़ आए थे। लो! जैसे अंग्रेज़ काफ़ी न हो, अंग्रेज़ों के होते हुए भी जापानी चढ़े आ रहे हैं। क्या आपको पता है, जापानियों ने चेन्नई पर भी बम गिराए हुए हैं? सुना नहीं होगा आपने। अजीब बात, जापानी चेन्नई पहुँचे हुए थे, हाँ। द्वितीय विश्व युद्ध में कुछ दिनों के लिए उन्होंने चेन्नई पर भी बमबारी कर दी थी। अंडमान-निकोबार हम जानते ही हैं, उधर वो जो मलय का किस्सा भी हम जानते हैं। बर्मा को भी हम जानते हैं। तब बर्मा ब्रिटानवी साम्राज्य का ही हिस्सा था, भारत का द्वार था। सब जापानी वहाँ चढ़े हुए हैं। कैसे?

हिटलर उधर प्लान बनाए बैठा था। क्या? कि जंग जीत जाएँगे। आप क्या सोच रहे थे कि वो कह रहा था, अंग्रेज़ों को हरा करके भारत को फिर आज़ाद कर देंगे? वह कह रहे थे, जब जंग जीत जाएँगे, तो यह जो लंबा-चौड़ा भारतीय उपमहाद्वीप है, इसका विभाजन कर देंगे। कुछ जापानियों के नीचे रहेगा और कुछ जर्मनों के नीचे रहेगा। लो! जर्मन बोले, हम भी पीछे काहे छूटेंगे। उन्होंने भी अपनी नज़र भारत पर डाल ही दी थी, ये तो अब वो हार गए द्वितीय विश्व युद्ध तो आने नहीं पाए। जापानी तो लगभग आ ही गए थे, वो भी जंग हार गए तो आने नहीं पाए।

कुछ तो बात होगी, कोई तो वजह होगी, जो कोई आ सकता था, आता गया, जीतता गया, कैसे करता गया? बड़ा दुख लगता है, आदमी चोटिल अनुभव करता है। आपको, आपको बुरा नहीं लग रहा है ये सुन के? मुझे बहुत बुरा लग रहा है। ये बात क्या हमारे लिए सिर्फ़ तथ्य की तरह है? ये बात हमारा सीना चीर क्यों नहीं देती? मैं पूछ रहा हूँ, हमें बुरा क्यों नहीं लग रहा है? यह क्या हुआ? कैसे हुआ? होता ही गया। और फिर आज़ादी के बाद भी चीन आया और ज़मीन हड़प कर चला गया। होता ही गया। कोई तो बात होगी न?

मैं चाहूँगा कि स्वाधीनता दिवस को हम आत्मावलोकन दिवस की तरह मनाएँ। और पूछें अपने आप को कि स्वतंत्रता तो ठीक है, पर पहले यह बताओ, परतंत्रता कैसे आ गई थी?

वो ज़्यादा ज़रूरी सवाल है। स्वतंत्रता के लड्डू खा लेंगे, बेशक, पर रखो अभी उन्हें इंतज़ार करने दो। पहले मैं ये समझना चाहता हूँ कि इतना विशाल देश इतने सालों तक इतने अलग-अलग लोगों के अधीन रहा कैसे? बात क्या थी? कारण क्या थे? मैं उन कारणों को जानना चाहूँगा, क्योंकि अगर आपने उन कारणों को नहीं जाना तो यह कैसे आपको निश्चित पता है कि वह कारण आज भी मौजूद नहीं है? बोलो। अगर वो कारण हज़ार साल तक मौजूद थे, तो अभी तो राजनीतिक आज़ादी मिले कुल 75 साल हुए हैं। 47 से अभी तक तो 100 साल भी नहीं बीते। नहीं बीते न?

जो चीज़ हज़ार साल से मौजूद थी, वह क्या 75-80 साल में चली गई होगी पूरी तरह से? जो चीज़ हज़ार साल तक मौजूद थी और हमको ग़ुलाम बनवाए रखी, क्या वो चीज़ आपको सचमुच लगता है कि इधर 80, 78-80 साल में चली गई होगी? चली गई होगी? वो आज भी मौजूद है। और अगर वो आज भी मौजूद है, तो कितना बड़ा ख़तरा है भारत के ऊपर। हम वो ख़तरा नहीं देख रहे हैं। हम बिल्कुल शुतुरमुर्ग की तरह रेत में सर गाड़ करके उत्सव मनाना चाहते हैं कि लो, आज़ादी आ गई। हाँ, बहुत अच्छी बात है, आज़ादी आ गई। हम भी नाचना चाहते हैं, हम भी झूमना चाहते हैं, हम भी ख़ुश होना चाहते हैं। पर मैं कैसे जो सर पर तलवार लटक रही है, उसके प्रति अनभिज्ञ होने का अभिनय कर लूँ? मुझे वह तलवार लटकती दिखाई दे रही है।

कोई चीज़ एक बार हो, दो बार हो, तो आप बोल सकते हो संयोग है। कोई चीज़ सालों तक लगातार हो तो संयोग है क्या? उसमें संयोग है या संरचना है? बोलो।

प्रश्नकर्ता: संरचना है।

आचार्य प्रशांत: उसके पीछे कोई संरचना है, कोई स्ट्रक्चर है? उसके पीछे कोई स्ट्रक्चरल रीजन है।

एक-दो लोग आकर के युद्ध में हरा के आपका शोषण कर ले जाएँ, तो आप कह सकते हो, संयोग है। बीच-बीच में कोई आता है, कभी हार होती है, कभी जीत होती है, भाई, चलता रहता है। पर एक-दो लोग नहीं, दसियों अलग-अलग तरफ़ के, अलग-अलग राष्ट्रीयता के, अलग-अलग लोग आ रहे हैं और हमारा शोषण करते ही जा रहे हैं, तो यह संयोग नहीं हो सकता न। या हो सकता है? पर हम ख़ुद को ये जताना चाहते हैं कि ये तो बस ऐसे ही हो गया। हो गया जी, हो गया। हो नहीं गया। डर मुझे यह है कि वो आज भी हो रहा है, क्योंकि जो कारण हज़ार साल तक चलता रहा, वो अस्सी साल में हट नहीं गया होगा, वो कारण आज भी मौजूद होगा।

वो कारण आज भी मौजूद होगा, हमें अपने आप से पूछना पड़ेगा, वो कारण क्या है, जिसने भारत को इतने बुरे दिन देखने पर विवश करा? वो कारण क्या है?

