
प्रश्नकर्ता: नमस्ते सर। मुझे ये समझ में कई बार नहीं आता कि जब मैं किसी माहौल में होती हूँ तो जैसे बार-बार ये बात होती है कि माया को हमें सत्य नहीं समझना चाहिए। लेकिन जैसे मैं आज दशहरा मेले में अपने बच्चों को लेकर गयी तो मैं वहाँ पर…









प्रश्न: आचार्य जी, प्रणाम। विचारों का प्रवाह पहले से अधिक अनुभव होता है। कहाँ-कहाँ की सारहीन बातें मन को घेरे हैं। मन को निरंतर चलता देखकर खीज-सी उठती है, कि ये विचार क्यों और कहाँ से आ रहे हैं। पहले इतना शोर अनुभव नहीं होता था। अब मन यह देखकर…

मैनूं लगड़ा इश्क़ अवलड़ा अव्वल दा, रोज़ अज़ल दा।
विच कड़ाही तिल-तिल पावे, तलिआं नूं चा तलदा।
मोइआं नूं एह वल-वल मारे, दलियां नूं एह दलदा।






बस कर जी, हुण बस कर जी,
काई गल असां नाल हस कर जी | टेक |
तुसीं दिल मेरे विच वसदे सी,

सभी श्रोता (गाते हुए):
पाया है कछु पाया है, मेरे सतगुरु अलख लगाया है
कहूं बैर पड़ा कहूं बेली है, कहूं मजनूं है कहूं लेली है, कहूं आप गुरु कहूं चेली है, आप आपका पंथ बताया है।

