
आचार्य प्रशांत: समझ में नहीं आ रहा क्या कि जब भगत सिंह कहते थे कि वो नास्तिक हैं तो वो वास्तव में परंपरागत धर्म, सड़े-गले धर्म, संस्थागत धर्म को नकार रहे थे। नहीं तो एक ऊँचे आदर्श के लिए शरीर की आहुति दे देने से बड़ा धार्मिक काम क्या होगा?…

आचार्य प्रशांत: अगर हमारे बीच वास्तव में कोई रिश्ता है तो मैं बर्दाश्त नहीं कर पाऊँगा कि आप वैसे ही कोई ज़िन्दगी जी रहे हो जैसे कोई आम आदमी जीता है। मुझे अपनेआप पर और अपनी बात पर घिन आएगी। आप अगर कहते हो आप दो साल से मेरे साथ

मैं वनडे(एक दिवसिय) देखता नहीं, टी-२० देखता नहीं, मैं सिर्फ़ टेस्ट मैच देखता हूँ; वह भी तब जब भारत जाता है – वो ही जो सेना कंट्रीज़

युवा होने का अर्थ होता है कि सुडौल शरीर हो, चौंड़ी छाती, मज़बूत कंधे और विराट ह्रदय। दुनिया की समझ, दुनिया की सारी क्रांतियाँ जवान लोगों ने करी हैं। और ‘क्रांति’ से मेरा मतलब पत्थरबाजी और हुल्लड़ नहीं है। क्रांति बहुत समझदार लोगों का काम होती है, क्रांति का मतलब

आचार्य प्रशांत: सिर्फ़ इसलिए कि तुम्हें शरीर मिला है इंसान का तो तुम इंसान नहीं हो गए।

आचार्य प्रशांत: हिंदुस्तान में जानते हो न दस-लाख लोग आवेदन भरते हैं और चयन होता है दो-सौ का। ऐसे ही चलता है न? कितना प्रतिशत हुआ ये? प्रश्नकर्ता:

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, आपके वीडियो में एक बात सुनी थी, वो बात मन में ठहर गई। अब जो भी हरकत करता हूँ, जो भी गलती करता हूँ, तो उस वीडियो में सुनी उस बात को याद कर लेता हूँ, और उसी के संदर्भ में सीखने का प्रयास करता हूँ।

प्रश्नकर्ता: ऊँचा जीवन कैसे जीएँ? आदर्शों को अपने जीवन में कैसे अपनाएँ?

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मेरा सवाल ब्यूरोक्रेसी (नौकरशाही) से है। हमारे ऊपर जो अधिकारी हैं, क्या उन्हें जागरूक नहीं होना चाहिए? हम लोग भी सोचते हैं कि अगर हमारा बॉस थोड़ा जागरूक होता, तो वो और अच्छे निर्णय ले सकते था।

प्रश्न: आचार्य जी, हमारे अभिभावक, हमारे बड़े, जो भी सुझाव देते हैं क्या वो हमेशा सही होते हैं?

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, बोध-शिविर से फ़ायदा क्या है?
आचार्य प्रशांत: आदमी, शरीर के ऊपर चढ़ी हुई समाज की परत है। जिसको अपना जन्म कहते हो, वो शरीर के साथ होता है। और फिर समाज उस पर एक परत और चढ़ा देता है। ये दोनों ही परतें तुम्हारा दुःख हैं। ये…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, बुद्ध पुरुषों ने जो बताया है समाज को, वह बहुत सरल है, लेकिन फिर भी इतना झूठ, इतना ड्रामा

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, दुनिया में इतने कम कबीर क्यों हुए हैं? मेरे परिवारजन मुझे इसी बात का उदाहरण देकर आध्यात्मिक मार्ग से विचलित करते हैं और खुद को भी दुनिया की ओर आकर्षित पाता हूँ, कृपया स्पष्ट करें।

प्रश्न: आपकी प्रोफाइल देखी है, आपने आई. आई. टी. दिल्ली से इंजीनियरिंग की है और उसके बाद आई. आई. एम्. अहमदाबाद । तो उसके हिसाब से आप अब्रॉड में इस समय बहुत मजे से ऐश कर सकते थे ।

प्रश्न: प्रश्न है, ‘जिसको हम बौद्धिक स्तर(इंटेलिजेंस कोशिएंट, आई.क्यू.) बोलते हैं वो अलग-अलग व्यक्तियों में अलग-अलग होता है, इस बात का क्या अर्थ है?’

