प्रश्नकर्ता: आचार्य जी प्रणाम। मेरा प्रश्न ये है कि मैं जिस राह में बढ़ रही हूँ मुक्ति को लेकर, तो वो दिशा मेरी सही है या नहीं इस चीज़ का पता कैसे चलेगा मुझे कि मुक्ति को लेकर मैं सही दिशा में जा रही हूँ या नहीं?
आचार्य जी: हमको मुक्ति की और नहीं जाना होता। हमें बन्धनों के विपरीत जाना होता है। तो बस दिशा सही है या नहीं है, ये बन्धन तय करेंगें। बन्धनों के विपरीत जाना माने बन्धनों को काटना, बन्धनों से दूर हो जाना, मुक्त हो जाना। यही मुक्ति है। तो आप जिधर को बढ़ रहे हो, उधर जाकर के बन्धन कमज़ोर हुए कि नहीं, यही जाँच लीजिए। कमज़ोर हुए हैं तो दिशा सही है, कमज़ोर नहीं हुए तो गड़बड़ चल रहा है मामला।
समझ में आ रही है बात?
देखो, सत्य, मुक्ति, ब्रह्म, आत्मा, ये सब विधियाँ हैं। ये कोई चीज़ें नहीं हैं, न कोई स्थितियाँ हैं, न कोई जगहें हैं, न व्यक्ति हैं, न वस्तु हैं। ये क्या हैं? विधि हैं। ये विधि है, आपके भीतर साहस और श्रद्धा बनाए रखने की। ताकि आपको ये भरोसा रहे कि माया आखिरी चीज़ नहीं है कि माया ही सबसे ताकतवर नहीं है। तो इसलिए आपसे कहा गया कि सत्य और आपसे कहा गया सत्य माया से बढ़कर है।
आपसे ये नहीं कहा गया होता तो आप सबसे बड़ा किसको ही मान लेते?
श्रोता: माया को।


