
‘अप्प दीपो भव’ — ‘अपने प्रकाश स्वयं बनो’ — यह एक बहुमूल्य वक्तव्य है, लेकिन आख़िरी है। उससे पहले बड़ी साधना करनी पड़ती है। ‘कोई गुरु आवश्यक नहीं है’, यह जानने के लिए भी कोई गुरु चाहिए। जब पूरी साधना, पूरी दीक्षा हो जाए और शिष्य की विदाई का समय आए तभी गुरु को कहना चाहिए — ‘अप्प दीपो भव’। और तभी शिष्य के कान में ये शब्द पड़ने चाहिए। भूलना नहीं, ये ‘आख़िरी’ शब्द हैं।

भ्रांति यह है कि मनुष्य जीव कभी भी अपनी मूल-वृत्ति से समूल मुक्त हो सकता है। हम सबकी इच्छा रहती है कि किसी ऐसी प्रक्रिया से गुज़र जाएँ जो हमें एक-बारगी ही सदा के लिए मुक्ति दे दे। वैसा नहीं हो सकता। जिस दिन तक शरीर है, उस दिन तक तुमको साधना भी करनी पड़ेगी। वृत्ति का हमला चूँकि निरंतर है, इसीलिए साधना भी प्रतिपल चाहिए। मुक्ति उनकी है जिन्हें मुक्ति प्यारी है, मुक्ति उनकी है जो मुक्ति में चल रहे हैं लगातार मुक्ति की ओर।


प्रश्नकर्ता: प्र: तो आचार्य जी, अंजन, अंजनों के घर्षन से निरंजन निकल रहा है, ऐसा कुछ हो रहा है?

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी प्रणाम। मेरा प्रश्न ये है कि मैं जिस राह में बढ़ रही हूँ मुक्ति को लेकर, तो वो दिशा मेरी सही है या नहीं इस चीज़ का पता कैसे चलेगा मुझे कि मुक्ति को लेकर मैं सही दिशा में जा रही हूँ या नहीं?

आचार्य प्रशांत: सुपर-फ़ास्ट वर्ल्ड न्यूज़ पूछ रहे हैं कि स्वामी विवेकानंद जी


प्रश्नकर्ता: जब आपसे लोग पूछते हैं कि क्या आप एनलाइटेंड (प्रबुद्ध) हैं, तो आप बार-बार एक ही जवाब देते हैं, न हूँ, न कभी होने वाला हूँ। कहीं ये वही बात तो नहीं कि हमें किसी चीज़ का अनुभव न हो, तो हम कह दें कि वैसी कोई चीज़ होती…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी। मैं आइआइटी कानपुर से हूँ, और जीवन के प्रति एक तर्कवादी रवैया रखता हूँ, चीज़ों को समझने की कोशिश करता हूँ। आपको सुनता हूँ और आपका बहुत सम्मान करता हूँ। मेरे कुछ मित्र भी हैं जो आपको सुनते हैं, और और भी आपको सुनने वाले हैं जो

प्रश्नकर्ता १: आचार्य जी, जैसा आपने अभी कहा कि हम अपने काम में अपने-आप को जानते हैं — दुनिया में हर कोई काम करता है लेकिन तब भी इतनी परेशानी है,

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, जो अनुभव आपको नहीं हैं, वो किसी और को कैसे हो सकते हैं, ये कहीं ऐसा तो नहीं, आपका कोई पूर्वाग्रह है?
आचार्य प्रशांत: नहीं, क्या है? खोलकर बताओ बात, क्या कह रहे हैं? किसका अनुभव? एनलाइटनमेंट का?

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, जितनी भी बात आपने बतायीं उसके मूल में यही था कि अध्यात्म का उद्देश्य तो मन को शान्त करना है, सरल करना है। आज का जो अध्यात्म है उसका उद्देश्य मन की शान्ति और सरलता नहीं, बल्कि कुछ और ही है। और क्योंकि उद्देश्य बदल चुका है

प्रश्नकर्ता: कि जैसे हम आंतरिक रूप से अप्रभावित रहें, बाहरी चीज़ें हमें प्रभावित न कर पाएँ। तो जब हम कर्म करते हैं, तो यह सारे कर्म हमें बाहरी दुनिया में ही करने पड़ रहे हैं। तो यह तो सुनने के बाद हम समझ पाते हैं कि हमें अप्रभावित रहना है,





प्रश्नकर्ता: अहंकार कब ख़त्म होता है?