बड़े मैच में उतरते ही हाथ बेड़ियों में जकड़े लगते हैं, और हम घबराहट सँभालने की कोई तरकीब खोजते हैं। पर मैदान बदल जाता है, भीतर का केंद्र नहीं बदलता। जो रोज़ की ज़िंदगी में हर काम से मनचाहा नतीजा माँगता है, वह बड़े दिन भी वही माँग लेकर उतरता है। मेडल पक्का होते ही दबाव उतर जाना भी यही बताता है, और जो जीत पर इतराता है, वही हार से घबराता है। ज़िंदगी की ऊँचाई हमेशा मेडल के रूप में सामने नहीं आती। क्या हम देख पाएँगे कि हम नतीजे को कितना पकड़े हुए हैं?





















आपने…
आचार्य प्रशांत: ऐसा आप सोचती हैं अपने बॉस के बारे…
आचार्य प्रशांत जी: मैं बड़ा हूँ तुमसे, हूँ न? मैं जो जवाब दूँगा, तुम्हें कैसे पता वो सही होगा?
यही प्रयोग कर लेते हैं। मैं भी तो बड़ा हूँ, जैसे दूसरे बड़े…
आचार्य प्रशांत: आप बताओ क्यों? कहीं बाहर से थोड़े ही टपक रहा है, रोज़ हम ही करते हैं। आप बताओ क्यों?
आप जिस वजह से करते हो,…
आचार्य प्रशांत: करोड़ों कबीर हो जाते, पर हर कबीर के पास वैसा…
(अट्टहास)
आपको किसी ने क्या प्रेरित किया, जो आज आप…
वक्ता: शायद ये सवाल यहाँ से आ रहा है कि मैंने ‘इंटेलिजेंस’ शब्द का प्रयोग किया था| मैंने कहा था कि मूलतः तुम ‘इंटेलीजेंट’ हो, तो…
कोई खिलाड़ी देश के लिए मेडल जीतकर लौटती है, और बधाई के साथ ही सवाल आता है कि खुशखबरी कब दोगी। उम्र का पैमाना और परिवार की अपेक्षा मिलकर उसकी पूरी मेहनत को एक देह की भूमिका तक सीमित कर देते हैं। पर सफलता केवल वह नहीं जिसे दूसरे गिन सकें। जब हम स्वयं को देह भर मान लेते हैं, तो हमारे विचार, लहजा और अपनी छवि तक उसी में बँध जाते हैं। इंसान बनकर जीना और किसी के हाथों न बिकना अपने आप में बड़ी और बिरली सफलता है। हमारे लिए असली खुशखबरी क्या है?
35 की उम्र आते ही खिलाड़ी महिला से कहा जाने लगता है कि अब खेल छोड़ो, बच्चों को मौका दो। हम मान लेते हैं कि यह उम्र और शरीर की मजबूरी है। पर ध्यान से देखें तो शरीर का तर्क टिकता ही नहीं। असल दबाव उस सिखाई गई मान्यता का है जो महिला को उसके शरीर और उससे जुड़ी भूमिकाओं से ही तौलती है, और जिसे हम अपनी ही सोच मान बैठे हैं। जो आवाज़ें हमें बताती हैं कि हमारी ज़िंदगी का क्या करना है, क्या हम ईमानदारी से देख पाएँगे कि वे आवाज़ें किसकी हैं?
प्रेम की गहराई हमेशा प्रेमी की अपनी चेतना जितनी होती है — जो जैसा है, उसका प्रेम भी वैसा ही होगा, चाहे उसे कितना भी पावन या अनोखा क्यों न मान लिया जाए। जिस चेतना ने खुद को कभी गहराई से नहीं जाना, वह प्रेम में भी सतह से आगे नहीं जा सकती। जो कोई अपने प्रेम को गहराई से परखने से बचता है, वह असल में खुद को परखने से बच रहा होता है — और यही बचाव, प्रेम के नाम पर पाला गया एक और भ्रम है।
“फॉलो योर पैशन” तभी सार्थक है, जब वह सचमुच आपका अपना हो। अक्सर जिसे हम अपनी पसंद, पैशन या इच्छा मानते हैं, वह समाज, परिवार, संस्कार और परिस्थितियों से भीतर बैठा हुआ प्रभाव होता है। वास्तविक स्वतंत्रता न बाहरी दबाव में जीने में है, न भीतर की कंडीशनिंग का गुलाम बनने में। आत्मनिरीक्षण से सही कर्म की स्पष्टता आती है और बिना बिके, बिना डरे एक गरिमापूर्ण जीवन जिया जा सकता है।
स्वतंत्रता दिवस को केवल उत्सव नहीं, बल्कि आत्मावलोकन और सतर्कता दिवस की तरह देखने की आवश्यकता है। भारत की परतंत्रता के पीछे रहे आंतरिक कारणों को समझना ज़रूरी है, क्योंकि राजनीतिक स्वतंत्रता के बावजूद लोकधर्म, अंधविश्वास, जातिगत विभाजन, ज्ञान-विज्ञान की उपेक्षा, परंपरागत जड़ता और आत्मबल की कमी आज भी मौजूद हैं। वास्तविक देशभक्ति इन बंधनों को पहचानकर ज्ञान, आत्मनिर्भरता, वैज्ञानिक दृष्टि और जागरूक नागरिकता विकसित करने में है।
लोकतंत्र, गणतंत्र और स्वतंत्रता केवल संविधान में लिखे शब्द नहीं, बल्कि जागरूक नागरिक की चेतना पर निर्भर हैं। वास्तविक स्वतंत्रता मनमानी करने की छूट नहीं, बल्कि भीतर घुसे भय, लालच, अंधविश्वास, पूर्वाग्रह और बाहरी प्रभावों से मुक्ति है। जब नागरिक अपने ही विचारों और मान्यताओं की जाँच नहीं करता, तो लोकतंत्र भीड़तंत्र और संप्रभुता खोखली बन सकती है।
