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विघ्नहर्ता के सामने खड़ा विघ्न: गणपति की कथाओं के संकेत
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विघ्नहर्ता के सामने खड़ा विघ्न: गणपति की कथाओं के संकेत
24min
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बाल गणेश अहंकार का प्रतीक है, जो प्रकृति (पार्वती) से जन्मा पर अभी सत्य (शिव) से अस्पर्शित है—इसलिए द्वार पर सत्य को रोकता है। सिर काटना और नया सिर लगाना अहंकार के क्षीण होने और उसे नया केंद्र यानी बोध मिलने का संकेत है। मूषक कामना का प्रतीक है, जो क्षैतिज अक्ष पर भागती इंद्रियों को दर्शाता है। शिव की परिक्रमा सूक्ष्म दृष्टि और ऊर्ध्व अक्ष पर होने वाली गति को इंगित करती है—स्थूल दौड़ यानी क्षैतिज गति कभी ऊँचाई नहीं देती। मूर्ति-विसर्जन नाम-रूप के त्याग और निर्गुण की ओर संकेत का प्रतीक है। विघ्नहर्ता नाम एक भ्रम को उजागर करता है: असली विघ्न अहंकार स्वयं है; उसका विगलन केवल स्वयं की नीयत यानी सक्रिय चुनाव से संभव है—कोई बाहरी सत्ता उसकी संप्रभुता नहीं छीन सकती।

एक अरबपति का मास्टरप्लान: सूरज को रोको, कार्बन उगलते रहो?
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एक अरबपति का मास्टरप्लान: सूरज को रोको, कार्बन उगलते रहो?
29min
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एक अरबपति ने चाँद से खरबों छोटे उपग्रह लॉन्च कर उन्हें सूरज और पृथ्वी के बीच तैनात करने और इस तरह सूरज की रोशनी का एक हिस्सा रोककर ग्लोबल वॉर्मिंग सुलझाने का प्रस्ताव रखा, ठीक उसी हफ्ते जब नेपाल में जलवायु-जनित त्रासदी ने हज़ारों लोगों की जान ले ली। संकट तकनीक की कमी से नहीं, उस भोग-वृत्ति से पैदा हुआ है जो अधिक उपभोग, अधिक उत्पादन और अधिक उत्सर्जन छोड़ना नहीं चाहती। जब जीवनशैली पर सवाल उठाना कठिन लगता है, तब मनुष्य समाधान भी ऐसा खोजता है जो उसे बदले बिना दुनिया को बदल दे।

जैसे तुम, वैसा तुम्हारा प्रेम
Love
जैसे तुम, वैसा तुम्हारा प्रेम
10min
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प्रेम की गहराई हमेशा प्रेमी की अपनी चेतना जितनी होती है — जो जैसा है, उसका प्रेम भी वैसा ही होगा, चाहे उसे कितना भी पावन या अनोखा क्यों न मान लिया जाए। जिस चेतना ने खुद को कभी गहराई से नहीं जाना, वह प्रेम में भी सतह से आगे नहीं जा सकती। जो कोई अपने प्रेम को गहराई से परखने से बचता है, वह असल में खुद को परखने से बच रहा होता है — और यही बचाव, प्रेम के नाम पर पाला गया एक और भ्रम है।

