
अन्तरिक्षचयाणां च दानवोत्तम पक्षिणाम्। उत्तिष्ठते यथाकालं मृत्युर्बलवतामपि।।
दानवश्रेष्ठ! आकाश में विचरणे वाले बलवान पक्षियों के समक्ष भी यथासमय मृत्यु आ पहुँचती है। ~ आजगर गीता, श्लोक १६
दिवि सञ्चरमाणानि ह्नस्वानि च महन्ति च। ज्योतींष्यपि यथाकालं पतमानानि लक्षये।।
आकाश में जो छोटे-बड़े ज्योतिर्मय नक्षत्र विचर रहे हैं, उन्हें भी मैं यथासमय…

निपुणमनुनिशाम्य तत्त्वबुद्ध्या व्रतमिदमाजगरं शुचिश्चरामि ।।
जो ये मिले, वो मिले—इस तरह तृष्णा से दबे रहते हैं और धन न मिलने के कारण निरंतर विषाद करते हैं, ऐसे लोगों की दशा अच्छी तरह देख कर तात्विक बुद्धि से संपन्न हुआ मैं पवित्र भाव से इस आजगर-व्रत…
नवरात्रि आते ही हम सोचने लगते हैं कि क्या खाना है, क्या नहीं खाना, कौन-सा हवन करना है। पर व्रत का अर्थ है संकल्प, और शुभ संकल्प एक ही है: हम जैसे हैं, वैसे न रहें। इसीलिए ये नौ दिन दुर्गा सप्तशती को समझने के लिए हैं, केवल रस्मों के लिए नहीं। जिसे हम माँ कहते हैं, वह यह पूरी प्रकृति है, और उसके ही बच्चों को चोट पहुँचाकर उसका पर्व नहीं मनाया जा सकता। क्या इस बार हम नौ दिन अपने ही जीवन को ईमानदारी से देख पाएँगे?

प्रश्नकर्ता: आत्मा और अहंकार ये सारी इंटेलेक्चुअल लेवल (बौद्धिक स्तर) पर समझ में आती हैं। लेकिन अनुभव के स्तर पर कहीं-न-कहीं हम इनको एक तरीक़े से मान रहे हैं, जान नहीं पा रहे अन्दर से कि हम आत्मा हैं। ये परिवर्तन कैसे हो?
आचार्य प्रशांत: कुछ नहीं समझना होता, जीना…

प्रश्नकर्ता: अपूर्वा हैं, अगर कोई हमारी किसी कमज़ोरी का फ़ायदा उठाए, हमें बार-बार परेशान करे तो हम उस समय पर न्यूट्रल (तटस्थ) कैसे बने रहें?
आचार्य प्रशांत: देखो, दो-तीन तरह की परेशानियाँ होती हैं जो लोगों को लगती हैं। मान लो, तुम ट्रेन में जा रही हो, भारतीय रेल। अब…

Questioner: Namskar Acharya ji. Pardon me for not remembering exactly but in one of the shivirs where we had read ‘Gospel of Sri Ramakrishna’ to come to terms with this expression called ‘Adhikar Bhed.’
So therein Ramakrishna was saying that, “now in modern times there cannot be any Adhikar Bhed,…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, कई सालों से अध्यात्म के साथ हूंँ, लेकिन फिर भी एक खालीपन महसूस होता रहता है, इससे बाहर कैसे निकलूंँ? कृपया मार्गदर्शन कीजिए।
आचार्य प्रशांत: मैं आपको इतना बताए देता हूंँ कि खेल बिलकुल आपके हाथ में है। बात यहांँ ग्रह-नक्षत्रों, चांँद-तारों की बिलकुल नहीं है कि…

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। जब मैंने शिविर में आने की बात अपने जानने वालों को बतायी तो सबकी ओर से एक सी ही प्रतिक्रिया आयी कि ये तो जोगी बनने जा रहा है या संन्यास लेने की सोच रहा है। तो मेरा प्रश्न ये है कि समाज में अध्यात्म की…

