
प्रश्नकर्ता: सर, मेरा सवाल यह है कि हम सभी लोग अपने जीवन में बहुत बार ये लाइन सुनें, फॉलो योर पैशन। बिना किसी लिमिटेशन के, बिना किसी रेस्ट्रिक्शन के। तो सर, ये जो किसी भी मिडिल क्लास फैमिली का पहला ऐम होता है कि हमारी फ़ाइनेंशियल नीड्स मीट हों। सर, वही बात है कि कोई भूखे पेट क्या पैशन फॉलो करें?
सर, मेरा सवाल ये है कि क्या ये लाइन सब पर लागू नहीं होता है कि फॉलो योर पैशन?
आचार्य प्रशांत: ये पैशन शब्द थोड़ा-सा अस्पष्ट है, इसीलिए गड़बड़ है। देखो, ये दोनों (श्रोताओं को इंगित करते हुए) बाहर हैं और ये बाहर से मुझ पर दबाव बनाएँ। तो दिख जाता है, बात विज़िबिलिटी की है। अब यही दोनों अगर किसी तरीके से एक सूक्ष्म रूप धर के, शब्द रूप लेकर के, मान्यता का रूप लेकर के, धारणा का रूप लेकर के, एक सटल-फ़ॉर्म लेकर के मेरे खोपड़े के अंदर बैठ जाएँ और वहाँ से मुझे संचालित करने लगें, कंट्रोल करने लगें, तो अब मुझे यह कहने का एक नकली अधिकार मिल गया है कि मैं बाहर के किसी प्रेशर को स्वीकार नहीं करता, क्योंकि अब बाहर कोई नहीं है जो मेरे ऊपर दबाव बना रहा है। बाहर से कोई नहीं है मेरे ऊपर चढ़ा हुआ। पर जो पहले बाहर चढ़ा होता था मेरे ऊपर, अब वो बाहर से अपनी जगह छोड़ के कहाँ बैठ गया है? यहाँ बैठ गया है।
जैसे आपके ब्रेन में एक चिप इंप्लांट कर दी गई हो। बहुत छोटी-सी चिप है और आपको एनेस्थाइज़ करके किया गया। यह सब आपको पता भी नहीं चला कि आपके दिमाग़ में कब एक चिप लगा दी गई है। अब आप घूम रहे हो स्वाधीन बनकर। अब आप घूम रहे हो कि मैं तो स्वचालित हूँ, स्वतंत्र हूँ। मैं तो अपने पैशन पर चलती हूँ, साहब। मैं अपने पैशन पर चलती हूँ। ये जो बाएँ वाले थे, ये बेकार लोग थे, ये दबाव में आ जाते थे। ये कायर थे और कमज़ोर थे। ये तो प्रेशर में आ गए। मैं किसी के प्रेशर में नहीं आती, मैं तो अपने पैशन पर चलती हूँ।
पर तुम्हारा यह पैशन है क्या? तुम्हारा यह पैशन कुछ नहीं है। जो बाहरी तमाम तरीके के दबाव हैं, हमारे बाहरी संस्कार हैं, बाहरी चाल-चलन है, वही तुम्हारे भीतर बनकर बैठ गया है और उसको तुम अपना पैशन बोल रहे हो, जबकि उसमें तुम्हारा अपना कुछ नहीं है।
बड़ा एक सीधा उदाहरण है और बहुत बार लेता हूँ और अलग-अलग तरीकों से वो उपयोगी हो जाता है। अभी ले लो। पता नहीं कितने लोगों का हिंदुस्तान में पैशन होगा क्रिकेट। तुम्हारा यही पैशन होता क्या, अगर तुम अरब में पैदा हुए होते या चीन में या जापान में पैदा हुए होते या अफ्रीका में पैदा हुए होते? आप नाइजीरिया में पैदा हुए हैं या सऊदी अरब में पैदा हुए हैं या अर्जेंटीना में पैदा हुए हैं, तो क्रिकेट आपका पैशन होता क्या? पर उतने ही चांसेस हैं, जितने यह चांस हैं कि आप यहाँ छत्तीसगढ़ में हो और आइस हॉकी आपका पैशन है। तो यह भी मत बोलो कि कम चांसेस हैं। कम चांसेस नहीं है, चांस टेंडिंग टू ज़ीरो। लेकिन आज आप जान देने को तैयार हो जाते हो। मेरा पैशन है क्रिकेट। मेरा पैशन है क्रिकेट।