Excerpts from Articles
Excerpts From Articles
सपने, सरकारी नौकरी और पेंशन: जवानी किसके लिए है?
सपनों और सामाजिक प्रतिष्ठा के पीछे भागते हुए युवा अक्सर अपनी वास्तविक क्षमता, रुचि और वर्तमान चुनौतियों को देखना भूल जाते हैं। आईआईटी, यूपीएससी, सरकारी नौकरी और पेंशन को जीवन का लक्ष्य मान लेने के बजाय ज़रूरी है आत्मज्ञान—ख़ुद को ईमानदारी से परखना। जवानी भविष्य की सुरक्षा की चिंता में नहीं, आज की वास्तविक चुनौतियों से जूझने और सार्थक कर्म में लगनी चाहिए।
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जो खुद आज़ाद नहीं, वह लोकतंत्र को मजबूत कैसे करेगा?
लोकतंत्र, गणतंत्र और स्वतंत्रता केवल संविधान में लिखे शब्द नहीं, बल्कि जागरूक नागरिक की चेतना पर निर्भर हैं। वास्तविक स्वतंत्रता मनमानी करने की छूट नहीं, बल्कि भीतर घुसे भय, लालच, अंधविश्वास, पूर्वाग्रह और बाहरी प्रभावों से मुक्ति है। जब नागरिक अपने ही विचारों और मान्यताओं की जाँच नहीं करता, तो लोकतंत्र भीड़तंत्र और संप्रभुता खोखली बन सकती है।
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बाबा नहीं, यार आया है - मंतर नहीं, मिरर लाया है
सच्चा गुरु या मित्र पूजा का विषय नहीं, बल्कि दर्पण होता है, जो बिना स्वार्थ हमारी वास्तविक स्थिति दिखाता है। आध्यात्मिक मार्ग पर अंधभक्ति नहीं, बल्कि प्रेम, कृतज्ञता और व्यक्तिगत ज़िम्मेदारी आवश्यक है। मुक्ति किसी गुरु के भरोसे नहीं मिलती; स्वयं को बदलने का साहस स्वयं जुटाना पड़ता है। गुरु का कार्य केवल सत्य का प्रतिबिंब दिखाना है, चलना साधक को ही होता है।
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रक्षाबंधन: वो रक्षा माँग रही है - ज़रा सुनिए
रक्षाबंधन केवल भाई-बहन के रिश्ते और सुरक्षा की रस्म तक सीमित नहीं होना चाहिए। आज असली रक्षा उन चीज़ों की ज़रूरत है जो कमज़ोर और संकट में हैं—गौरैया, नदियाँ, पहाड़, पेड़, महासागर और पृथ्वी। साथ ही ईमानदारी, आत्मज्ञान और मानवीय मूल्यों की भी रक्षा जरूरी है। धर्म कर्मकांड नहीं, अपनी शक्ति और उससे जुड़ी व्यापक ज़िम्मेदारी को समझना है।
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जवान हो, नाराज़ हो? देश बदलना चाहते हो? तो सुनो ये बात
मन पर बाहरी प्रभाव पड़ना स्वाभाविक है, लेकिन जीवन का संचालन उन प्रभावों से नहीं, अपने विवेक से होना चाहिए। जानकारी बाहर से आती है, पर उसे समझना, परखना और सही निर्णय लेना हमारी आंतरिक क्षमता है। जो व्यक्ति अपने विवेक को जागृत रखता है, वही विचारों का स्वामी बनता है; अन्यथा वह केवल परिस्थितियों और दूसरों की धारणाओं का अनुयायी बनकर रह जाता है।
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फ़ालतू खर्च छोड़िए, अपनी ज़िंदगी पर खर्च करना सीखिए
आचार्य प्रशांत बताते हैं कि क्यों हम सही खान-पान, स्वास्थ्य और अपने ऊपर ज़रूरी खर्च से बचते हैं, लेकिन दिखावे और फ़ालतू सामाजिक परंपराओं पर पैसा बहा देते हैं। अधिकांश लोगों के लिए समस्या सिर्फ़ पैसों की कमी नहीं, बल्कि विवेक और सही प्राथमिकताओं की कमी भी है।
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शादी या लिव-इन: आज़ादी किसमें है?
सच्चा वैराग्य महत्वहीन या हानिकारक चीज़ों को छोड़ना है, और सच्ची महत्वाकांक्षा उस चीज़ के लिए पूरी तरह समर्पित होना है जो वास्तव में मूल्यवान है। दोनों विरोधी नहीं, बल्कि गहरी समझ के दो पहलू हैं। जब विवेक से सत्य और असत्य स्पष्ट दिखने लगते हैं, तो त्याग प्रयास नहीं रहता, स्वाभाविक हो जाता है। आध्यात्मिक यात्रा में यह प्रक्रिया लगातार चलती रहती है।
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आप दुखी नहीं… आपको दुख में मज़ा आता है!
समझदारी याददाश्त से नहीं, समझ से आती है। जीवन हर पल नए प्रश्न पूछता है, इसलिए रटे हुए उत्तर नहीं चलते। जानकारी बाहर से मिल सकती है, पर सही उत्तर तभी जन्म लेते हैं जब मन वर्तमान में पूरी तरह उपस्थित हो। जो समझ में न आए उसे रटने के बजाय प्रश्न करो, जिज्ञासु बने रहो। सीखने का सार स्मृति नहीं, जागरूकता, समझ और वर्तमान क्षण में जीने की क्षमता है।
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प्रूफ नहीं है, तो मानें क्यों?
अंधविश्वास या किसी दावे को केवल किताबों, परंपराओं या बड़ी-बड़ी हस्तियों के कहने से नहीं मानना चाहिए। भौतिक जगत से जुड़े हर दावे के लिए प्रमाण माँगना आवश्यक है। जो बात जाँची-परखी जा सकती है, उसे तर्क, प्रयोग और उपकरणों से जाना जाए; बिना जाने नहीं माना जाए। सच्ची जिज्ञासा वही है जो हर दावे के सामने प्रश्नचिह्न रखे और प्रमाण मिलने पर ही स्वीकार करे।
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अंधविश्वास असल में झूठ को स्वीकृति पाने की चाह है
एक पुजारी जो रोज़ भूत-प्रेत, तंत्र-मंत्र और वशीकरण के नाम पर आए लोगों से मिलता है, आचार्य प्रशांत से पूछता है: जब वो ख़ुद जानता है कि कुछ भूत-चुड़ैल नहीं होता, तो लोग बार-बार इसी झूठ की शरण में क्यों जाते हैं? जवाब अंधविश्वास से कहीं गहरा निकलता है — यह हमारे भीतर के उस झूठ की कहानी है, जिसे हम हर कीमत पर बचाना चाहते हैं।
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जन्माष्टमी: मूर्ति, कहानी और गीता
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जन्माष्टमी: मूर्ति, कहानी और गीता
17min
3kreads
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जन्माष्टमी केवल बाल-कृष्ण की पूजा, मिठाई और उत्सव का दिन नहीं, बल्कि अपने भीतर के अहंकार, मोह, भय और अज्ञान से युद्ध करने का अवसर है। मूर्ति, गुरु और गीता साधन हैं, मंज़िल नहीं—वे हमें अपनी क्षुद्रता दिखाकर सत्य की ओर ले जाने वाले दर्पण हैं। कृष्ण का वास्तविक जन्म तब होता है, जब मन झूठ और आसक्ति से मुक्त होकर सत्य, आत्मबोध और अपनी उच्चतम संभावना की ओर जागता है।

