

प्रश्नकर्ता: किसी भी रिलेशन में बने रहना, जस्ट किसी को दुख न पहुँचे या चोट न लगे। ऐसा रहना क्या ईमानदारी होगी? क्या ये जो मोनोगैमी है, लाइफ़ लॉन्ग मोनोगैमी, ऐसा कुछ होता भी है या फिर जस्ट कन्वीनियंस या डर होता है? ये कुछ संशय बार-बार आते हैं।
आचार्य प्रशांत: आप पूछ लो। आपने एक मिनट में पूछ लिया, अब जो मैं आधे घंटे बोलूँगा, उसकी गाली मुझे पड़ेगी। है न? अरे, जो पूछना था पूछ लेते हो, उसमें ये मोनोगैमी लाना ज़रूरी था। हम पूरे भारत भर के लोकधर्मी वैसे ही मरे जा रहे हैं हार्ट अटैक से कि ये हमारी सब महिलाओं को चरित्रहीन और भ्रष्ट करे दे रहा है। ऊपर से मोनोगैमी के ख़िलाफ़ और बुलवा दीजिए मुझसे।
आप कह रहे हैं, कि “किसी का दिल न टूटे, इसके लिए क्या किसी रिश्ते में बने रहना ईमानदारी है?” ईमानदारी या बेईमानी की बात तो तब आएगी न जब पहले कोई घटना संभव हो। वैसी आप अगर बदल गए हो, तो आपका रिश्ता बदल गया। आप लाख कोशिश कर लो, रिश्ता वैसा रह ही नहीं जाएगा जैसा था अंधेरे में, रह ही नहीं जाएगा। जो देखने लग गया, वो अंधेरे में बनाए रिश्ते को पुरानी तरह ही अब कैसे निभाएगा? कैसे? बोलो, कैसे?
अंधेरा कमरा था, आप घुस गई, वहाँ कोई था आपको लगा पिया जी हैं और जाकर के लिपट गई। तभी किसी ने बत्ती जला दी, वो निकला टिंकू लाल। क्या रिश्ता वैसे ही रह जाएगा?
प्रकाश सब बदल देता है। अंधेरे में बनाए गए रिश्ते प्रकाश की धार बर्दाश्त नहीं कर पाते।
अब दिल टूटने की बात कि हमें सब समझ में आ गया है। पर अगर समझदारी दिखाएँगे, तो किसी का दिल टूट जाएगा। ये दिल क्या होता है? वो वाली चीज़ कैसे दिखाते हैं उसको? ये, (हाथ से आकृति बनाते हुए)। ये क्या है? कुछ है ये? ये क्या है? क्या है ये? कुछ है? कुछ है नहीं, तो टूटेगा क्या? कहीं होता है? कुछ भी है क्या ये? तो दिल माने क्या? मान्यता। है न? मान्यता, अहंकार-जनित और अहंकार-केंद्रित मान्यता, जिसको आप दिल का नाम देते हो। पर इतने फ़िल्मी गाने सुने, इतनी शायरी पढ़ी कि लगा कि दिल भी कुछ होता है। दिल क्या होता है?
गीता क्या बोल रही है? गीता में एक दिल भी आता है; आत्मा, अहम्, दिल और प्रकृति। ऐसा सीखा है आपने। ये, ये है। दो-चार श्लोक बताइए, जिसमें दिल का भी ज़िक्र हो, उर्दू का ही श्लोक बता दो। है कोई जहाँ पर दिल की भी बात हो?
