
35 की उम्र आते ही खिलाड़ी महिला से कहा जाने लगता है कि अब खेल छोड़ो, बच्चों को मौका दो। हम मान लेते हैं कि यह उम्र और शरीर की मजबूरी है। पर ध्यान से देखें तो शरीर का तर्क टिकता ही नहीं। असल दबाव उस सिखाई गई मान्यता का है जो महिला को उसके शरीर और उससे जुड़ी भूमिकाओं से ही तौलती है, और जिसे हम अपनी ही सोच मान बैठे हैं। जो आवाज़ें हमें बताती हैं कि हमारी ज़िंदगी का क्या करना है, क्या हम ईमानदारी से देख पाएँगे कि वे आवाज़ें किसकी हैं?








प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मैं गर्ल्स हॉस्टल (लड़कियों का छात्रावास) में रहती हूँ, इंदौर में। तो वहाँ पर बहुत बड़ा हॉस्टल है। सौ-डेढ़ सौ लड़कियाँ रहती हैं तो उसमें से फ़िफ़्टी पर्सेन्ट

प्रश्नकर्ता: प्रतियोगी परीक्षाओं में लगातार असफल होने के बाद मैं अब सांसारिक प्रयासों से अनासक्त हो गया हूँ। क्या अध्यात्म में मुझे शरण प्राप्त हो सकती है ताकि मुझे सांसारिक प्रयत्न फिर करने ही ना पड़ें?








प्रश्नकर्ता: नमस्कार सर। सर, दुनिया में दो तरह के सिद्धांत चलते हैं — एक ये कि जवान लोग कहते हैं कि खाओ-पियो बिंदास जियो, और दूसरी ये कि बुज़ुर्ग या दार्शनिक लोग कहते हैं कि जीवन क्या है इसको समझो, अपना पुरुषार्थ दिखाओ, अपनेआप को जानो, इस तरह की बातें।


प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। जो सस्टेनेबल डेवलपमेंट (सतत विकास) की जो आज के टाइम में हमको फिलोसॉफी



प्रश्नकर्ता: मेरे व्यक्तित्व के दो भाग हैं और मैं उन दोनों के बीच में ही डोलती रहती हूँ। पहला भाग मुझे जीवन के प्रति उत्सुक रखता है और दूसरा भाग मुझे आलसी बनाता है। पहला भाग योजनाएँ बनाता है आगे की, और दूसरा वाला आगे की सोचता ही नहीं। आचार्य


प्रश्नकर्ता: वीडियो था ‘अपनी कमज़ोरियों से भिड़ जाओ’ तो उसके सम्बन्ध में थोड़ा प्रतिवाद है— अपनी कमज़ोरियों से कभी मत भिड़ो क्योंकि कमज़ोरियाँ भी आपके व्यक्तित्व का पहलू है। अपनी कमज़ोरियों पर विजय पानी हो तो स्वीकार करो कि हाँ, मैं हूँ ऐसा, कमज़ोरियों को स्वीकार करते ही कमज़ोरियाँ आपकी

आचार्य प्रशांत: जब अन्धेरा नहीं रहता, जब बोध का प्रकाश जाग्रत हो जाता है, उद्बोध हो जाता है, तब न दिन रहता है, न रात रहती है, न सत्य रहता है, न असत्य रहता है, न सर्दी रहती है, न गरमी रहती है, न सुख रहता है, न दुख रहता

प्रश्नकर्ता: आईआईटी पटना के कुछ छात्रों के प्रश्न थे। जैसे काफ़ी सारे विद्यार्थी ये जानना चाह रहे थे कि

आचार्य प्रशांत: एक बार मुझसे पूछा था कि उपनिषद कहाँ से आते हैं। ‘न’ से उठता है उपनिषद्। न से। तो वेदान्त ‘न’ है। ‘न’। नकार — नहीं, नहीं। किसके खिलाफ़ नहीं? ‘ये जो मेरी हालत है, ऐसे नहीं जीना है।’ इसको वेदान्त कहते हैं। और अगर मेरी हालत ऐसी

आचार्य प्रशांत: समझ में नहीं आ रहा क्या कि जब भगत सिंह कहते थे कि वो नास्तिक हैं तो वो वास्तव में परंपरागत धर्म, सड़े-गले धर्म, संस्थागत धर्म को नकार रहे थे। नहीं तो एक ऊँचे आदर्श के लिए शरीर की आहुति दे देने से बड़ा धार्मिक काम क्या होगा?