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नेपाल त्रासदी: सच छुपाने की कोशिश क्यों?
36min
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नेपाल त्रासदी: सच छुपाने की कोशिश क्यों?

नेपाल की बाढ़ को केवल प्राकृतिक आपदा मानना असली कारण से बचना है। ग्लेशियरों का पिघलना, ग्लेशियल झीलों का फटना और हिमालय का अस्थिर होना बढ़ती गर्मी और जलवायु संकट से जुड़ा है। इसके पीछे हमारी अंधी उपभोग-वासना, विकास की गलत समझ और प्रकृति के शोषण की प्रवृत्ति है। हिमालय की तबाही भारत के जल, खेती और भविष्य से भी जुड़ी है। समाधान केवल तकनीक और नीतियों में नहीं, बल्कि आत्मज्ञान, संयम और अपनी कामनाओं को समझने में है।

नेपाल त्रासदी: सच छुपाने की कोशिश क्यों?
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नेपाल त्रासदी: सच छुपाने की कोशिश क्यों?
36min
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नेपाल की बाढ़ को केवल प्राकृतिक आपदा मानना असली कारण से बचना है। ग्लेशियरों का पिघलना, ग्लेशियल झीलों का फटना और हिमालय का अस्थिर होना बढ़ती गर्मी और जलवायु संकट से जुड़ा है। इसके पीछे हमारी अंधी उपभोग-वासना, विकास की गलत समझ और प्रकृति के शोषण की प्रवृत्ति है। हिमालय की तबाही भारत के जल, खेती और भविष्य से भी जुड़ी है। समाधान केवल तकनीक और नीतियों में नहीं, बल्कि आत्मज्ञान, संयम और अपनी कामनाओं को समझने में है।

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जेन जीः एक 'वाइब' क्रांति नहीं होती कोई
35min
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जेन जीः एक 'वाइब' क्रांति नहीं होती कोई

‘जेन ज़ी’ को विद्रोही और क्रांतिकारी मान लेना एक भ्रम है। बाहरी विरोध के साथ यही युवा ज्योतिष, अंधविश्वास, जाति, पारिवारिक दबाव, दिखावे, कर्ज़ और सोशल मीडिया की कंडीशनिंग में फँसा है। असली क्रांति किसी सिस्टम या व्यक्ति के खिलाफ नहीं, बल्कि अपने भीतर के अहंकार, डर, अंधविश्वास और कंडीशनिंग के खिलाफ है। बदलाव पीढ़ी बदलने से नहीं, चेतना का केंद्र बदलने से आएगा।

जेन जीः एक 'वाइब' क्रांति नहीं होती कोई
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जेन जीः एक 'वाइब' क्रांति नहीं होती कोई
35min
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‘जेन ज़ी’ को विद्रोही और क्रांतिकारी मान लेना एक भ्रम है। बाहरी विरोध के साथ यही युवा ज्योतिष, अंधविश्वास, जाति, पारिवारिक दबाव, दिखावे, कर्ज़ और सोशल मीडिया की कंडीशनिंग में फँसा है। असली क्रांति किसी सिस्टम या व्यक्ति के खिलाफ नहीं, बल्कि अपने भीतर के अहंकार, डर, अंधविश्वास और कंडीशनिंग के खिलाफ है। बदलाव पीढ़ी बदलने से नहीं, चेतना का केंद्र बदलने से आएगा।

