Baba Bulleh Shah

जिस तन लगिया इश्क़ कमाल || आचार्य प्रशांत, बाबा बुल्लेशाह पर (2018)
जिस तन लगिया इश्क़ कमाल || आचार्य प्रशांत, बाबा बुल्लेशाह पर (2018)
17 min

जिस तन लगिआ इश्क़ कमाल,

नाचे बेसुर ते बेताल | टेक |

दरदमंद नूं कोई न छेड़े,

जिसने आपे दुःख सहेड़े,

जम्मणा जीणा मूल उखेड़े,

बूझे अपणा आप खिआल

जिसने वेस इश्क़ दा कीता,

धुर दरबारों फ़तवा लीता,

जदों हजूरों प्याला पीता,

कुछ ना रहा सवाल जवाब

जिसदे अन्दर वस्स्या

अब तो जाग मुसाफ़िर प्यारे!
अब तो जाग मुसाफ़िर प्यारे!
125 min
"अब तो जाग मुसाफ़िर प्यारे" का अर्थ है, कि जब ये सुन रहा है मुसाफिर, जब तू ये बात सुन रहा है, तभी जग जा। अब से अर्थ है, अभी। और अभी माने, जब जग रहे हो, जब सुन रहे हो, तभी। सुनने के लिये जगना आवश्यक है। सुनने के लिए जगना आवश्यक है। तो जब भी तुम इन वचनों को सुन रहे हो, बस तभी उठ के बैठ जाओ। जब भी सुन रहे हो, तभी उठ जाओ।
भगवान निर्दयी से क्यों लगते हैं?
भगवान निर्दयी से क्यों लगते हैं?
24 min
भगवान किसी और को सूली पर कहाँ चढ़ा रहे हैं? वो ही हैं, अपने आप को ही सूली दे रहे हैं। खुद ही जाते हैं सिपाही बनकर; खुद ही पकड़ लाते हैं किसी संत को, फिर खुद ही न्यायलय में न्यायाधीश बन बैठते हैं, खुद को ही झूठी सज़ा सुना देते हैं, फिर खुद ही जल्लाद हो जाते हैं; फिर खुद ही सूली हो जाते हैं, फिर खुद को ही सूली पर चढ़ा देते हैं। और किसको मार रहे हैं वो? दया इत्यादि तो दूसरों पर की जाती है। जहाँ द्वैत ही नहीं, वहाँ दया कैसी। किस पर दया करनी है?
श्री कृष्णमूर्ति और बाबा बुल्लेशाह
श्री कृष्णमूर्ति और बाबा बुल्लेशाह
9 min
जिन्होंने कृष्णमूर्ति से मुलाक़ात की हुई है, वो बुल्लेशाह में और प्रगाढ़ता से प्रवेश कर पाएँगे, बल्कि मैं कहूँगा वही समझ पाएँगे बुल्लेशाह को। और जो बुल्लेशाह के कायल हैं, वो जब कृष्णमूर्ति के पास जाएँगे तो उन्हें ऐसा लगेगा किसी अपने के पास आएँ हैं, इनको तो हम जानते हैं, ये वही बात तो कह रहे हैं। ये वही बात कह रहे हैं, जिस पर हम नाच कर आये हैं। बस सफ़ाई से कह रहे हैं, ज़्यादा व्यवस्था के साथ कह रहे हैं, बिना रंगरोगन के कह रहे हैं।
Let the Words Take You to Silence – Baba Bulle Shah
Let the Words Take You to Silence – Baba Bulle Shah
23 min
There is such great fun in leaving yourself behind and turning a servant to the Truth. It’s almost like Krishna advising Arjuna, “Talk in everlasting words and dedicate them all to Me—*mām ekaṃ śaraṇaṃ vraja, sarva-dharmān parityajya*.” And at numerous places in the *Bhagavad Gita*, he says, “Arjuna, you are not fighting for yourself, you are fighting for Me. As long as you fight for yourself, if you win, you suffer, and if you lose, you suffer. And when you fight for Me, then you are a victor even before the fight begins.”
क्या मैं धर्म अनुसार आचरण कर रहा हूँ?
क्या मैं धर्म अनुसार आचरण कर रहा हूँ?
15 min

