
जिस तन लगिआ इश्क़ कमाल,
नाचे बेसुर ते बेताल | टेक |
दरदमंद नूं कोई न छेड़े,
जिसने आपे दुःख सहेड़े,
जम्मणा जीणा मूल उखेड़े,
बूझे अपणा आप खिआल
जिसने वेस इश्क़ दा कीता,
धुर दरबारों फ़तवा लीता,
जदों हजूरों प्याला पीता,
कुछ ना रहा सवाल जवाब
जिसदे अन्दर वस्स्या…








प्रश्नकर्ता: नमस्ते सर। मुझे ये समझ में कई बार नहीं आता कि जब मैं किसी माहौल में होती हूँ तो जैसे बार-बार ये बात होती है कि माया को हमें सत्य नहीं समझना चाहिए। लेकिन जैसे मैं आज दशहरा मेले में अपने बच्चों को लेकर गयी तो मैं वहाँ पर




जिस तन लगिआ इश्क़ कमाल, नाचे बेसुर ते बेताल।

भाग 1

आचार्य प्रशांत: मैं सवाल को थोड़ा सा पलट देता हूँ। किसी चीज़ का अगर पता ही हो कि खो जाएगी और फिर वह खो जाए, तो ज़्यादा बुरा लगता है या किसी चीज़ के बारे में धारणा हो कि नहीं खोएगी, फिर वह खो जाए तो ज़्यादा बुरा लगता है,


प्रश्न: आचार्य जी, प्रणाम। विचारों का प्रवाह पहले से अधिक अनुभव होता है। कहाँ-कहाँ की सारहीन बातें मन को घेरे हैं। मन को निरंतर चलता देखकर खीज-सी उठती है, कि ये विचार क्यों और कहाँ से आ रहे हैं। पहले इतना शोर अनुभव नहीं होता था। अब मन यह देखकर…


मैनूं लगड़ा इश्क़ अवलड़ा अव्वल दा, रोज़ अज़ल दा।
विच कड़ाही तिल-तिल पावे, तलिआं नूं चा तलदा।
मोइआं नूं एह वल-वल मारे, दलियां नूं एह दलदा।

अब लगन लगी की करिये

चुप्प कर के करीं गुज़ारे नूं



बुल्हे नूं समझावण आइयां


इक्को रंग कपाई दा



बस कर जी, हुण बस कर जी,
काई गल असां नाल हस कर जी | टेक |
तुसीं दिल मेरे विच वसदे सी,

सभी श्रोता (गाते हुए):
पाया है कछु पाया है, मेरे सतगुरु अलख लगाया है
कहूं बैर पड़ा कहूं बेली है, कहूं मजनूं है कहूं लेली है, कहूं आप गुरु कहूं चेली है, आप आपका पंथ बताया है।