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फ़ालतू खर्च छोड़िए, अपनी ज़िंदगी पर खर्च करना सीखिए
Values
फ़ालतू खर्च छोड़िए, अपनी ज़िंदगी पर खर्च करना सीखिए
48min
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आचार्य प्रशांत बताते हैं कि क्यों हम सही खान-पान, स्वास्थ्य और अपने ऊपर ज़रूरी खर्च से बचते हैं, लेकिन दिखावे और फ़ालतू सामाजिक परंपराओं पर पैसा बहा देते हैं। अधिकांश लोगों के लिए समस्या सिर्फ़ पैसों की कमी नहीं, बल्कि विवेक और सही प्राथमिकताओं की कमी भी है।

Fear
क्या सच में भूत होते हैं?
8min
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क्या सच में भूत होते हैं?

भूतों का डर अक्सर किसी वास्तविक भूत से नहीं, बल्कि हमारी कल्पना, डर और सस्ते रोमांच की चाह से पैदा होता है। भूतिया फ़िल्में और कहानियाँ मन में ऐसी धारणाएँ बना देती हैं कि साधारण चीज़ें भी डरावनी लगने लगती हैं। डर से भागने के बजाय उसके आधार पर प्रश्न करना चाहिए। सस्ते रोमांच के बजाय ज्ञान, इतिहास और सार्थक चुनौतियों में वास्तविक आनंद और उत्साह खोजना अधिक उपयोगी है।

क्या सच में भूत होते हैं?
Fear
क्या सच में भूत होते हैं?
8min
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भूतों का डर अक्सर किसी वास्तविक भूत से नहीं, बल्कि हमारी कल्पना, डर और सस्ते रोमांच की चाह से पैदा होता है। भूतिया फ़िल्में और कहानियाँ मन में ऐसी धारणाएँ बना देती हैं कि साधारण चीज़ें भी डरावनी लगने लगती हैं। डर से भागने के बजाय उसके आधार पर प्रश्न करना चाहिए। सस्ते रोमांच के बजाय ज्ञान, इतिहास और सार्थक चुनौतियों में वास्तविक आनंद और उत्साह खोजना अधिक उपयोगी है।

Money
घटिया फ़िल्में देखने वालों || नीम लड्डू
1min
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घटिया फ़िल्में देखने वालों || नीम लड्डू

एक-से-एक पिक्चरें रिलीज़ होती हैं; दो-सौ, चार-सौ, छः-सौ करोड़ जा रही हैं, वो तुम्हारी जेब से ही तो जा रहा है। वो छः-सौ करोड़ का बिज़नेस कैसे किया पिक्चर ने? पिक्चरें जो इतना पैसा बनाती हैं उनको देखने फोर्ब्स पाँच-सौ वाले तो आते नहीं, या आते हैं? रेस चार, गोलमाल…

घटिया फ़िल्में देखने वालों || नीम लड्डू
Money
घटिया फ़िल्में देखने वालों || नीम लड्डू
1min
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एक-से-एक पिक्चरें रिलीज़ होती हैं; दो-सौ, चार-सौ, छः-सौ करोड़ जा रही हैं, वो तुम्हारी जेब से ही तो जा रहा है। वो छः-सौ करोड़ का बिज़नेस कैसे किया पिक्चर ने? पिक्चरें जो इतना पैसा बनाती हैं उनको देखने फोर्ब्स पाँच-सौ वाले तो आते नहीं, या आते हैं? रेस चार, गोलमाल…

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साल बदल गया, हम कब बदलेंगे?
Bhagavad Gita
साल बदल गया, हम कब बदलेंगे?
42min
4.8kreads
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शुरुआत होगी प्रेम से; प्रेम माने, संवेदनशीलता; संवेदनशीलता माने, दुख। दुख का उदय नहीं, दुख का अनुभव। दुख तो है ही, पर असंवेदन बनकर हम उस दुख से किसी तरह बच लेते हैं। किसी चीज़ का होना और उसका अनुभव होना, दो अलग-अलग बातें हैं। दुख है, पर हम उसके अनुभव से बच जाते हैं। कैसे? सुन्न पड़कर। असंवेदनशील होकर हम दुख के अनुभव से कन्नी काट लेते हैं।

Bhagavad Gita
क्या अध्यात्म में संकल्प लेना वर्जित है?
8min
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41
क्या अध्यात्म में संकल्प लेना वर्जित है?