आचार्य प्रशांत: अगर हमारे बीच वास्तव में कोई रिश्ता है तो मैं बर्दाश्त नहीं कर पाऊँगा कि आप वैसे ही कोई ज़िन्दगी जी रहे हो जैसे कोई आम आदमी जीता है। मुझे अपनेआप पर और अपनी बात पर घिन आएगी। आप अगर कहते हो आप दो साल से मेरे साथ

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रणाम आपको। मेरा पहला शिविर है, देहरादून से आया हूँ मैं और चार महीने से सुन रहा हूँ मैं आपके वीडियो। काफ़ी अच्छा लग रहा है। एक प्रश्न चल रहा है मन में कि मानसिक पर्यावरण पर तो आपने बहुत कुछ बोला है कि मन ख़राब होता…

प्रश्नकर्ता: सर, मेरे कई दोस्त हैं जो रोज़ मेडिटेशन (ध्यान) करते हैं और कहते हैं कि इससे कॉनसन्ट्रेशन (एकाग्रता) बढ़ती है। मैंने भी काफ़ी मेडिटेशन तकनीक को आज़माया लेकिन कुछ ख़ास लाभ नहीं हुआ। क्या आप ऐसी कोई तकनीक बता सकते हैं जो कॉनसन्ट्रेशन बढ़ाने में सहायक हो ?
आचार्य…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, कल एक बहुत बड़ा जो कचरा जो मन में था, उस पर बहुत क्लेरिटी (स्पष्टता) मिली। जो कंफ्यूजन (उलझन) था, चॉइस (पसन्द) और सरेंडर (समर्पण) पर, वैसे ही एक-दो और कचरे हैं। तो इसीलिए पूछना चाह रहा हूँ,




प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रणाम। मन का स्वरूप नहीं समझ में आ रहा है कि मेरा मन मुझसे क्या करवाना चाह रहा है। मन की भागा-भागी नहीं रुक रही।

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। मेरा नाम अमन है। और पिछले दो साल से आपको सुन रहा हूँ। बाय नेचर मैं इंट्रोवर्ट (अंतर्मुखी) हूँ। इन्होंने भी इंट्रोवर्ट होने की बात करी थी। काफी लम्बे समय से इंट्रोवर्ट ही रहा हूँ। तो जब आपकी टीचिंग मिली मुझे और क्लैरिटी (स्पष्टता) आयी तो

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, अंतर्मुखी होना माने क्या और वो क्यों ज़रूरी है?
आचार्य प्रशांत: ये बहुत गहरा शब्द नहीं है। अध्यात्म की दृष्टि से अंतर्मुखी-बहिर्मुखी सब एक हैं। आमतौर पर आप बहिर्मुखी उसे बोल देते हो जो संसार से ज़्यादा वास्ता रखता है। और जो अपने में ही ज़्यादा सीमित…



जितनी ज़िन्दगी जी चुके हैं ये देखा है कैसे पालक झपकते बीत गयी है? अभी स्कूल में थे, कॉलेज में थे, और अभी बच्चे थे आप, यूँ ही मैदान में, गलियों में दौड़-भाग रहे थे। अभी-अभी! ये जो समय बीता है ये कैसे बीता है? ये चुटकी बजाते बीता है।

