मनुष्य ही है जो बंधन का अनुभव करता है, इसलिए उसे अर्थ चाहिए। ज़िंदगी मिली है भीतरी बंधन तोड़ने के लिए, न कि भीड़ या रेस में दौड़ने के लिए। हमें लगता है रेस में दौड़ने वाले मेहनत कर रहे हैं, पर वो मौज कर रहे हैं। निरर्थक काम करने में तो मेहनत लगती है, लेकिन अकेले चलने और सार्थक काम करने में उससे कहीं ज़्यादा मेहनत लगती है। खोजो वो, जो जीवन को अर्थपूर्ण बना दे। भीड़ में जीवन नहीं लगाना है, क्योंकि भीड़ में निरर्थकता है। उस निरर्थकता से बचना ही सार्थकता है।
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प्रश्नकर्ता: मेरा नाम प्रभात त्यागी है और मैंने आईआईटी दिल्ली से ही ग्रेजुएशन किया हुआ है 2004 में। अगर मैं एक साल पहले जाता तो शायद आपसे मिलता 1999 में वहाँ पर, यू नो प्रशांत त्रिपाठी से। सो आचार्य जी, एक तो मेरा सवाल ये है कि जो आपने ये आईआईटी, आईआईएम छोड़ने के बाद इस पाथ को चुज़ किया, वो काफ़ी कठिन रहा होगा। तो आप अपनी वो प्रक्रिया थोड़ा बता सकते हैं हमें कि वो कितना, कैसे वो प्रोग्रेसिव हुआ, नंबर एक।
नंबर दो, अभी हम लोग ग्लोबल वार्मिंग पर बात कर रहे हैं और आपने एक डर्टिनेस को उससे लिंक किया हुआ है यहाँ पर। तो आई मीन, अगर हम बात करें कि मानव समाज जो है, ये मानव 10,000 साल पहले जंगल से निकला है, तो वो पहला कदम ही कहीं-न-कहीं इस तरफ़ था ग्लोबल वार्मिंग की तरफ़।
तो क्या इंसान प्रगति ही न करे, वहीं रह जाए जहाँ रुका हुआ है? और अगर वो प्रगति करे, और मैं अगर एक कंपनी की तरफ़ से सोचता हूँ जब, तो मुझे कुछ ऐसे लोग चाहिए जो कि