प्रेम का मार्ग सुरक्षा नहीं, बल्कि घायल होने का साहस माँगता है। जो चोट, हार, पीड़ा और ठगे जाने से डरता है, वह सत्य और प्रेम तक नहीं पहुँच सकता। अहंकार हर कीमत पर जीत चाहता है, जबकि प्रेम हारना, झुकना और दर्द को स्वीकारना सिखाता है। जो छोटी-छोटी हारों का अभ्यास करता है, वही अंततः अहंकार हारकर हरि को पा सकता है। सच्ची शक्ति दूसरों को हराने में नहीं, बल्कि प्रेम के लिए स्वयं घायल होने में है।
डर और जड़ता से बाहर निकलने का रास्ता किसी बड़े बदलाव से नहीं, बल्कि एक छोटे-से सही कदम से शुरू होता है। अपनी समस्याओं का बार-बार विश्लेषण और वर्णन करने के बजाय उनसे दूर जाने का निर्णय आवश्यक है। सत्य के प्रति प्रेम जागने पर भय अपने-आप पीछे छूट जाता है और साहस जुटाना नहीं पड़ता। सही संगति, अनुकूल वातावरण और आत्मिक विकास के अवसरों को अपनाने से परिवर्तन सहज होने लगता है। अपनी कमजोरियों से मोह रखने के बजाय उनके प्रति वैराग्य विकसित करना ज़रूरी है। शिकायत, बहाने और आत्म-दया में उलझे रहने से कुछ नहीं बदलता; निर्णायक कर्म, सत्य के प्रति प्रेम और वर्तमान स्थिति के विरुद्ध विद्रोह ही ऊँचे जीवन की वास्तविक शुरुआत हैं.
प्रेम कोई सामाजिक स्वीकृति, विवाह या रोमांटिक आकर्षण नहीं, बल्कि अहंकार के मिटने की प्रक्रिया है। सच्चा प्रेम अनुमति नहीं मांगता और न ही हार्मोन या परंपरा से पैदा होता है; वह सत्य और मुक्ति की ओर भीतर की यात्रा है। इसी तरह अहंकार सफलता पाने के लिए खुद को नहीं मिटा सकता — क्योंकि जब तक "मैं" बना हुआ है, तब तक हर त्याग, चाहे परिवार का हो, मित्रों का हो या स्वास्थ्य का, अहंकार का ही एक रूप रहता है। सही कर्म योजना बनाकर नहीं, बल्कि झूठे प्रभावों और बंधनों से मुक्त होकर स्वतः प्रकट होता है।
डेटिंग ऐप, कुंडली मिलान और “मेरी पसंद” जैसी धारणाएँ अक्सर प्रेम नहीं, बल्कि डर, सामाजिक कंडीशनिंग और अहंकार से संचालित होती हैं। परंपरा के दबाव में किया गया चुनाव और केवल व्यक्तिगत पसंद पर आधारित चुनाव, दोनों ही भ्रमित हो सकते हैं। सच्चा प्रेम तब संभव होता है जब व्यक्ति स्वयं को जाने और ऐसा संबंध चुने जो उसके बंधनों, भय और अहंकार को चुनौती देकर उसे भीतर से मुक्त करे।
रिश्तों में प्रेम को अक्सर जन्म, परिवार या सामाजिक भूमिकाओं से जोड़ दिया जाता है, जबकि अधिकांश संबंध अपेक्षाओं, स्वामित्व और तयशुदा व्यवहारों पर टिके होते हैं। केवल माता-पिता या संतान का रिश्ता होने से प्रेम नहीं जन्मता। प्रेम कोई जैविक घटना नहीं, बल्कि सीखने और समझने की प्रक्रिया है। जहाँ “मेरा” और “मेरे लिए” का आग्रह घटता है, वहीं प्रेम सीमाओं को लाँघकर स्वतंत्रता, करुणा और वास्तविक संबंध का रूप लेता है।
रिश्तों में प्रेम अक्सर मान लिया जाता है, पर अधिकांश संबंध तय भूमिकाओं, अपेक्षाओं और सामाजिक ढाँचों पर चलते हैं। माता-पिता, पति-पत्नी या परिवार के रिश्ते भी कई बार समझ, स्वतंत्रता और संवेदनशीलता से नहीं, बल्कि आदत, अधिकार और “मेरापन” से संचालित होते हैं। सच्चा प्रेम सीमित नहीं होता; वह स्वामित्व नहीं, बल्कि समझ, स्वतंत्रता और विस्तार देता है। प्रेम जन्म से नहीं, जागरूकता से सीखा जाता है।
सच्चा जीवन समाज के दबाव या तथाकथित “पैशन” के पीछे चलने से नहीं, बल्कि भीतर और बाहर दोनों प्रकार की गुलामी से मुक्त होने से शुरू होता है। अक्सर जिसे अपनी पसंद या पैशन समझा जाता है, वह भी सामाजिक संस्कारों का परिणाम होता है। जब व्यक्ति स्वयं को गहराई से समझकर स्वतंत्र निर्णय लेता है, तब उसका कर्म स्वाभाविक, सार्थक और समाजोपयोगी बनता है। भय और सुरक्षा की मानसिकता से ऊपर उठकर भी गरिमापूर्ण, संतुलित और आर्थिक रूप से पर्याप्त जीवन जिया जा सकता है।