तुमने जब भी कोई संकल्प उठाया है, अपनी इच्छित वस्तु को पाने का ही तो उठाया है न? और तुम उसी वस्तु की इच्छा करोगे जो तुम्हारे ही जैसी होगी। इन संकल्पों को त्यागने की बात करी जा रही है। ये छोटे संकल्प हैं। संकल्प बनाओ, पर सब संकल्पों के केन्द्र में श्रीकृष्ण को बिठाओ। जो कुछ भी करने से श्रीकृष्ण मिलते हों, वो ज़रूर करो और जो करने से तुम संसार के कारागार में ही कैदी रह जाते हो, वो बिल्कुल मत करना।

क्या अध्यात्म में संकल्प लेना वर्जित है?
Bhagavad Gita
क्या अध्यात्म में संकल्प लेना वर्जित है?
8min
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तुमने जब भी कोई संकल्प उठाया है, अपनी इच्छित वस्तु को पाने का ही तो उठाया है न? और तुम उसी वस्तु की इच्छा करोगे जो तुम्हारे ही जैसी होगी। इन संकल्पों को त्यागने की बात करी जा रही है। ये छोटे संकल्प हैं। संकल्प बनाओ, पर सब संकल्पों के केन्द्र में श्रीकृष्ण को बिठाओ। जो कुछ भी करने से श्रीकृष्ण मिलते हों, वो ज़रूर करो और जो करने से तुम संसार के कारागार में ही कैदी रह जाते हो, वो बिल्कुल मत करना।

Bhagavad Gita
मूल्य चुकाओ, आनन्द पाओ
51min
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मूल्य चुकाओ, आनन्द पाओ

गीता आपको यह बताने के लिए है कि आपकी सब चिन्ताओं के साथ-साथ जो आपकी चिन्ताओं को नष्ट कर सकता है, वो भी आपको उपलब्ध है। आपको चुनाव करना है और मूल्य चुकाने को तैयार रहना है। अर्जुन के एक ओर माँ प्रकृति हैं जो कह रही हैं, ‘मेरे बहाव में बहो,’ और दूसरी ओर श्रीकृष्ण हैं जो कह रहे हैं, ‘मेरी ओर बढ़ो और रास्ते में जो भी आता है, उसे सहो।’ सही काम में जो पीड़ा मिले अगर उसे प्रेम का उपहार मान कर सीने से नहीं लगा सकते, तो उसे दवाई का कड़वा घूँट ही मानकर बस सह लो। सच्चाई के मार्ग पर जो तमाम अनुभवों में अडिग रहता है, वो आनन्द का अधिकारी है।

मूल्य चुकाओ, आनन्द पाओ
Bhagavad Gita
मूल्य चुकाओ, आनन्द पाओ
51min
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गीता आपको यह बताने के लिए है कि आपकी सब चिन्ताओं के साथ-साथ जो आपकी चिन्ताओं को नष्ट कर सकता है, वो भी आपको उपलब्ध है। आपको चुनाव करना है और मूल्य चुकाने को तैयार रहना है। अर्जुन के एक ओर माँ प्रकृति हैं जो कह रही हैं, ‘मेरे बहाव में बहो,’ और दूसरी ओर श्रीकृष्ण हैं जो कह रहे हैं, ‘मेरी ओर बढ़ो और रास्ते में जो भी आता है, उसे सहो।’ सही काम में जो पीड़ा मिले अगर उसे प्रेम का उपहार मान कर सीने से नहीं लगा सकते, तो उसे दवाई का कड़वा घूँट ही मानकर बस सह लो। सच्चाई के मार्ग पर जो तमाम अनुभवों में अडिग रहता है, वो आनन्द का अधिकारी है।

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अहं अगनि हिरदै जरै॥ आचार्य प्रशांत, संत कबीर पर (2014)
Saint Kabir
अहं अगनि हिरदै जरै॥ आचार्य प्रशांत, संत कबीर पर (2014)
9min
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अहं अगनि हिरदै जरै, गुरू सों चाहै मान। तिनका जम न्यौता दिया, हो हमरे मिहमान॥

~ कबीर साहब

वक्ता :गुरु और शिष्य की कहानी है। उनके संबंधों के विषय में है। अहं की आग सीने में धकधक जल रही है। अहं कहता है, “मुझे मान्यता मिले, स्वीकृति मिले, प्रशंसा मिले”।…

Beliefs
अंधविश्वास असल में झूठ को स्वीकृति पाने की चाह है
46min
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अंधविश्वास असल में झूठ को स्वीकृति पाने की चाह है

एक पुजारी जो रोज़ भूत-प्रेत, तंत्र-मंत्र और वशीकरण के नाम पर आए लोगों से मिलता है, आचार्य प्रशांत से पूछता है: जब वो ख़ुद जानता है कि कुछ भूत-चुड़ैल नहीं होता, तो लोग बार-बार इसी झूठ की शरण में क्यों जाते हैं? जवाब अंधविश्वास से कहीं गहरा निकलता है — यह हमारे भीतर के उस झूठ की कहानी है, जिसे हम हर कीमत पर बचाना चाहते हैं।