प्रश्नकर्ता: मन क्यों हमेशा सुरक्षा की तलाश में लगा रहता है? क्या हैं मन के सदा असुरक्षित अनुभव करने के कारण? मैं तो अध्यात्म में, आप में और शिविर इत्यादि में भी सुरक्षा की तलाश कर रहा हूँ कि संसार में सुरक्षा न मिली तो सत्य में मिल जाए। मैं…

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। मैं हंसराज कॉलेज का छात्र हूँ, कम्प्यूटर साइंस डिपार्टमेन्ट (संगणक विज्ञान विभाग) से। मेरे मन में एक प्रश्न है, जहाँ पर मैं दुविधा से भरा हुआ हूँ, कि मेरा इस बार अन्तिम वर्ष है और मैं कॉलेज से पास आउट हो (निकल) जाऊँगा। तो मेरी फैमिली…

प्रश्नकर्ता: मेरा शरीर यादों से भरा हुआ है। यहाँ तक कि मैं अपने बालों के रंग, अपनी आँखों के रंग को भी स्मृति ही कहूँगा। और ये स्मृतियाँ मुझे पुरानी पीढ़ियों से मिली हैं क़रीब-क़रीब विरासत के तौर पर।
तो हम इन मेमोरीज़ को, स्मृतियों को फॉरमैट कैसे कर सकते…

प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी, मेरा प्रश्न विज्ञान से सम्बन्धित है। तो काफ़ी समय से वैज्ञानिक समुदाय और प्रकृति में एक तरीक़े का एक तकरार चल रहा है और काफ़ी हद तक विज्ञान सफल भी हुआ है, कोविड वैक्सीन का उन्होंने निर्माण किया और शायद प्रकृति की जो योजना थी उसको…

आचार्य प्रशांत: अगर हमारे बीच वास्तव में कोई रिश्ता है तो मैं बर्दाश्त नहीं कर पाऊँगा कि आप वैसे ही कोई ज़िन्दगी जी रहे हो जैसे कोई आम आदमी जीता है। मुझे अपनेआप पर और अपनी बात पर घिन आएगी। आप अगर कहते हो आप दो साल से मेरे साथ…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी प्रणाम, आप हमेशा बोलते हैं कि ऊँचे उद्देश्य रखने चाहिए जिससे कि उसमें किसी भी तरीक़े का कोई डेविएशन नहीं होता है। अब ऊँचे उद्देश्य रखने की सामर्थ्य और साहस नहीं मिल पाता है क्योंकि अपनेआप को बहुत जगह मैं बेहोश पाता हूँ। कभी कुछ चीज़े साफ़…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रणाम। मेरा प्रश्न मेरे वैवाहिक जीवन से है। किसी भी अन्य रिश्ते में मुझे अभिव्यक्ति करना सरल लगता है पर अपनी बातें अपनी पत्नी तक पहुँचाना बहुत ही कठिन लगता है। यह रिश्ता इतना गहरा है फिर इतनी मुश्किल क्यों?
आचार्य प्रशांत: अब तुम्हें यहाँ पर एक…

प्रश्नकर्ता: तलब एक हैप्पिनेस (खुशी) है सर, हैप्पिनेस को किस तरह कन्सिडर (मान) कर सकते हैं?...कि मतलब हमारी जो इच्छाएँ हैं वो पूरी हो जाएँ? या उसमें कोई दुख वगैरह उसको कन्सिडर करते हैं? सर एक लाइन (पंक्ति) है कि हर लाइफ़ (जीवन) की एक हैप्पी एंडिंग (सुखान्त) होती है,…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी प्रणाम। आचार्य जी, पिछले एक साल से आपको सुन रहा हूँ और आपकी अनुकम्पा से ग्रन्थ भी पढ़ने शुरू किये हैं तो अभी प्रतिदिन कुछ नया सीखने को मिलता है, मन बिलकुल लगा रहता है और जैसा पहले चला करता था, उससे बिलकुल बदल गया है जीवन।…

भाषा हमें बहुत सारे देती है नाम। और ये जो सारे नाम हैं, ये हमें भरोसा दिला देते हैं कि अपूर्ण अहंकार, पूर्ण हो सकता है। ‘इस नाम से बात नहीं बनी तो उस नाम से बात बनेगी; तो उस नाम से बात बनेगी, तो उस नाम से बात बनेगी।…

n some sense, spirituality is all about unleashing yourself, which is freedom from bondage. The leash is the bondage. Read more....