बलिया आशिक़ होइआ रब्ब दा, मलामत हुई लाख, तैनूं लोकीं काफ़िर आखदें, तूं आहो-आहो आख। ~ संत बुल्लेशाह जी
बुल्ला रब का आशिक़ हो गया है और चारों तरफ़ से लानतें मिल रही हैं। लोग आकर के रब के आशिक को काफ़िर कह रहे हैं और बुल्लेशाह इसे स्वीकार कर…
There is such great fun in leaving yourself behind and turning a servant to the Truth. It’s almost like Krishna advising Arjuna, “Talk in everlasting words and dedicate them all to Me—*mām ekaṃ śaraṇaṃ vraja, sarva-dharmān parityajya*.” And at numerous places in the *Bhagavad Gita*, he says, “Arjuna, you are not fighting for yourself, you are fighting for Me. As long as you fight for yourself, if you win, you suffer, and if you lose, you suffer. And when you fight for Me, then you are a victor even before the fight begins.”
जिस तन लगिआ इश्क़ कमाल,
नाचे बेसुर ते बेताल | टेक |
दरदमंद नूं कोई न छेड़े,
जिसने आपे दुःख सहेड़े,
जम्मणा जीणा मूल उखेड़े,
बूझे अपणा आप खिआल
जिसने वेस इश्क़ दा कीता,
धुर दरबारों फ़तवा लीता,
जदों हजूरों प्याला पीता,
कुछ ना रहा सवाल जवाब
जिसदे अन्दर वस्स्या…
"अब तो जाग मुसाफ़िर प्यारे" का अर्थ है, कि जब ये सुन रहा है मुसाफिर, जब तू ये बात सुन रहा है, तभी जग जा। अब से अर्थ है, अभी। और अभी माने, जब जग रहे हो, जब सुन रहे हो, तभी। सुनने के लिये जगना आवश्यक है। सुनने के लिए जगना आवश्यक है। तो जब भी तुम इन वचनों को सुन रहे हो, बस तभी उठ के बैठ जाओ। जब भी सुन रहे हो, तभी उठ जाओ।
भगवान किसी और को सूली पर कहाँ चढ़ा रहे हैं? वो ही हैं, अपने आप को ही सूली दे रहे हैं। खुद ही जाते हैं सिपाही बनकर; खुद ही पकड़ लाते हैं किसी संत को, फिर खुद ही न्यायलय में न्यायाधीश बन बैठते हैं, खुद को ही झूठी सज़ा सुना देते हैं, फिर खुद ही जल्लाद हो जाते हैं; फिर खुद ही सूली हो जाते हैं, फिर खुद को ही सूली पर चढ़ा देते हैं। और किसको मार रहे हैं वो? दया इत्यादि तो दूसरों पर की जाती है। जहाँ द्वैत ही नहीं, वहाँ दया कैसी। किस पर दया करनी है?
जिन्होंने कृष्णमूर्ति से मुलाक़ात की हुई है, वो बुल्लेशाह में और प्रगाढ़ता से प्रवेश कर पाएँगे, बल्कि मैं कहूँगा वही समझ पाएँगे बुल्लेशाह को। और जो बुल्लेशाह के कायल हैं, वो जब कृष्णमूर्ति के पास जाएँगे तो उन्हें ऐसा लगेगा किसी अपने के पास आएँ हैं, इनको तो हम जानते हैं, ये वही बात तो कह रहे हैं। ये वही बात कह रहे हैं, जिस पर हम नाच कर आये हैं। बस सफ़ाई से कह रहे हैं, ज़्यादा व्यवस्था के साथ कह रहे हैं, बिना रंगरोगन के कह रहे हैं।
प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी। मेरा नाम गवाक्ष जोशी है। मैं आइआइटी कानपुर में पीएचडी का छात्र हूँ। और विद्युत अभियान्त्रिकी विभाग से। मेरा प्रश्न धर्म को लेकर है। मैं हितोपदेश मित्रलाभ पढ़ रहा था! तो एक श्लोक आया था मेरे सामने, जिसका अर्थ ये था — भोजन, निद्रा, भय और…
Questioner (Q): I read some couplets by Saint Kabir and they touched me deeply. He wants to become one with God or Truth so much, but he is pained that he is unable to do that. At times I feel like meeting Him is the only thing left for me…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मैं अपने मित्र को आपके पास लाना चाहता हूँ, लेकिन मन में शंका उठती है कि कहीं वो बाद में मुझे गालियाँ न दे।
आचार्य प्रशांत: तो तुम पक्का करो न कि वो गालियाँ दे ही रहा है, ताकि शंका मिट जाए पूरी। शंका का अर्थ है…
प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी, "इक अलफ़ पढ़ो छुटकारा ए।"
बाबा बुल्लेशाह जी कहते हैं कि बस अल्लाह का नाम लो, उसी में मुक्ति है। जबकि आदि शंकर जी कहते हैं कि दुख का मूल कारण ही अज्ञान है और अज्ञान नेति-नेति से ख़त्म होता है। और बाबा बुल्लेशाह जी कह…
Questioner: Although we start speaking, listening and interacting with the world between the age of two and three years, we do not remember much from our early childhood. In one of your videos, you said that when pure witnessing happens, it doesn’t get registered in the memory. Is this the…
माटी कुदम करेन्दी यार, वाह वाह माटी दी गुलज़ार। माटी कुदम करेन्दी यार, वाह वाह माटी दी गुलज़ार। माटी घोड़ा, माटी जोड़ा, माटी दा असवार। माटी घोड़ा, माटी जोड़ा, माटी दा असवार। माटी कुदम करेन्दी यार, वाह वाह माटी दी गुलज़ार। माटी कुदम करेन्दी यार, वाह वाह माटी दी गुलज़ार।…
जिसे प्रभु से पूर्ण प्रेम हो जाता है, वह आनन्दमय मस्ती में आकर बेसुर और बेताल नाचने लग जाता है।