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, जब अचानक मन के सामने कुछ आता है तो वह प्रतिक्रिया व्यक्त करता है — जो अच्छी भी हो सकती है व बुरी भी हो सकती है। किसी चीज़ की पुनरावृत्ति होने पर मन योजना बनाने लगता है कि — "कैसे होगा?"

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, क्या यह पता लगाया जा सकता है कि बोध की प्राप्ति में अभी कितनी यात्रा बची है, या किसकी कितनी यात्रा हो चुकी है?
आचार्य प्रशांत: यात्रा लम्बी किसी की नहीं होती है। समझाने वालों ने ऐसा बोला, मैं भी ऐसा ही उदाहरण रख देता हूँ।

प्रश्न: आचार्य जी, ‘झूठा होश’ का क्या अर्थ होता है?





























प्रश्न: आचार्य जी, हम पूर्णता के भाव तक कैसे पहुँचे?
आचार्य प्रशांत: पूर्णता के भाव तक पहुँचे कैसे, शुरुआत यहाँ से करते हैं। पूर्णता कोई भाव है ही नहीं, तो उस तक पहुँचने का भी कोई प्रश्न नहीं है।
आप (प्रश्नकर्ता) कहते हैं कि आपने मेरा लिखा पढ़ा है, थोड़ा…
प्र: या फिर मतलब उसमें...
आचार्य प्रशांत: निरंजन कुछ है कि जो निकलेगा?
प्र: यहाँ पर आप इतनी देर से एक्सप्लेन (समझा) कर…
आचार्य जी: हमको…
क्योंकि कोई भी व्यक्ति पूर्ण, माने परफ़ेक्ट नहीं होता। तुम उनसे या तो वह सीख लो जो चीज़ें सीखने लायक है या उन बातों पर ध्यान दें लो जिन पर ध्यान नहीं दिया…
आचार्य प्रशांत: तिरसठवाँ श्लोक उद्धृत किया है, पिंगलागीता से। भीष्म कहते हैं, युधिष्ठिर से - “राजन्! ब्राह्मण द्वारा कहे गए इन युक्तियुक्त वचनों से राजा सेनजित् का चित्त स्थिर हो गया। वे शोक छोड़कर सुखी हो गए और प्रसन्नतापूर्वक रहने लगे।”
तो कह रहे हैं प्रश्नकर्ता कि यहाँ तो ऐसा…
सभ महि जोति जोति है सोइ
सब में प्रकाश है
~ सोहिला (नितनेम)
आचार्य प्रशांत: कल दोपहर जब हम लौट रहे थे कॉलेज से तो गाड़ी में कृष्ण कुछ बातें कह रहे थे, फिर मैंने सी.डी. प्लेयर बन्द कर दिया। जब तक वो जो कह रहे थे, वो चल रहा…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, आप हमें जो ज्ञान देते हैं, वह कहाँ से आता है?
आचार्य प्रशांत: कल कहा था न मैंने कि आप मुझसे सीख रहे हो और मैं आपसे सीख रहा हूँ। ज़िन्दगी देखता हूँ, और ज़िन्दगी में वो सारे गुरुजन शामिल हैं जो इस संसार में रहे और…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी जीवन को जानना क्यों ज़रूरी है?
आचार्य प्रशांत: एकदम ज़रूरी नहीं है!
प्र: लेकिन मैंने यूट्यूब और कहीं-कहीं से देखकर कई बार जानने की कोशिश किया कि ये शरीर नहीं है, मन नहीं है, विचार नहीं है और उसके बाद फ़िर अटक जाता हूँ।
आचार्य: यूट्यूब देखना…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, क्या हममें क्षमता नहीं है जीवन को समझने की? क्या गुरु का होना ज़रुरी है?
आचार्य प्रशांत: ये नहीं कहना चाहिए कि हममें क्षमता नहीं है तो हमें गुरु का सहारा लेना चाहिए। इसको ऐसे कहते हैं कि हमारी ही जो क्षमता है वो हमारे सामने गुरु…
अहंकार उस दिन ख़त्म हुआ…
आचार्य प्रशांत: मन का तो…
