प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, कल एक बहुत बड़ा जो कचरा जो मन में था, उस पर बहुत क्लेरिटी (स्पष्टता) मिली। जो कंफ्यूजन (उलझन) था, चॉइस (पसन्द) और सरेंडर (समर्पण) पर, वैसे ही एक-दो और कचरे हैं। तो इसीलिए पूछना चाह रहा हूँ, ‘हाउ माइंड वर्क्स?’ (दिमाग कैसे काम करता है?)
कॉन्शियसनेस, कंसंट्रेशन और अवेयरनेस (चेतना, एकाग्रता और जागरूकता) को लेकर बेटी ने सवाल पूछ लिया और मैं उसको सही उत्तर नहीं दे पाया। उसको मैं बड़े दिनों से अपने तरीक़े से ही समझ कर बैठ गया हूँ, जो कि लग रहा है कि उसमें भी अस्पष्टता है। थोड़ा सा देखा था आपका वीडियो यूट्यूब में तो बात उतनी स्पष्ट नहीं हो पायी। थोड़ा उस पर अगर आप प्रकाश डाल दें।
आचार्य प्रशांत: सबसे पहले तो यह समझना होगा कि शरीर को न कोई समस्या है, न उत्सुकता है आध्यात्मिक तल पर। शरीर को न कोई समस्या है, न उत्सुकता है। शरीर एक प्रणाली है, एक यन्त्र, एक मशीन जो अपना काम बखूबी करना जानता है। और जब मैं शरीर कह रहा हूँ, तो फिर याद दिला रहा हूँ कि मेरा तात्पर्य सिर्फ़ माँस और हड्डी से नहीं है, मैं मस्तिष्क को उसमें शामिल कर रहा हूँ। मस्तिष्क भी अपना काम करना बखूबी जानता है और उसे कोई बेचैनी नहीं है। उसके सामने अगर जैविक असुरक्षा आती है, तो वह उसके लिए जो कर सकता है करेगा। आध्यात्मिक अशान्ति नहीं है शरीर को। जो अशान्त है वह कोई और है। उसको ‘अहम् वृत्ति’ जानिए। वो, वो है जिसे आप ‘मैं’ कहते हैं। वो, वो है जो अशान्त है।
मैंने किसको छुआ? (एक श्रोता को छूकर पूछते हैं) तुम बोलोगे, ‘मुझे छूआ।‘ मैंने उँगली किसको दिखायी? ‘मुझे दिखायी।‘ और मैंने जबकि छूआ किसको था? शरीर को। इसका मतलब, यह ‘मैं’ क्या कर चुका है? यह शरीर से गुत्थम-गुत्था हो चुका है। यह शरीर में वैसे ही मिल गया है जैसे पानी में नमक। शरीर में किसी एक जगह पर ‘मैं’ है क्या?