मजबूरी एक झूठ है जिसे अहंकार स्वार्थ छुपाने के लिए गढ़ता है। जो दबता है वो किसी सौदे में दब रहा है। माँ-बाप की धमकी, समाज का दबाव - ये सब तभी काम करते हैं जब भीतर डर हो और डर तभी होता है जब कोई चीज़ पानी हो। आज़ादी के लिए आखिरी कीमत भी चुकाने की तैयारी ही असली जीवन है।
थोड़ी जीवन में ठसक होनी चाहिए, एक्सक्लूसिविटी। एक शान, ऐरी-गहरी चीज़ों को भाव नहीं देना, ऐरे-गैरों को मुँह नहीं लगाना। “तू क्यों है ऐरा-गैरा?” मैं तेरा अपमान नहीं कर रहा हूँ। मैं तुझे प्रेरणा दे रहा हूँ। क्योंकि मुझे पता है तू भी वही संभावना रखता है, जो किसी ऊँचे-से-ऊँचे व्यक्ति में है। तू अपनी संभावना क्यों नहीं साकार कर रहा? और जिस दिन तक तू अपनी संभावना साकार नहीं करता, उस दिन तक मैं तुझे स्वीकार नहीं करता।
जिसको तुम कहते हो रोमांटिक लव, इसका बाज़ारवाद से बहुत सीधा ताल्लुक है। अच्छे कपड़े पहन लिए, तोहफ़े दे लिए और मज़े कर लिए, लेकिन कुछ पूरा नहीं पड़ रहा; एक अधूरापन, एक कसक रह जाती है। आपकी बेचैनी वैसी की वैसी है। प्रेम का मतलब है कि जिसके साथ हो, उसकी आँखें खोल दो; वो ख़ुद को जानने लगे, मन को समझने लगे, यही प्रेम है। लेकिन ये करना आसान नहीं होता। ये करने की क़ीमत चुकानी पड़ती है। ये करने के लिए तुम्हें अपना सर्वस्व भी निछावर करना पड़े, तो कर दो। यही है वैलेंटाइन डे।
अंधविश्वास जीवन का ज़हर है। जिसके जीवन में अंधविश्वास आ गया हो, नहीं हो सकता कि वो हिंसक न हो जाए। जिसके जीवन में अंधविश्वास आ गया, उसके जीवन में प्रेम नहीं रह सकता। जिसके जीवन में अंधविश्वास आ गया, उम्मीद भी मत करना कि उसके पास साहस या ताक़त बचेगी। हाँ, क्रोध और प्रतिक्रिया दिखाई दे सकते हैं। अंधी प्रतिक्रिया वो कर सकता है। पर एक शांत, अदम्य साहस, अब उसमें नहीं दिखेगा।
मुझे बड़ा ताज्जुब होता है। एक से एक नमूने, ज़िंदगी में जिनको कुछ नहीं समझ में आता, कुछ नहीं जानते। 14 साल के होंगे, 16 साल के होंगे, तभी से एक लफ्ज़ वो जान जाते हैं, क्या? प्यार। और ऐसे कभी सामने पड़ें, मैं कहूँ कि तुझे गणित नहीं आती, तुझे भूगोल नहीं आता, तुझे यहाँ से लेकर वहाँ तक सीधे चलना नहीं आता, तुझे किसी आदमी से दो बात करना नहीं आता, तुझे अपना गुस्सा संभालना नहीं आता, तुझे कहीं पर समय से पहुँचना नहीं आता, तुझे इंसान बनना नहीं आता, तुझे प्रेम करना कहाँ से आ गया?
तुम जिस भी क्षेत्र में उत्कृष्टता हासिल करने जाते हो और कर लेते हो, उस उत्कृष्टता की दुनिया तुरंत बोली लगानी शुरू कर देती है। इसीलिए तो दुनिया के जितने भी कॉम्पिटेंट लोग हैं, वह शैतान की सेवा में लगे हुए हैं। वह बोली ऊँची लगाता है और ढंग के कामों के लिए कॉम्पिटेंट लोग मिलने बहुत मुश्किल है। सारा खेल ही इसी बात का है कि कर क्या रहे हो? कितनी कुशलता से कर रहे हो, ये पीछे की बात है। आदमी ऐसा चाहिए, अर्जुन जैसा, कॉम्पिटेंट भी हो और कृष्ण के साथ भी है। तब फिर गीता बरसती है। तब आता है मज़ा।
भारत में यह मान्यता रही है कि अध्यात्म बुढ़ापे का काम है। लेकिन जहाँ भी स्वामी विवेकानंद की मूर्ति खड़ी होगी, उस जवान आदमी का तेज गवाही देता होगा कि अध्यात्म बुढ़ापे का नहीं, जवानी का काम है। जवानी अगर, जो सबसे ऊँचा काम हो सकता है, उसको नहीं दी, तो और क्या काम आएगी? उन्होंने युवाओं से कहा, ज़रा चुनौती स्वीकार करना सीखो, प्रतिस्पर्धा करना सीखो। बल ही जीवन है और दुर्बलता ही मृत्यु है। उचित ही है कि युवा दिवस मनाया जाता है उन्हीं के नाम पर।
बहुत लोग होते हैं, जिनको दूसरों को तकलीफ़ देने में खुशी मिलती है। बहुत लोग हैं, जिन्हें जानवरों का गला काट करके खाने में खुशी मिलती है। वो कहेंगे, “मैं तो वही करूँगा, जिसमें खुशी मिलती है।” पहले तो यह सीखना पड़ेगा न कि यह जो मेरा खुशी का सिद्धांत है, यह आया कहाँ से? आज की समस्या है, ब्लाइंड फ़्रीडम; जहाँ आदमी बाहर वाली तो किसी ताक़त का ग़ुलाम नहीं है, पर भीतरी ताक़त का ग़ुलाम हो गया है। और वो भीतरी ताक़त क्या है? अहंकार।

