पर्यावरण खराब किया किसने? || आचार्य प्रशांत, वेदांत महोत्सव ऋषिकेश में (2022)

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रणाम आपको। मेरा पहला शिविर है, देहरादून से आया हूँ मैं और चार महीने से सुन रहा हूँ मैं आपके वीडियो। काफ़ी अच्छा लग रहा है। एक प्रश्न चल रहा है मन में कि मानसिक पर्यावरण पर तो आपने बहुत कुछ बोला है कि मन ख़राब होता है, कुछ भी ख़राब होता है। लेकिन जो बाकी दूसरे पर्यावरण से काफ़ी नुक़सान हो रहा है। जैसे प्लास्टिक हो गया, पानी का बहुत मिसयूज़ (दुरुपयोग) होता है, पेड़ों की बहुत कटाई होती है। और आपके इतने फ़ॉलोवर्स हैं, तो मैसेज़ आप इस बारे में थोड़ा अगर दें तो।
आचार्य: इस पर भी बोला हैं, खूब बोला है। आपने शायद सुना नहीं होगा। खूब बोला है। मैं फिर बोल देता हूँ, अच्छा हुआ आपने प्रश्न उठाया।
देखिये, हम बाहर जो कर रहे हैं न, वो हमारे भीतरी माहौल का ही एक प्रतिबिंब होता है। भीतर जो हैं, वो छुपा रह जाता है। हम कह देते हैं, “हम बड़े साफ़ लोग हैं।“ क्यों? मुँह साफ़ है हाथ साफ़ है, कपड़े साफ़ है, हम कह देते हैं हम साफ़ लोग हैं। हम लोग हैं बड़े गंदे, बहुत ही गंदे, घिनौने लोग हैं हम। और हमारा वही घिनौनापन फिर उस प्लास्टिक में दिखाई देता है। कटे हुए पेड़ों के ठुठों में दिखाई देता है। वो जो बाहर हैं, वो कहाँ से आया? वो हमारे भीतर से आया न?
अब इसी शहर (ऋषिकेश) को लीजिये। ये शहर वो शहर है ही नहीं जिसे मैं दस साल से जानता हूँ। हर तरह की गंदगी, हवा तक अशुद्ध हो गई है। बोलने के लिए तो बहुत, बहुत, बहुत कुछ है। दिन-रात देखता ही हूँ। आप यहाँ से जाइए, वहाँ रास्ते में शराब का एक ठेका पड़ेगा और उसके बगल में कई टन गंदे प्लास्टिक का ढ़ेर दिखाई देगा आपको, गंदे। और वो सरकारी है। सरकार ने वहाँ पर कचराघर-सा बनाया है। जहाँ कचराघर बनाया हैं, वहाँ पहले एक नदी बहती थी। वो नदी अब नहीं बहती। नदी का तल भर दिखाई देता है, पानी वहाँ एकदम नहीं है, वहाँ कचराघर बना है। उसको आप देखेंगे, आप अवाक़ रह जाएँगे — ये क्या है?
मुझे मालूम है न वो कहाँ से आया है। वो आया है एक धार्मिक जगह को एक मनोरंज़न की, पर्यटन की जगह बना देने से। ये जो पूरा