ये बॉलीवुड का कमाल है, दिल। दिल न टूटे, माने आप बस यही कह रहे हो कि किसी ने मुझे लेकर कुछ धारणा बना रखी है। किसी की मुझको लेकर कोई बिलीफ़ है, जो कि ज़ाहिर है झूठी है। पर मैं चाहती हूँ न टूटे। तो ले-देकर आप क्या बोल रही हैं? आप कह रही हैं उसकी एक झूठी बिलीफ़ है और मैं नहीं चाहती कि उसकी झूठी बिलीफ़ टूटे। आप उसकी दोस्त हैं कि दुश्मन हैं? जल्दी बोलिए।
तो दिल का मतलब ही अगर झूठी मान्यता है और फ़ालतू अरमान यही है न? अगर दिल का मतलब ही यही है, तो दिल तो जितनी जल्दी हो सके, सबसे पहले अपना। अध्यात्म का और काम ही क्या है? दिल तोड़ना, दिल-विल, प्यार मैं क्या जानूँ रे। महावाक्य है ये अध्यात्म का? तू मेरा दिल है, तू मेरा जिगर है। अध्यात्म में ये सब होता है? जिगर, अमाशय, मलाशय, यकृत। उपनिषद् बोल रहे हैं, कि तत्वमसि और तत् माने किडनी। है ऐसा? हमारे गानों में ये सब होता है, उसमें सब कुछ आ जाता है, तू मेरा गला है, तू मेरी ज़ुबान है।
और अगर शरीर के अंगों से ही उसका नाता दिखाना है, तो सचमुच शरीर के जिस अंग से उसका नाता है, उसका नाम कभी नहीं लेते। असली बात छुपाए बैठे हैं, बाक़ी सब कुछ: तू मेरी मूँछ का बाल है।
दिल टूट जाएगा, माने क्या? अहंकार न स्वयं को जानता, न दूसरे को जानता। जैसे अपनी एक झूठी छवि बना रखी है, वैसे ही उसकी भी एक झूठी छवि बना रखी है और आप चाहती हैं कि झूठी छवि चलती रहे। इससे किसका लाभ हो रहा है? किसका? बोलो न, किसका? जो अपनी सच्चाई को दूसरे से छुपा रहा है, वो दूसरे का दिल टूटने से भले बचा रहा हो, पर उसकी ज़िंदगी तोड़ रहा है। और रिश्ते हमारे सारे ही ऐसे होते हैं जिसमें अपनी सच्चाई बता दो, तो दिल ही नहीं रिश्ता भी टूट जाए।
हम सब जानते हैं कि हमारे संबंधों में कौन से सवाल हैं, जो कभी नहीं पूछे जाने चाहिए। और वो सवाल अगर पूछ दिए गए, वो मुद्दा, वो चर्चा, अगर छिड़ गई वो चर्चा तो गड़बड़ हो जाएगी। हो जाएगी न? हम सब जानते हैं कि कौन-सी बात, कौन-सी सच्चाई अगर दूसरे को बता दी, तो उसका दिल टूटेगा, तो बताओ ही मत। वास्तव में पेशेवर लोग, ये जो रिलेशनशिप एक्सपर्ट्स होते हैं, ये सलाह भी यही देते हैं कि कुछ बातें न अपने पार्टनर को कहीं बतानी चाहिए। न पार्टनर को, न पेरेंट्स को, किसी को नहीं बतानी चाहिए।
और कुछ बातें होती हैं, जो पेरेंट्स को बता दो, पर पार्टनर को नहीं बताओ। कुछ बातें हैं, जो पार्टनर को बताओ। पेरेंट्स को कुछ बातें होती हैं, सिर्फ़ फ्रेंड्स को बताओ और किसी को नहीं बताओ। माने, कुल मिलाकर एक-एक रिश्ता झूठ पर ही टिका हुआ है। सचमुच किसी का भला चाहते हो, तो उसको ग़लतफ़हमी में मत रखो।