मैंने कहा है कि जिसको छोड़ने में तुम्हें देर लग रही हो, उसको पूरी तरह छूटने का इंतज़ार मत करो। उसको लिए-लिए भागो। यह थोड़ी कहा है कि उसको बाँध कर भागो। आप मान लीजिए, शरीर पर बहुत सारा फैट ढोए हुए हैं, उसको लिए-लिए ही तो भागोगे। लेकिन भागने की प्रक्रिया में क्या होगा? वो गलेगा। मैं तब तक इंतज़ार करूँगी जब तक सब ठीक… नहीं, नहीं, नहीं। जो भी तुम्हारी बुरी हालत है, जैसी भी है, अभी दुर्बल हालत है, शुरू अभी करो। कम ऐज़ यू आर एंड रन ऐज़ यू आर।

तुम और क्या करोगे, भीतर परेशान हो तो दूसरों को परेशान करोगे। ‘आई लव यू’ भी बोलते हो, तो तुम्हारी आँखों में आशा रहती है। और फिर जब वो उम्मीद पूरी नहीं करेगा, तो कहोगे: ‘हर्ट।’ जो भी बात है, उसको थोड़ा खुला रखना सीखिए। देना सीखो और लो भी तो उसी से, जो बिना उम्मीद के दे रहा हो तुमको।

