“फॉलो योर पैशन” तभी सार्थक है, जब वह सचमुच आपका अपना हो। अक्सर जिसे हम अपनी पसंद, पैशन या इच्छा मानते हैं, वह समाज, परिवार, संस्कार और परिस्थितियों से भीतर बैठा हुआ प्रभाव होता है। वास्तविक स्वतंत्रता न बाहरी दबाव में जीने में है, न भीतर की कंडीशनिंग का गुलाम बनने में। आत्मनिरीक्षण से सही कर्म की स्पष्टता आती है और बिना बिके, बिना डरे एक गरिमापूर्ण जीवन जिया जा सकता है।
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प्रश्नकर्ता: सर, मेरा सवाल यह है कि हम सभी लोग अपने जीवन में बहुत बार ये लाइन सुनें, फॉलो योर पैशन। बिना किसी लिमिटेशन के, बिना किसी रेस्ट्रिक्शन के। तो सर, ये जो किसी भी मिडिल क्लास फैमिली का पहला ऐम होता है कि हमारी फ़ाइनेंशियल नीड्स मीट हों। सर, वही बात है कि कोई भूखे पेट क्या पैशन फॉलो करें?
सर, मेरा सवाल ये है कि क्या ये लाइन सब पर लागू नहीं होता है कि फॉलो योर पैशन?
आचार्य प्रशांत: ये पैशन शब्द थोड़ा-सा अस्पष्ट है, इसीलिए गड़बड़ है। देखो, ये दोनों (श्रोताओं को इंगित करते हुए) बाहर हैं और ये बाहर से मुझ पर दबाव बनाएँ। तो दिख जाता है, बात विज़िबिलिटी की है। अब यही दोनों अगर किसी तरीके से एक सूक्ष्म रूप धर के, शब्द रूप लेकर के, मान्यता का रूप लेकर के, धारणा का रूप लेकर के, एक सटल-फ़ॉर्म लेकर के मेरे खोपड़े के अंदर बैठ जाएँ और वहाँ से मुझे संचालित करने लगें, कंट्रोल करने लगें, तो अब मुझे यह कहने का एक नकली अधिकार मिल गया है कि मैं बाहर के किसी