क्या वह कारण राजनीतिक हो सकता है? नहीं। कोई राजनीतिक कारण इतने दिनों तक नहीं चलता। क्या वह कारण सामयिक हो सकता है? हम पहले ही कह चुके हैं, नहीं। वो कारण तो कुछ ऐसा है कि पीढ़ियाँ बदलती रहीं, लोग बदलते रहे, पर वो कारण बचा रहा। वो कारण कैसा होगा? वो कारण तो सांस्कृतिक है। कोई ऐसी चीज़ है, जो दुर्भाग्यवश भारत की हवाओं में घुल गई है और संस्कृति बनकर बैठ गई है और हम उसको पहचान नहीं पा रहे। हम उसको अलग नहीं कर पा रहे। कुछ ऐसा है, जो हमें भीतर से ही कमज़ोर बना रहा है। पर हम उसको बहुत पवित्र माने बैठे हैं, हम उसको हटा नहीं पा रहे अपने भीतर से। मैं उसको लोकधर्म कहता हूँ। वह है भारत की परतंत्रता का कारण।

और वह जब तक रहेगा, तब तक भारत को दुर्बल ही रखेगा, और जो दुर्बल होता है उसका शोषण करने तो कोई भी चला आता है। दुनिया में इतने स्वार्थी लोग हैं वो सब लगे हुए हैं कि कोई कमज़ोर दिखे, जाकर के उस पर झपट्टा मार दो। निस्तेज मनुष्यों के साथ क्या तेजस्वी राष्ट्र हो सकता है? दुर्बल नागरिकों के साथ क्या बली राष्ट्र हो सकता है?

और मनुष्य का बल होता है वास्तविक धर्म। वास्तविक धर्म। भारत ने वास्तविक धर्म के साथ जो मज़ाक करा, लोकधर्म के रूप में, मुझे डर है कि कहीं उसकी सज़ा तो नहीं मिली है। “नायमात्मा बलहीनेन लभ्यो।” आत्मा और बल का बड़ा गहरा रिश्ता है। और अगर कहीं पर आत्मा की ही परिभाषा विकृत कर दी गई हो, तो बल कैसे बचेगा? बोलो, बल कैसे बचेगा? जहाँ आत्मा की ही परिभाषा विकृत कर दी गई, वहाँ अब मनुष्य में बल कैसे बचेगा? और मनुष्य में बल नहीं, तो फिर राष्ट्र में बल नहीं।

और मनुष्य का बल होता है वास्तविक धर्म। वास्तविक धर्म गया, तो मनुष्य का बल गया। मनुष्य का बल गया, तो राष्ट्र का बल गया। और राष्ट्र का बल गया, तो राष्ट्र परतंत्र हो गया।

मैं बार-बार पूछा करता हूँ। फिर पूछ रहा हूँ। हम कहते हैं, उदाहरण के लिए, कि हम अपने महापुरुषों को पूजते हैं। उनको अपना आदर्श, अपना रोल मॉडल घोषित करते हैं। आदर्श का तो अर्थ यह होता है न कि जैसे वह जिए, वैसे हम जिएँगे और जो उन्होंने कहा, हम उसको समझेंगे। यही होता है न आदर्श का अर्थ? तो अगर श्रीकृष्ण हमारे आदर्श हैं, तो गीता हमारे जीवन में कैसे नहीं उतरी? और गीता तो कही ही गई है रणक्षेत्र पर। अगर हम वास्तव में श्रीकृष्ण को ज़रा भी सम्मान देते होते, तो युद्ध में हल्के कैसे पड़ जाते? गीता तो कहती है, युद्धस्व। गीता तो कहती है, जीत-हार का पता नहीं; साम्राज्य की, सिंहासन की परवाह नहीं, पर जो सही है, वह कर, निष्काम होकर कर। अंजाम की हमें फ़िक्र ही नहीं है, जो सही है वो कर। और अगर यही सही है कि हम जूझ जाएँ, तो हम जूझे कैसे नहीं? जूझे कैसे नहीं?

हम कहते तो यही रह गए कि हम धार्मिक देश हैं। हम धार्मिक देश नहीं हैं, हम लोकधार्मिक देश हैं। कहा था किसी ने कि इतने भारतीय हैं सब मिलकर के एक जगह थूक भी दें, तो यह जितने आतताई हैं, आक्रांता हैं, डूब मरें इसी में। ब्रिटानवी सल्तनत के लिए कहा था। हम इतने सारे हैं और हारते गए। यह गीता पढ़ने वालों के साथ तो नहीं हो सकता। यह श्रीकृष्ण के वास्तविक प्रेमियों के साथ तो नहीं हो सकता। और श्रीकृष्ण का प्रेमी होने का दावा तो हम रोज़ करते हैं। वो दावा झूठा है।

श्रीकृष्ण माने गीता; गीता माने आत्मज्ञान; और आत्मज्ञान माने जीवन के संघर्ष से कोई पलायन नहीं। मर सकते हैं, हार थोड़ी मानेंगे। मर सकते हैं पर हार थोड़ी मान लेंगे, मुट्ठी भर लोगों को अपने ऊपर छा थोड़ी जाने देंगे। पर यह आप तभी कह सकते हो जब आपको पता होता है कि आपका जीवन धर्मसम्मत है। तब आप कहते हो कि मेरा जीवन मेरे लिए नहीं है, मेरा जीवन धार्मिक है, मेरा जीवन धर्म के लिए है। तो मेरी हार मेरी हार नहीं होगी, मेरी हार धर्म की हार होगी। इसीलिए हारना मंज़ूर ही नहीं है।