मैं कहीं पढ़ रहा था कि भारत में हर साल कुछ-न-कुछ मौतें होती हैं क्रिकेट से जुड़े मुद्दों को लेकर। कुछ इस बात पर होती हैं कि कहीं मोहल्ला स्तर पर कुछ लड़के खेल रहे थे और उनमें लड़ाई हो गई, तो एक-दूसरे को किसी ने विकेट मार दिया, बल्ला मार दिया, वो मर गया। और कुछ मौतें ऐसी होती हैं कि साहब, मैच देख रहे थे। आपकी टीम हार गई, तो बुज़ुर्ग थे, उनको हार्ट अटैक आ गया। और कुछ ऐसी होती हैं कि मैच था, मैच में आपकी टीम हार गई तो आपने जाकर के मोहल्ले में दंगे कर दिए, तो उसमें किसी की मौत हो गई।
हमारा इतना भारी पैशन है कि हम उसके लिए मरने-मारने को तैयार हैं। हर साल हिंदुस्तान में एक-एक फाइनाइट नंबर ऑफ़ डेथ्स होती हैं क्रिकेट को लेकर के, क्योंकि वो हमारा पैशन है। वो आ कहाँ से गया तुममें? तुम्हारा है क्या, सचमुच?
हम उनकी तो बात ही नहीं कर रहे, जो प्रेशर पर चले ज़िंदगी में। हम उनकी तो बात ही नहीं कर रहे, जिन्होंने बाहरी दबाव के आगे घुटने टेक दिए। हम उनकी बात कर रहे हैं, जो अपने आप को आज़ाद और स्वाधीन बोलते हैं और बोलते हैं, मैं तो ज़िंदगी अपने हिसाब से चलाऊँगा। मुझे तो अपने पैशन को साकार करना है। तुम्हारा पैशन तुम्हारा है क्या? तुम्हारा पैशन क्या सचमुच तुम्हारा है या वो भी एक बाहरी हवा है, जो तुम्हारे भीतर प्रवेश कर गई है? बस बाहरी प्रभाव हैं, ट्रेंड हैं, संस्कार हैं, जो तुमने सोख लिए हैं और तुम बेहोश थे। तुम्हें पता भी नहीं चला कि तुमने कब उन बाहरी प्रभावों को ही मेरी पसंद का नाम दे दिया। तुमने कह दिया, ये तो मेरी पसंद है। मेरा पैशन है, मेरा मत है, मेरा ओपिनियन है। मेरी बात है। साहब, मेरा ऐसा मानना है।
तुम्हारा ऐसा मानना नहीं है। तुम्हारे चारों ओर लोग उसी तरह मान रहे, वही बात तुम्हारे अंदर भी घुस गई। तुम्हारा अपना कोई मानना है ही नहीं।
तो जिसको आप कहते हो कि अ लाइफ़ स्पेंट अंडर प्रेशर, वो तो प्रेशर में बीती ही बीती है। उसके ऊपर तो प्रभावों का ठप्पा पड़ा ही पड़ा हुआ है। लेकिन जिन लोगों को आप बोलते हो कि दे आर लिविंग अ लाइफ़ ऑफ़ इंडिविजुअल पैशन, वह शायद और ज़्यादा प्रभावित और संस्कारित हैं। वह और ज़्यादा कंडीशंड ज़िंदगी जी रहे हैं। बताओ क्यों? क्योंकि ये जो बाएँ वाले हैं, इनको कम-से-कम दिख तो रहा है कि इनके बाहर खड़े होकर दो लोग इन पर दबाव बना रहे हैं, छा रहे हैं, तो अब ये झूठ नहीं बोल सकते। ये दो जने हैं, ये चढ़े हुए हैं मेरे ऊपर। मैं झूठ नहीं बोल सकता कि मैं आज़ाद हूँ। मुझे दिख रहा है कि ये दो मूर्तियाँ, ये दो जीव, ये प्राणी, ये चढ़े आ रहे हैं मेरे ऊपर, अब मैं झूठ कैसे बोल दूँ? मैं किसको बेवकूफ़ बनाऊँ कि मैं आज़ाद हूँ? मुझे तो।
