आचार्य प्रशांत: जब अन्धेरा नहीं रहता, जब बोध का प्रकाश जाग्रत हो जाता है, उद्बोध हो जाता है, तब न दिन रहता है, न रात रहती है, न सत्य रहता है, न असत्य रहता है, न सर्दी रहती है, न गरमी रहती है, न सुख रहता है, न दुख रहता है। माने क्या नहीं रहता है? अरे! ये संसार ही नहीं रहता। वो अहम् नहीं रहता है जो सब तरह के द्वैतों में पनाह खोजता था।
कभी वो कहता था, ‘रात! ठंड बहुत है, दिन हो जाए धूप निकलेगी, आहाहा! धूप सेकेंगे, बड़ा मज़ा आएगा। कभी क्या बोलता था? ये दिन ही बड़ा गड़बड़ है, कितनी ज़्यादा गरमी है, और दिन बहुत खराब जा रहा है। जल्दी से ये दिन बीत जाए, रात हो जाए सोने को मिलेगा।’ वो जहाँ होता है, उससे विपरीत में हमेशा आशा देखता है, उससे विपरीत में हमेशा भागना चाहता है। लेकिन जो बात को समझ गया, जिसने सच्चाई देख ली, अब उसे किसी विपरीत में जाने में क्या रूचि होगी?
तो ऐसा नहीं है कि रात होनी बन्द हो जाती है, दिन होना बन्द हो जाता है, सर्दी होनी या गरमी होनी बन्द हो जाती है, ये सब होते रहते हैं। ये होते रहते हैं, इनसे जुड़ी उम्मीद नहीं होती है। बात समझिएगा।
हम चीज़ों की बात नहीं कर रहे हैं हम चीज़ों से जुड़े जो अर्थ हम पकड़ते हैं हम उनकी बात कर रहे हैं। क्योंकि चीज़ें तो वैसे भी कुछ होती ही नहीं हैं। आप एक खम्भा नहीं देखते हो, आप खम्भे से जुड़ा जो आपने अर्थ है उसको देखते हो। लेकिन हम ये नहीं लगता, हमें लगता है हम खम्भा देख रहे हैं, आप खम्भा नहीं देख रहे हैं। आप खम्भे की अपनी परिभाषा को देख रहे हैं। आपने खम्भे के साथ जो अर्थ, जो छवियाँ, जो प्रतीक जोड़ रखे हैं आप उनको देखते हो।
तो एक बार आप अहम् से मुक्त हो गये उसके बाद जिन स्वार्थों के चलते, स्वार्थ में ही अर्थ निहित है न? अर्थ। जिन स्वार्थों के चलते आप खम्भे को देखते रहते थे वो स्वार्थ भी गये क्योंकि अहम् को ही स्वार्थ होता है और वो जो खम्भा है वो अर्थों के अतिरिक्त कुछ था ही नहीं तो अगर अर्थ सारे चले गये तो? तो? खम्भा भी चला गया न। वैसे ही दिन और रात क्या हैं? वो अपनेआप में घटने वाली कोई बाहरी घटनाएँ नहीं हैं।