हमने हारना मंज़ूर कर लिया, क्योंकि भीतर ही भीतर हमको पता था कि हमारे जीवन में धर्म तो वैसे भी नहीं मौजूद है। तो हमने बड़ी आसानी से हार मान ली। बड़ी आसानी से हमने घुटने टेक दिए।

सोचो, कितनी दूर था ब्रिटेन? कितनी दूर था। और जब वह लोग आए थे उस समय स्टीम इंजन भी नहीं होता था। यह हवा, इसके भरोसे आए थे; यही पाल, यही पतवार, सेल्स, इनके भरोसे आए थे। वो वहाँ से पूरा घूम करके अफ़्रीका इधर आ गए और कब्ज़ा भी कर लिया। सोचो, कितनी भारी आंतरिक दुर्बलता रही होगी जो हमें यह दुर्दिन देखने पड़े। इतने मुट्ठी भर लोग उतनी दूर से आ रहे हैं और उनके पास कुछ विशेष नहीं। स्टीम इंजन वग़ैरह बाद में आए हैं भाई, इलेक्ट्रिसिटी तो बहुत दूर की बात है। कुछ पता नहीं।

हमें बड़ा अच्छा लगता है यह कहना कि वह तो अंग्रेज़ आ गए, हम तो भोले-भाले लोग थे उन्होंने फूट डालकर हम पर राज कर लिया। ऐसे कैसे फूट डाल दी? ऐसे कैसे फूट डाल दी? जहाँ सत्य होता है वहाँ ऐसे नहीं फूट डाली जा सकती, इतने मासूम मत बनो। इतनी आसानी से अगर कोई फूट डाल दे, तो न सत्य है, न प्रेम है।

आ रहे हैं यहाँ पर घूस देकर के, प्लासी की लड़ाई तो सीधे-सीधे घूस देकर उन्होंने जीती है। वो लड़ाई मालूम है। वो लड़ाई जीती हुई मानी ही नहीं जाती, वो लड़ाई ख़रीदी हुई मानी जाती है। द ब्रिटिश बोट द बैटल ऑफ प्लासी। जो घूस पर ईमान बेच दे, उसकी ज़िंदगी में धर्म रहा होगा क्या कहीं? उसके बाद बक्सर की लड़ाई लड़ रहे हैं, उसमें तीन राजा इकट्ठे हो रहे हैं। वहाँ असली लड़ाई हुई थी। उन तीनों में आपस में मनमुटाव है, फूट है। वो तीनों अपना-अपना स्वार्थ देख रहे हैं। तीनों को ही राष्ट्र से, धर्म से, सत्य से कोई मतलब नहीं। अंग्रेज़ों ने फिर हराया।

क्या हम वास्तव में गीता का देश हैं? क्या हम वास्तव में धर्म का देश हैं? हम लोकधर्म का देश हैं और वो लोकधर्म आज भी हावी है। तो बताओ, तलवार आज भी सर पर लटक रही है कि नहीं लटक रही है?

दूसरों का दोष बेशक है, जो लोग यहाँ आ रहे थे वो कोई हमें गले लगाने नहीं आ रहे थे, वो हमारा शोषण ही करने आ रहे थे। दूसरों का दोष तो बेशक है पर क्या हम अपनी कमजोरी, अपनी बीमारी, अपनी बेईमानी की चर्चा नहीं करना चाहेंगे? बोलो। और अतीत में वो सब हमने कमज़ोरियाँ दिखा दीं। उससे भी मुझे कोई बहुत मतलब नहीं, अतीत की बात अतीत में पड़ी रहे। पर अतीत की यह बात अतीत की नहीं है। यह अतीत की बात आज भी है। बहुत अर्थ में हम आज भी बिल्कुल वैसे ही हैं, जैसे सोलहवीं और सत्रहवीं और अठारहवीं शताब्दी में थे। और बल्कि आज और कोशिशें हो रही हैं कि हमें बारहवीं शताब्दी में डाल दिया जाए। तो बताओ पहले उत्सव मनाऊँ या पहले और चौकन्ना होकर के नज़र घुमाऊँ? बोलो।

स्वतंत्रता दिवस को सतर्कता दिवस की तरह मनाइए। ख़तरा बराबर का है। ख़तरा अभी बाक़ी है और ख़तरे का कारण आंतरिक है। हमारे ही भीतर, हमारे ही दिल में, हमारी ही हवाओं में, हमारी ही संस्कृति में अभी धर्म का वह विकृत रूप घूम रहा है, जिसने अतीत में भी हमारी दुर्दशा करी।

पहले भी आपसे चर्चा करी थी। वह आ रहे थे आपके पास एस्ट्रोनॉमी ले, नहीं, यहाँ पहुँच नहीं पाते। लोंगिट्यूड प्रॉब्लम सुनी है आपने? लोंगिट्यूड प्रॉब्लम सुनी है? लोंगिट्यूड प्रॉब्लम ये होती है कि जब आप कहीं को चलते हो, तो अपनी स्थिति पता करने के लिए समुद्र में जब आप चलते हो, लैटीट्यूड चाहिए, लोंगिट्यूड चाहिए। दो चीज़ें चाहिए, दोनों पता है तो आप बता सकते हो, आप कहाँ पर हो। लैटीट्यूड बड़ी आसानी से पता चल जाता है, लोंगिट्यूड नहीं पता चलता। लोंगिट्यूड नहीं पता चलता। तो पता ही नहीं होता आपको, आप हो कहाँ पर।

