जीवन को सँभालकर रखो तब तक, जब तक मुक्ति नहीं मिल जाती; लेकिन जीवन को सँभालने का उद्देश्य जीवन को लंबा ही करना कभी नहीं हो सकता। जीवन का उद्देश्य जीवन की लंबाई नहीं है; जीवन का उद्देश्य जीवन से मुक्ति है।
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प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, भविष्य में कभी बीमार हुए तो उसके लिए अभी से ही पैसों की व्यवस्था करके रखनी होगी न?
आचार्य प्रशांत: बीमारी जब आएगी उसके लिए तुम अभी से बीमारी का जीवन जीना चाहते हो? तुम्हें इतनी घनी और इतनी बड़ी बीमारी आ गई कि नहीं जी सकते, तो मर जाना, पर जब तक जिओ कम-से-कम आज़ाद जिओ।
प्रश्नकर्ता: नहीं सर, जितना जी रहे हैं उतना मस्ती में जी रहे हैं।
आचार्य प्रशांत: ठीक, जब बीमारी आए तो मर जाना। अगर इतनी बड़ी बीमारी आ गई है कि बिना लाखों-करोड़ों लगाए उसका उपचार ही नहीं है, तो मर जाओ। ज़बरदस्ती लाश को जिलाए रखने से फ़ायदा क्या? मरने से इतना डर क्यों? और मुर्दा जीवन से इतना मोह क्यों? कैंसर होगा तुम्हें सत्तर की उम्र में...।
प्रश्नकर्ता: मुझे पच्चीस साल की उम्र से है।