अहं अगनि हिरदै जरै, गुरू सों चाहै मान। तिनका जम न्यौता दिया, हो हमरे मिहमान॥
~ कबीर साहब
वक्ता :गुरु और शिष्य की कहानी है। उनके संबंधों के विषय में है। अहं की आग सीने में धकधक जल रही है। अहं कहता है, “मुझे मान्यता मिले, स्वीकृति मिले, प्रशंसा मिले”।…
प्रेम की गहराई हमेशा प्रेमी की अपनी चेतना जितनी होती है — जो जैसा है, उसका प्रेम भी वैसा ही होगा, चाहे उसे कितना भी पावन या अनोखा क्यों न मान लिया जाए। जिस चेतना ने खुद को कभी गहराई से नहीं जाना, वह प्रेम में भी सतह से आगे नहीं जा सकती। जो कोई अपने प्रेम को गहराई से परखने से बचता है, वह असल में खुद को परखने से बच रहा होता है — और यही बचाव, प्रेम के नाम पर पाला गया एक और भ्रम है।
“फॉलो योर पैशन” तभी सार्थक है, जब वह सचमुच आपका अपना हो। अक्सर जिसे हम अपनी पसंद, पैशन या इच्छा मानते हैं, वह समाज, परिवार, संस्कार और परिस्थितियों से भीतर बैठा हुआ प्रभाव होता है। वास्तविक स्वतंत्रता न बाहरी दबाव में जीने में है, न भीतर की कंडीशनिंग का गुलाम बनने में। आत्मनिरीक्षण से सही कर्म की स्पष्टता आती है और बिना बिके, बिना डरे एक गरिमापूर्ण जीवन जिया जा सकता है।
स्वतंत्रता दिवस को केवल उत्सव नहीं, बल्कि आत्मावलोकन और सतर्कता दिवस की तरह देखने की आवश्यकता है। भारत की परतंत्रता के पीछे रहे आंतरिक कारणों को समझना ज़रूरी है, क्योंकि राजनीतिक स्वतंत्रता के बावजूद लोकधर्म, अंधविश्वास, जातिगत विभाजन, ज्ञान-विज्ञान की उपेक्षा, परंपरागत जड़ता और आत्मबल की कमी आज भी मौजूद हैं। वास्तविक देशभक्ति इन बंधनों को पहचानकर ज्ञान, आत्मनिर्भरता, वैज्ञानिक दृष्टि और जागरूक नागरिकता विकसित करने में है।
लोकतंत्र, गणतंत्र और स्वतंत्रता केवल संविधान में लिखे शब्द नहीं, बल्कि जागरूक नागरिक की चेतना पर निर्भर हैं। वास्तविक स्वतंत्रता मनमानी करने की छूट नहीं, बल्कि भीतर घुसे भय, लालच, अंधविश्वास, पूर्वाग्रह और बाहरी प्रभावों से मुक्ति है। जब नागरिक अपने ही विचारों और मान्यताओं की जाँच नहीं करता, तो लोकतंत्र भीड़तंत्र और संप्रभुता खोखली बन सकती है।
समझ केवल जानकारी इकट्ठा करने या बातों को याद रखने से नहीं आती, बल्कि पूरी सजगता से वर्तमान में जीने और हर अनुभव को स्वयं देखने से आती है। जीवन हर दिन नए प्रश्न पूछता है, इसलिए रटी हुई बातें पर्याप्त नहीं होतीं। वास्तविक सीख तब होती है जब जिज्ञासा, प्रश्न और प्रत्यक्ष समझ विकसित होती है। स्मृति नहीं, बल्कि जागरूकता और समझ ही सही निर्णय, सीखने और जीवन को सार्थक दिशा देने का आधार बनती है।
आध्यात्मिक प्रगति अधिक गुरु, ग्रंथ या संस्थाएँ बदलने से नहीं, बल्कि एक सत्य को गहराई से जीने से होती है। सतही अध्ययन अहंकार को बढ़ाता है, जबकि वास्तविक अध्ययन स्वयं को बदल देता है। जो वास्तव में समझता है, उसे निरंतर नए उपाय नहीं चाहिए। विनम्रता से अपनी अधूरी समझ स्वीकार कर, एक प्रामाणिक स्रोत के साथ गहराई से जुड़े रहना ही आत्मज्ञान और आंतरिक परिवर्तन का मार्ग है।