"अब तो जाग मुसाफ़िर प्यारे" का अर्थ है, कि जब ये सुन रहा है मुसाफिर, जब तू ये बात सुन रहा है, तभी जग जा। अब से अर्थ है, अभी। और अभी माने, जब जग रहे हो, जब सुन रहे हो, तभी। सुनने के लिये जगना आवश्यक है। सुनने के लिए जगना आवश्यक है। तो जब भी तुम इन वचनों को सुन रहे हो, बस तभी उठ के बैठ जाओ। जब भी सुन रहे हो, तभी उठ जाओ।
भगवान किसी और को सूली पर कहाँ चढ़ा रहे हैं? वो ही हैं, अपने आप को ही सूली दे रहे हैं। खुद ही जाते हैं सिपाही बनकर; खुद ही पकड़ लाते हैं किसी संत को, फिर खुद ही न्यायलय में न्यायाधीश बन बैठते हैं, खुद को ही झूठी सज़ा सुना देते हैं, फिर खुद ही जल्लाद हो जाते हैं; फिर खुद ही सूली हो जाते हैं, फिर खुद को ही सूली पर चढ़ा देते हैं। और किसको मार रहे हैं वो? दया इत्यादि तो दूसरों पर की जाती है। जहाँ द्वैत ही नहीं, वहाँ दया कैसी। किस पर दया करनी है?
जिन्होंने कृष्णमूर्ति से मुलाक़ात की हुई है, वो बुल्लेशाह में और प्रगाढ़ता से प्रवेश कर पाएँगे, बल्कि मैं कहूँगा वही समझ पाएँगे बुल्लेशाह को। और जो बुल्लेशाह के कायल हैं, वो जब कृष्णमूर्ति के पास जाएँगे तो उन्हें ऐसा लगेगा किसी अपने के पास आएँ हैं, इनको तो हम जानते हैं, ये वही बात तो कह रहे हैं। ये वही बात कह रहे हैं, जिस पर हम नाच कर आये हैं। बस सफ़ाई से कह रहे हैं, ज़्यादा व्यवस्था के साथ कह रहे हैं, बिना रंगरोगन के कह रहे हैं।
There is such great fun in leaving yourself behind and turning a servant to the Truth. It’s almost like Krishna advising Arjuna, “Talk in everlasting words and dedicate them all to Me—*mām ekaṃ śaraṇaṃ vraja, sarva-dharmān parityajya*.” And at numerous places in the *Bhagavad Gita*, he says, “Arjuna, you are not fighting for yourself, you are fighting for Me. As long as you fight for yourself, if you win, you suffer, and if you lose, you suffer. And when you fight for Me, then you are a victor even before the fight begins.”
प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी। मेरा नाम गवाक्ष जोशी है। मैं आइआइटी कानपुर में पीएचडी का छात्र हूँ। और विद्युत अभियान्त्रिकी विभाग से। मेरा प्रश्न धर्म को लेकर है। मैं हितोपदेश मित्रलाभ पढ़ रहा था! तो एक श्लोक आया था मेरे सामने, जिसका अर्थ ये था — भोजन, निद्रा, भय और…
Questioner (Q): I read some couplets by Saint Kabir and they touched me deeply. He wants to become one with God or Truth so much, but he is pained that he is unable to do that. At times I feel like meeting Him is the only thing left for me…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मैं अपने मित्र को आपके पास लाना चाहता हूँ, लेकिन मन में शंका उठती है कि कहीं वो बाद में मुझे गालियाँ न दे।
आचार्य प्रशांत: तो तुम पक्का करो न कि वो गालियाँ दे ही रहा है, ताकि शंका मिट जाए पूरी। शंका का अर्थ है…
प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी, "इक अलफ़ पढ़ो छुटकारा ए।"
बाबा बुल्लेशाह जी कहते हैं कि बस अल्लाह का नाम लो, उसी में मुक्ति है। जबकि आदि शंकर जी कहते हैं कि दुख का मूल कारण ही अज्ञान है और अज्ञान नेति-नेति से ख़त्म होता है। और बाबा बुल्लेशाह जी कह…
Questioner: Although we start speaking, listening and interacting with the world between the age of two and three years, we do not remember much from our early childhood. In one of your videos, you said that when pure witnessing happens, it doesn’t get registered in the memory. Is this the…
माटी कुदम करेन्दी यार, वाह वाह माटी दी गुलज़ार। माटी कुदम करेन्दी यार, वाह वाह माटी दी गुलज़ार। माटी घोड़ा, माटी जोड़ा, माटी दा असवार। माटी घोड़ा, माटी जोड़ा, माटी दा असवार। माटी कुदम करेन्दी यार, वाह वाह माटी दी गुलज़ार। माटी कुदम करेन्दी यार, वाह वाह माटी दी गुलज़ार।…