ये पता करने के लिए आप अगर लंदन में वहाँ पर ग्रीनच लैब है, वहाँ जाएँगे, तो आपको पता चलेगा, ये लोंगिट्यूड पता करने के लिए कितनी रिसर्च करी और कितनी जानें गँवाई उन्होंने। और यह करने के बाद अंततः उन्होंने वह उपकरण निकाल लिया, जो समुद्र में भी उनको सही लोंगिट्यूड बता पाता था और उसी का इस्तेमाल करके वो भारत तक पहुँच पाए। और जब वो ये सब कुछ कर रहे थे, तब भारत एस्ट्रोलॉजी कर रहा था। जब वो एस्ट्रोनॉमी में तेज़ी से आगे बढ़ रहे थे, तब भारत मुहूर्त और घंटा-घड़ियाल में उलझा हुआ था और आज भी उलझा हुआ है। कितने हज़ार करोड़ की एस्ट्रो ऐप्स मार्केट में घूम रही हैं। और यही एस्ट्रोलॉजी है। भारत ने एस्ट्रोलॉजी रह, एस्ट्रोनॉमी पर ध्यान दिया होता तो ग़ुलाम नहीं हुआ होता। क्या आज भी कुछ बदल गया है? आज तो ये जेन ज़ी, ये नए-नए लड़के, ये भी एस्ट्रो ऐप्स पर घुसे हुए हैं। ख़तरा आज भी बराबर का है, दुनिया आगे बढ़ रही है विज्ञान में। हम आगे बढ़ रहे हैं ये कुंडली निकालने में।

जिनके जीवन में वास्तव में धर्म होगा, गीता होगी, क्या वह अपने क्षुद्र स्वार्थों की चिंता करेंगे? यहाँ तो छोटे-छोटे राजा, उनकी छोटी-छोटी रियासतें, वो ख़ुद ही जाकर के अंग्रेज़ों से मिल जाते थे। क्या पड़ोसी को हराना है? आओ, आओ, यहाँ आओ। इसको मिलकर के हराते हैं। ये क्या एक धार्मिक चित्त का लक्षण है? क्या आज भी वैसे ही नहीं है?

जातियों में बहुत गंदे और घटिया तरीके से बँटा हुआ देश था। इतने ही लोग हैं, जो लड़ाई पर जाएँगे। बाक़ी तो अपना-अपना तुम काम करो: तुम सफ़ाई करो, तुम बर्तन देखो, तुम बाल देखो, तुम खेत देखो, तुम ये करो, तुम वो करो। कहाँ से मिलेंगे सबसे क़ाबिल लोग लड़ाई लड़ने के लिए, जब आपने जनसंख्या के 90-95% वर्ग को लड़ाई के मैदान से ही बाहर कर दिया। सेना कैसे बनेगी? और सेना बनेगी भी तो क्या उसमें सबसे क़ाबिल लोग प्रवेश पा पाएँगे, मेरिटोक्रेसी जब है ही नहीं? और क्यों नहीं है? क्योंकि साहब, हम कह देंगे, हमारे ग्रंथों में, हमारी किताबों में लिखा है कि जाति तो भगवान ने बनाई है।

श्रुति में लिखा है? सचमुच? अगर हम धार्मिक लोग होते, तो हम किसी भी किताब को शास्त्र कहने से पहले पूछते कि क्या ये किताब श्रुति से मेल खाती है? पुराणों से हम प्रश्न पूछते कि क्या तुम्हारी बातें उपनिषदों के सिद्धांतों से मेल खाती हैं? क्योंकि ये नियम है। यह नियम है कि स्मृति ग्रंथ, जिसमें पुराण इत्यादि भी आते हैं, कि स्मृति ग्रंथों की बस वही बातें मानी जाएँगी, जो श्रुति से मेल खाती हैं। स्मृति की कोई भी बात जो श्रुति से मेल नहीं खाती, उसे अस्वीकार हमें करना पड़ेगा। यह सनातन का नियम है। पर श्रुति का हमें कुछ पता नहीं, लोकधर्म तो स्मृति ग्रंथों पर चलता है। क़ीमत देनी पड़ती है न। सच्चाई को, तथ्य को। जब धर्म ही पूरा कल्पना पर आधारित हो गया हो तो आप तथ्य को क़ीमत नहीं दोगे। जब तथ्य को क़ीमत नहीं दोगे, तो फिर आप यूनिवर्सिटीज़ में इन्वेस्ट नहीं करोगे। और जब आप नए विश्वविद्यालय नहीं बनाओगे, तो ज्ञान कहाँ से आएगा?

जितनी भी यूरोपियन ताक़तें थीं, उनकी जो टेक्नोलॉजी थी, वो भारतीय राजाओं की टेक्नोलॉजी से कहीं आगे की थी। उनकी बंदूकें, उनके वाहन, उनके जहाज़, सब कुछ, उनकी ट्रिग्नोमेट्री, उनकी कार्टोग्राफी, सब भारत से बहुत आगे की थी। क्यों? भारतीयों की क्या बुद्धि कम नहीं? बुद्धि नहीं कम है, बुद्धि पर लोकधर्म चढ़ा हुआ है। तो जो पैसा लगना चाहिए था कि उससे यूनिवर्सिटीज़ बनतीं और रिसर्च होती, वो पैसा कहाँ लग रहा है? वो कर्मकांड में जा रहा है पैसा सारा। और राजा भी ख़ूब-ख़ूब डोनेशंस दे रहे हैं, चढ़ावा दे रहे हैं, गाँव के गाँव दे रहे हैं। किनको दे रहे हैं? अंधविश्वास फैलाने वालों को। यह है परतंत्रता का कारण।

आप ज़रा-सा सर्च करिएगा कि अंग्रेज़ों के आने से पहले पिछले पाँच सौ साल में और पिछले आठ हज़ार साल में भारत में कुल कितने विश्वविद्यालय खुले? आप पाओगे, कुछ नहीं। कुछ नहीं। जहाँ ज्ञान की क़दर नहीं, वहाँ ग़ुलामी नहीं आएगी, तो और क्या आएगा?

मुग़ल बादशाहों को लेकर भी आप कहते हो, अरे, उन्होंने मक़बरे बनाए, ताजमहल बनवाए। यह तो बताओ, विश्वविद्यालय कितने बनवाए? और यह जनता का पैसा है। यह जनता का पैसा है जिससे आप कह रहे हो फलानी मीनार बनवा दो, यह कर दो, वो कर दो। स्कूल-कॉलेज कितने बनवा रहे हो? रिसर्च ग्रांट कितनी दे रहे हो? और रिसर्च नहीं करोगे, तो टेक्नोलॉजी कहाँ से आएगी? लड़ाइयाँ कैसे लड़ोगे? मेडिसिन कैसे आगे बढ़ेगी?