क्या सभी गुरु और ग्रंथ व्यर्थ हैं, या यह भी अहंकार का एक नया रूप है? इस संवाद में आचार्य प्रशांत बताते हैं कि सत्य का कोई निश्चित मार्ग नहीं, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि गुरु और शास्त्रों का महत्व समाप्त हो जाता है। वे मौलिकता, कृतज्ञता और बौद्धिक ईमानदारी पर ज़ोर देते हुए समझाते हैं कि जिसने जहाँ से सीखा है, उसका स्वीकार आवश्यक है। साथ ही चेतावनी देते हैं कि "मैं स्वयं ही पर्याप्त हूँ" का विचार भी अहंकार का सूक्ष्म खेल बन सकता है।
ज्ञान ही डर को मस्ती में बदलता है। अज्ञान भय पैदा करता है, जबकि सही समझ भय दूर करता है। सच्चे मित्र बनाने की कोशिश करने के बजाय आत्म-अवलोकन अधिक आवश्यक है। कबीर साहब का संदेश है कि केवल किताबें पढ़ने से नहीं, बल्कि ज्ञान के प्रति प्रेम से जीवन बदलता है। मन स्वयं चंचल नहीं होता; हमारी इच्छाएँ और अस्थिरता उसे भटकाती हैं। शिक्षा का उद्देश्य केवल जानकारी जुटाना नहीं, बल्कि अपनी मान्यताओं पर प्रश्न करना और सत्य की खोज करना है।
पढ़ना केवल पन्ने पूरे करना नहीं, बल्कि समझ विकसित करना है। जब किसी विषय को सचमुच समझा जाता है, तो जिज्ञासा स्वयं आगे पढ़ने के लिए प्रेरित करती है। अधूरी किताबें अक्सर रुचि की कमी नहीं, बल्कि बिना समझे आगे बढ़ने का परिणाम होती हैं। इसलिए गति से अधिक महत्त्वपूर्ण है हर विचार को समझना, क्योंकि वास्तविक सीख वहीं से शुरू होती है।
व्यक्ति और उसके माता-पिता दोनों अक्सर प्रेम के नाम पर एक-दूसरे पर अधिकार जताते हैं, जबकि संबंधों में निर्णय सम्मान, समझ और स्वतंत्रता पर आधारित होने चाहिए। वयस्क होने के बाद जीवन के महत्वपूर्ण फैसले स्वयं लेने की क्षमता विकसित करना आवश्यक है। सच्ची परवरिश निर्भरता नहीं, आत्मनिर्भरता पैदा करती है। पारिवारिक दबाव का बड़ा हिस्सा प्रेम से नहीं, बल्कि भय, सुविधा, अपेक्षाओं और स्वार्थ से संचालित होता है। स्वस्थ संबंध वहीं संभव हैं जहाँ दोनों पक्ष एक-दूसरे की चेतना, स्वतंत्रता और गरिमा का सम्मान करें।
अध्यात्म कोई अलग विषय या पुरानी परंपरा नहीं, बल्कि स्वयं को जानने की सतत जागरूकता है। विज्ञान, चिकित्सा या एआई जैसे सभी क्षेत्र बाहरी ज्ञान से जुड़े हैं, जबकि अध्यात्म उस व्यक्ति को समझने की प्रक्रिया है जो इनका उपयोग करता है। यदि इंसान स्वयं को नहीं समझता, तो उसका ज्ञान दिशाहीन हो सकता है। सही समझ ही तकनीक और शक्ति को मानव कल्याण की दिशा देती है।
लोग ऋषिकेश शांति या आत्मबोध के लिए नहीं, बल्कि अपनी वही तनावपूर्ण और भ्रमित जीवनशैली को बनाए रखने के लिए आते हैं। महादेव का अर्थ अंत और अहंकार की समाप्ति है, पर तीर्थ भी मनोरंजन और पलायन का साधन बन गया है। दुख से मुक्त होने के बजाय लोग उसी दुख को बचाए रखने के उपाय खोजते रहते हैं।
समुद्र के लिए ही यहाँ आया समुद्र से ही मेरा आखिरी नाता
पर आज सुबह से व्यस्त रहा रेतीले मसले ये गिनती वो घाटा
साँझ अब जब तट पर आया समुद्र लहराता बोला मुस्कुराता
रेत के कणों में मन फँस जाता रेत गिनते सूरज ढ़ल जाता
रेत का कण विशाल…