प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी। मेरा नाम गवाक्ष जोशी है। मैं आइआइटी कानपुर में पीएचडी का छात्र हूँ। और विद्युत अभियान्त्रिकी विभाग से। मेरा प्रश्न धर्म को लेकर है। मैं हितोपदेश मित्रलाभ पढ़ रहा था! तो एक श्लोक आया था मेरे सामने, जिसका अर्थ ये था — भोजन, निद्रा, भय और

In the middle of your wounds, celebrate! || Acharya Prashant, on Saint Kabir (2017)
In the middle of your wounds, celebrate! || Acharya Prashant, on Saint Kabir (2017)
8 min

Questioner (Q): I read some couplets by Saint Kabir and they touched me deeply. He wants to become one with God or Truth so much, but he is pained that he is unable to do that. At times I feel like meeting Him is the only thing left for me

सच से नफ़रत भी काम आती है || आचार्य प्रशांत (2017)
सच से नफ़रत भी काम आती है || आचार्य प्रशांत (2017)
9 min

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मैं अपने मित्र को आपके पास लाना चाहता हूँ, लेकिन मन में शंका उठती है कि कहीं वो बाद में मुझे गालियाँ न दे।

आचार्य प्रशांत: तो तुम पक्का करो न कि वो गालियाँ दे ही रहा है, ताकि शंका मिट जाए पूरी। शंका का अर्थ है

मेले, उत्सव, पार्टियाँ - इनमें एक खास चीज़ देखी कि नहीं? || आचार्य प्रशांत (2023)
मेले, उत्सव, पार्टियाँ - इनमें एक खास चीज़ देखी कि नहीं? || आचार्य प्रशांत (2023)
24 min

प्रश्नकर्ता: नमस्ते सर। मुझे ये समझ में कई बार नहीं आता कि जब मैं किसी माहौल में होती हूँ तो जैसे बार-बार ये बात होती है कि माया को हमें सत्य नहीं समझना चाहिए। लेकिन जैसे मैं आज दशहरा मेले में अपने बच्चों को लेकर गयी तो मैं वहाँ पर

भक्ति और ज्ञान, दोनों की मंज़िल एक है || आचार्य प्रशांत, बाबा बुल्लेशाह और आदि शंकराचार्य पर (2019)
भक्ति और ज्ञान, दोनों की मंज़िल एक है || आचार्य प्रशांत, बाबा बुल्लेशाह और आदि शंकराचार्य पर (2019)
11 min

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी, "इक अलफ़ पढ़ो छुटकारा ए।"

बाबा बुल्लेशाह जी कहते हैं कि बस अल्लाह का नाम लो, उसी में मुक्ति है। जबकि आदि शंकर जी कहते हैं कि दुख का मूल कारण ही अज्ञान है और अज्ञान नेति-नेति से ख़त्म होता है। और बाबा बुल्लेशाह जी कह

The myth of the child’s innocence || Acharya Prashant (2018)
The myth of the child’s innocence || Acharya Prashant (2018)
13 min

Questioner: Although we start speaking, listening and interacting with the world between the age of two and three years, we do not remember much from our early childhood. In one of your videos, you said that when pure witnessing happens, it doesn’t get registered in the memory. Is this the

माटी कुदम करेंदी यार || आचार्य प्रशांत, बाबा बुल्लेशाह पर (2023)
माटी कुदम करेंदी यार || आचार्य प्रशांत, बाबा बुल्लेशाह पर (2023)
26 min

माटी कुदम करेन्दी यार, वाह वाह माटी दी गुलज़ार। माटी कुदम करेन्दी यार, वाह वाह माटी दी गुलज़ार। माटी घोड़ा, माटी जोड़ा, माटी दा असवार। माटी घोड़ा, माटी जोड़ा, माटी दा असवार। माटी कुदम करेन्दी यार, वाह वाह माटी दी गुलज़ार। माटी कुदम करेन्दी यार, वाह वाह माटी दी गुलज़ार।

