
प्रश्नकर्ता: प्रणाम, आचार्य जी। मैं भगवद्गीता ऑनलाइन कोर्स में आपके सानिध्य में सीख रहा हूँ। आपने हाल ही में स्वधर्म के दो भागों के बारे में बताया। पहला: बाहरी व्यवस्था को ठीक करना, मन को। और दूसरा: मन को शुद्ध करना।
मैंने कृष्णमूर्ति, ओशो तथा आपकी वीडियोज़ तथा किताबों का भरपूर अध्ययन कर किया है। मैं विभिन्न आध्यात्मिक संस्थाओं में भी जाकर आया हूँ। एक 19 वर्षीय कॉलेजी छात्र होने के नाते, अपनी आध्यात्मिक प्रगति के लिए मैं और क्या प्रयास कर सकता हूँ?
आचार्य प्रशांत: वही पुराना फेर, जिसमें सब फँसते हैं। किनका है? "मैं और क्या कर सकता हूँ?" शुरुआत ही यहाँ से होती है। तुम जो कर आए, वह कम-से-कम सिद्धांततः तो कुछ बुरा नहीं था। एक छोटी-सी चीज़ ले लेते हैं। कह रहे हो, "मैं कृष्णमूर्ति को पढ़ चुका हूँ। मैं आपको सुन चुका हूँ। मैं फलानी संस्थाओं में भी घूम आ चुका हूँ।" अब कह रहे हो, "मैं और क्या करूँ?"
किसी ने अगर कृष्णमूर्ति को वास्तव में पढ़ा हो, तो क्या पूछेगा कि "अब और क्या करूँ?" जिद्दू कृष्णमूर्ति को जिसने पढ़ लिया, क्या वह अब आगे पूछेगा कि "और क्या करूँ?" पर तुम कह रहे हो, "मैं कृष्णमूर्ति को पढ़ आया। अब और क्या करूँ?"
क्या प्रश्न यह होना चाहिए कि "मैं और क्या करूँ?" या प्रश्न यह होना चाहिए कि "मुझे जिद्दू कृष्णमूर्ति समझ में ही नहीं आए हैं।"
पीछे का काम, जो किया है, वही गड़बड़ है। अब आगे करोगे, तो और गड़बड़ ही करोगे, भाई। मैं तुम्हें पाँच और मुक्त पुरुषों के नाम बता सकता हूँ, इनको पढ़ लो। चार संस्थाओं में हो आए हो और मैं तुम्हें बता सकता हूँ, आओ, भाई! यहाँ एक और संस्था है। कुछ दिन इसमें भी रहकर सेवा करके देख लो। पर अगर तुम वही हो, जो जिद्दू कृष्णमूर्ति को पढ़कर भी अभी उलझन में है, तो किसी और को भी पढ़ोगे, तो रह तो उलझन में ही जाओगे न।
लेकिन तुम यह नहीं कह रहे कि मुझे कृष्णमूर्ति को पढ़ना आया नहीं। बड़ी ठसक के साथ दावा कर रहे हो, "मैंने उनको पढ़ लिया, निपटा दिया। कृष्णमूर्ति को निपटा दिया! अब और क्या करूँ?" अरे, तुमने उनको अगर निपटा दिया होता, तो तुम भी न निपट गए होते साथ में।
हम गौर ही नहीं करते कि हम कर क्या रहे हैं। हम ज़्यादा आग्रह इसी में रखते हैं कि हम, और क्या करें।
क्या करोगे और कर-करके? कहीं लिख लेना है? दीवार पर ऐसे एक फ़ेहरिस्त बना देनी है? रोल ऑफ ऑनर फलाने महीने में इसको निपटा दिया, फिर इसको निपटा दिया, फिर इसको निपटा दिया, फिर इसको निपटा दिया। जीवन भर तुम दीवारें रंगते रहो अपनी उपलब्धियों से। मरते वक़्त फिर भी यही सवाल पूछ रहे होओगे, "अब और क्या करें?" फिर भैंसे वाला बताएगा और क्या करें? आगे की काहे पूछ रहे हो, बेटा? पीछे का देखो न। अभी तक तुमने जो किया है, वह कुछ किया ही नहीं है। वह सब ज़ीरो है।
