
प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी, मेरा नाम है अयुक्ता। मुझे आपसे एक क्वेश्चन पूछना था। मुझे अभी तक सिर्फ़ ये पता नहीं चला। आप अभी तो इतने ओल्ड हो गए हो, फिर आपको ये इतना कैसे याद रहता है? मेरे मम्मी-पापा को तो याद नहीं रहता।
आचार्य प्रशांत: आप इतने हॉट हो गए हो, आप इतने ओल्ड हो गए हो, क्या बोला?
प्रश्नकर्ता: ओल्ड।
आचार्य प्रशांत: ओल्ड? मैं जवाब ही नहीं दूँगा। तुमने दिल तोड़ दिया मेरा।
बेटा, मुझे कुछ याद नहीं रहता है। कुछ याद नहीं रहता। इसीलिए इतना कुछ आपको कह पाता हूँ, क्योंकि कुछ याद नहीं रहता।
याद से थोड़ी बोलते हैं। आप पढ़ाई करते हो न? आप भी समझना, रटना नहीं। क्या करना है? समझना है। बात समझ में आ गई, तो सब समस्याएँ सुलझ जाएँगी। और रटोगे, तो दो-चार तरीके के सवालों के उत्तर रट लोगे। है न?
पर यह जो लाइफ़ है न, लाइफ़, यह हमेशा नए-नए सवाल पूछती है।
जैसे एग्ज़ाम होता है आपका? अभी स्कूल में एग्ज़ाम होता है?
प्रश्नकर्ता: हँ।
आचार्य प्रशांत: तो एग्ज़ाम ऐसा होता है जिसमें हमेशा नए-नए सवाल आते हैं। और आप कुछ पुराने सवालों के आंसर्स रट सकते हो। पर लाइफ़ के एग्ज़ाम में नया सवाल आ जाएगा। आप जवाब कैसे दोगे? तो रटने से, मेमोरी से, याद रखने से बात नहीं बनती। कैसे बनती है? समझने से।
आप अभी जो बोल रहे हो न, मैं उसको समझने के लिए मौजूद हूँ। मैं इस वक़्त ये नहीं सोच रहा कि, "मेरे रूम में चूहा तो नहीं घुस गया? एक चूहा घूम रहा था, कहीं घुस न गया हो इतनी देर में। ऑ! मेरा खाना तो नहीं खा लिया चूहे ने? ऑ! चूहा मेरे कपड़े लेकर चला गया।" मैं ऐसे सोचने लगूँगा, तो आप जो पूछ रहे हो, मैं उसका आंसर दे पाऊँगा?
प्रश्नकर्ता: नहीं।
आचार्य प्रशांत: तो मैं अभी बिल्कुल यहीं पर प्रेज़ेंट हूँ। जैसे जब मैम क्लास में अटेंडेंस लेती होंगी, तो क्या बोलती होंगी? आपका नाम क्या है?
प्रश्नकर्ता: अयुक्ता।
आचार्य प्रशांत: अयुक्ता, बोलती होंगी। तो आप कैसे बोलते हो? आपका नाम बोला, "अयुक्ता", तो क्या बोलते हो?
प्रश्नकर्ता: प्रेज़ेंट मैम।
आचार्य प्रशांत: प्रेज़ेंट मैम। तो वैसे ही आपने मुझसे सवाल पूछा। तो मैंने क्या करा? "प्रेज़ेंट मैम।" आप मेरी मैम हो। आप जब सवाल पूछोगे, तो मुझे यहाँ प्रेज़ेंट होना है। मुझे चूहे के बारे में नहीं सोचना। मुझे कहीं, किसी से कोई मतलब नहीं है। जो सामने है, वो ज़रूरी है। ठीक है? फिर वहाँ से आंसर, अपने-आप आ जाता है। ठीक है?
समझ में आई है बात?
प्रश्नकर्ता: थोड़ी-थोड़ी।
आचार्य प्रशांत: थोड़ी-थोड़ी। क्या नहीं समझ में आया? अच्छा, बताओ।
प्रश्नकर्ता: वो तो पता नहीं, भूल गई।
आचार्य प्रशांत: ये ऑनेस्ट जवाब है। ठीक है? कि कुछ-कुछ बात समझ में आई है। क्या नहीं समझ में आया, वो बाद में पता चलेगा। पर एक बात पक्की है, जो चीज़ समझ में नहीं आई, उसको रटना मत। जो चीज़ समझ में नहीं आई है, उसको मेमोरी में रखकर दोहराने से कोई फ़ायदा नहीं होता।
आप तो अभी छोटे से हो। ये सारे जो बड़े-बड़े बैठे हैं न, ये अंकल-आंटी लोग, मालूम है क्या करते हैं? ये संस्कृत के न, कुछ वर्ड्स उठा लेते हैं, जो इनको कुछ पता नहीं है उनका मतलब क्या है। कई बार तो कोई नाम ले लेंगे संस्कृत का, या किसी भी लैंग्वेज का न, कोई वर्ड, प्रॉपर नाउन ले लेंगे, और उसको रटना शुरू कर देंगे। और फिर सोचेंगे कि इन्हें कुछ मिल गया। कुछ मिलेगा? कोई बात समझ में ही नहीं आई है, उसको रटे जा रहे हैं, रटे जा रहे हैं, रिपीट कर रहे हैं। कुछ मिलेगा?
प्रश्नकर्ता: नहीं।
आचार्य प्रशांत: देखो, तुम्हें भी समझ में आ गया। इतने बड़े हो गए, उन्हें कुछ समझ में नहीं आता। इसीलिए मुझे छोटे लोग अच्छे लगते हैं। उन्हें बात जल्दी समझ में आ जाती है। ये जितने बड़े होते जाते हैं न, इनको छोटी-छोटी बातें भी फिर समझ में नहीं आतीं। ज़्यादा रट लिया इन्होंने, सब समझ में आना बंद हो गया। रटना मत। ठीक है? समझना। सवाल पूछना। समझने का तरीका क्या है? वही। जैसे हाथ में अभी माइक है न, हमेशा ऐसे ही रहे। ये सवाल पूछने की पोज़ है। देखो, मस्त ऐसे खड़े हुए हो आप। ऐसे ही रहना, सवालों के साथ। इसी से समझ बढ़ेगी।