यही वो काल था रेनेसाँ के बाद का, जब ब्रिटेन में विज्ञान तेज़ी से आगे बढ़ा। भारत में रेनेसाँ हुआ ही नहीं। और रेनेसाँ का संबंध किससे था? स्वतंत्रता से। उन्होंने कहा, रेनेसाँ माने विचार की स्वतंत्रता। भारत ने तो उससे आगे की बात कर रखी थी। भारत ने कहा था, स्वतंत्रता माने अस्तित्व की मुक्ति, एग्ज़िस्टेंशियल फ़्रीडम। पर उस बात को हमने बिल्कुल दफ़न कर दिया। हमने कहा, हमें श्रुति पढ़नी नहीं, हमें उपनिषद् चाहिए नहीं, हमें वेदांत चाहिए नहीं। तो फिर हमें फ़्रीडम भी चाहिए ही नहीं। इतनी हमने दुर्दशा कर ली थी।

मैकॉले का नाम तो सुना ही है आपने। उसने एक ऐसा व्यंग्य मारा था, उसकी चोट आज भी महसूस होती है। उसने कहा था, भारत में इस वक़्त जितना यह कुल ज्ञान है, इससे ज़्यादा ज्ञान लंदन की एक स्कूल गोइंग बच्ची को है, दसवीं की। भारत का कुल ज्ञान ले लो, जितना है। कुल ज्ञान भारत का, या इसी से कुछ मिलती-जुलती बात आप सर्च करेंगे, तो एग्ज़ैक्ट उसके शब्द मिल जाएंगे आपको।

ज्ञान की ज़रूरत क्या है? हमें क्या करना है? कुछ नहीं। बस कल्पना करनी है कि ऐसा कर्मकांड कर दो, तो स्वर्ग लोक प्राप्त हो जाएगा। यह कल्पना करनी है हमें, ज्ञान की ज़रूरत क्या है? और ज्ञान में फिर आत्मज्ञान की तो एकदम ही कोई ज़रूरत नहीं है। धर्म माने ऊँची से ऊँची स्वतंत्रता और लोकधर्म माने सबका शोषण, सबको दबा के रखो। चाहे महिला हो, चाहे दलित हो, चाहे पशु हो, पक्षी हो और चाहे अपनी ही हस्ती हो, अपना ही दमन कर डालो।

हम जब लगे हुए हैं भूत-प्रेत, जादू-टोना, धर्म आधारित, जाति आधारित राजनीति करने में, यहाँ उत्तर में चीन आगे बढ़ता ही जा रहा है, बढ़ता ही जा रहा है, बढ़ता ही जा रहा है। बहुत आगे बढ़ता जा रहा है। और ज़्यादा आगे बस पिछले पचीस साल में बढ़ा है। 1990 के दशक पर भी भारत और चीन अगल-बगल ही चल रहे थे। अभी पचीस-तीस साल में वो और इतना आगे बढ़ गया, चीन। अब जब वो सीमाओं में घुसा चला आएगा, तो क्या करोगे वहाँ पर? मंत्र मारोगे, भस्म मारोगे? उसे कहोगे, तुम लोगों की जाति क्या है? पहले अपनी जाति बताओ। उससे कहोगे, तुम तो हारोगे क्योंकि तुम तो मुहूर्त देख के आते ही नहीं। तो तुम्हारी तो हार निश्चित है। सामने चला आ रहा, उसकी कुंडली माँगोगे कि जा रहे हैं कुंडली बाबा जी को दिखाएँगे कि इसको कैसे वशीभूत करें। क्या करोगे?

हम आज भी ख़तरे में हैं, संभल जाइए, चेत जाइए। और सबसे बड़ा दुश्मन हमारे ही भीतर बैठा है। यहाँ बगल के घर में नहीं, हमारे ही भीतर बैठा है।

और एक बताता हूँ, आने वाले समय में न, ग़ुलामी के लिए ज़रूरी नहीं है कोई आपकी ज़मीन पर कब्ज़ा करे। वो बात ओल्ड फ़ैशंड हो गई कि किसी को ग़ुलाम बनाना है, तो उसकी ज़मीन पर कब्ज़ा कर लो। अब ज़रूरत ही नहीं है। रखो अपनी ज़मीन। तुम ख़ुद अपनी ज़मीन पर हमें आमंत्रित करोगे। तुम ख़ुद हमारे दास बनकर हमारे देशों में आओगे, हमारी सेवा करोगे। पहले तो स्लेव ट्रेडिंग करनी पड़ती थी। अब तुम बाकायदा वीज़ा लेकर आओगे और हमारी सेवा करोगे।

पहले तुम किसी को ग़ुलाम बनाओ, पकड़ के बेड़ियों में और जहाज़ों में भर-भर के, एक ग़ुलाम जा रहे हैं, स्लेव्स जा रहे हैं। तो बुरा लगता था, देखने में ही बुरा लगता था। अब आप बाकायदा वहाँ जाते हो। एंबेसी में लाइन लगाकर वीज़ा लेते हो और ख़ुद अपने आप को हाज़िर करते हो। दास हाज़िर है, मेरे आका। बताइए, क्या सेवा करूँ? वो बोलते हैं, अब तुम हमारे यहाँ टैक्सी चलाओगे।

जब आप ग्लोबल नॉर्थ और ग्लोबल साउथ को लेते हैं। ग्लोबल नॉर्थ कई गुना ज़्यादा अमीर है पर कैपिटा टर्म्स में। लेकिन ड्रेन ऑफ़ वेल्थ आज भी ग्लोबल साउथ से ग्लोबल नॉर्थ को ही हो रहा है। बिना किसी पॉलिटिकल सबजुगेशन के ख़ुद ही हो रहा है। जब इंडिया पॉलिटिकली सबजुगेटेड था, तब तो हमें पता ही है कि ड्रेन ऑफ़ वेल्थ हुआ था। जानते ही हो, वो ड्रेन ऑफ़ वेल्थ आज भी हो रहा है। अब बाकायदा डील के माध्यम से हो रहा है। बाकायदा ट्रेड ट्रीटीज़ के माध्यम से हो रहा है। कोई ज़रूरी नहीं कि आके अब कोई आपकी ज़मीन पर कब्ज़ा करे। अब आप विल्फ़ुली सरेंडर करोगे। अब आप कहोगे, मैं ख़ुद चल के आया हूँ आपकी ग़ुलामी करने।