जो कुछ भी तुम्हारे भीतर है न, जब तक उसके प्रति, उसके विरुद्ध सक्रिय ऊर्जा नहीं उठेगी, तब तक कोई परिवर्तन नहीं आता। बहुत सोच-समझ के कहा है — नफ़रत, घृणा होनी चाहिए। जो घृणा की ऊर्जा होगी न वही ऊर्जा काम आएगी। जो संतुष्ट हैं, उनकी ज़िन्दगी में कोई बदलाव नहीं आता।

भारत के सारे जवान लोगों का अब यही नारा है: कुछ और न आता हो हमको, हमें प्यार निभाना आता है। प्रेम हल्की बात नहीं होती है, भाई! एक तरीके से प्रेमी बनने का अर्थ होता है चिकित्सक बनना; जिससे प्रेम करते हो, तुम्हारे ऊपर उसके सुधार और स्वास्थ्य की ज़िम्मेदारी आ जाती है। प्यार ऐसी चीज़ है, जिससे बच भी नहीं सकते, लेकिन बिना पात्रता के किया, तो फिर तुम्हें कोई बचा भी नहीं सकता। करना तो पड़ेगा ही, लेकिन बिना समझ-बूझ कर करा, तो फिर वो प्यार नहीं है, वो अत्याचार है।

प्रेम ऐसी चीज़ है जो बोध के पहले भी चाहिए और बोध के बाद भी आती है। बोध से पहले कौन-सा प्रेम चाहिए? मैं जो उच्चतम और सुंदरतम हो सकता हूँ, वो मुझे होना है; ये है आंतरिक प्रेम, परम प्रेम। परम प्रेम कहता है, बोध होना चाहिए और जब बोध होता है, तो फिर उसके होने से आप जान जाते हो कि दुनिया में आपके प्यार के लायक कौन-सा विषय है। तो सबसे पहले परम प्रेम, फिर बोध और फिर साधारण सांसारिक प्रेम।

श्रीमद् भगवत गीता प्रथम अध्याय अर्जुन विषाद योग
धृतराष्ट्र उवाच | धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः | मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत सञ्जय || 1.1 ||
धृतराष्ट्र ने कहा, “हे संजय! धर्मक्षेत्र, कुरुक्षेत्र में युद्ध करने के लिए एकत्रित हुए मेरे पुत्रों और पांडवों ने क्या किया?”
आचार्य प्रशांत: जिज्ञासा से आरंभ हो…

साल भर जो निरंजन में जिया है, उसके लिए कल राम निरंजन; और साल भर जिसने मनोरंजन ही पाला है, उसके लिए फिर पर्व भी मनोरंजन। अंजन माने क्या होता है? कालिमा। तो राम निरंजन न्यारा रे, अंजन सकल पसारा रे। समझ रहे हो? अब आपको तय करना है कि सकल पसारा माने चहुदिश जो ये व्याप्त है, आपको इसका होना है या इससे न्यारा होना है। न्यारा माने अलग, अस्पर्शित।