लेकिन ये जो पैशनवादी होते हैं, अब इनके ऊपर कोई बाहर तो आ नहीं रहा चढ़ने। तो इनको एक आंतरिक झूठ बोलने का लाइसेंस मिल जाता है। वो आंतरिक झूठ यह है कि साहब, मैं तो ज़िंदगी अपने पैशन, अपनी पसंद पर जीता हूँ। मैं तो आज़ाद पंछी हूँ, दिल करेगा तो उधर जाएँगे। दिल करेगा तो उधर जाएँगे। जिसको तुम अपना दिल बोल रहे हो, वो एक चिप है। जिसको तुम अपना दिल बोल रहे हो, वो एक चिप है, जो समाज, समय, संयोग, संस्कार ने तुम्हारे भीतर स्थापित कर दी है, इंप्लांट कर दी है। तुम्हारा दिल तुम्हारा है ही नहीं, वो पूरे तरीके से सोशल है, टेंपोरल है। सिचुएशनल है, कॉइंसिडेंटल है।
तुम्हारा दिल तुम्हारा नहीं है, तुम बोलते ही रहो, बस मेरी पसंद, मेरी पसंद, मेरा मानना, मेरी धारणा, मेरा विश्वास, मेरी आस्था, मेरा प्यार, इसमें से कुछ भी तुम्हारा नहीं है।
तो वो तो जो बात थी न कि अपना पैशन कैसे फॉलो करें, वो बात तो यहीं ख़त्म हो जाती है। लेकिन अब बात ख़त्म हो के एक अगले चरण में प्रवेश कर जाती है। बात एक तल पर ख़त्म हुई है और अब वो एक दूसरे तल पर जन्म ले लेती है। अब वह दूसरा तल क्या है? तो क्या इनके अलावा और इनके अलावा जीने का और कोई तरीका नहीं है?
यह है प्रकट प्रेशर की लाइफ़, जहाँ आपके ऊपर जो दबाव है और जो बंधन है, वह प्रकट है, प्रत्यक्ष हैं। और यह है अप्रकट, परोक्ष, इनडायरेक्ट, प्रच्छन्न प्रेशर की लाइफ़, जिसको आप बोलते हो पैशन की लाइफ़। यहाँ मैं क्या हूँ? यहाँ मैं एक डायरेक्ट प्रिजनर हूँ। और यहाँ मैं क्या हूँ? प्रिजनर यहाँ भी हूँ, पर इनडायरेक्टली हूँ। यहाँ मेरे ऊपर डायरेक्ट प्रेशर है, यहाँ मेरे ऊपर इनडायरेक्ट प्रेशर है।
ग़ुलामी इधर भी है, ग़ुलामी इधर भी है। बस इतना है कि यहाँ की ग़ुलामी स्पष्ट है और अनडिनायबल है, नकारी नहीं जा सकती। और यहाँ की ग़ुलामी आज़ादी का रूप रखकर सामने आ जाती है। मैं जवान हूँ, मैं आज़ाद हूँ। मैं किसी की नहीं सुनती। कोई मेरे ऊपर आए नहीं। कोई मुझे रोके नहीं, कोई मुझे टोके नहीं। मैं चाहे जो करूँ, मेरी मर्ज़ी। तुम्हारी अपनी कोई मर्ज़ी है ही नहीं, तुम्हारी सारी मर्ज़ियाँ सामाजिक और सांयोगिक हैं। बात आ रही है?
तो बात ख़त्म हो गई इस तल पर। तो क्या जीवन ही ख़त्म हो गया इस स्थल पर? माने जीने के क्या बस यही दो तरीके हो सकते हैं? कि या तो खुलेआम ग़ुलाम रहो या छुप-छुप कर ग़ुलामी करो। इन दो के अलावा क्या जीने का कोई तरीका नहीं हो सकता? बिल्कुल हो सकता है। और वही जो जीने का तरीका है, उसी को जीवन कहते हैं, उसी को आज़ादी कहते हैं, उसी को जवानी कहते हैं। बाक़ी सब तो गर्भ से ही बूढ़े पैदा होते हैं। बात आ रही है समझ में?