भारत का जितना पर कैपिटा कार्बन डाइऑक्साइड एमिशन है न, उसमें से बहुत सारा वो है जो विदेशियों ने भारत को आउटसोर्स कर रखा है। यह है नए क़िस्म की ग़ुलामी।

जब आप यह देखते हो, उदाहरण के लिए कि यूरोप का, यूरोप का जो यूरोपियन मैन्युफ़ैक्चरिंग और सर्विसेज़ हैं, उनसे कितना एमिशन है, तो एक आँकड़ा आता है। फिर जब आप उसमें ये देखते हो कि वो फ़ुटप्रिंट कितना है, जहाँ उन्होंने एमिशन कहीं और कराया और वो प्रोडक्ट अपने आप मंगा कर ख़ुद यूज़ कर दिया, तो वो आँकड़ा लगभग 20-30% बढ़ जाता है। नहीं समझे?

सारा गंदा काम दूसरे देश करेंगे। तो सारा एमिशन दूसरे झेलेंगे, सारा पॉल्यूशन दूसरे झेलेंगे। और जो माल बना, दो माल हमें दे दो साफ़-साफ़ करके। ये है नए क़िस्म की ग़ुलामी। और इसका भी समाधान वही है, मास-बेस्ड एजुकेशन ऑफ़ द सेल्फ़। जब तक व्यक्ति जागृत नहीं होता, तब तक राष्ट्र कैसे जागृत होगा? एक-एक व्यक्ति को जगाए बिना हम कैसे कह दें कि एक जागृत राष्ट्र है? आ रही है बात समझ में?

सारा जो अपना साधारण काम है, उन्होंने सौंप दिया अब काले और भूरे लोगों को। ख़ुद क्या कर रहे हैं? वैल्यू-एडेड वर्क, हाई-एंड वर्क, रिसर्च, जिससे नई टेक्नोलॉजीज़ निकल रही हैं, जिससे नया नॉलेज क्रिएट हो रहा है और आप क्या करोगे? आप बर्तन घिसोगे। आप वो सारा काम करो जो लो-लेवल का है। तो उनका समय बचता है, ताकि वह ऊँचा काम कर पाएँ। यह है नया सबजुगेशन, नई ग़ुलामी। और इसमें कोई उन्हें बुरा भी नहीं बोलेगा, क्योंकि आप जो कर रहे हो अपनी मर्ज़ी से कर रहे हो। आपको बाकायदा पैसे मिल रहे हैं काम करने के।

क्या नहीं है भारत के पास? सब कुछ है। एक क्रूड ऑयल को छोड़ दो, उसके अलावा। पर फिर एनर्जी के दूसरे भी होते हैं। क्रूड ऑयल को छोड़ दो और कुछ रेयर अर्थ्स हैं, उनको छोड़ दो, सब कुछ है। उसके बाद भी आज भी हमें क्रूशियल टेक्नोलॉजीज़ के लिए दूसरे देशों का मुँह क्यों ताकना पड़ रहा है? बताओ न। क्योंकि भीतर अभी कुछ है, जो स्वतंत्र नहीं है। वह नकल करने में ज़्यादा सुविधा और सुरक्षा मानता है। वो कहता है, दूसरे ने कर लिया न, वो नकल कर लो, उसने करा है तो ठीक करा होगा।

ठीक वैसे जैसे लोकधर्म कहता है, नकल करो। परंपरा है न। परंपरा माने यही तो होता है। उसने करा, तुम भी कर लो। क्योंकि वही श्रेष्ठ है। तुम्हारे अलावा जो भी कोई हो, श्रेष्ठ है बस उसका जो करा था, उसने उसको सही मान के ख़ुद उसकी नकल कर लो। वही चीज़ हमारी राष्ट्रीय आदत बन गई है। हमारे अलावा जो कोई है, वो बेहतर ही है। उसने जो करा, उसकी नकल कर लो।

टेक्नोलॉजी वो करेंगे, रिसर्च वो करेंगे। हमारा क्या काम है? अधिक से अधिक टेक्नोलॉजी का लाइसेंस ले लो। सामरिक टेक्नोलॉजीज़ में जो सबसे सेंट्रल मोस्ट, क्रूशियल होती हैं, वो हमारी सारी की सारी आज भी इंपोर्टेड हैं। दुनिया सिक्स्थ जनरेशन फ़ाइटर जेट पर पहुँच गई है, हमारे पास फोर्थ जनरेशन का भी अपना इंजन नहीं है। और इंजन ही नहीं है, तो क्या है? इंजन ही इंपोर्ट करना पड़ रहा है। युद्ध शुरू होगा, वो वहाँ से बंद कर देगा एक्सपोर्ट करना इंजन को। क्या कर लोगे? और इंजन में जो फ़्यूल डलता है, वो भी तुम्हें इंपोर्ट करना पड़ रहा है। इंजन भी इंपोर्ट करना पड़ रहा है। फ़्यूल भी इंपोर्ट करना पड़ रहा है। तो अगर सचमुच हो गई आर-पार की लड़ाई, तो हम कैसे लड़ेंगे? कितनी ख़तरे की बात है ये? पर हम अल्टरनेट टेक्नोलॉजीज़ डेवलप ही नहीं कर पाए। क्यों?