आप ‘अद्वैत’ को कोई सिद्धांत समझते हैं? जब तक ‘मैं’ है, तब तक दुनिया और दूसरा भी है, यही द्वैत है। अद्वैत तब होता है जब ‘मैं’ ही अपने मिथ्यात्व को देख ले। तब न कहने वाला बचता है, न कहने को कुछ। अद्वैत कोई विचार नहीं, अस्तित्व का अनुभव है। यह अहंकार के समाप्त होने का नाम है, जहाँ सिर्फ़ बोध शेष रह जाता है।
मजबूरी एक झूठ है जिसे अहंकार स्वार्थ छुपाने के लिए गढ़ता है। जो दबता है वो किसी सौदे में दब रहा है। माँ-बाप की धमकी, समाज का दबाव - ये सब तभी काम करते हैं जब भीतर डर हो और डर तभी होता है जब कोई चीज़ पानी हो। आज़ादी के लिए आखिरी कीमत भी चुकाने की तैयारी ही असली जीवन है।
निर्वाण षट्कम को स्वयं तक पहुँचने का आख़िरी सूत्र भी माना जाता है। निर्वाण षट्कम के सब के सब श्लोक मात्र नकार में हैं। सब बस ये बता रहे हैं कि किसको ज़िंदगी में अहमियत नहीं देनी है। वो सब, जो मैं नहीं हूँ, जो मुझे बाँध कर रखता है, उसका नकार ही शिवत्व है। मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार, इनको बहुत महत्त्व नहीं देना है। इन सबका उपयोग कर लेना, उधर बढ़ने को, जिधर शुद्धता हो। हम में उस शुद्धता से प्रेम रहे। जहाँ कहीं भी कोई व्यक्ति अपनी सीमाओं को चुनौती दे रहा है, शिवत्व वहीं है।
शुरुआत होगी प्रेम से; प्रेम माने, संवेदनशीलता; संवेदनशीलता माने, दुख। दुख का उदय नहीं, दुख का अनुभव। दुख तो है ही, पर असंवेदन बनकर हम उस दुख से किसी तरह बच लेते हैं। किसी चीज़ का होना और उसका अनुभव होना, दो अलग-अलग बातें हैं। दुख है, पर हम उसके अनुभव से बच जाते हैं। कैसे? सुन्न पड़कर। असंवेदनशील होकर हम दुख के अनुभव से कन्नी काट लेते हैं।
अंधविश्वास जीवन का ज़हर है। जिसके जीवन में अंधविश्वास आ गया हो, नहीं हो सकता कि वो हिंसक न हो जाए। जिसके जीवन में अंधविश्वास आ गया, उसके जीवन में प्रेम नहीं रह सकता। जिसके जीवन में अंधविश्वास आ गया, उम्मीद भी मत करना कि उसके पास साहस या ताक़त बचेगी। हाँ, क्रोध और प्रतिक्रिया दिखाई दे सकते हैं। अंधी प्रतिक्रिया वो कर सकता है। पर एक शांत, अदम्य साहस, अब उसमें नहीं दिखेगा।
ये ऐसी सी बात है, कि “मैं क्या करूँ? मैं दस कदम आगे चलता हूँ। पीछे से वो कॉल करके पकड़ लेती है।” वो तुम्हें कॉल करके पकड़ रही है या पहले तुमने मोबाइल फोन पकड़ रखा है? वो तुम्हें पकड़ ले, इसका इंतजाम पहले से करके कौन बैठा है? तुम अगर चाहते ही होते कि वो तुम्हें न पकड़े, तो फोन पीछे नहीं छोड़ के आए होते।
जब ये सब उठे, तो कहो, “तू उठ, तेरा काम है उठना पर तू मैं नहीं है।” और प्रमाण इसका ये है कि मैं तुझे देख सकता हूँ, मैं तेरी हर गतिविधि पर नज़र रख सकता हूँ। यही प्रमाणित करता है कि तुझमें और मुझमें भेद है। तू दृश्य है, मैं दृष्टा हूँ। हम दोनों एक नहीं हैं। मैं साक्षी हूँ तेरा, तू अपना काम कर, मैं बैठा-बैठा देखूँगा। मैं बैठा-बैठा देखूँगा तो मेरे पाँव मेरे पाँव हैं, और मेरा हाथ मेरा हाथ है, और मेरी ऊर्जा मेरी ऊर्जा है; वो तुझे नहीं मिलेगी। मैं तुझसे कोई रिश्ता बनाऊँगा ही नहीं।