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी, मेरा प्रश्न है कि हमारे सामने जब कोई परिस्थिति आती है तो हम उसके तथ्य को देखने के बजाय, उसे उसके अतीत से जोड़कर देखते हैं। इसका कारण क्या है? जैसे कि कभी हम कोई लड़ाई हार जाते हैं तो आगे की लड़ाइयों में संशय और…

प्रश्नकर्ता: नमस्ते सर, मेरा नाम अंकिता रावत है। सर, जैसे कि मन हमेशा चीज़ों की ओर आकर्षित होता है तो आकर्षित का मतलब होता है कि हमें वहाँ खुशी मिलेगी, हम उसके पीछे भागते हैं और वो और अन्त में हमें दुख ही होता है, मतलब खुशी और दुख का…

प्रश्नकर्ता: नमस्ते सर। मुझे ये समझ में कई बार नहीं आता कि जब मैं किसी माहौल में होती हूँ तो जैसे बार-बार ये बात होती है कि माया को हमें सत्य नहीं समझना चाहिए। लेकिन जैसे मैं आज दशहरा मेले में अपने बच्चों को लेकर गयी तो मैं वहाँ पर…

प्रश्नकर्ता: भगवान श्री प्रणाम। अपनी तरफ़ देखता हूँ, तो समझ में तो आ रहा है कि कंडिशनिंग (संस्कारों) से अहम् का निर्माण है, अगर इसको, कुछ-कुछ हल्की सी झलक भी आने लगी है कि मानसिक स्तर पर नहीं हूँ।
आचार्य प्रशांत: कंडिशनिंग से अहम् का निर्माण नहीं है, कंडिशनिंग से…

प्रश्नकर्ता: अब मेरा रोज़ का देखना होता है कि मेरे पीछे कोई बल है, कोई फोर्स है जो मुझे संचालित करता है। जैसे मैं सुबह उठा और मैं ऑफ़िस की तरफ़ चल दिया। बैग लिया और चल दिया। तो एक डर है पीछे जो मुझे उधर जाने के लिए विवश…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, भारतीय दर्शन में वेदों के आधार पर आस्तिक और नास्तिक का विभाजन किया गया। उसमें बौद्ध, जैन और चार्वाक दर्शन को नास्तिक बोल दिया गया; जिसमें से मुख्यत: बौद्ध और जैन धर्म ने वेदों की सत्ता को माना नहीं, इस वजह से उसमें वर्गीकरण किया गया।
तो…

आचार्य प्रशांत: प्रकाश से आशय होता है — वस्तुओं का संज्ञान। प्रकाश न हो तो ऑंखें किसी भी वस्तु का संज्ञान नहीं ले सकतीं; और जब प्रकाश होता है तो प्रकाश स्वयं नहीं देखा जाता, प्रकाश में वस्तु देखी जाती है। तो जैसे हम हैं, हमारे लिए वस्तु तभी है…

Acharya Prashant: Happiness comes to you so that you become interested, you become inquisitive, your longing gains depth and you ask for permanent happiness. You say, “Oh this that was given to me was so ephemeral! Thirty seconds, that’s all? No no no! It was good. But I want the…

Questioner: Why think so much about decisions? Shouldn’t our decisions be spontaneous? I like to decide in a free flow.
Acharya Prashant: So the questioner is stressing on the spontaneity of decisions. He says that he likes to decide in a flow. It's a good thing, your intention is good.…

आचार्य प्रशांत: खिंचाव है, आकर्षण है, किधर को जाने की इच्छा, बदल जाने का मन; कुछ अनजाना, कुछ नया पा लेने की अभीप्सा। कोई ऐसा है जिसको ये न होता हो? कोई ऐसा है जो किधर को खिंचता न हो? कोई है जिसको कुछ-न-कुछ आकर्षित न करता हो? सब हैं…

प्रश्नकर्ता: जो अद्वैत बोधस्थल में आप लोग बंधनों की बात करते हैं और उनके सॉल्यूशंस (समाधान) की बात करते हैं…
आचार्य प्रशांत: बंधनों की बेटा, बात नहीं करनी पड़ती। बंधन में तो सब हैं ही न! तो जो यथार्थ है उसकी बात होती है। यथार्थ ऐसा नहीं है कि अलग…