हम अपने आप को बहाना दिए रहते हैं कि अगर मेरे जीवन में प्रेम नहीं है, तो इसलिए नहीं है क्योंकि कठिन है। संगति ऐसों की करिए, जिनकी ज़िंदगी में प्रेम हो, वो आपसे आपके बहाने छीन लेंगे। संगति इसीलिए बहुत बड़ी चीज़ होती है। सौ लोग मिलकर जो सिद्ध कर रहे हैं कि प्रेम असंभव है, इन सौ लोगों की बात को एक दूसरा उदाहरण, एक विपरीत उदाहरण काट सकता है, उसकी खोज करनी चाहिए। और ये सौ उस एक से बहुत घबराएँगे, क्योंकि एक करोड़ लोगों के झूठ को एक आदमी का सच काट सकता है।

कोई पूछे सुबह-सुबह, “कहाँ जा रहे हो?” बोलो, “मोहब्बत करने।” मैं जी रहा हूँ, और यूँ ही नहीं जी रहा हूँ, मेरी हर धड़कन में आशिक़ी है। ये ज़िंदगी के प्रति प्रेम है — ऐसा प्यार जो परिणाम माँगता ही नहीं। किसके लिए है बात ये सारी? जो कर रहे हैं, उसके लिए है। ये प्रेम यज्ञ की ज्वाला है — काम और आग, जिसमें वो आग हो, वो है योगी। आग का धर्म है हमारा; उपनिषद् कहते हैं, “तुम अमृत की औलाद हो।” मैं और साफ़ करके तुमसे कह रहा हूँ — तुम आग की औलाद हो और आग की औलाद नहीं हो, तो अपने आप को सनातनी मत बोलना।

हम अपने आराध्यों की कथा, चरित्र, मूर्ति, छवि अपने ही हिसाब से बना देते हैं। हम अपनी सहूलियत, मान्यता और स्वार्थ के अनुसार कालातीत को भी बदल डालते हैं। यह समस्या राम के निर्गुण–निराकार रूप के साथ बिल्कुल नहीं है क्योंकि जो निर्गुण और निराकार है, उसकी कोई मूर्ति ही नहीं, कोई छवि ही नहीं; तुम उसको कैसे ख़राब कर लोगे? इसलिए ज्ञानियों ने कहा कि उनको तो ब्रह्मस्वरूप ही मानना — “राम ब्रह्म परमारथ रूपा, अबिगत अलख अनादि अनूपा।” मात्र वही राम हैं जो कालातीत हैं।

जहाँ प्रेम है, वहाँ मोह हो नहीं सकता, और जहाँ मोह है, वहाँ प्रेम की कोई जगह नहीं है। मोह में सुविधा है, सम्मान है। प्रेम तो सब तोड़-ताड़ देता है—पुराने ढर्रें, पुरानी दीवारें, सुविधाएँ, आपका आतंरिक ढाँचा, और जो सामाजिक सम्मान मिलता है। प्रेम सब तोड़ देता है। प्रेम इतनी ऊँची चीज़ है कि आप उसमें पुरानी व्यवस्था का विरोध नहीं करते, पुरानी व्यवस्था को भूल जाते हो। प्रेम और मोह दो अलग-अलग दुनियाओं के हैं।

संतों ने गाया है कि इश्क़ और मौत साथ-साथ नहीं चले, तो इश्क़ कैसा? हमारा जीवन अप्रेम का है। जो अपने ही प्रति सहानुभूति नहीं रखता, वो अपने आप को जैसा है, वैसा बचाए रखेगा और प्रेम जब आ गया तो अहम् मिटेगा। प्रेम जो तुम्हें तुम्हारे जैसा छोड़ दे, वो प्रेम तो है ही नहीं।

क़ुर्बानी का अर्थ यह नहीं होता कि कोई बहुत कीमती चीज़ छोड़ दी। क़ुर्बानी का अर्थ होता है कि कुछ ऐसा छोड़ा जो कीमती लगता था, पर कीमती नहीं था। क़ुर्बानी की पूरी बात यह है — “एक ही है जिससे मोहब्बत की जा सकती है, तुम्हें ख़ुदा के अलावा कोई चीज़ प्यारी हो कैसे गई? इसलिए तुम्हें जो कुछ भी प्यारा हो गया, उसकी क़ुर्बानी दो क्योंकि वो नकली है।” वास्तव में प्रेम सिर्फ़ एक से हो सकता है, बाकियों से सिर्फ़ मोह और आसक्ति होती है।