बलिया आशिक़ होइआ रब्ब दा, मलामत हुई लाख, तैनूं लोकीं काफ़िर आखदें, तूं आहो-आहो आख। ~ संत बुल्लेशाह जी
बुल्ला रब का आशिक़ हो गया है और चारों तरफ़ से लानतें मिल रही हैं। लोग आकर के रब के आशिक को काफ़िर कह रहे हैं और बुल्लेशाह इसे स्वीकार कर…
दरदमन्द नूं कोई न छेड़े, जिसने आपे दुःख सहेड़े।
उस वेदना भरे जीव को कोई क्या तंग करेगा, जिसने स्वयं अपने…
मैंनूं कौन पछाणे
हादी मैंनूं सबक पढ़ाया, ओत्थे होर न आया-जाया, मुतलिक ज़ात जमाल विखाया, वहदत पाया ज़ोर नी।
गुरु ने मुझे शिक्षा दी कि यह मार्ग ऐसा है कि वहाँ कोई अन्य आता-जाता नहीं है। गुरु ने…
बुल्लिआ हिजरत विच्च इस्लाम दे मेरा नित्त है खास आराम। नित्त नित्त मराँ ते नित्त नित्त जीवाँ मेरा नित्त नित्त कूच मुकाम।
मैं भी हज़रत पैगम्बर की तरह हिज़रत करता हूँ, यात्रा करता हूँ, लेकिन मेरी यात्रा ऐसी है जो तब शुरु होती है, जब मैं बिलकुल शान्त, आराम, विश्राम…
घत्त जादू दिल नु खस्सदे सी, हुण आइयो मेरे वस कर जी।
तुसीं मोयां नूं मार ना मुक्कदे सी, नित्त खिद्दो वांङ कुट्टदे सी,…
आचार्य प्रशांत: पूरी प्रकृति में आदमी अकेला है जो भटक गया है। और सब जितने भी हैं, वो अपने घर में हैं। वो वहीं हैं, जहाँ उन्हें होना था। वो अपने घर से कभी बाहर निकले ही नहीं।
चारों और देखोगे तो पाओगे कि हर तरफ एक निर्विकल्पता है।…
बुल्ल्हा, शौह दा न्योंह अनोखा, ओह नहीं रलाइआं रलदा।
~ बुल्ले शाह
प्रश्नकर्ता: मुझे…
तुम सुनो हमारी बैना, मोहे रात दिने नहीं चैना, हुन पी बिन पलक ना सरीए। अब लगन लगी किह करीए?
इह अगन बिरहों दी जारी, कोई हमरी प्रीत निवारी, बिन दरशन कैसे तरीए? अब…
सच्च शर्हा करे बरबादी ए सच्च आशक दे घर शादी ए, सच्च करदा नवीं…
भरवासा की आशनाई दा, डर लगदा बेपरवाही दा।
~ बुल्लेशाह
आचार्य प्रशांत: आशिकी का क्या भरोसा; बेपरवाही से डर लगता है। वो बेपरवाह है, बुल्लेशाह हों, नानक हों, और कोई भी ‘जानने’ वाला हो, सभी ने यही जाना है: बेपरवाही उसका स्वभाव है। बुल्लेशाह कह रहे हैं, ‘भरोसा की आशनाई…
अपणे संग रलाँई पिआरे, अपणे संग रलाँई।
पहलां नेहुं लगाया सी तैं, आपे चाँई चाँई; मैं पाया ए या तुध लाया, आपणी तोड़ निभाईं।
-बुल्ले शाह
वक्ता: बुल्ले शाह प्रार्थना कर रहे हैं कि ‘निभाना’। ‘अपणे संग रलाँई प्यारे, अपणे संग रलाँई’- निभाना। ऋचा पूछ रही हैं कि बात थोड़ी…
*“मन्न लै बुल्लिहआ साडा कहणा,छड दे पल्ला, राइयां,आल नबी औलादि अली नूं,*तूं क्यों लीकां लाइयां?”
*“जेहड़ा सानूं, सैयद आखे,दोज़ख़ मिले सज़ाइयां,जो कोई सानूं राईं आखे,*भिश्तीं पींघां पाइयां |”
*राईं साईं समनीं…
*जो कोई अन्दर बोले चाले,*ज़ात असाडी सोई |
*जिसदे नाल मैं नेहुं लगाया,*ओहो जिहा मैं होई |
*मिहर करीं ते फ़ज़ल करीं तू,*मैं आज़ज़ दी ढोई |
*नचण लगी तां घुंघट केहा,*…
इक आपे रूप वटाई दा | टेक |
अरूड़ी ते जो गदों चरावैं,
सो भी वांगी गाईं दा |
सभ नगरां विच आपे वस्से,
ओहो मेहर गराईं दा |
हर जी आपे हर जा खेले,
सदिआ चाईं चाईं दा |
बाग़…
उठ जाग घुराड़े मार नहीं,
एह सौण तेरे दरकार नहीं | टेक |
कित्थे हैं सुलतान सिकंदर,
मौत न छडिया पीर पगम्बर,
सबमें छड़-छड़ गए अडम्बर,
कोई एथे पायेदार नहीं |
जो कुछ करसैं सो कुछ पासैं,
नहीं तां ओड़क पच्छो तासैं,
सुंजी कूंज वांग कुरलासैं,
खभां बाझ उडार नहीं…
मैनूं कौन पछाणे,
मैं कुझ गो गई होर नी | टेक |
हादी मैनूं सबक़ पढ़ाया,
ओत्थे होर न आया-जाया,
मुतलिक ज़ात जमाल विखाया,
वहदत पाया ज़ोर नी |
अव्वल होके लामकानी,
ज़ाहर बातन दिसदा जानी,
रही न मेरी नाम निशानी,
मिट गया झगड़ा-शोर नी |
प्यारे आप जमाल विखाली,…
घत जादू दिल नूं खसदे सी,
हुण आइओ मेरे वस कर जी |
तुसी मोइआं नूं मार ना मुकदे सी,
नित…
~ कबीर साहब
वक्ता :गुरु और शिष्य की कहानी है। उनके संबंधों के विषय में है। अहं की आग सीने में धकधक जल रही है। अहं कहता है, “मुझे मान्यता मिले, स्वीकृति मिले, प्रशंसा मिले”।…

