ये ऐसी सी बात है, कि “मैं क्या करूँ? मैं दस कदम आगे चलता हूँ। पीछे से वो कॉल करके पकड़ लेती है।” वो तुम्हें कॉल करके पकड़ रही है या पहले तुमने मोबाइल फोन पकड़ रखा है? वो तुम्हें पकड़ ले, इसका इंतजाम पहले से करके कौन बैठा है? तुम अगर चाहते ही होते कि वो तुम्हें न पकड़े, तो फोन पीछे नहीं छोड़ के आए होते।
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प्रश्नकर्ता: सर, जैसे आपने कहा कि हमारे पास सिर्फ़ एक चीज़ होती है। वो होता है चॉइस का हमारे पास राइट, चुनने का अधिकार होता है। सर, मेरी प्रॉब्लम ये है, कि मान लीजिए मैं मुक्ति की राह पर चल भी जाता हूँ, चुन भी देता हूँ। लेकिन, कुछ दिनों बाद कुछ बात, कुछ आगे चलने के बाद फिर माया पकड़ लेती है। फिर वही चार दिन की चांदनी में अंधेरी रात, दोबारा फिर वही डर्रे पर आ जाते हैं।
क्या करें कि वो वहाँ से फिर डेविएट न हो, डिस्ट्रैक्ट न हो? उसी पर चलते रहें।
आचार्य प्रशांत: ये ऐसी सी बात है, कि “मैं क्या करूँ? मैं दस कदम आगे चलता हूँ। पीछे से वो कॉल करके पकड़ लेती है।” वो तुम्हें कॉल करके पकड़ रही है या पहले तुमने मोबाइल फोन पकड़ रखा है? वो तुम्हें पकड़ ले, इसका इंतजाम पहले से करके कौन बैठा है? तुम अगर चाहते ही होते कि वो तुम्हें न पकड़े, तो फोन पीछे नहीं छोड़ के आए होते। किधर को निकल लिए? दसे कदम आगे बढ़े, पीछे से उसने फोन कर दिया। बोल रहे, “हाँ, हम तो मुक्ति की तरफ़ निकलते हैं।” वो पीछे से पकड़ लेती है।




