प्रश्नकर्ता: प्र: तो आचार्य जी, अंजन, अंजनों के घर्षन से निरंजन निकल रहा है, ऐसा कुछ हो रहा है?
आचार्य प्रशांत: निरंजन क्या है कि जो निकलेगा?
प्र: या फिर मतलब उसमें...
आचार्य प्रशांत: निरंजन कुछ है कि जो निकलेगा?
प्र: यहाँ पर आप इतनी देर से एक्सप्लेन (समझा) कर रहे थे कि राम निरंजन है और अंजन से वह बाहर है और ऊपर है। मगर हम तो अंजन में ही हैं सब।
आचार्य प्रशांत: अंजन को अंजन जानना होता है। इसका अर्थ ये थोड़ी है कि अंजन से बाहर कुछ है। हमने क्या ये कहा निरंजन को जानना है? जानने के लिए भी क्या उपलब्ध है, सिर्फ़ और सिर्फ़?
प्र: अंजन।
आचार्य प्रशांत: हाँ, तो अंजन को जानना ही निरंजन है। बोधोहं, दैट रियलाइज़ेशन इज़ दैट