तो यह मत पूछो, "और क्या करें?" मैं कह रहा हूँ, अगर कृष्णमूर्ति को पसंद करते हो, तो लौटकर जाओ उनके पास, फिर पढ़ो। अभी तुमने उनको पढ़ा ही नहीं, अभी तुमने उनको समझा ही नहीं।
अगर कह रहे हो कि मेरी वीडियोज़ देखते हो, देखे होतीं, तो मैंने सैकड़ों बार यह कहा है कि यह सवाल कोई पूछे नहीं कि "आगे क्या करें?" तुमने मुझे भी समझा ही नहीं, आगे की बात पूछना ही निरर्थक है। पीछे कुछ काम हुआ ही नहीं है अभी तक, बिल्कुल शुरुआत से शुरुआत करो। यह दंभ मत रखो कि "मैं इतनी यात्रा तो कर ही आया हूँ। बताइए, आगे की यात्रा कैसी होगी?" सर्वप्रथम विनम्रता के साथ मानो कि अभी तुमने कोई यात्रा करी ही नहीं है।
ये बड़ी घातक गलतफ़हमी होती है, इससे सब लोग बचें। आप कहें कि मैंने रामकृष्ण परमहंस को पढ़ लिया है। आप कहें कि मैं उपनिषद् पढ़ चुका हूँ। आप कहें, "मैं कृष्णमूर्ति पढ़ चुका हूँ, रमण महर्षि पढ़ चुका हूँ।" और फिर आप कहें, "आचार्य जी, मैं बड़ा परेशान हूँ।" तो मैं कहूँगा, सबसे पहले तो अभी जो बोला, उसको वापस लो। जितने अभी तुमने शब्द उचारे, सबको वापस लो। न तुमने रमण महर्षि को पढ़ा है, न तुमने उपनिषदों को पढ़ा है, न कृष्णमूर्ति को पढ़ा है। तुमने किसी को नहीं पढ़ा है। उनको पढ़ने के बाद कोई परेशान रह सकता है क्या?
पर तुम कह रहे हो, "मैं इतना-इतना पढ़ आया, इतने साल का मेरा अध्यात्म हो गया, मैं अभी भी उलझन में हूँ, परेशान हूँ।" इसका मतलब, तुम्हारा अध्यात्म अभी शुरू ही नहीं हुआ है। तुम व्यर्थ ही अपने-आप को झाड़ पर चढ़ाते रहे कि "मैं इतना जान गया और उतना जान गया।" कुछ नहीं जानते।
एक अलिफ़ पढ़ो, छुटकारा है। जिसने पढ़ा होता है, उसके पढ़ने में यह ताक़त होती है। इतने से में मुक्त हो जाता है। जानने वालों ने कभी नहीं कहा है कि विशाल होना चाहिए तुम्हारे अध्ययन का क्षेत्र। उन्होंने तो कह दिया कभी कि ढाई आखर काफ़ी है। कभी कह दिया, बस राम काफ़ी है। कभी कह दिया, बस अलिफ़ काफ़ी है। यह असर होता है, यह परिणाम होता है वास्तविक अध्ययन का।
“समुंद समाना बूँद में, अब कत हेरत जाई।” एक बूँद भी अगर तुमने ठीक से पढ़ी होती, तो उसमें समुद्र को पा जाते। और तुम कह रहे हो, "मैं पूरा समुद्र पढ़ लिया, फिर भी बूँद को समझ नहीं पाया।" निश्चित रूप से शब्दों में तैर रहे थे, गहरे गोता मारा नहीं। समुद्र पूरा यूँ ही दूर-दूर से देख लिया, या चुल्लू में पानी भरकर उछाल दिया, जैसा समुद्र किनारे बच्चे करते हैं। और वो कह रहे हैं कि "मैं तो पूरे समुद्र को जानता हूँ।"