दुनिया के सामने इंसान की तरह खड़े होना सीखो भाई! केंचुए की तरह थोड़े ही कि किसी के भी पाँव के नीचे आ गए। इस चेहरे पर तेज होना चाहिए, आँखों में ताक़त झलकनी चाहिए, कुछ बोलो तो उसमें साहस और संकल्प हो, आवाज़ काँपे नहीं, थरथराए नहीं। एक ज़िंदगी

जब तुम अपने-आप को बेरोज़गार कहना शुरू कर देते हो, आंतरिक पतन होने लगता है। और वैसे ही पतन होने लगता है उन गृहणियों का जिनके ऊपर अब गृहस्थी की कोई खास ज़िम्मेदारी नहीं है, फिर भी वह घर पर ही बैठी हुई हैं।


स्वामी विवेकानंद अनूठे हैं, बहुत कम तुमने साधु-संत-सन्यासी देखे होंगे जो इतने सुघटित सुडौल शरीर के हों, जितने विवेकानंद थे।

आदमी यूँ ही नहीं सिगरेट, शराब पीता; उसे कुछ चाहिए जो उसे मिल नहीं रहा इसलिए वो सिगरेट से क्षुधापूर्ति करना चाहता है। एक सिगरेट से बात बनती नहीं इसलिए दूसरी सिगरेट पीता है, दूसरी सिगरेट से भी बात बनती नहीं तो तीसरी पीता है, चौथी पीता है, पीता ही

हम इज़्ज़त को बहुत बड़ी बात समझ बैठते हैं। हमारे जीवन का, समय का, ऊर्जा का, ध्यान का न-जाने कितना बड़ा भाग सिर्फ़ दूसरों की नज़रों में अपनी छवि चमकाने में लग जाता है, है न?

