चिंता का कोई कारण नहीं होता, चिंता बस होती है, और जो मन चिंताग्रस्त है वो चिंता के बहाने खोज लेता है। अगर किसी को रुपयों की चिंता हो, और वो सुलझ जाए, तो मन तुरंत नई चिंता का कारण ढूंढ लेता है। जब तुम पूरी तरह वही कर रहे हो जो उस समय जरूरी है, तो चिंता के लिए समय ही नहीं होगा। चिंता के लिए सोचना पड़ता है, और जब दिमाग पूरी तरह व्यस्त हो, तो सोचने का वक्त ही नहीं मिलता।
यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।
चिंता ऐसी डाकिनी, काट कलेजा खाए। वैद बेचारा क्या करे, कहा तक दवा लगाए।। ~ कबीर साहब
प्रश्नकर्ता: अर्थात् तो इसमें कबीर जी कहना चाहते हैं कि चिंता एक भूत है, एक राक्षस है, गुज़रा हुआ कल है जो कलेजा को खंखोरता है अन्दर-ही-अन्दर, और इसका इलाज कुछ नहीं है। कोई भी, कितना भी, संत जितने प्रवचन दे दे, कोई वैद इलाज कर दे, गुरु अपनी बातों को कह दे, लेकिन इसका कोई इलाज नहीं है अगर चिंता को न छोड़ा जाए।
आचार्य प्रशांत: इसका मतलब ये है कि किसी भी बीमारी का इलाज वहीं हो सकता है जहाँ वो बीमारी है। चिंता मन के भीतर है, उसका इलाज कहीं बाहर नहीं हो सकता। “वैद बेचारा क्या करे, कहाँ दवा लगाए।” वैद तो शरीर ही जानता है। शरीर माने वो सारी चीज़ें जो मटेरियल हैं, जो चीज़ दिखाई पड़ती हैं, जो पकड़ में आती हैं और हम भी यही सोचते हैं।
किसी को चिंता होती है तो हमें लगता है कि ये चिंता, दूर की जा सकती है दुनिया में कोई काम करने से। कोई भी ये नहीं कहता कि मुझे चिंता है, हर कोई ये कहता है कि उसे किसी वजह से चिंता है। कोई ये कहता है उसे रूपये की चिंता है, कोई ये कहता है कि उसे प्रतिष्ठा की चिंता है, कोई कहता है उसको एग्ज़ाम की चिंता है, नौकरी की चिंता है, रिश्तेदारी की चिंता है, यही सब है न?