दरदमन्द नूं कोई न छेड़े, जिसने आपे दुःख सहेड़े।
उस वेदना भरे जीव को कोई क्या तंग करेगा, जिसने स्वयं अपने…
आचार्य प्रशांत: (पत्र पढ़ते हैं) शैलेन्द्र भास्कर हैं, कानपुर से।
मैंनूं कौन पछाणे
हादी मैंनूं सबक पढ़ाया, ओत्थे होर न आया-जाया, मुतलिक ज़ात जमाल विखाया, वहदत पाया ज़ोर नी।
गुरु ने मुझे शिक्षा दी कि यह मार्ग ऐसा है कि वहाँ कोई अन्य आता-जाता नहीं है। गुरु ने…
बुल्लिआ हिजरत विच्च इस्लाम दे मेरा नित्त है खास आराम। नित्त नित्त मराँ ते नित्त नित्त जीवाँ मेरा नित्त नित्त कूच मुकाम।
मैं भी हज़रत पैगम्बर की तरह हिज़रत करता हूँ, यात्रा करता हूँ, लेकिन मेरी यात्रा ऐसी है जो तब शुरु होती है, जब मैं बिलकुल शान्त, आराम, विश्राम…
तुसीं दिल मेरे विच वस्सदे सी, तद सानु दूर क्यों दसदे सी,
घत्त जादू दिल नु खस्सदे सी, हुण आइयो मेरे वस कर जी।
तुसीं मोयां नूं मार ना मुक्कदे सी, नित्त खिद्दो वांङ कुट्टदे सी,…
आचार्य प्रशांत: पूरी प्रकृति में आदमी अकेला है जो भटक गया है। और सब जितने भी हैं, वो अपने घर में हैं। वो वहीं हैं, जहाँ उन्हें होना था। वो अपने घर से कभी बाहर निकले ही नहीं।
चारों और देखोगे तो पाओगे कि हर तरफ एक निर्विकल्पता है।…
की जाणां कोई चिणग कखी ए, नित सूल कलेजे सलदा।
बुल्ल्हा, शौह दा न्योंह अनोखा, ओह नहीं रलाइआं रलदा।
~ बुल्ले शाह
प्रश्नकर्ता: मुझे…
अब लगन लगी किह करिए? ना जी सकीए ते ना मरीए।
तुम सुनो हमारी बैना, मोहे रात दिने नहीं चैना, हुन पी बिन पलक ना सरीए। अब लगन लगी किह करीए?
इह अगन बिरहों दी जारी, कोई हमरी प्रीत निवारी, बिन दरशन कैसे तरीए? अब…
सच्च सुणदे लोक ना सहिंदे नी, सच्च आखिए तां गल पैंदे नी, फिर सच्चे पास ना बहिंदे नी, सच्च मिट्ठा आशक प्यारे नूं । चुप्प करके करीं गुज़ारे नूं ।
सच्च शर्हा करे बरबादी ए सच्च आशक दे घर शादी ए, सच्च करदा नवीं…
भरवासा की आशनाई दा, डर लगदा बेपरवाही दा।
~ बुल्लेशाह
आचार्य प्रशांत: आशिकी का क्या भरोसा; बेपरवाही से डर लगता है। वो बेपरवाह है, बुल्लेशाह हों, नानक हों, और कोई भी ‘जानने’ वाला हो, सभी ने यही जाना है: बेपरवाही उसका स्वभाव है। बुल्लेशाह कह रहे हैं, ‘भरोसा की आशनाई…
अपणे संग रलाँई पिआरे, अपणे संग रलाँई।
पहलां नेहुं लगाया सी तैं, आपे चाँई चाँई; मैं पाया ए या तुध लाया, आपणी तोड़ निभाईं।
-बुल्ले शाह
वक्ता: बुल्ले शाह प्रार्थना कर रहे हैं कि ‘निभाना’। ‘अपणे संग रलाँई प्यारे, अपणे संग रलाँई’- निभाना। ऋचा पूछ रही हैं कि बात थोड़ी…
*बुल्हेनूं समझावण आइयां,*भैणा ते भरजाइयां | टेक |
*“मन्न लै बुल्लिहआ साडा कहणा,छड दे पल्ला, राइयां,आल नबी औलादि अली नूं,*तूं क्यों लीकां लाइयां?”
*“जेहड़ा सानूं, सैयद आखे,दोज़ख़ मिले सज़ाइयां,जो कोई सानूं राईं आखे,*भिश्तीं पींघां पाइयां |”
*राईं साईं समनीं…
*जो कोई अन्दर बोले चाले,*ज़ात असाडी सोई |
*जिसदे नाल मैं नेहुं लगाया,*ओहो जिहा मैं होई |
*मिहर करीं ते फ़ज़ल करीं तू,*मैं आज़ज़ दी ढोई |
*नचण लगी तां घुंघट केहा,*…
इक्को रंग कपाई दा
सब इक्को रंग कपाई दा,
इक आपे रूप वटाई दा | टेक |
अरूड़ी ते जो गदों चरावैं,
सो भी वांगी गाईं दा |
सभ नगरां विच आपे वस्से,
ओहो मेहर गराईं दा |
हर जी आपे हर जा खेले,
सदिआ चाईं चाईं दा |
बाग़…
उठ जाग घुराड़े मार नहीं,
एह सौण तेरे दरकार नहीं | टेक |
कित्थे हैं सुलतान सिकंदर,
मौत न छडिया पीर पगम्बर,
सबमें छड़-छड़ गए अडम्बर,
कोई एथे पायेदार नहीं |
जो कुछ करसैं सो कुछ पासैं,
नहीं तां ओड़क पच्छो तासैं,
सुंजी कूंज वांग कुरलासैं,
खभां बाझ उडार नहीं…
मैनूं कौन पछाणे,
मैं कुझ गो गई होर नी | टेक |
हादी मैनूं सबक़ पढ़ाया,
ओत्थे होर न आया-जाया,
मुतलिक ज़ात जमाल विखाया,
वहदत पाया ज़ोर नी |
अव्वल होके लामकानी,
ज़ाहर बातन दिसदा जानी,
रही न मेरी नाम निशानी,
मिट गया झगड़ा-शोर नी |
प्यारे आप जमाल विखाली,…
घत जादू दिल नूं खसदे सी,
हुण आइओ मेरे वस कर जी |
तुसी मोइआं नूं मार ना मुकदे सी,
नित…
कहूं महजत का करतारा है, कहूं बणिया ठाकुरद्वारा है, कहूं बैरागी जयधारा है,…
We have all put down a book that could have helped us, or dozed off halfway through something that mattered. A man who could not keep food down was given medicine, and he threw that away too, since it went in by the same route. Most of us strike a similar deal: we move into a place that stinks and, within a week, call the smell normal. Show our fifteen-year-old self the life we lead now and they would scoff. What would change if we admitted we do not like our condition?