प्रेम की गहराई हमेशा प्रेमी की अपनी चेतना जितनी होती है — जो जैसा है, उसका प्रेम भी वैसा ही होगा, चाहे उसे कितना भी पावन या अनोखा क्यों न मान लिया जाए। जिस चेतना ने खुद को कभी गहराई से नहीं जाना, वह प्रेम में भी सतह से आगे नहीं जा सकती। जो कोई अपने प्रेम को गहराई से परखने से बचता है, वह असल में खुद को परखने से बच रहा होता है — और यही बचाव, प्रेम के नाम पर पाला गया एक और भ्रम है।

आचार्य प्रशांत बताते हैं कि क्यों हम सही खान-पान, स्वास्थ्य और अपने ऊपर ज़रूरी खर्च से बचते हैं, लेकिन दिखावे और फ़ालतू सामाजिक परंपराओं पर पैसा बहा देते हैं। अधिकांश लोगों के लिए समस्या सिर्फ़ पैसों की कमी नहीं, बल्कि विवेक और सही प्राथमिकताओं की कमी भी है।

आध्यात्मिकता का उद्देश्य व्यक्ति को बाहरी अधिकारों से आगे आंतरिक स्वतंत्रता की ओर ले जाना है। विज्ञान और संविधान अपने-अपने क्षेत्र में महत्वपूर्ण हैं, लेकिन आत्म-भ्रम, गलत चुनाव और अहंकार से मुक्ति का मार्ग आत्मज्ञान से खुलता है। सच्चा गुरु शिष्य को निर्भर नहीं, स्वतंत्र बनाता है। साथ ही, शिष्य का आचरण उसके गुरु और शिक्षा का प्रतिनिधित्व करता है, इसलिए उसे नकल नहीं, समझ और विवेक के साथ जीना चाहिए।

We often call something “help” or “love” while secretly expecting something in return. When that return does not come, we feel hurt, revealing that the relationship was a trade, not genuine help. The ego, being unfulfilled, cannot truly love or share. Likewise, desperation to be loved makes us controllable. Real love emerges when we stop seeking validation, work on ourselves, and become so inwardly fulfilled that we no longer need to be loved.

“फॉलो योर पैशन” तभी सार्थक है, जब वह सचमुच आपका अपना हो। अक्सर जिसे हम अपनी पसंद, पैशन या इच्छा मानते हैं, वह समाज, परिवार, संस्कार और परिस्थितियों से भीतर बैठा हुआ प्रभाव होता है। वास्तविक स्वतंत्रता न बाहरी दबाव में जीने में है, न भीतर की कंडीशनिंग का गुलाम बनने में। आत्मनिरीक्षण से सही कर्म की स्पष्टता आती है और बिना बिके, बिना डरे एक गरिमापूर्ण जीवन जिया जा सकता है।

स्वतंत्रता दिवस को केवल उत्सव नहीं, बल्कि आत्मावलोकन और सतर्कता दिवस की तरह देखने की आवश्यकता है। भारत की परतंत्रता के पीछे रहे आंतरिक कारणों को समझना ज़रूरी है, क्योंकि राजनीतिक स्वतंत्रता के बावजूद लोकधर्म, अंधविश्वास, जातिगत विभाजन, ज्ञान-विज्ञान की उपेक्षा, परंपरागत जड़ता और आत्मबल की कमी आज भी मौजूद हैं। वास्तविक देशभक्ति इन बंधनों को पहचानकर ज्ञान, आत्मनिर्भरता, वैज्ञानिक दृष्टि और जागरूक नागरिकता विकसित करने में है।

The balance between order and disorder should not be decided by personal likes or dislikes, but by what the task at hand requires. Sometimes a project demands discipline and order; at other times, more important work requires leaving things messy. The right action comes from responding to the actual need, not personal preference. Even sacrifice can be meaningful when it serves something important, but “staying backstage” should never become an excuse to avoid what one cannot tolerate.