कुछ साल मिले हैं जगने के लिए, उसके बाद तो खूब सोना है। तो यह तुम कैसे आदत अभी पाले हुए हो कि, “ज़रा और सो लें एक घण्टा, दो घण्टा”?
यहाँ जीसस एक तरह से हँस रहे हैं उनके ऊपर। कह रहे हैं, सत्य थोड़ी छुपा हुआ है, दरवाज़ा थोड़ी बंद है। “नॉक एंड द डोर विल बी ओपनड।” हो सकता है दरवाज़ा खुला ही हुआ हो, नॉक करके तुमको पता चले कि ये तो पहले ही खुला हुआ था। और नहीं भी खुला हुआ है, तो तुम्हारे नॉक करने की देर है। दरवाज़े ने कोई ठान नहीं रखी है कि बंद रहना है। पूछो और जवाब मिलेगा। चाहो और मिल जाएगा। तो बात तुम्हारी चॉइस की है।
भारत में यह मान्यता रही है कि अध्यात्म बुढ़ापे का काम है। लेकिन जहाँ भी स्वामी विवेकानंद की मूर्ति खड़ी होगी, उस जवान आदमी का तेज गवाही देता होगा कि अध्यात्म बुढ़ापे का नहीं, जवानी का काम है। जवानी अगर, जो सबसे ऊँचा काम हो सकता है, उसको नहीं दी, तो और क्या काम आएगी? उन्होंने युवाओं से कहा, ज़रा चुनौती स्वीकार करना सीखो, प्रतिस्पर्धा करना सीखो। बल ही जीवन है और दुर्बलता ही मृत्यु है। उचित ही है कि युवा दिवस मनाया जाता है उन्हीं के नाम पर।
मनुष्य ही है जो बंधन का अनुभव करता है, इसलिए उसे अर्थ चाहिए। ज़िंदगी मिली है भीतरी बंधन तोड़ने के लिए, न कि भीड़ या रेस में दौड़ने के लिए। हमें लगता है रेस में दौड़ने वाले मेहनत कर रहे हैं, पर वो मौज कर रहे हैं। निरर्थक काम करने में तो मेहनत लगती है, लेकिन अकेले चलने और सार्थक काम करने में उससे कहीं ज़्यादा मेहनत लगती है। खोजो वो, जो जीवन को अर्थपूर्ण बना दे। भीड़ में जीवन नहीं लगाना है, क्योंकि भीड़ में निरर्थकता है। उस निरर्थकता से बचना ही सार्थकता है।
सबसे बड़ा दोष है — कमज़ोरी, जो कहता है हम संकुचित हैं, सीमित हैं जबकि हमारे ऋषियों ने प्रेम में हमें बताया — 'अमृत की औलाद हो तुम, इतनी आसानी से कैसे लड़खड़ा सकते हो?' 'न दैन्यं न पलायनम्' — ना हम छोटे हैं, ना हम मैदान छोड़कर भागते हैं।
कोई होगा बहुत ऊँचा, उसको बोलो "अपनी ऊँचाई अपनी जेब में रखे। हमारे पास हमारी ज़िंदगी है, हमारा दुख है और हमें बेहतर होना है।" श्रीकृष्ण कहते हैं कि "योग: कर्मसु कौशलम्" माने बेहतर काम चुनूँगा और उस बेहतर काम को रोज़, क्रमशः बेहतर तरीक़े से करूँगा, क्योंकि कोई चमत्कार नहीं होता। अचानक से उड़कर के, छलांग मारकर कोई ऊँचाई तक नहीं पहुँच सकता। सीढ़ी दर सीढ़ी, लगातार ऊपर चढ़ते हुए ही उत्कृष्टता हासिल करनी पड़ती है।
समय तब कम पड़ता है, जब वह बेकार चीज़ों में जा रहा हो। मैनेजमेंट का एक सिद्धांत है — व्हाट इज़ इम्पॉर्टेंट, मस्ट बी मेज़र्ड। अगर आप वक़्त को क़ीमती मानते हो, तो उसे मेज़र करना सीखो। जब तक आप समय को साफ़-साफ़ नहीं नापोगे, तब तक यह नहीं जान पाओगे कि समय बर्बाद कहाँ हो रहा है। समय जहाँ-जहाँ बच सकता है, बचाओ। यदि उसे बर्बाद होने से बचा लिया, तो 24 घंटे में अच्छे कामों को करने के लिए समय की कोई कमी नहीं होगी।
हम ठीक वैसा ही देखते हैं, जैसा हम होते हैं। जो यह तय करना चाहता है कि दूसरा नकली है या नहीं, उसे पहले अपने आपको असली करना पड़ेगा। दूसरों से सतर्क मत रहो, अपने आप से सतर्क रहो। तुम्हारा सबसे बड़ा दुश्मन तुम्हारे भीतर ही बैठा हुआ है। तुम्हें एक क्षण नहीं लगेगा नकली को नकली जान लेने में, अगर तुम असली हो गए। जिसको दूसरे की सच्चाई जाननी है, उसको पहले अपनी सच्चाई जाननी पड़ेगी। अपने भीतर ही समाधान खोजना पड़ेगा।