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। जीवन में क्या लक्ष्य बनाने योग्य है? क्या है जो मन, शरीर दोनों को सुकून दे सकता है?
आचार्य प्रशांत: वह तो आप पर निर्भर करता है न। अगर बिलकुल खरी बात पूछेंगे तो जीवन को किसी लक्ष्य कि ज़रूरत ही नहीं है। पर वह इतनी…

मुक्ति तुम्हारा स्वभाव है लेकिन स्वभाव में जीना है या नहीं जीना — ये तुम्हारा चुनाव है। आवश्यक नहीं है कि सब मुक्ति को चुनें। मुक्ति स्वभाव है इसीलिए सदा उपलब्ध है पर तुम उसको चुनोगे ही, ये कोई आवश्यक नहीं है। तुम कुछ और भी चुन सकते हो। ये इंसान पैदा होने की विडंबना है। जो इंसान पैदा हुआ है उसको दुर्भाग्यवश ये विकल्प मिला हुआ है कि स्वभाव में चाहे तो जिए और न चाहे तो न जिए।

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, कुछ ख़ास दिन जैसे नवदुर्गा के नौ दिनों में सब द सेक्रेड फेमिनिन (पवित्र स्त्रीत्व) वगैरह की बहुत बातें करते हैं। हर जगह स्त्री शक्ति का ही ज़ोर रहता है। पंडालों में भी देवी और अखबारों में भी नारी का, स्त्री का महिमामंडन रहता है और तब…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी अकेलापन महसूस करती हूँ और पुरानी बातें याद आती हैं। इस पर आपने कहा था कि विद्रोह पूर्ण करना पड़ता है। हम जहाँ रहते हैं, जहाँ काम करते हैं, ये सारी जगह एक होती हैं तो विद्रोह पूर्ण करना पड़ता है।माताजी के गुजरने और घर के…

#तुम 'कूल' कैसे हो गए?
प्रश्नकर्ता: सर आप 'कूल' लोगों का एकदम बाजा बजा देते हो। तो सवाल मेरा यह है कि आप कूल लोगों की इतनी बजाते क्यों हैं? उनकी इतनी बेइज्जती क्यों करते हैं?
आचार्य प्रशांत: 'कूल' माने क्या? 'कूल' के आध्यात्मिक अर्थ हो सकते हैं। कृष्ण अर्जुन…

आचार्य प्रशांत: और जो परेशान हो, अपनी ज़िन्दगी को लेकर के, वो बच्चों का वीडियो गेम खेलने लग जाए तो अपने साथ कोई इंसाफ़ या उपकार तो नहीं कर रहा, या कर रहा है?
परेशान हो बहुत चीज़ों को लेकर, ज़िन्दगी के झंझट हैं, ये है, वो है, और लग…

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। मैंने देखा पिछले कुछ सालों में, तो मैं थोड़ा सा रिलेशनशिप को लेकर थोड़ा ब्लंटली (दो टूक) अपनी चीज़ें शेयर करना किसी भी टॉपिक को लेकर डिस्कशन हो रहा है। तो रिलेटिव्स भी मुझसे कतराने लगे फिर बात करने से।
आचार्य प्रशांत: नहीं, तो उनसे आप…

प्रश्नकर्ता: जो वासनाओं का दमन करने की पहले जो कोशिश होती थी, तो उसमें केवल यह होता था कि नियमों का अनुसरण करने के लिए हुआ करता था। उस पर आवरण गिराएँ ताकि दिखाई न दे लोगों को। जब यह बोध हुआ, जब बुद्धि को यह समझ आया कि वासनाओं…

Questioner: You have said that individual liberation is not possible: that either we go together, or nobody can go. So, we have to help others to cross over. But I can’t help even the people close to me; they are caught up in routine work or indulge in entertainment; no…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, पिछले कुछ दिनों से उदासी रहती है, सब ठीक चल रहा है फिर भी पता नहीं क्यों रोना आ जाता है, समझ नहीं आ रहा क्या करूँ? कृपया मार्गदर्शन करें।
आचार्य प्रशांत: तो जो हो रहा है, उसको होने दो, उसके साथ रहो, बुरा मत मानो इसका।…