तीसरा तरीका क्या है? आप पूछना चाहती थी कि पहले से क्या दूसरा जीवन बेहतर है। मैं कह रहा हूँ, जिसको आप दूसरा जीवन कह रही हैं, वह बिल्कुल पहले जैसा ही है। बस यहाँ डायरेक्ट है, यहाँ इनडायरेक्ट है। तो दूसरे से आगे बढ़कर अब हम तीसरे पर जाते हैं। तीसरे तरह का क्या कोई जीवन हो सकता है? हाँ, हो सकता है। वो तीसरा जीवन वो है जिसमें न आप बाहर से ग़ुलाम हैं, न आप ख़ुद के ग़ुलाम हैं। जिसमें न तो आप संसार के ग़ुलाम हैं, न अहंकार के ग़ुलाम हैं। जिसमें न तो आपके ऊपर समाज बाहर से चढ़ा हुआ है और न वह संस्कार बनकर आपके ऊपर भीतर से चढ़ा हुआ है।
देखो, बाहर वाले आपके ऊपर दो तरह से शासन करते हैं, एक तो यह कि बाहर से ही शासन कर लें। आपकी कनपटी पर रख दी बंदूक कि जो तुमसे कहा जा रहा है, वह करो। इसे कहते हैं बाहर से शासन करना। कनपटी पर बंदूक रख दी या कि आपको लालच दिखा दिया बाहर से। यह होता है आप पर बाहर से शासन करना। और दूसरा होता है कि बाहर से तो आपको आज़ाद छोड़ दिया, पर आपके भीतर घुस कर के आप पर भीतर से शासन कर रहे हैं।
हमें यह दोनों ही संभावनाएँ नहीं चाहिए, हम इन्हें ख़ारिज करते हैं। हम एक तीसरी संभावना से प्यार करते हैं। और तीसरी संभावना है, न मैं बाहर से ग़ुलाम रहूँगा, न भीतर से। और इन दोनों में ज़्यादा ख़तरनाक ग़ुलामी कौन-सी है? बाहर वाली या भीतर वाली? बोलो, बाहर वाली या भीतर वाली?
श्रोता: भीतर वाली।
आचार्य प्रशांत: बाहर से तो ग़ुलाम नहीं रहूँगा। भाई, आज़ाद देश है और बड़ा ख़ूबसूरत संविधान है और तमाम तरह के हमको अधिकार मिले हुए हैं। तो बाहर से तो वैसे भी कोई हम पर राज कर ही नहीं सकता। आप एडल्ट्स हैं। क़ानूनन किसी को हक़ नहीं कि वो आप पर बाहर से शासन करें। लेकिन संविधान आपको नहीं रोक सकता, आपका अपना ही ग़ुलाम बन जाने से। संविधान इतना तो कर सकता है कि दूसरे आपका शोषण न करें। यह संविधान तय कर देता है कि दूसरा आपका शोषण नहीं कर सकता। पर आप ख़ुद ही अपना शोषण ना करें, संविधान यह नहीं तय कर सकता। आप ख़ुद ही अपना शोषण करने को उतारू हो, तो संविधान बेचारा क्या करेगा?