तथ्य तथ्य है, यथार्थ यथार्थ है, वो न्यूट्रल होता है। न किसी का अच्छा, न किसी का बुरा। वो बस है। वो सत्य के बिल्कुल निकट की चीज़ है। वो व्यवहार से ऊपर ले जाता है परमार्थ में। उसी को छुपा रहे हो और इस छुपा-छुपी को रिश्ते की बुनियाद बना रहे हो कि उसका दिल टूट जाएगा, उसकी भावनाएँ आहत हो जाएँगी। “क्या मेरी फ़ीलिंग्स की कोई क़दर नहीं? मत बताओ मुझे वो सच, जिससे मेरी फ़ीलिंग्स हर्ट होती हों।”
अच्छा, कितने लोग ऐसे ही हैं? सही से हाथ खड़े करो। जल्दी से करो। “मत बताओ मुझे वो सच, जिससे मेरी फ़ीलिंग्स हर्ट होती हों।”
(बहुत कम श्रोता हाथ उठाते हैं)।
मैं नहीं ले रहा गीता सत्र। अच्छा छोड़ो, तुम ऐसे नहीं हो, ठीक है। तुम तो महामानव हो, देवाधिदेव हो।
अच्छा, कितनों की ज़िंदगी में ऐसे लोग हैं, जिनसे सच बोल दिया तो उनकी फ़ीलिंग्स हर्ट हो जाएँगी? इतने सारे हाथ! और इनमें से कई लोग एक-दूसरे की ज़िंदगी में होंगे। “हम हर्ट नहीं होते पर हम झूठ इसलिए बोलते हैं क्योंकि वो हर्ट हो जाएगा।” और यही बात वो भी बोल रहा है।
एक कहानी थी, अग्निखोर। एक-आध बार पहले भी उसका ज़िक्र करा है, बंगाली की कहानी है। तो उसमें एक फ़ायरब्रांड, बिल्कुल क्रांतिकारी कम्युनिस्ट लड़का है। वो यूनिवर्सिटी में पढ़ता है और कह रहा है, ये कर दूँगा, वो कर दूँगा, क्रांतियाँ लाऊँगा। बिल्कुल आग लगा दूँगा सब जगह। यह दुनिया, इसके रीति-रिवाज़, ये सब सिर्फ़ ग़रीबों को, शोषितों को कुचलने का पाखंड मात्र है। मैं सब ख़त्म कर दूँगा।
उसका जो बाप है, वो बाप सीधा-सादा बिल्कुल मृदुल इंसान है, कम बोलता है, चुप रहता है। ये जब उसके आगे जाकर के बेटा बहुत आग उगलता है कि दुनिया में इतना ग़लत है, ऐसा है, वैसा है, हमें सब तोड़ देना चाहिए। बाप चुपचाप रहता है। अपना बैठा अख़बार पढ़ता रहता है। तो ये बेटा अपने बाप को बहुत ताने मारता है। बोलता है, तुम्हारे भीतर कोई आग नहीं है। और उस बेटे का नाम उसके साथ के लोगों ने, उसका जो पीयर ग्रुप है उसने दिया, आग खाने वाला। वहीं से कहानी का नाम आया होगा, आग खाने वाला। बोलता है, तेरे दम नहीं है, अरे, तुम्हीं जैसे लोगों के कारण कभी क्रांतियाँ नहीं होने पातीं। बुर्जुआ भद्रजन, तुम्हारे कारण ही ये दुनिया जैसी चल रही है, वैसी है।
तो एक दिन वो यही सब कुछ कर रहा होता है। बाप बैठा है, बाप ऐसे अख़बार नीचे करता है और उसे बोलता है, बेटा, तुम्हें एक बात बतानी थी। बोलता है, क्या? तो बोलता है कि तुम्हारी माँ का किसी से अफ़ेयर था, तुम मेरी औलाद नहीं हो। और ये अगिनखोर ऐसे सुनता है और फिर ऐसे लहराता हुआ गिर जाता है। कहानी ख़त्म।
कोई रिश्ता है जो सच को झेल सके? कोई रिश्ता है? बन रहे हैं बहुत क्रांतिकारी दुनिया में पर अपनी निजी ज़िंदगी में सब झूठ पर ही तो चल रहा है। कहानी में अतिशयोक्ति थी। आम घरों में ऐसा नहीं होता कि औलादें कहीं और से आ रही हों, आमतौर पर। पर उतना बड़ा नहीं तो छोटा-मोटा झूठ तो होता ही है।
झूठ हटाने का, सच झेलने का दम रखिए। जो रिश्ता लगातार झूठ की ही ख़ुराक माँगता हो, उसको भूखा मरने दीजिए। उसकी डाइटिंग हो जाएगी। उसकी फ़ास्टिंग है। वह कुछ बेहतर बनकर निकलेगा अब वो।