आचार्य प्रशांत: रॉंग नंबर। ऐसे थोड़ी है की इधर से पिट गए, उधर से…
प्रश्नकर्ता: प्रणाम, आचार्य जी। मैं बचपन से एक धार्मिक परिवार में पला-बढ़ा हूँ। बचपन से पूजा-पाठ हमारे घर में चलता था। रामायण-महाभारत हमारे घर में चलता था। तो उन सब का देखा-देखी मैं भी सबसे रामायण-महाभारत साझा करता था। लोग खुश होते थे और मुझे भी एक तरह का प्रोत्साहन…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, कैसे पता करें कि कोई कर्म ध्यान से निकल रहा है?
आचार्य प्रशांत: जब ये जाँचने की कोई ज़रूरत ही न पड़े, कि सर्वप्रथम मैं जो कर रही हूँ वो सही है या गलत और दूसरी बात कि मुझे जो लग रहा है, जो आन्तरिक निर्देश प्राप्त…
समय मिले तो उसे तत्काल किसी सार्थक काम में लगा दो। समय का एक पल भी अपने लिए बचा लिया, तो मरोगे। व्यक्तिगत समय के अलावा और कोई नर्क नहीं है। हमें बड़ा अच्छा लगता है बोलना, ‘थोड़ा Personal Time मिलना चाहिए न।’ तुम्हारी ज़िंदगी के सब झंझट Personal Time में ही पैदा हुए थे। ये सज़ा मिली है समय चुराने की, कि आज सौ झंझटों से घिरे हुए हो।
प्रश्नकर्ता: कोई काम करते हैं या कोई बुक पढ़ते हैं, तो मन उस समय नहीं होता, वो भविष्य या भूतकाल में चला जाता है। ज़्यादातर प्रेज़ेन्ट (वर्तमान) में नहीं रहता है। तो क्या करें कि वो अधिकांशतः वर्तमान में ही रहे?
आचार्य प्रशांत: क्या करोगे तुम वर्तमान में रहकर?
प्र:…
एक ओर तो शरीर को बनाकर रखना है, और दूसरी ओर शरीर से चिपक भी नहीं जाना है - जैसे शरीर एक उपकरण है, एक संसाधन है; इस्तेमाल करना है उसका। लेकिन जिस चीज़ का इस्तेमाल करना है, उसको इस्तेमाल करने के लिए ही सही, स्वस्थ और मज़बूत तो रखोगे न? मज़बूत रखना है, लेकिन इससे पहचान नहीं बाँध लेनी है। जब मौक़ा आएगा, इसको हँसते-हँसते त्याग भी देंगे। और शरीर की जितनी हम सेवा कर रहे हैं, जितना इसको तेल पिला रहे हैं, जितना इसको व्यायाम दे रहे हैं, इससे दूना इससे काम लेंगे।
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रणाम। जीवन में आगे बढ़ने के लिए मन बहुत कुछ पाना चाहता है; मूलत: इसमें आर्थिक लाभ भी छुपा होता है। लेकिन पाँच-छह महीने कुछ किया और फिर कुछ और करने को मन चाहता है। मन को समझने का प्रयास किया, आपके कुछ वीडियोज़ देखे। एक वीडियो…
आचार्य प्रशांत: (प्रश्न पढ़ते हुए) कह रहे हैं कि आप कहते हैं कि महिलाओं का कमाना उनकी आन्तरिक और भौतिक प्रगति के लिए ज़रूरी है, पर हमारी प्राचीन देवियाँ जैसे माँ सीता, देवी अनुसुइया, यहाँ तक कि साध्वियाँ जैसे मीराबाई भी कभी कमाती तो नहीं थीं, तो क्या वो सब…
आचार्य प्रशांत: पूछते हैं कि युवा हूँ और अपने जीवन में कई अलग-अलग पहलुओं को पाता हूँ। फिर इनके जीवन में वो अलग अलग पहलू क्या है, उसकी छोटी सी सूची दी है। तो एक पहलू है पढ़ाई और कैरियर का। अगला है गर्लफ्रेंड और प्रेम प्रसंगों का। फिर अगला…