हम इन दोनों ही बातों को ख़ारिज करते हैं।
हम वह व्यक्ति बनना चाहते हैं, जो ख़ुद को इतना जानता है कि अगर अपने भीतर किसी अपरिचित को, शोषक को बैठे देखता है, तो पकड़ लेता है। कहता है, यह मैं नहीं हूँ।
अगर मेरा शोषक मुझसे बाहर बैठा है, तब तो मैं उसे पहचान ही लूँगा। पर मैं अपने आप को इतने ध्यान से देखा करता हूँ कि अगर मेरा शोषक मेरे भीतर भी आकर बैठ गया है, तो मैं उसको भीतर भी पहचान लूँगा।
मेरी आँखें सिर्फ़ दुनिया को ही नहीं देखतीं कि कौन मेरा दुश्मन, कौन मेरा दोस्त, कौन आ रहा है मुझ पर क़ब्ज़ा करने के लिए। मेरी आँखें सिर्फ़ दुनिया को ही नहीं देख रही हैं। मेरी आँखें दर्पण भी देख रही हैं। और जब मेरी आँखें दर्पण को देखती हैं, तो उसमें वो यह देख लेती हैं कि कहीं मेरा शोषक, मेरा दुश्मन, मेरे भीतर ही तो नहीं बैठा हुआ है।
और जब आप बाहर और भीतर दोनों तरफ़ से आज़ाद हो जाते हो, तब आपसे स्वतःस्फूर्त सही कर्म उठता है, फूटता है। अब उसको नियंत्रित नहीं करा जा सकता, रोका नहीं जा सकता। और तब आप यह सवाल पूछना भूल जाते हो कि अब मेरी रोज़ी-रोटी कैसे चलेगी? लाइवलीहुड का क्या होगा? फिर यह सवाल ग़ायब हो जाता है। क्योंकि अब आप वही कर रहे हो जो आपको करना है, कोई विकल्प है ही नहीं। अब ऐसा नहीं है कि मेरे पास चार जॉब ऑफ़र्स हैं। मैं इसमें से किसको एक्सेप्ट करूँ? अब सॉफ़्टवेयर में चली जाऊँ कि एमबीए करने चली जाऊँ कि पापा के बिज़नेस में चली जाऊँ। अब यह सब कुछ नहीं है।
अब भीतर स्पष्टता इतनी है, आईने को हमने इतने अनुशासन के साथ देखा है और इतनी ईमानदारी के साथ कि पाँच-दस तरह के विकल्प हमें उठते ही नहीं। अब क्लेरिटी है, निर्विकल्पता है, चॉइसलेसनेस है। एक काम है और वह होकर रहेगा।
क्या वह काम करते समय हमने यह पहले से तय करा था, गणना करी थी, कैलकुलेट करा था कि इसमें पैसे कितने मिलेंगे, करियर सक्सेस कितनी मिलेगी? नहीं करा था। तो इसका क्या मतलब है कि सही काम करने में करियर ख़राब हो जाएगा? भूखे मरोगे, ग़रीब जिओगे? नहीं, बिल्कुल भी नहीं। क्योंकि जो सही काम होता है, उसके साथ दो चीज़ें जुड़ जाती हैं। पहला, उसमें आप प्रण-प्राण से उतरते हो, तो एक्सीलेंस उसमें आती ही आती है। क्योंकि अब वो काम आत्मिक है, वास्तव में आपका अपना है। और दूसरी बात, क्योंकि वो काम अब स्वार्थ-केंद्रित नहीं है। आत्मिक तो है, पर स्वार्थ से नहीं आ रहा है। तो इसीलिए उसकी एक जनरल वैल्यू भी होती है, उसकी एक सोशल वैल्यू भी होती है।
कोई काम आप सिर्फ़ अपने लिए करो, तो उसके लिए कोई आपको पैसे क्यों देगा? मैं यह पानी पी रहा हूँ। यह कर्म था, इस कर्म के आप मुझे पैसे नहीं देंगे क्योंकि यह काम मैंने सिर्फ़ अपने लिए करा है। पर जो काम पूरे तरीके से आंतरिक आज़ादी के साथ करा जाता है, वह दूसरों के भी काम आता है और दूसरों को आज़ादी का संदेश दे जाता है। तो उसके लिए दूसरे आपको इतना पैसा सहर्ष दे देंगे कि आपकी ज़िंदगी मज़े में चलती रहे। आपको पैसों की कमी नहीं पड़ेगी। और मैं आपको यह आश्वासन नहीं दे रहा हूँ कि आप करोड़पति हो जाएँगे। पर फिर जो आत्मिक जीवन जीता है, करोड़पति होना उसका मंसूबा होता भी नहीं है। ऐसा नहीं कि करोड़पति हो नहीं सकता। पर लक्ष्य बनाकर करोड़पति नहीं होता। वो हो गया, तो हो गया। नहीं हुआ, तो नहीं हुआ।