प्रश्नकर्ता: जो इतने वर्षों में सीखा, घर में रहकर, दोस्तों के साथ, शिक्षा में, उसका बल इतना है कि लगता है कि वो गलत है; ये मैं अपना एक प्रोजेक्शन (प्रक्षेपण) कर रहा हूँ; गलत लगता तो छोड़ ही देता, लेकिन बल इतना है कि उसको गिराने के लिए अक्षम…
यह जो अलग-अलग दिखाई देता है, यह वास्तव में कुछ है क्या? यह जो अलग-अलग दिखाई देता है, यह संसार है, प्रकृति। प्रकृति में बस विविधताएँ होती हैं, अनेकताएँ होती हैं। उसमें वास्तव में कुछ अलग-अलग है क्या? अलग-अलग जो दृष्टा होते हैं, उन्हीं के कारण यह संसार सबके लिए अलग-अलग हो जाता है। तो अद्वैत कहता है, हम दृष्टा की पहले जाँच-पड़ताल करेंगे, दृश्य की बाद में बात करेंगे।
हमारे लिए धर्म का मतलब ही यही हो गया है कि ठीक-ठीक उसमें लिखा हो कि मेरा क्या कर्त्तव्य है। जीवन इतना बदलाव वाला है कि कोई आकर कैसे बता सकता है कि इस पल में क्या करना है? जब आँखें दी गई हैं तो सहारे की क्या ज़रूरत है? किसने बता दिया कि ‘यह करने योग्य है’? कर्त्तव्य क्या है? नासमझों की सज़ा! जिस दिन समझ जागेगी उस दिन तुम कर्तव्यों से मुक्त हो।
हम आमतौर पर बस ऐसे ही छवि बना लेते हैं कि संघर्ष या दबाव सिर्फ़ व्यवसाय में या सांसारिक मसलों में ही है। ऐसा बिल्कुल नहीं है। दबाव और संघर्ष अध्यात्म में भी उतने ही करने पड़ते हैं, जितने कि संसार में, बस उसकी श्रेणी, उसकी गुणवत्ता अलग है। बाहर तुम दबाव झेलते हो कुछ और अतिरिक्त हासिल कर लेने के लिए, और अध्यात्म में, जिसको तुमने नाहक पा लिया है, वह दबाव बनाता है कि मुझे मत छोड़ो। भीतर वाली लड़ाई जीत लो, बाहर की सब लड़ाइयाँ तुम पाओगे कि तुम्हारे लिए बहुत आसान हो गई हैं।
तुम कहीं गए, तुमने किसी की चरण स्पर्श कर लिए। यह कोई सम्मान है? यह आदर है। सम्मान दूसरी बात है। सम्मान का अर्थ होता है, ध्यान से समझना। जो अपने मन की समझ नहीं रख सकता, वह किसी और को कैसे समझ जाएगा? पर दावा हमारा यह है कि हम दूसरे का सम्मान करते हैं। दूसरे का सम्मान तो तब हो जब आत्म-सम्मान हो। आत्म-सम्मान मतलब खुद को समझना। पहले अपना सम्मान कर लो। अपना सम्मान मतलब, आत्म-ज्ञान! आत्म-ज्ञान ही आत्म-सम्मान है।
दार्शनिक बना नहीं जाता। ये कोई कैरियर थोड़ी होता है। ये तो ज़िंदगी बना देती है। पहले ज़िंदगी ऐसे जियो कि उसकी परतें उघड़ें कुछ, उसका नंगापन सामने आए। और उसके लिए ज़िंदगी के बहुत क़रीब आना पड़ता है। ज़िंदगी के क़रीब जाना माने झूठ अब टूटेगा। और झूठ साँस है, झूठ रीढ़ है, झूठ प्राण बन गया है हमारा। सब टूटेगा। ज़िंदगी को देखो। ज़िंदगी से लात खाओ फिर तुमसे जो कुछ भी अभिव्यक्त होगा, वह दर्शन होगा।
भारत में यह मान्यता रही है कि अध्यात्म बुढ़ापे का काम है। लेकिन जहाँ भी स्वामी विवेकानंद की मूर्ति खड़ी होगी, उस जवान आदमी का तेज गवाही देता होगा कि अध्यात्म बुढ़ापे का नहीं, जवानी का काम है। जवानी अगर, जो सबसे ऊँचा काम हो सकता है, उसको नहीं दी, तो और क्या काम आएगी? उन्होंने युवाओं से कहा, ज़रा चुनौती स्वीकार करना सीखो, प्रतिस्पर्धा करना सीखो। बल ही जीवन है और दुर्बलता ही मृत्यु है। उचित ही है कि युवा दिवस मनाया जाता है उन्हीं के नाम पर।