स्वतंत्रता दिवस को केवल उत्सव नहीं, बल्कि आत्मावलोकन और सतर्कता दिवस की तरह देखने की आवश्यकता है। भारत की परतंत्रता के पीछे रहे आंतरिक कारणों को समझना ज़रूरी है, क्योंकि राजनीतिक स्वतंत्रता के बावजूद लोकधर्म, अंधविश्वास, जातिगत विभाजन, ज्ञान-विज्ञान की उपेक्षा, परंपरागत जड़ता और आत्मबल की कमी आज भी मौजूद हैं। वास्तविक देशभक्ति इन बंधनों को पहचानकर ज्ञान, आत्मनिर्भरता, वैज्ञानिक दृष्टि और जागरूक नागरिकता विकसित करने में है।
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प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। मेरा नाम कमलेश है। मैं राजस्थान, उदयपुर से आया हूँ, सर। मेरा क्वेश्चन स्वतंत्रता दिवस पर है। क्योंकि स्वतंत्रता दिवस आने वाला है तो मैं अपने गाँव से शुरू करूँ तो स्कूलों में देखूँगा तो मंच सजेंगे। धूमधाम से मनाया जाएगा, बहुत उत्साह दिखेगा। थोड़ा और बाहर निकलूँगा, तो तहसील लेवल पर या कॉलेजेस को देखूँगा, तो वहाँ पर भी मंच सजेंगे, उत्साह दिखेगा, रैलियाँ निकाली जाएँगी। अभियान चलेंगे कि हर घर तिरंगा, तिरंगे के साथ रैलियाँ निकलेंगी, देशभक्ति के नारे लगेंगे।
तो फिर उस दिन के लिए इतना उत्साह दिखता है देश के लिए, हम देश को बदल देंगे। देश को तरह-तरह से विकास के लिए प्रण लिए जाएँगे और बड़ी-बड़ी बातें होंगी। और फिर दूसरे दिन देखूँगा कि सड़क पर तिरंगे बिखरे हैं, जो बातें हुई थीं उनका कहीं नामोनिशान नहीं दिखेगा। बस वही लोग, जो बड़ी-बड़ी बातें कर रहे थे, वो या तो रिश्वत देने में संलिप्त रहेंगे या लेने में। वही लोग, जो बड़ी-बड़ी बातें कर रहे थे, वही लोग कहीं पर गंदगी फैला रहे होंगे। तो ऐसी-ऐसी चीज़ें कर रहे होंगे, जो देश को भीतर से खोखला कर रही हैं। तो मैं ये समझना चाह रहा था कि वास्तव में देशभक्ति कैसी होगी? हमें इस स्वतंत्रता दिवस को कैसे मनाना चाहिए और वास्तव में देशभक्ति का अर्थ क्या होगा?
आचार्य प्रशांत: भारत हो या दुनिया का कोई भी अन्य देश, जब उसकी स्थापना होती है तब उस दिन वो स्वतंत्र होता है या परतंत्र? स्वतंत्र या परतंत्र?




