आध्यात्मिक प्रगति अधिक गुरु, ग्रंथ या संस्थाएँ बदलने से नहीं, बल्कि एक सत्य को गहराई से जीने से होती है। सतही अध्ययन अहंकार को बढ़ाता है, जबकि वास्तविक अध्ययन स्वयं को बदल देता है। जो वास्तव में समझता है, उसे निरंतर नए उपाय नहीं चाहिए। विनम्रता से अपनी अधूरी समझ स्वीकार कर, एक प्रामाणिक स्रोत के साथ गहराई से जुड़े रहना ही आत्मज्ञान और आंतरिक परिवर्तन का मार्ग है।
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प्रश्नकर्ता: प्रणाम, आचार्य जी। मैं भगवद्गीता ऑनलाइन कोर्स में आपके सानिध्य में सीख रहा हूँ। आपने हाल ही में स्वधर्म के दो भागों के बारे में बताया। पहला: बाहरी व्यवस्था को ठीक करना, मन को। और दूसरा: मन को शुद्ध करना।
मैंने कृष्णमूर्ति, ओशो तथा आपकी वीडियोज़ तथा किताबों का भरपूर अध्ययन कर किया है। मैं विभिन्न आध्यात्मिक संस्थाओं में भी जाकर आया हूँ। एक 19 वर्षीय कॉलेजी छात्र होने के नाते, अपनी आध्यात्मिक प्रगति के लिए मैं और क्या प्रयास कर सकता हूँ?
आचार्य प्रशांत: वही पुराना फेर, जिसमें सब फँसते हैं। किनका है? "मैं और क्या कर सकता हूँ?" शुरुआत ही यहाँ से होती है। तुम जो कर आए, वह कम-से-कम सिद्धांततः तो कुछ बुरा नहीं था। एक छोटी-सी चीज़ ले लेते हैं। कह रहे हो, "मैं कृष्णमूर्ति को पढ़ चुका हूँ। मैं आपको सुन चुका हूँ। मैं फलानी संस्थाओं में भी घूम आ चुका हूँ।" अब कह रहे हो, "मैं और क्या करूँ?"
किसी ने अगर कृष्णमूर्ति को वास्तव में पढ़ा हो, तो क्या पूछेगा कि "अब और क्या करूँ?" जिद्दू कृष्णमूर्ति को जिसने पढ़ लिया, क्या वह अब आगे पूछेगा कि "और क्या करूँ?" पर तुम कह रहे हो, "मैं कृष्णमूर्ति को पढ़ आया। अब और क्या करूँ?"




