प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रणाम। जीवन में आगे बढ़ने के लिए मन बहुत कुछ पाना चाहता है; मूलत: इसमें आर्थिक लाभ भी छुपा होता है। लेकिन पाँच-छह महीने कुछ किया और फिर कुछ और करने को मन चाहता है। मन को समझने का प्रयास किया, आपके कुछ वीडियोज़ देखे। एक वीडियो में आपने कहा कि मन को ऐसे जाना जाए कि क्या कह रहा है उसे पहचान लिया जाए और कौन कह रहा है उसको जान लिया जाए। ये चीज़ थोड़ी क्लियर (स्पष्ट) नहीं हुई।
आचार्य प्रशांत: तुम यह छोड़ो कि उस वीडियो में क्या देखा। तुम्हारी समस्या क्या है ये बताओ।
प्र: मन विचलित रहता है, उसको...
आचार्य: सबका रहता है, कुछ आगे थोड़ा बढ़कर बताओ।
प्र: तो उसको काबू में करने या समझने की कोशिश की। मन और जो मैं हूँ उसमें पृथक्करण नहीं हो पा रहा।
आचार्य: क्या करोगे? किसने बता दिया कि पृथक्करण करना होता है? क्यों करना चाहते हो?
प्र: ताकि मन को समझ सकूँ।




