बदलाव चाहता हूँ, लेकिन बिना कुछ छोड़े!

Acharya Prashant

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बदलाव चाहता हूँ, लेकिन बिना कुछ छोड़े!
ये ऐसी सी बात है, कि “मैं क्या करूँ? मैं दस कदम आगे चलता हूँ। पीछे से वो कॉल करके पकड़ लेती है।” वो तुम्हें कॉल करके पकड़ रही है या पहले तुमने मोबाइल फोन पकड़ रखा है? वो तुम्हें पकड़ ले, इसका इंतजाम पहले से करके कौन बैठा है? तुम अगर चाहते ही होते कि वो तुम्हें न पकड़े, तो फोन पीछे नहीं छोड़ के आए होते। यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।

प्रश्नकर्ता: सर, जैसे आपने कहा कि हमारे पास सिर्फ़ एक चीज़ होती है। वो होता है चॉइस का हमारे पास राइट, चुनने का अधिकार होता है। सर, मेरी प्रॉब्लम ये है, कि मान लीजिए मैं मुक्ति की राह पर चल भी जाता हूँ, चुन भी देता हूँ। लेकिन, कुछ दिनों बाद कुछ बात, कुछ आगे चलने के बाद फिर माया पकड़ लेती है। फिर वही चार दिन की चांदनी में अंधेरी रात, दोबारा फिर वही डर्रे पर आ जाते हैं।

क्या करें कि वो वहाँ से फिर डेविएट न हो, डिस्ट्रैक्ट न हो? उसी पर चलते रहें।

आचार्य प्रशांत: ये ऐसी सी बात है, कि “मैं क्या करूँ? मैं दस कदम आगे चलता हूँ। पीछे से वो कॉल करके पकड़ लेती है।” वो तुम्हें कॉल करके पकड़ रही है या पहले तुमने मोबाइल फोन पकड़ रखा है? वो तुम्हें पकड़ ले, इसका इंतजाम पहले से करके कौन बैठा है? तुम अगर चाहते ही होते कि वो तुम्हें न पकड़े, तो फोन पीछे नहीं छोड़ के आए होते। किधर को निकल लिए? दसे कदम आगे बढ़े, पीछे से उसने फोन कर दिया। बोल रहे, “हाँ, हम तो मुक्ति की तरफ़ निकलते हैं।” वो पीछे से पकड़ लेती है।

पहले उसने तुमको पकड़ा या पहले तुमने फोन पकड़ा? बोलो जल्दी।

श्रोता: फोन।

आचार्य प्रशांत: कोई तुम्हें कैसे पकड़ सकता है, अगर तुमने उसे पकड़ने का हक़ न दे रखा हो, तुमने उसे पकड़ने के साधन न दे रखे हों; अगर तुमने अपने स्वार्थ न खड़े कर रखे हों, जिनका उपयोग करके लोग तुम्हें पकड़ते हैं।

किसी ने कहा था, कि जब तुम भागते हो तो अपनी पीठ पर खूटियाँ लगाए क्यों भागते हो। अब भाग रहे हैं बचने के लिए पीठ पर क्या लगा रखी है? पीछे से लोग रस्सा मारते हैं, खींच लेते हैं। अगर तुम सचमुच ईमानदारी से इच्छुक होते भागने के, तो सबसे पहले क्या किया होता? ये जो पीछे खूटियाँ डाल रखी हैं, इनको उतार दिया होता न?

नहीं, वो पीठ पे तो वो सब चीज़ें लगा रखी हैं, जिनका इस्तेमाल करके कोई भी तुम्हें कभी भी पकड़ लेगा। और कह रहे हैं, हम भाग रहे हैं। ये कैसा भागना हुआ? ये भागना हुआ? इधर जैसे कोई भागे, अपनी लाइव लोकेशन ऑन करके। “क्या बताऊँ? तीनों लोग छान मारे, जहाँ भी जाता हूँ, किसी भी कोने में छुपता हूँ। अरे, ये मेरा डिस्चार्ज क्यों हो रहा है? भाई, जल्दी से चार्ज कर देना, लाइव लोकेशन ऑन रखनी होती है। दो पल भी मैं इसको बर्दाश्त नहीं कर सकता, डिस्चार्ज रखना।”

