प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। मेरा मन बहुत भटकता है और जब भी मन को एकाग्र करने की कोशिश करता हूँ, तो एकाग्र नहीं हो पाता। तो ऐसे में मुझे क्या करना चाहिए आचार्य जी?
आचार्य प्रशांत: मैं तुम्हें बता दूँ कि मन को कैसे एकाग्र करते हैं ताकि तुम इसको बिलकुल बढ़िया वाली जगह पर एकाग्र कर दो, है न? क्या इरादें हैं भाई? कि जैसे कोई कसाई मुझसे आकर के पूछे कि ये मेरे बकरे भागते बहुत हैं इधर-उधर और मैं उसको बता दूँ कि कैसे वो न भागें ताकि वो..
श्रोतागण: काट सके।
आचार्य: भली बात है कि मन भाग जाता है, नहीं भागेगा तो तुम करोगे क्या उसका? कहाँ एकाग्र करने वाले हो ये तो बताओ। तुम्हें एकाग्रता तो चाहिए और बहुत दुकानों पर एकाग्रता बिक रही है। बताया जा रहा है कंसंट्रेट (ध्यान केंद्रित करना) कैसे करना है, पर कहाँ कंसंट्रेट करोगे? पहले मुझे ये बताओ। अपने सड़े हुए दफ्तर में बैठे हो, जहाँ सड़ा हुआ काम है, वहाँ से मन भाग रहा है, ये तो भली बात है कि भाग रहा है।
मन भाग करके तुमको यही बता रहा है कि जहाँ बैठ गये हो वहाँ नहीं बैठना चाहिए और ज़िन्दगी में जो भी कुछ कर रहे हो वो इस लायक नहीं है कि तुम्हें शान्ति दे सके। तो मन वहाँ से भागता है। मन को एक बार वो तो देकर देखो न जो मन को चाहिए। फिर मुझे बताना कि मन भागा क्या।
जिनका मन एकाग्र नहीं हो पाता, वो भले हैं उनसे जिनका मन एकाग्र हो पाता है। अपने बच्चों को कंसंट्रेशन सिखा मत देना। देखना कि लोग कहाँ-कहाँ मन को एकाग्र कर लेते हैं। दुनिया के बड़े-से-बड़े पाप हो रहे हैं एकाग्रता से। सब बड़े अपराधियों को देखना, उन्होंने बहुत एकाग्र होकर अपराध किये। और दुर्भाग्य की बात ये है कि देखोगे तो अपराध ही ज्यादा पाओगे।