जानने वाला ऐसा होता है कि उसे पूरे समुद्र की ज़रूरत भी नहीं पड़ती, एक बूँद काफ़ी होती है। “समुंद समाना बूँद में।” एक बूँद काफ़ी होती है। एक सूत्र, एक श्लोक, एक पन्ना, एक पुस्तक, उतने में काम हो जाता है अगर वास्तव में पढ़ा हो। कई बार तो एक नज़र, अगर नज़र मिलाने को तैयार हो तो।
बिल्कुल शुरुआत से शुरुआत करो, कुछ नहीं जानते हम। कुछ नहीं पढ़ा। अब हम जानना चाहते हैं, बात क्या है। और पचास जगह मत भटको, यह संस्था, वो संस्था इत्यादि।
दस जगह गड्ढा खोदने से पानी नहीं आ जाता, एक जगह पकड़ लो और वहाँ गहरी खुदाई करते जाओ। पानी मिलेगा।
जो लोग दस दरवाज़ों पर खटखटा रहे होते हैं न, उन बेचारों की त्रासदी यही होती है। वो ऐसे होते हैं, जैसे कि कोई दस जगह गड्ढा खोदे। दस जगह गड्ढा खोदे, दस-दस मीटर। और कोई एक ही जगह सौ मीटर खोद डाले। श्रम और समय तो दोनों का बराबर का ही लग गया न? बस, एक प्यासा मरेगा और दूसरे को कुआँ भर मिलेगा। और दूसरे को तो हो सकता है सौ मीटर खोदना भी न पड़े। कौन-सा कुआँ सौ मीटर गहरा होता है। पर यह पक्का है कि दस मीटर में तो पानी नहीं पाओगे।
बात आ रही है समझ में?
यह ग्रंथों का अपमान है कि उनको एक बार पढ़कर किनारे रख दो। यह बड़ी अहंकारपूर्ण उक्ति है कि "मैंने पढ़ लिया। मैंने कृष्णमूर्ति को पढ़ लिया, मैंने गीता पढ़ ली, कि मैंने बाइबिल पढ़ ली, क़ुरान पढ़ ली।" जो भी आपका चुनिंदा ग्रंथ है, यह कभी ख़त्म नहीं होते। इनमें लगातार जाते रहना होता है। वो ग्रंथ, मैंने कहा न, उसी दिन ख़त्म होते हैं जब उनके साथ आप ख़त्म हो जाते हैं।
पर हम अपने-आप को बड़ा शक्तिशाली, ज्ञानी और प्रतिभाशाली मानते हैं। हम कहते हैं कि बस के पन्ने पलट लिए कॉमेंट्रीज़ ऑन लिविंग, तो हम तो जान गए कृष्णमूर्ति किस स्रोत से बात करते थे।
भारत में इसीलिए परंपरा रही है, पाठ की, जप की, मंत्र की। एक चीज़ ले लो और उसको दोहराते जाओ। दोहराते जाओ। दोहराते जाओ। दोहराते जाओ, तुम बदलते जाओगे। तुम बदलते जाओगे, तो जो मंत्र है, उसके नए-नए अर्थ तुम्हारे सामने खुलते जाएँगे। आर्ष वचन कभी चुक नहीं जाते, उनमें अनंत क्षमता होती है। वो देते ही रहेंगे तुमको, देते ही रहेंगे, देते ही रहेंगे। तुम उन्हें लाँघकर कभी आगे नहीं बढ़ सकते।
इसीलिए उनकी संगति करी जाती है, उनको सीढ़ी की तरह इस्तेमाल नहीं किया जाता। उनके साथ तो रह सकते हो, उनका अतिक्रमण नहीं कर सकते। आगे नहीं चले जाओगे उनसे। अगर वह वाक़ई सत्य-वचन हैं तो। बाक़ी किस्से-कहानियाँ और इधर-उधर की बातें मैं उनकी बात नहीं कर रहा, उनको तो, चाहो तो आधे घंटे में निपटा दो।