तुम्हें वाकई भागना होता, तुम अपनी लोकेशन ऑन करके भागते? भागने वालों के तुमको पता है लक्षण क्या होते हैं? उनके लक्षण ये होते हैं, कि उन्होंने लाल लंगोट डाल रखी हो और पीछे से चला आ रहा है वो साँड़ मारने के लिए लाल रंग देख के तो वो लंगोट खोल के उतार के छोड़ के भागते हैं। नंगे भागते हैं। उन्हें भागना है।

वो ये भी नहीं देखते कि लंगोट तो कम से कम लेकर भागेंगे। वो नंगे भागते हैं। कहे, कि लंगोट पहने रहेंगे तो पीछे से…। सोच रहा हूँ मैं, मतलब बुद्ध महावीर भागे होते, पीछे से अपना एड्रेस बता के, और जहाँ गए वहाँ से हॉटलाइन चालू रखी है प्रियतमा के साथ। तो क्या होता? तो भागे थे, तो फिर कैसे भागे थे? चुपचाप, रात का अंधेरा, न शोर, न खटका, धीरे से उठे और।

महावीर तो पुरानी ज़िंदगी की आख़िरी निशानियाँ भी छोड़ते हुए भागे थे। बोले, “लो, ये कपड़े भी अगर पुराने पहने रहेंगे तो पुरानी जिंदगी फिर पकड़ सकती है।” तो वो वस्त्र भी एक-एक करके त्यागते हुए आगे बढ़े। बोले, “पुराना कुछ नहीं रखूँगा। अगर पुराना कुछ भी अपने ऊपर रखा, तो पुराना मुझे फिर से पकड़ लेगा। सब छोड़ो।”

ये होती है उनकी निशानी, जिन्हें सचमुच भागना होता है।

आप तो जो करते हो, वो तो बड़ा सतही एस्केप होता है, बस। ये सतह ही एस्केप बस इसलिए किया जाता है ताकि थोड़ी दूर जाकर के फिर वापस लौट आओ। ये पर्यटन जैसा होता है। दो दिन को गए वीकेंड पर, फिर वापस आ गए सोमवार सुबह। ये नहीं, ये भागने वालों की निशानी नहीं है।

सब बात फिर सिंबॉलिक हो गई। या कुछ समझ में आया?

प्रश्नकर्ता: सर समझ में आया, जो कुछ मतलब है, लालच है उसे छोड़ना होगा, बट उतना आसान नहीं होता, सर। कहना आसान होता है, सर।

आचार्य प्रशांत: अच्छा!

प्रश्नकर्ता: मतलब मेरे लिए तो नहीं है सर अभी।

आचार्य प्रशांत: इसी को क्या बोलते हैं? द मोस्ट फंडामेंटल एसंप्शन अबाउट वनसेल्फ। मेरे लिए आसान नहीं है, मैं कमज़ोर आदमी हूँ। बेटा, ये जो तुमने कमज़ोरी पकड़ी हुई है न, ये तुम्हारा यथार्थ नहीं तुम्हारी मान्यता है। यही तो समझा रहा हूँ तब से।

आसान नहीं होता, मत बोलो। वेदान्त कहता, किसके लिए? बोलो, “मेरे लिए आसान नहीं है।”

और “मेरे लिए आसान नहीं है” तो माने, मैंने अपने लिए कठिन बना रखा है। और अगर मैंने अपने लिए कठिन बना रखा है तो मैं अपने लिए आसान भी बना सकता हूँ। मैंने ही तो कठिन माना था। मैंने ही कठिन माना था, मैं ही आसान मान लूँगा। बात तो मानने की है। ये तुमने मान रखा है, है नहीं। फैक्ट और बिलीफ में कुछ अंतर होता है, कि नहीं होता है?

प्रश्नकर्ता: आसान है, फिर छोड़ दूँगा।

आचार्य प्रशांत: ये एक नई चीज़ मान ली।

प्रश्नकर्ता: थैंक यू, सर।

This article has been created by volunteers of the PrashantAdvait Foundation from transcriptions of sessions by Acharya Prashant
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