हाँ, एक चीज़ पक्की है, भूखे नहीं मरोगे।
जो सही ज़िंदगी जी रहा है, द ट्रुथफ़ुल लाइफ़, द ऑथेंटिक लाइफ़, वो इस डर के पार निकल जाता है कि उसको रोटी के लाले पड़ जाएँगे और रोटी के लाले उसको कभी पड़ते भी नहीं हैं।
तो यह जो मिडिल क्लास फ़ियर आपके भीतर बैठाया जाता है ना कि अरे, तू क्या करेगी? बेरोज़गार रह जाएगी, दुनिया में सबसे पीछे रह जाएगी। खाने-पहनने को भी नहीं होगा तेरे पास। यह झूठी बात है। और इसी झूठी बात को न मानने को श्रद्धा कहते हैं। श्रद्धा का मतलब ही यही होता है कि अगर सही और सच्चा जीवन जी रही हूँ, तो भूखी नहीं मरने वाली। क्या होगा? कैसे होगा? हमें पता नहीं, पर कुछ हो जाएगा। पैदा हुए हैं, तो प्रकृति ने यह शर्त थोड़ी रखी थी कि पैदा हुए हो, तो नकली ज़िंदगी जिओगे, तभी जी पाओगे। पैदा हुए हैं, सच्ची ज़िंदगी जिएँगे। कुछ न कुछ इंतज़ाम हो जाएगा। जैसे पैदा हुए थे, वैसे ही जी भी लेंगे। और अगर नकली ज़िंदगी जीकर ही जीवन काटा जा सकता है, तो इसका मतलब यह है कि जन्म लेने की शर्त ही यही है कि ग़ुलामी में जियो और नकली होकर के जियो, नहीं तो जियो ही मत। ऐसी कोई शर्त हो नहीं सकती। है भी, तो हम मानने से इंकार करते हैं।
आप में से जिन लोगों का भी दिल सचमुच धड़कता है, जो गंदा जीवन नहीं जीना चाहते आम आदमी की तरह, जो बस पेट और परिवार पालने के लिए अपने आप को बेच नहीं देना चाहते, जो सचमुच जवान हैं, मैं उनसे कह रहा हूँ, झुक जाना, गिर जाना, लेट जाना, बिक जाना बिल्कुल ज़रूरी नहीं है। उसके बिना भी एक गरिमापूर्ण जीवन जिया जा सकता है। और हाँ, भूखे नहीं मरोगे। यक़ीन करो, भूखे नहीं मरोगे।
हाँ, तुम्हारे विदेशों में बसने के सपने हों और प्राइवेट जेट उड़ाने के सपने हों, तो उनकी कोई गारंटी नहीं। पर एक अच्छा, शांत, सुंदर और गरिमापूर्ण जीवन, डिग्निफ़ाइड लाइफ़, बिल्कुल जी सकते हो बिना बेईमानी करे, बिल्कुल जी सकते हो। बिना झुके, बिना घुटनों पर आए, बिना अपनी बोली लगवाए। यह डर भीतर से एकदम निकाल दो कि जीने के लिए बिकना ज़रूरी है, बिल्कुल भी नहीं है। बिल्कुल भी नहीं। बड़े-बड़े ख़रीदार खड़े हों, तो भी मत बिकना और बड़े-बड़े बाहुबली खड़े हों, तो भी मत झुकना, एकदम ज़रूरी नहीं है। कुछ नहीं बिगड़ेगा तुम्हारा, बल्कि शान से जिओगे, मौज में जिओगे। और यह भी हो सकता है कि यह जो बिके हुए लोग हैं, जो पैसे के लिए और सुरक्षा के लिए बिके हैं, पता चले कि किसी बिंदु पर तुम्हारे पास पैसे भी इनसे ज़्यादा ही निकले। यह भी हो सकता है।
बात आ रही है समझ में?
मिडिल क्लास नाइटमेयर है बस एक, मिडिल क्लास वहम है कि जो बँधे-बँधाए सुरक्षित रास्ते हैं उसी पर चलो। ख़ासकर अगर लड़की हो, तब तो हाईवे को बिल्कुल मत छोड़ना, किन्हीं पगडंडियों पे मत उतरना। लड़की-वड़की कुछ नहीं हो, इंसान हो पहले, अपनी ज़िंदगी देखो। बात आ रही है समझ में?
मस्त जिओगे, खुलकर जिओगे और जितनी ज़रूरतें हैं, वाजिब ज़रूरतें, सही ज़रूरतें, उन सही ज़रूरतों के लिए पर्याप्त पैसा भी रहेगा। बिकना मत, डरना मत।
ठीक है?