मैं ज़िन्दा हूँ और मैं अभी दुख में हूँ, ये दुख कैसे हटाया जाए — धर्म इसका विज्ञान है। मरने के बाद कोई जीवन होता है (आफ्टर लाइफ) — उससे धर्म का कोई रिश्ता नहीं है। इतना तो ज्ञानियों ने चेताया है कि “हीरा जनम अमोल है, कौड़ी बदले जाय।” तो जब तक जीवित हो, तब तक मुक्ति मिल सकती है — उसके बाद कुछ नहीं है।
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प्रश्नकर्ता: सर जैसे कि एलेक्ट्रॉनिक क्रेमेटोरियम है जिसमें शरीर को नष्ट किया जा सकता है — विद्युत दाह। और दूसरा जो अपना ट्रेडिशनल तरीका है जहाँ पर लकड़ियों पर जलाया जाता है। तो जैसे अभी मैं श्मशान घाट गई थी। तो मैंने वहाँ पे देखा कि दो लाशें जल रही थी तो मैं ये साफ़ तौर पर देख पा रही थी कि जैसे — मांस जलता है जब तो बहुत सारा धुआँ निकलता है, और बहुत सारा एयर पॉल्यूशन हो रहा था वहाँ पर।
लेकिन क्योंकि हिंदू धर्म में ख़ास करके मृत्यु के बाद शरीर को, मतलब जो डेड बॉडी है उसको कैसे हैंडल किया जाता है, कैसे जलाया जाता है — इसका पूरा संबंध लोगों ने बिठा दिया है उस जीव की मुक्ति के साथ। मतलब लोग सोचते हैं कि, अगर ये सब नहीं किया जाए तो उसकी आत्मा भटकती रहेगी। उसको गति नहीं मिलेगी, उसको मुक्ति नहीं मिलेगी।
आचार्य प्रशांत: अरे भैया, मुक्ति मरने के बाद नहीं मिलती। धर्म का कोई रिश्ता आपके मरने के बाद के किसी क्षण से नहीं है, ये अच्छे से समझो। धर्म इसलिए है कि अभी ज़िन्दा हो तो जी लो। मरने के बाद कोई जीवन होता है आफ्टर लाइफ उससे धर्म का कोई रिश्ता नहीं है। धर्म कहता है ज़िन्दा हो तो जी लो — ये है धर्म। तो मुक्ति भी अगर मिलनी है तो सिर्फ़ अभी मिल सकती है जीते जी।