अंधविश्वास असल में झूठ को स्वीकृति पाने की चाह है
Beliefs
अंधविश्वास असल में झूठ को स्वीकृति पाने की चाह है
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एक पुजारी जो रोज़ भूत-प्रेत, तंत्र-मंत्र और वशीकरण के नाम पर आए लोगों से मिलता है, आचार्य प्रशांत से पूछता है: जब वो ख़ुद जानता है कि कुछ भूत-चुड़ैल नहीं होता, तो लोग बार-बार इसी झूठ की शरण में क्यों जाते हैं? जवाब अंधविश्वास से कहीं गहरा निकलता है — यह हमारे भीतर के उस झूठ की कहानी है, जिसे हम हर कीमत पर बचाना चाहते हैं।

Guru
अध्यात्म, विज्ञान और संविधान: किससे मिलेगी सच्ची स्वतंत्रता?
16min
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अध्यात्म, विज्ञान और संविधान: किससे मिलेगी सच्ची स्वतंत्रता?

आध्यात्मिकता का उद्देश्य व्यक्ति को बाहरी अधिकारों से आगे आंतरिक स्वतंत्रता की ओर ले जाना है। विज्ञान और संविधान अपने-अपने क्षेत्र में महत्वपूर्ण हैं, लेकिन आत्म-भ्रम, गलत चुनाव और अहंकार से मुक्ति का मार्ग आत्मज्ञान से खुलता है। सच्चा गुरु शिष्य को निर्भर नहीं, स्वतंत्र बनाता है। साथ ही, शिष्य का आचरण उसके गुरु और शिक्षा का प्रतिनिधित्व करता है, इसलिए उसे नकल नहीं, समझ और विवेक के साथ जीना चाहिए।

अध्यात्म, विज्ञान और संविधान: किससे मिलेगी सच्ची स्वतंत्रता?
Guru
अध्यात्म, विज्ञान और संविधान: किससे मिलेगी सच्ची स्वतंत्रता?
16min
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आध्यात्मिकता का उद्देश्य व्यक्ति को बाहरी अधिकारों से आगे आंतरिक स्वतंत्रता की ओर ले जाना है। विज्ञान और संविधान अपने-अपने क्षेत्र में महत्वपूर्ण हैं, लेकिन आत्म-भ्रम, गलत चुनाव और अहंकार से मुक्ति का मार्ग आत्मज्ञान से खुलता है। सच्चा गुरु शिष्य को निर्भर नहीं, स्वतंत्र बनाता है। साथ ही, शिष्य का आचरण उसके गुरु और शिक्षा का प्रतिनिधित्व करता है, इसलिए उसे नकल नहीं, समझ और विवेक के साथ जीना चाहिए।

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क्लाइमेट चेंज: क्या कोर्ट, सरकार और मीडिया सच में बदलाव ला सकते हैं?
Climate Change
क्लाइमेट चेंज: क्या कोर्ट, सरकार और मीडिया सच में बदलाव ला सकते हैं?
15min
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जलवायु परिवर्तन जैसी गंभीर समस्या का समाधान केवल अदालतों, सरकारों या अन्य संस्थाओं से उम्मीद करके नहीं हो सकता, क्योंकि ये सभी संस्थाएँ उसी समाज और चेतना से निकलती हैं, जिसने समस्या को जन्म दिया है। वास्तविक परिवर्तन के लिए मनुष्य को बदलना होगा। जब तक अज्ञान, conditioning और उदासीनता बनी रहेगी, संस्थाएँ भी व्यवस्था को ही बनाए रखेंगी। इसलिए तथ्यों को सीधे देखना, मिथकों से ऊपर उठना और जागरूकता विकसित करना ही मूल परिवर्तन का आधार है।

Climate Change
कम बारिश, ज़्यादा गर्मी - इस अकाल का जिम्मेदार कौन?
28min
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कम बारिश, ज़्यादा गर्मी - इस अकाल का जिम्मेदार कौन?