प्रश्नकर्ता: समटाइम्स व्हेन देयर इज़ डीप इन्वॉल्वमेंट विथ रीडिंग, आई फ़ॉरगेट द सराउंडिंग्स। ऑनली द बुक रिमेंस। इज़ दैट इन्वॉल्वमेंट इन एस्केप फ़्रॉम व्हॉट इज़ हैपनिंग अराउंड और रियली बीइंग विथ ऑनसेल्फ़? (कभी-कभी जब पढ़ने से गहरा जुड़ाव होता है तो मैं अपने आस-पास का माहौल भूल जाता हूँ। केवल…
एवं बुद्धे: परं बुद्धवा संस्तभ्यात्मानमात्मना। जहि शत्रुं महाबाहो कामरूपं दुरासदम्।।३.४३।।
इस प्रकार हे महाबाहो अर्जुन! अपने आप को भौतिक इन्द्रियों, मन तथा बुद्धि से परे जानकर और मन को निश्चयात्मिका बुद्धि की सहायता से स्थिर करके इस काम-रूपी दुर्जय शत्रु को जीतो।
~श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय ३, श्लोक ४३
आचार्य प्रशांत: ‘संस्तभ्यात्मानमात्मना’—कहीं-कहीं…
प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। मेरा मन बहुत भटकता है और जब भी मन को एकाग्र करने की कोशिश करता हूँ, तो एकाग्र नहीं हो पाता। तो ऐसे में मुझे क्या करना चाहिए आचार्य जी?
आचार्य प्रशांत: मैं तुम्हें बता दूँ कि मन को कैसे एकाग्र करते हैं ताकि तुम इसको…
कॉन्शियसनेस…
Questioner (Q): One of the things I found really relevant post-Covid is a lot of violent crimes that have happened. I am speaking about the United States, where we had a classroom of school students that were shot. A gunman came in and killed many people, including kids.
There are…
प्रश्नकर्ता: प्रणाम, आचार्य जी। मेरा प्रश्न टाइम मैनेजमेंट (समय प्रबंधन) को लेकर है और उसका जो एक छोटा भाई आता है वह है वर्क लाइफ़ बैलेंस (कार्य संतुलन)। तो कॉर्पोरेट और एकेडमिक दुनिया में यह बहुत चलता है कि टाइम मैनेज करो। इसका कोर्स भी होता है कि एक्सेल शीट…
पाँच बरस का भोला-भाला, बीस में जवान भयो। तीस बरस में माया के कारण, देश विदेश गयो।। उमर सब धोखे में खो दियो रे। चालिस बरस अन्त अब लागे, बाढ़ै मोह गयो। धन धाम पुत्र के कारण, निस दिन सोच भयो।। बरस पचास कमर भई टेढ़ी, सोचत खाट परयो। लड़का…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी! ये तीन वर्ड्स (शब्द) हैं — अटेंशन (ध्यान), फोकस (केंद्रित करना) और कॉन्सेंट्रेशन (एकाग्रता)। ये बहुत ही सुनने में आते हैं। और तीनों के हमारे लिए बड़ी इम्पोर्टेंस (महत्त्व) है। मुझें लगता हैं कि ये तीनों अटेंशन, कॉन्सेंट्रेशन और फोकस एकदम अलग-अलग बातें हैं।
मैं एक युवा…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी प्रणाम! कुछ ही महीने हुए हैं आपसे यूट्यूब के माध्यम से जुड़े हुए। 'वैराग्य शतकम' का इक्कीस्वाँ श्लोक मुझे सता रहा है, मेरे वजूद पर सवाल उठा रहा है। मैं कॉर्पोरेट में काम कर रहा हूँ तीन साल से, आप समझ ही गए होंगे मैं पापियों के…
समय तुम्हें इसलिए दिया गया है ताकि समय से आगे जा सको। शरीर तुम्हें इसलिए दिया गया है ताकि शरीर से आगे जा सको। शरीर इसलिए नहीं दिया गया है कि शरीर ही को बचाए पड़े हो, “और दो-सौ साल जिएँगे!” जाते-जाते अपना थोड़ा सा अंश छोड़ गए कि, “इसकी …
मैं समझ सकता हूँ आप काम…
ना संसार से डरो, ना सरकार से डरो, ना डरो दुनिया के तानों से, ना डरो अधूरे अरमानों से, डरो तो बस ज़िंदगी के बर्बाद चले जाने से। घड़ी की टिक-टिक को अपना दोस्त बना लो, हर घण्टे-दो- घण्टे पूछा करो अपने-आप से, “अपने समय का जो मैं ऊँचे-से-ऊँचा, बढ़िया-से-बढ़िया…
जिस…