लोकतंत्र, गणतंत्र और स्वतंत्रता केवल संविधान में लिखे शब्द नहीं, बल्कि जागरूक नागरिक की चेतना पर निर्भर हैं। वास्तविक स्वतंत्रता मनमानी करने की छूट नहीं, बल्कि भीतर घुसे भय, लालच, अंधविश्वास, पूर्वाग्रह और बाहरी प्रभावों से मुक्ति है। जब नागरिक अपने ही विचारों और मान्यताओं की जाँच नहीं करता, तो लोकतंत्र भीड़तंत्र और संप्रभुता खोखली बन सकती है।

सोमवारी और काँवड़ यात्रा का बाहरी आयोजन तभी सार्थक है जब उसका संबंध शिवत्व और सत्य से हो। केवल भीड़, दिखावे, मांसाहार छोड़ने की औपचारिकता या पुत्र की कामना को धर्म मान लेना वास्तविक धर्म नहीं है। काँवड़ियों को दोष देने के बजाय उस सामूहिक मानसिकता को देखना चाहिए जो ऐसे कर्मों को जन्म देती है। धर्म का उद्देश्य लोकधर्म की रूढ़ियों को बढ़ाना नहीं, बल्कि विवेक और समझ के द्वारा उनसे मुक्त करना है।

सच्चा गुरु या मित्र पूजा का विषय नहीं, बल्कि दर्पण होता है, जो बिना स्वार्थ हमारी वास्तविक स्थिति दिखाता है। आध्यात्मिक मार्ग पर अंधभक्ति नहीं, बल्कि प्रेम, कृतज्ञता और व्यक्तिगत ज़िम्मेदारी आवश्यक है। मुक्ति किसी गुरु के भरोसे नहीं मिलती; स्वयं को बदलने का साहस स्वयं जुटाना पड़ता है। गुरु का कार्य केवल सत्य का प्रतिबिंब दिखाना है, चलना साधक को ही होता है।

True freedom begins when we question the beliefs that make us feel trapped. Most of our suffering comes not from circumstances but from unquestioned assumptions, attachments, and imagined obligations. By suspending our beliefs, even briefly, we allow truth to enter, revealing that life always offers choice. Transformation is born from love for truth, the courage to let go, and the willingness to step beyond the boundaries created by the ego.

True love is not a biological instinct, emotional attachment, or social conditioning. Biology and science explain the body's drives, but they cannot explain the self that seeks freedom. Love is the inner restlessness to move from ignorance and bondage toward truth and liberation. Religion is not rituals or inherited beliefs but this personal journey of understanding. Freedom—not possession or conformity—is the essence of both love and religion.

प्रेम का मार्ग सुरक्षा नहीं, बल्कि घायल होने का साहस माँगता है। जो चोट, हार, पीड़ा और ठगे जाने से डरता है, वह सत्य और प्रेम तक नहीं पहुँच सकता। अहंकार हर कीमत पर जीत चाहता है, जबकि प्रेम हारना, झुकना और दर्द को स्वीकारना सिखाता है। जो छोटी-छोटी हारों का अभ्यास करता है, वही अंततः अहंकार हारकर हरि को पा सकता है। सच्ची शक्ति दूसरों को हराने में नहीं, बल्कि प्रेम के लिए स्वयं घायल होने में है।

The Bhagavad Gita deserves reverence not because of inherited beliefs about its author, but because of its power to dissolve falsehood and reveal Truth. Real devotion is not ritual or blind faith—it is understanding, inquiry, and living the wisdom of the Gita. Through sincere study, one discovers the true meaning of Krishna, making the Gita the most authentic path to knowing and worshipping Him.

Truth cannot be forced upon anyone, but neither should falsehood be entertained. Genuine love is not about preserving relationships at any cost; it is about helping oneself and others break free from illusion, even if that means risking the relationship itself. Spiritual growth begins by questioning conditioning, examining falsehood without bias, and choosing authenticity over comfort. Real relationships are built on the courage to seek freedom, not convenience.

सत्य के मार्ग पर चलने के लिए सबसे बड़ी आवश्यकता बाहरी समर्थन नहीं, बल्कि भीतर की निष्ठा और साहस की होती है। जब व्यक्ति स्वार्थ, भय और सामाजिक दबाव से ऊपर उठकर न्याय का साथ देता है, तभी वास्तविक स्वतंत्रता जन्म लेती है। जीत या हार से अधिक महत्वपूर्ण है सत्य के प्रति अडिग रहना। इतिहास उन्हीं को याद रखता है जो अन्याय के सामने झुकने के बजाय अकेले खड़े होने का साहस रखते हैं।

True learning is not built on memorizing answers but on understanding reality. Memory may help in examinations, but life constantly presents new questions that demand clarity, presence, and intelligence. Education becomes meaningful only when knowledge is deeply understood and lived, not merely remembered. Real understanding frees us from dependence on rote learning and enables us to respond wisely to every new situation.