जलवायु परिवर्तन केवल पर्यावरण का नहीं, बल्कि चेतना का संकट है। अंधाधुंध उपभोग, अनियंत्रित विकास, जनसंख्या वृद्धि और भविष्य के भ्रम ने पृथ्वी के सीमित संसाधनों पर असहनीय दबाव डाल दिया है। समाधान डर फैलाने या आदेश देने में नहीं, बल्कि स्पष्टता, जागरूकता और सही समझ में है। जब मनुष्य होश में जीना सीखता है, तभी उपभोग, विकास और जीवन के निर्णय प्रकृति के साथ संतुलित हो पाते हैं।

कम बारिश, ज़्यादा गर्मी - इस अकाल का जिम्मेदार कौन?
Climate Change
कम बारिश, ज़्यादा गर्मी - इस अकाल का जिम्मेदार कौन?
28min
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जलवायु परिवर्तन केवल पर्यावरण का नहीं, बल्कि चेतना का संकट है। अंधाधुंध उपभोग, अनियंत्रित विकास, जनसंख्या वृद्धि और भविष्य के भ्रम ने पृथ्वी के सीमित संसाधनों पर असहनीय दबाव डाल दिया है। समाधान डर फैलाने या आदेश देने में नहीं, बल्कि स्पष्टता, जागरूकता और सही समझ में है। जब मनुष्य होश में जीना सीखता है, तभी उपभोग, विकास और जीवन के निर्णय प्रकृति के साथ संतुलित हो पाते हैं।

Animal Cruelty
जानवर ब्रश नहीं करते… तो तुम क्यों करते हो?
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जानवर ब्रश नहीं करते… तो तुम क्यों करते हो?

जानवर अपनी जैविक प्रवृत्तियों के अनुसार जीते हैं, जबकि मनुष्य के पास विवेक और चुनाव की क्षमता है। इसलिए अपने व्यवहार को सही ठहराने के लिए पशुओं का उदाहरण देना उचित नहीं है। जीवन में महत्वपूर्ण यह है कि हम सचेत होकर निर्णय लें। इसी तरह खेल में सफलता तब मिलती है जब ध्यान खेल पर हो, न कि जीत, प्रशंसा या दूसरों को प्रभावित करने पर। परिणाम की चिंता बढ़ते ही एकाग्रता टूटती है और प्रदर्शन प्रभावित होता है।

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क्या पीरियड्स में महिलाएं सच में कमजोर हो जाती हैं? आचार्य प्रशांत का जवाब
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पीरियड्स से महिलाएं कमजोर नहीं होतीं, फिर भी यह मान्यता सदियों से चली आ रही है। आचार्य प्रशांत बताते हैं कि हर ऐसी मान्यता के पीछे किसी का डर या स्वार्थ छुपा होता है। सिर्फ तर्क या जानकारी से बदलाव नहीं आता, जब तक हम खुद अपने भीतर के इस डर या स्वार्थ को पहचानकर उससे मुक्त होने का चुनाव न करें। असली आज़ादी वहीं से शुरू होती है जहां हम मूर्खता की बातों को पीछे छोड़ना सीखते हैं और सोच-समझकर संगति का चुनाव करते हैं।

Women Empowerment
"प्रेम" की सच्चाई जाँचने के कुछ तरीके
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"प्रेम" की सच्चाई जाँचने के कुछ तरीके

स्त्री-पुरुष के रिश्तों में समस्या केवल आकर्षण या कामना की नहीं, बल्कि उस मानसिकता की है जिसमें दोनों एक-दूसरे को अपनी इच्छाओं का साधन बना लेते हैं। पुरुष स्त्री को शरीर और स्त्री पुरुष को धन, सुरक्षा या सुविधा के माध्यम के रूप में देखने लगती है। इससे निर्भरता, कुंठा और संघर्ष पैदा होते हैं। स्वस्थ संबंध के लिए आत्मज्ञान, स्पष्टता, समानता, स्वतंत्रता और अपनी इच्छाओं की विवेकपूर्ण जाँच ज़रूरी है। साथ ही, रिश्तों के बने-बनाए सामाजिक मॉडलों पर पुनर्विचार करना और किसी भी व्यक्ति को अपनी मुक्ति का साधन न बनाना आवश्यक है।

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Women Empowerment
सहारे की ज़रूरत ही क्यों?
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सहारे की ज़रूरत ही क्यों?

लड़कियों को बचपन से निर्भर बनाना उनकी क्षमता नहीं, उनकी स्वतंत्रता छीनता है। आर्थिक, बौद्धिक और व्यावहारिक आत्मनिर्भरता ही वास्तविक सम्मान और सुरक्षा का आधार है। समाज अक्सर उन्हें रूप, भावनाओं और दूसरों पर आश्रित रहने तक सीमित कर देता है, जबकि उनकी सबसे बड़ी आवश्यकता आज़ादी है। जो भी शिक्षा, कौशल या संघर्ष स्वतंत्रता की ओर ले जाए, उसी पर पूरी ऊर्जा लगानी चाहिए; बाकी सब उसके बाद है।