किसी के मुँह से सुनते ही कि उसे सच मिल गया है, हम उसके पीछे चल पड़ते हैं, जेब भी ढीली कर आते हैं। फिर हम जैसे दो-चार लोग मिलकर एक-दूसरे को दिलासा देते हैं कि हमें भी मिल गया। पर जो सबसे ऊँचा है, वह जेब में डालने की चीज़ नहीं। जो उसे छूने निकला है, वह अभी पूरा बचा हुआ है, और छूते ही उसे अपनी कहानी का पात्र, अपना औज़ार बना लेता है। जिसका सच से सचमुच नाता है, उसकी ज़बान तो नाम लेने में भी काँपती है। तो हम सच खोज रहे हैं, या अपने झूठ को देखने से बच रहे हैं?


भगत सिंह कहते थे "बहरे कानों तक अपनी आवाज़ पहुँचाने के लिए अक्सर धमाकों की ज़रूरत पड़ती है।"
लेकिन उनको कहाँ पता था कि लोगों की स्मृति इतनी कमज़ोर है कि उनके जाने के बाद वे सिर्फ़ उनका 'धमाका' ही याद रखेंगे। और उनको भूल जाएँगे, उनके संघर्ष…

🔥 “मैं तुम्हें प्यार से लूटने आया हूँ” 🔥
देश को आज़ाद हुए 4 साल ही हुए थे, और 75% आबादी कृषि संबंधित कार्यों से जीवनयापन कर रही थी।
लेकिन एक बहुत विचित्र बात थी: कृषि क्षेत्र में काम कर रहे अधिकतर लोगों के पास अपनी ज़मीन ही नहीं…

How many hours do you spend meditating each day?
This is a trick question!
Whether you are “meditating” one hour per day or six, you are not truly meditating. This is because meditation is not something you do to escape life. Meditation is a way of life.
Meditation is to…

Love is great. Love is necessary. Love is beautiful.
But what is love?
For most of us, love is the greatest excitement and comfort—and also the greatest suffering. Whether love has become a problem or something you cherish the most in your life, please go deeper into the matter. Know…

राष्ट्रों का निर्माण किसी समाज की परिष्कृत बुद्धिमत्ता से होना चाहिए था, लेकिन वे सामूहिक अहंकार का दर्पण बन जाते हैं। व्यक्ति जो अपनी संपत्ति के साथ करता है, राष्ट्र वही GDP के साथ करता है—जो गिना और तुलना किया जा सके, उसे योग्यता का प्रमाण मान लेता है। हम इसे समझदारी कहते हैं, फिर आश्चर्य करते हैं कि व्यक्ति और देश दोनों सदा घिरे हुए क्यों महसूस करते हैं, मानो विश्राम करना निषिद्ध हो।

Spirituality is about belonging to existence. Not belonging to a narrow household, or caste or ideology. All these are boundaries. So, wherever there are boundaries, there is violence. Wherever there are boundaries, there is also the fear of being small, powerless, limited. The really non-violent one is at home, everywhere and in every situation. Non-violence is not about following duties. Non-violence is an action in clarity and love. That alone is non-violence.