हम अपनी रिसर्च करके अपने इंजन डेवलप ही नहीं कर पाए। क्यों? क्योंकि परंपरा ने हमें अनक्रिएटिव बना दिया है। जिसको आप यह बोल दोगे न कि जो पीछे से चला आ रहा है, बस उसी का पालन कर लो। वो आदमी अब क्रिएटिव नहीं हो सकता। एआई एक मौके की तरह आया था हमारे पास। वह मौका भी लगभग हमने पूरा गँवा ही दिया है। एआई में भी छलांग मारकर के अमेरिका, यूरोप, चीन भी ये निकल गए। और कारण तो एक ही है, लोकधर्म। वो आपको ख़तरे नहीं उठाने देगा, वो आपको रिस्क टेकिंग बनने ही नहीं देगा, वो आपसे कहेगा सुरक्षा बड़ी बात है।

जैसी हमारी माँएँ होती हैं कि बच्चे को, ओ ले लो, कहीं बाहर मत जाना, कुछ हो जाएगा। वहाँ तो वहाँ होती है। ऐसा कैसे होता है कि अमेरिका की माँ, 15 साल का हुआ नहीं कि लात मारती है कि जा, अपनी रोटी ख़ुद कमा। उनके क्या डीएनए अलग हैं? वो भी होमो सेपियंस, हम भी। पर हमारे यहाँ तो कुछ है ही नहीं कि नहीं, नहीं, नहीं। जैसा सबने करा, वैसे ही तू भी कर ले और आजा पल्लू के नीचे छुप जा। और इस बात पर हमें फ़क्र भी बहुत रहता है। हम कहते हैं, यही तो, यही तो हमारी गौरवशाली संस्कृति है।

गौरव श्रुति में लीजिए, संस्कृति में नहीं। और संस्कृति में गौरव तब लीजिए, जब संस्कृति श्रुति का अनुगमन करती हो। तब ज़रूर संस्कृति में गौरव ले लीजिएगा। लेकिन आपने जो आज संस्कृति बना रखी है, उसमें कहाँ सनातन और कहाँ श्रुति? कुछ नहीं है। इस संस्कृति पर मैं कैसे गौरव करूँ? ये तो लोकधार्मिक संस्कृति है।

खेती करते हैं न हम। खेती में भी जो इनोवेशन हुए हैं, वह दूसरे देशों ने करें, आज़ादी के बाद भी। इज़राइल को मिली थी बिल्कुल बंजर ज़मीन, कुछ नहीं, उसने खेती के नए-नए तरीके निकाल करके वहाँ पर काम कर डाला। भारत ने भी कुछ करा है, वहाँ पर पूसा वग़ैरह है। नए क़िस्म के बीज वगैरह हम करते हैं। लेकिन आप आज भी सुनते होंगे, जैपनीज़ मेथड ऑफ़ राइस कल्टीवेशन। जो ब्रेकथ्रू इनोवेशंस हैं, वह सब बाहर कहीं हो रहे हैं। हमारे यहाँ कुछ मार्जिनल, इंक्रीमेंटल इंप्रूवमेंट हो जाए, तो हो जाए। ब्रेकथ्रू कुछ होने नहीं पाता, क्योंकि, क्योंकि ब्रेकिंग थ्रू के लिए हम तैयार ही नहीं हैं।

हम डरे हुए लोग हैं। हमें डरा दिया गया है कि ऐसा-सा करो, नहीं तो श्राप लग जाएगा। ऐसा-सा करो, नहीं तो परंपरा टूट जाएगी, लोग नाराज़ हो जाएँगे। वो पुराना डर बहुत गहरे बैठ गया हमारे ज़ेहन में। हम खेती में भी क्रिएटिव नहीं हो पाए। जिसका बोलते हैं, भारत कृषि प्रधान देश है। अरे, कृषि प्रधान देश है, तो कृषि में ही कुछ नया हमने करा होता। वहाँ भी नहीं करा।

हाँ, यह ज़रूर करा है कि मास के, मीट के, बीफ़ के एक्सपोर्ट में हम सबसे आगे हैं। दुनिया के सौ सबसे गर्म शहर ले लो, वो भारत में मिलेंगे सब। दुनिया के सौ सबसे प्रदूषित शहर ले लो, वो भारत में मिलेंगे सब। उसमें आगे हो गए। और यह ख़ुद करा है हमने अपने साथ, यह किसी और की साज़िश नहीं है। और जब तक हमारी संस्कृति, आम आदमी की कंडीशनिंग वैसी ही रहेगी जैसी है, कोई सुधार नहीं हो सकता।

सतर्कता दिवस। क्या? सतर्कता दिवस।

प्रश्नकर्ता: थैंक यू आचार्य जी।

प्रश्नकर्ता: मैकॉले का कोट जो आपने बताया था, इसमें उन्होंने कहा था कि इंडियन टेक्स्ट, जो संस्कृत और अरेबिक में लिखे थे, वो यूरोपियन स्टैंडर्ड्स से इतने पीछे हैं कि एस्ट्रोनॉमी का जो उनका विवरण है, दैट वुड ड्रॉ लाफ्टर फ़्रॉम इंग्लिश बोर्डिंग स्कूल गर्ल्स।

आचार्य प्रशांत: उन्होंने कहा, भारत में यह जो तुमने चला रखा है, तुम्हारे जो साइंस के लेवल्स हैं और जो तुम यह कुंडलीबाज़ी करते हो, इंग्लिश बोर्डिंग स्कूल गर्ल्स भी हँसेंगी इस पर।

कितने अपमान की बात है ये, है कि नहीं? और कितने अफ़सोस की बात है? और और ज़्यादा अफ़सोस की बात ये नहीं है कि जो आज की युवा पीढ़ी की गर्ल्स हैं, ये आज भी हॉरोस्कोप बनवा रही हैं ऐप पर जाकर के। और ये बात मैकॉले ने इतने सौ साल पहले बोली थी। आज भी वही चल रहा है। शुभचिंतक नहीं था वो हमारा। यह उसने क्या करा है? व्यंग्य करा है हमारे ऊपर। हम पूरी तरह आहत भी नहीं होते। और गर्ल्स भी जानबूझकर बोला है। बॉयज़ क्यों नहीं बोला? यह दिखाने के लिए कि भारत में तो गर्ल्स पढ़ती ही नहीं हैं। और वहाँ पीछे इंग्लैंड में गर्ल्स भी इतना पढ़ती हैं कि तुम्हारे यहाँ के बड़े-बड़ों से ज़्यादा ज्ञान रखती हैं।