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रामानुजन का सपना था भारत को वैज्ञानिक रूप से सशक्त बनाना। वे मानते थे कि “गणित हर विज्ञान की आत्मा है।” श्रीनिवास रामानुजन ने अपने संघर्ष और प्रतिभा से दुनिया को चौंका दिया, लेकिन उनके जीवन का संदेश इससे भी बड़ा था — ज्ञान, समर्पण और वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ जीवन को समझना।

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आचार्य नागार्जुन – जीवन वृतांत
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आचार्य नागार्जुन – जीवन वृतांत

आचार्य नागार्जुन की जीवन कथा का आंरभिक विवरण चीनी भाषा में उपलब्ध है, जिसे क़रीब 405 ई. में प्रसिद्ध बौद्ध अनुवादक कुमारजीव ने उपलब्ध कराया। यह अन्य चीनी एवं तिब्बती वृत्तांत से सहमत हैं कि नागार्जुन दक्षिण भारत में एक ब्राह्मण परिवार में जन्मे थे। ऐतिहासिक रूप से बचपन की…

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हेमलेखा - जीवन वृतांत
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हेमलेखा - जीवन वृतांत

हेमलेखा की कहानी बड़ी अनूठी है। श्री दत्तात्रेय द्वारा रचित त्रिपुरा रहस्य में उनकी कहानी पढ़ने को मिलती है। एक तपस्वी ऋषि की पुत्री, विद्वत्ता ऐसी कि ऋषिगण आनंदित हो जाते, सौंदर्य ऐसा कि राजे मोहित हो जाते।सभी को हैरान कर देता हेमलेखा का विवेक। शारीरिक सुंदरता का उसे कोई घमंड नहीं था और राजाओं द्वारा विवाह के बदले सुख-सुविधाओं का लालच दिए जाने पर उसका सिर्फ़ एक उत्तर हुआ करता, जो खुशी सिर्फ़ पलभर की है, उसे आप खुशी कैसे मान लेते हैं?

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भीतर फौलाद तभी आता है जब जीवन फौलाद से टकराता है। जब तक सामने कोई बड़ी समस्या नहीं होगी, तुम्हारे भीतर ताकत बस सोई रहेगी, जगेगी नहीं। समस्या आविष्कृत नहीं करनी है। समस्याएँ तो होती ही हैं, हम उनसे मुँह चुराते हैं क्योंकि पता होता है कि समस्याओं का सामना करने का दम नहीं है। दम विकसित करना हो तो जिन समस्याओं से मुँह चुराते रहे हो, उनसे जूझ जाओ। मार पड़ेगी, चोट लगेगी, दर्द होगा, लेकिन ताकत विकसित हो जाएगी।

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वासना और डर - समस्या कहाँ है?
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वासना और डर - समस्या कहाँ है?

तुम्हारे घर में कोई चीज़ अँधेरे में रखी थी, कोई आकर उस पर थोड़ी रोशनी डाल सकता है। उस पर थोड़ा प्रयोग करके बता सकता है कि ये चीज़ सड़ी हुई है। उसके आगे का काम तो तुम्हारी नीयत का है। उसको उठा के बाहर तुम्हें ही फेंकना पड़ेगा। नीयत, फ़ैसला, ईमानदारी, इनका कोई विकल्प नहीं होता। डूबे रहो इधर-उधर की चीज़ों में, वासना हो, डर हो। जिस दिन तुम जलोगे, उस दिन डर और वासना भी जल जाएँगे। कहानी कभी न कभी तो ख़त्म होनी है। या तो ख़ुद अभी ख़त्म कर लो, नहीं तो चिता पर ख़त्म हो जाएगी। मर्ज़ी है।

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अज्ञान का दूसरा नाम शोषण है। जो आज अपनेआप को शोषित कह रहा है, वो भीतर- ही- भीतर तैयारी करके बैठा है कि कल शोषण करूँगा। तो जो आज का शोषित है, वो कल का शोषक बनता है। हमें ये नहीं करना है कि संतुलन ला दिया और संतुलन का मतलब हुआ कि अब दोनों बराबर का शोषण करेंगे। वो कोई संतुलन नहीं होता है। हमें ये करना है कि जो शोषण का मूल कारण ही है उसको मानव मात्र के भीतर से हटा दें।

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रक्षाबंधन केवल भाई-बहन के रिश्ते और सुरक्षा की रस्म तक सीमित नहीं होना चाहिए। आज असली रक्षा उन चीज़ों की ज़रूरत है जो कमज़ोर और संकट में हैं—गौरैया, नदियाँ, पहाड़, पेड़, महासागर और पृथ्वी। साथ ही ईमानदारी, आत्मज्ञान और मानवीय मूल्यों की भी रक्षा जरूरी है। धर्म कर्मकांड नहीं, अपनी शक्ति और उससे जुड़ी व्यापक ज़िम्मेदारी को समझना है।

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