अलग-अलग नहीं हैं दोनों! बाहर से अलग हैं, अंदर से एक हैं। जिसको हम आध्यात्मिक ज्ञान भी कहते हैं, वह बस मन की खोजबीन, जाँच-पड़ताल का नाम है। हमें दोनों चाहिए, विज्ञान भी, अध्यात्म भी। विज्ञान इसीलिए ताकि तुम्हें जगत की हक़ीक़त पता रहे, और अध्यात्म ताकि तुम्हें मन का ज्ञान रहे, तुम्हें पता हो कि ये मन चीज़ क्या है? इन दोनों का ही पता होना चाहिए, जैसे तुम्हारे मन के पखेरू को दो पंख मिल जाएँ, अब वो मुक्ति के आकाश में उड़ जाएगा।

Dr. Ambedkar, one of the greatest minds of modern India, had problems with Hindu culture, but not with Vedanta. Our culture is based on the very periphery of religion and does not resonate with Vedanta. That’s the reason it is in conflict with the Constitution. The Constitution and true religiosity—which you can call self-knowledge or Vedanta—go together.

Man has certain desires. He is seeking the company of the highest, so that his lowest desires can be fulfilled. The highest is just a means, a method and that is the case with all means and methods. Whether the highest is the means, whether the highest is even the end, the real end is always the gratification of the lowly self. Man is such that even if he wants the company or proximity of Gods, it is for the fulfilment of his own personal objectives.

You’re conditioned to think you can only exist with social approval. What holds you back is the fear that something devastating will happen if you don’t conform. Challenge that belief. One must have a healthy contempt for the world, which is possible only when one has deep love for what’s real. Otherwise, you'll keep bowing your head.

संसार में तुम जिस भी चीज़ को शांति का,तृप्ति का साधन बनाओगे वो चीज़ बेचारी असफल हो जाएगी। तुम उसे भोगकर के कुछ और कर देते हो। तो फिर कौन है जो तुम्हें सन्तुष्टि दे सकता है? सिर्फ़ वो जो तुम्हारे स्पर्श से कहीं आगे का हो। तुम्हारा स्पर्श उस पर कोई दाग ही न लगा पाये, जो अस्पर्श्य हो। ऐसे किसी को ही सत्य कहा गया है, परमात्मा कहा गया है। वो तुम्हारे काम का है क्योंकि तुम उस पर हावी नहीं हो सकते। वो तुम्हारे काम का है क्योंकि तुम उसे बदल नहीं सकते।

Questioner: When I do something my parents don’t approve of, they scold me. But sometimes the matter goes too far and I get offended, and then I refrain from talking back to them; I fear that if I say something, I will end up hurting them. But then, if I…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रणाम। मेरा प्रश्न युग के बारे में है। जैसे हम पढ़ते हैं, चार युग होते हैं– सतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग और कलियुग। और जो एक युग होता है उसको लगभग लाखों वर्षों का मानते हैं। जबकि एस्ट्रोफिजिक्स (खगोल भौतिकी) के अनुसार जो स्टार्स (तारों) की पोजीशन (स्थिति) है,…

प्रश्नकर्ता: आत्मा और अहंकार ये सारी इंटेलेक्चुअल लेवल (बौद्धिक स्तर) पर समझ में आती हैं। लेकिन अनुभव के स्तर पर कहीं-न-कहीं हम इनको एक तरीक़े से मान रहे हैं, जान नहीं पा रहे अन्दर से कि हम आत्मा हैं। ये परिवर्तन कैसे हो?
आचार्य प्रशांत: कुछ नहीं समझना होता, जीना…

Questioner: Sir, as a law student, Every student has a concern about whether it is about environmental concerns, there is a lot of environmental pollution etc. Also, it is about poverty concern or corruption or any other social issue but then when we get out of college we get start…