Questioner: Earlier you said that there has been no inward evolution, nothing has changed inwardly, so we are essentially the same people who were roaming the jungles once. But still, somewhere in the course of evolution, we did become this human species with a higher capacity of consciousness compared to…

करीब-करीब हर कोई बंधन में है और मुक्ति चाह रहा है; बंधनों से मुक्ति चाह रहा है न और कई बार कुछ बंधनों से मुक्ति मिल भी जाएगी, इसीलिए तो आपका अपने पुरुषार्थ पर इतना भरोसा है। इंसान ने अपने ऊपर के कई बंधनों पर फ़तह हासिल की भी है, तो उसका भरोसा कायम रहता है उसे लगता है कि कुछ बंधन तो पीछे छोड़ ही दिये, तोड़ ही दिये और भी छोड़े जा सकते हैं। वो ये नहीं देख पाता कि पुराने को छोड़कर जो नये बंधन वो धारण कर लेता है वो और कुछ नहीं है पुरानों का ही एक नया रूप है और वो होना ही था क्योंकि बंधन बने रहें इसकी प्यास हममें है।

प्रश्नकर्ता: चरण स्पर्श आचार्य जी, जब कोई कामना बहुत हावी हो जाती है तो उससे मिलने वाले तात्कालिक सुख के अलावा कुछ नहीं दिखता। लेकिन उस कामना को पूरी करने के बाद ग्लानि अनुभव होती है। जब चुनाव करना होता है, तब छोटे सुख की तरफ़ खिंच जाते हैं। उस…

Acharya Prashant: You have to ask yourself what your primary identity is. If your primary identity is that of the body, then do what the body commands you to do. Good. The body has an inbuilt software of its own, and it’s a self-improving software. Its capacity to keep improving…

प्रश्नकर्ता: नमस्ते सर। आपने पढ़ने के लिए एक किताब सुझाई था जिसका नाम था ‘लस्ट फ़ॉर लाइफ़’ बाय इरविन स्टोन, जो कि विन्सेंट वैन गॉग जी की बायोग्राफ़ी थी। सर, उन्होंने जो संघर्ष किया अपनी पूरी ज़िन्दगी में और वो बहुत कम आयु पर ही चले गये थे। क्या उनका…

आचार्य प्रशांत: एक स्कूल था बच्चों का, छोटे बच्चे आते थे वहाँ एकदम। छोटे बच्चे आये वहाँ, खड़े हो और बड़े अपनेपन से और बड़े नाज़ से बोले, 'ये हमारा स्कूल है।' एक दिन वहाँ कुछ जंगली जानवर आ गये। उनको खबर मिल गयी थी कि यहाँ छोटे-छोटे बच्चे रहते…

प्रश्नकर्ता: प्रणाम गुरुजी, मेरा प्रश्न हैप्पीनेस (खुशी) के बारे में है कि व्हाट एग्ज़ेक्टली हैप्पीनेस इज़? (खुशी वास्तव में क्या है?) और हमें खुशी चहिए क्यों होती है। जैसे कि बचपन से ही जब हम किसी के पैर छूते हैं अपने से बड़ों का, तो सभी लोग बोलते हैं, "खुश…

Maturity is when you can transcend your body, and by the body, I mean the bodily compulsions. That includes your thoughts, your feelings, and everything because they are all bodily. You very well know how chemicals in the body translate into thoughts and feelings. Read more...

Questioner: Acharya Ji, a good discussion happened yesterday in which many seekers participated and shared their understanding of Prakṛiti, Puruṣha and other things.
During the discussion, it was put that Prakṛiti, Puruṣha, Māyā, are mere concepts and that one is pure Ātman, never threatened and…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मैं जिस व्यवसाय में हूँ, मैं जानता हूँ कि इस व्यवसाय में छलकपट, झूठ बड़ी आम बात है। परंतु ये जानने के बावज़ूद भी जो बेहतर से बेहतर मैं कर पा रहा हूँ वो ये है कि मैं इस काम को पूरी ईमानदारी से कर रहा हूँ।…