जिसके होने से दिन है, ये दिन उसी को समर्पित हो
जिसके होने से शरीर है, ये शरीर उसी को समर्पित हो
जिसके होने से मन है, ये मन उसी को समर्पित हो
जिसके होने से मैं हूँ, सर्वस्व मेरा उसी को समर्पित हो
~ आचार्य प्रशांत
जिसके होने से दिन है, ये दिन उसी को समर्पित हो
जिसके होने से शरीर है, ये शरीर उसी को समर्पित हो
जिसके होने से मन है, ये मन उसी को समर्पित हो
जिसके होने से मैं हूँ, सर्वस्व मेरा उसी को समर्पित हो
~ आचार्य प्रशांत

मन शांत सब के सोने पर मेरा एकांत एक बार फिर वही आदिम नींद पलकों पर आए एक बार फिर वही इच्छा मन पर छाए कि सोऊँ ऐसे कि फिर जागूँ न जगाए
पर मेरा नीरव चैन जागृति की भेंट चढ़ जाना है तुमने सदा सूरज और सुबह को सत्य…

पर आज सुबह से व्यस्त रहा रेतीले मसले ये गिनती वो घाटा
साँझ अब जब तट पर आया समुद्र लहराता बोला मुस्कुराता
रेत के कणों में मन फँस जाता रेत गिनते सूरज ढ़ल जाता
रेत का कण विशाल…
आचार्य प्रशांत: जो बातें मैं कह रहा हूँ अगर उनमें कुछ दम, कुछ फ़ौलाद समझ में आता है तो उसको अपनी ज़िंदगी में उतार लें, मेरा उद्देश्य पूरा हो जाएगा। और अगर वो फ़ौलाद आप ज़िंदगी में नहीं उतार रहे हो और बस “गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णु” कर रहे हो, तो करते…