और बेहतर, माने ये नहीं होता कि प्रेम बढ़ जाएगा या कुछ। बेहतर माने सम्यक हो जाएगा, एप्रोप्रियट हो जाएगा। वैसा हो जाएगा जैसा उसे होना चाहिए।
इंसान और घोड़े का रिश्ता पति और पत्नी का नहीं हो सकता। आपने उसको जान लिया कि ये घोड़ा ही है। तो यह थोड़ी है कि अब दुश्मनी हो जाएगी या घृणा हो जाएगी। अब रिश्ता सम्यक हो जाएगा। वही रिश्ता, जो एक इंसान में और एक पशु में होना चाहिए, वो रिश्ता रहेगा। ये थोड़ी है कि डिवोर्स हो गया, रिश्ता अभी भी है। पर पहले लगता था इंसान और इंसान का है, अब मुझे पता है इंसान और घोड़े का है। तो रिश्ता तो अभी भी है। घोड़ा अभी भी घर में रहता है, पर उसके साथ अब हम व्यवहार घोड़े जैसा ही करते हैं। ये थोड़ी किया कि घोड़े को निकाल दिया है और कह रहे हैं कि अब संबंध-विच्छेद। नहीं, नहीं। बस हम जान गए हैं कि ये घोड़ा है।
अब घोड़े के साथ भी रिश्ता तो होता है न? नहीं होता? है रिश्ता। घोड़े के साथ अभी भी रिश्ता है। कहीं ले जाना होता है तो घोड़ा काम आता है, अभी भी कहते हैं, चल, तैयार हो जा, तड़पक-तड़पक ले चल। जिस काम आ सकता है, उसी काम आ।
दिल-विल की बहुत परवाह मत किया करिए। अध्यात्म का भी बहुत नाश इस दिलबाज़ी ने ही करा है। आप जिसको लोकधर्म कहते हो, वो सेंटीमेंटलिज़्म के अलावा कुछ है? आप इस पर आप नोट्स बना लीजिएगा और ग़ौर करिएगा ख़ुद। दो बातों के अलावा लोकधर्म में कुछ हो, तो बताइएगा: एक कोरी भावनाएँ, सेंटीमेंटलिज़्म, और दूसरा परलोकवाद, मिस्टिसिज़्म। बस यही दो बातें होती हैं कि या तो रोओ और बोलो कि यही तो भक्त और भगवान के बीच का रिश्ता है, भावना, भ भ भ! या फिर कहो कि बस अब देखो वहाँ, मेरी आँखों से देखो तो तुमको वहाँ चंद्रमा के ऊपर बैठी परी दिखाई देगी।
भावनाओं की बुराई नहीं कर रहे हैं, हम कह रहे हैं केंद्र पर भावना नहीं होनी चाहिए, केंद्र पर बोध होना चाहिए। और बोध से जो भावना उठती है, वो बड़ी सुंदर होती है। बोध से भी आँसू आ सकते हैं, वो बड़े प्यारे आँसू होते हैं।
तो आपको नहीं सोचना है कि अब रिश्ते का क्या होगा? रिश्ते का अब क्या होगा? यह ज्ञान ख़ुद तय कर लेगा। और आपको अपनी ओर से ज़ोर भी नहीं लगाना है कि इसको बनाए रखूँ, कि तोड़ दूँ, कि बदल दूँ, कि सँवार दूँ। आठ दस तरह के विकल्प होते हैं रिश्तों को लेकर के, आपको किसी विकल्प की परवाह करनी नहीं है। अब जो होना होगा, ज्ञान ख़ुद करेगा।
बल्कि वो तो करा भी मत करिए कि अब मैं ज़्यादा समझदार हो गई हूँ, तो अब मैं औपचारिक रूप से रिश्ता तोड़ रही हूँ। ये औपचारिक रूप से जो फ़ॉर्मल डिसोसिएशन होता है, ये भी मुझे समझ में नहीं आता। औपचारिक रूप से क्या तोड़ना है? उसका जो होना था वो हो जाएगा, रिश्ता अपनी सम्यक जगह पा लेगा। सम्यक माने राइट, उचित, वो हो जाएगा।