क्या करती हैं गर्ल्स? भारत का जितना फीमेल लेबर फ़ोर्स पार्टिसिपेशन रेट है, इससे दुगुना है चीन का। तो भारत की गर्ल्स” क्या कर रही हैं? “फ़ैमिली, फ़ैमिली। वहाँ पर महिलाएँ निकल कर काम कर रही हैं, राष्ट्र बना रही हैं। नेशन बिल्डिंग कर रही हैं। हमारे यहाँ महिलाएँ फ़ैमिली बिल्डिंग कर रही हैं। एक देश के 50% नागरिकों को तुमने किचन में और बिस्तर में क़ैद कर दिया है। और दूसरा राष्ट्र है, जो अपने स्त्रियों, पुरुषों सबको काम पर लगा रहा है। आगे कौन निकलेगा?

और है कुछ?

प्रश्नकर्ता: उन्होंने यह बोला कि जो हमारे मेडिकल डॉक्ट्रिन्स हैं, उस पे जो विवरण है, दैट वुड एंबेरेस एन इंग्लिश ब्लैकस्मिथ। लोहार की बात कर रहे थे।

आचार्य प्रशांत: कह रहे हैं कि तुम जिसको अपनी मेडिसिन बोलते हो, इंग्लैंड का एक लोहार भी वो सब सुनेगा, तो कहेगा, ये क्या है? कैसी बातें बोल रहे हो? अरे, इंग्लैंड के लोहार को भी तुमसे ज़्यादा ज्ञान है। वो अतिशयोक्ति कर रहा है। मैकॉले कोई अच्छा आदमी नहीं है, शुभचिंतक नहीं है हमारा, अतिशयोक्ति कर रहा है। पर क्या हम इंकार कर सकते हैं कि हमने अपनी दुर्दशा कर रखी थी, इसीलिए किसी दूसरे को हक़ मिला हम पर व्यंग्य करने का? बोलो। और है कुछ?

प्रश्नकर्ता: उन्होंने एक्चुअली लोकधर्म का भी कुछ मेंशन किया कि भारत की ज्योग्राफी तो शहद और मक्खन के सीज़ डिस्क्राइब करती है।

आचार्य प्रशांत: वो कह रहे हैं कि ये जो बाकी सारे डिसिप्लिंस ले रहे हैं। मेडिसिन ले ली, एस्ट्रोनॉमी ले ली। अब ज्योग्राफी ले रहे हैं। कह रहे हैं, तुम्हारे यहाँ पे जो ज्योग्राफी है, उसके हिसाब से तो कहीं पर दूध की नदी बहनी चाहिए। कहीं पर मक्खन है, कहीं शहद है, कहीं खीर का सागर है, कहीं कुछ है। कह, तुम्हारे यहाँ यह लेवल है ज्योग्राफी का। यह पढ़ाते हो तुम अपने बच्चों को कि उतनी दूर अगर चले जाओगे, तो वहाँ तुम्हें मक्खन की नदी मिलेगी। कह रहे हैं ये जब पढ़ा रहे हो, तो तुम्हारा देश आगे बढ़ेगा क्या? और आज भी क्या हम इन सब बातों में यक़ीन नहीं करते हैं? बोलिए। ज्योग्राफी में भले ही नहीं पढ़ाया जाता हो, पर संस्कृत में मौजूद है कि मरोगे, वहाँ जाओगे, तो बीच में फलानी नदी मिलेगी, फिर ऐसे पार करोगे, फिर दूध आएगा, फिर मक्खन आएगा, फिर फलाना-ढिकाना, ये अप्सरा आएगी।

क्यों हम किसी मैकॉले को मौक़ा दे रहे हैं हमें आहत करने का? और मैकॉले मर नहीं गया, मैकॉले आज भी ज़िंदा है। वो हज़ार तरीक़ों से आज भी हम पर व्यंग्य कर रहा है। और यह हक़ उसे, बहुत अफ़सोस की बात है, हमने ही दिया है।

वेद है हमारे प्राथमिक ग्रंथ। ठीक है? वैदिक धर्म। जिस दिन से वेदांत, वेदांत माने वेदों का दर्शन, जिस दिन से वेदांत का ग़लत अर्थ भारत में प्रचलित हुआ, उस दिन से भारत की अवनति शुरू हो गई। बस यह है बात। अगर आप भारत की ग़ुलामी की टाइमलाइन देखेंगे और वेदांत की विकृति की टाइमलाइन देखेंगे, तो दोनों बिल्कुल समानांतर है। वेदांत बहुत सीधा है: श्रुति, धर्म, अद्वैत। और भारत ने जब यह स्वीकार कर लिया कि वेदांत को तोड़ना-मरोड़ना ठीक है। उसमें इधर-उधर की बातें, मान्यताएँ डालना ठीक है। जो बात कही ही नहीं जा रही, वो बात उस पर प्रक्षेपित करना ठीक है। वहीं से भारत की अवनति शुरू हो गई। ये है कारण।

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, एक अभी ख़बर भी आई है कि एक मंदिर में, एमपी के एक मंदिर में, 11 अगस्त को मनेगा स्वतंत्रता दिवस, क्योंकि वहाँ के पुजारी कह रहे हैं कि तिथि देखकर मनाना चाहिए, राष्ट्रीय पर्व भी।

आचार्य प्रशांत: ट्रेन भले ही शाम को 7:00 बजे आती हो, आप जाइएगा रात में 10:00 बजे। क्योंकि आप तो तब जाएँगे न जब आपका हिसाब-किताब बोलता हो कि अब यह मुहूर्त है। तथ्यों के लिए तो हमारे पास कोई सम्मान ही नहीं है। “मेरी धारणा, मेरी मान्यता, मेरी कल्पना, मैं उस पर चलूँगा।”

This article has been created by volunteers of the PrashantAdvait Foundation from transcriptions of sessions by Acharya Prashant
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