तुम्हारा मन तुम्हारा है भी? || आचार्य प्रशांत, बाबा बुल्लेशाह पर (2019)
तुम्हारा मन तुम्हारा है भी? || आचार्य प्रशांत, बाबा बुल्लेशाह पर (2019)
9 min

बलिया आशिक़ होइआ रब्ब दा, मलामत हुई लाख, तैनूं लोकीं काफ़िर आखदें, तूं आहो-आहो आख। ~ संत बुल्लेशाह जी

बुल्ला रब का आशिक़ हो गया है और चारों तरफ़ से लानतें मिल रही हैं। लोग आकर के रब के आशिक को काफ़िर कह रहे हैं और बुल्लेशाह इसे स्वीकार कर

जिस तन लगिया इश्क कमाल || आचार्य प्रशांत, बाबा बुल्लेशाह पर (2023)
जिस तन लगिया इश्क कमाल || आचार्य प्रशांत, बाबा बुल्लेशाह पर (2023)
26 min

जिस तन लगिआ इश्क़ कमाल, नाचे बेसुर ते बेताल।

जिसे प्रभु से पूर्ण प्रेम हो जाता है, वह आनन्दमय मस्ती में आकर बेसुर और बेताल नाचने लग जाता है।

दरदमन्द नूं कोई न छेड़े, जिसने आपे दुःख सहेड़े।

उस वेदना भरे जीव को कोई क्या तंग करेगा, जिसने स्वयं अपने

क्या परिवार के साथ रहकर सच को नहीं पाया जा सकता? || आचार्य प्रशांत, बाबा बुल्लेशाह पर (2019)
क्या परिवार के साथ रहकर सच को नहीं पाया जा सकता? || आचार्य प्रशांत, बाबा बुल्लेशाह पर (2019)
16 min

भाग 1

आचार्य प्रशांत: (पत्र पढ़ते हैं) शैलेन्द्र भास्कर हैं, कानपुर से।

मैंनूं कौन पछाणे

हादी मैंनूं सबक पढ़ाया, ओत्थे होर न आया-जाया, मुतलिक ज़ात जमाल विखाया, वहदत पाया ज़ोर नी।

गुरु ने मुझे शिक्षा दी कि यह मार्ग ऐसा है कि वहाँ कोई अन्य आता-जाता नहीं है। गुरु ने

जीवन में कुछ खो जाने का भय हमेशा क्यों रहता है? || आचार्य प्रशांत (2018)
जीवन में कुछ खो जाने का भय हमेशा क्यों रहता है? || आचार्य प्रशांत (2018)
39 min

आचार्य प्रशांत: मैं सवाल को थोड़ा सा पलट देता हूँ। किसी चीज़ का अगर पता ही हो कि खो जाएगी और फिर वह खो जाए, तो ज़्यादा बुरा लगता है या किसी चीज़ के बारे में धारणा हो कि नहीं खोएगी, फिर वह खो जाए तो ज़्यादा बुरा लगता है,

जिसकी ओर बढ़ रहे हो, उसे दिल में बसाकर बढ़ना || आचार्य प्रशांत, बाबा बुल्लेशाह पर (2019)
जिसकी ओर बढ़ रहे हो, उसे दिल में बसाकर बढ़ना || आचार्य प्रशांत, बाबा बुल्लेशाह पर (2019)
14 min

बुल्लिआ हिजरत विच्च इस्लाम दे मेरा नित्त है खास आराम। नित्त नित्त मराँ ते नित्त नित्त जीवाँ मेरा नित्त नित्त कूच मुकाम।

मैं भी हज़रत पैगम्बर की तरह हिज़रत करता हूँ, यात्रा करता हूँ, लेकिन मेरी यात्रा ऐसी है जो तब शुरु होती है, जब मैं बिलकुल शान्त, आराम, विश्राम

जब गुरु दनादन पीटे
जब गुरु दनादन पीटे
8 min

बस्स कर जी हुण बस्स कर जी

काई गल असां नाल हस्स कर जी।

तुसीं दिल मेरे विच वस्सदे सी, तद सानु दूर क्यों दसदे सी,

घत्त जादू दिल नु खस्सदे सी, हुण आइयो मेरे वस कर जी।

तुसीं मोयां नूं मार ना मुक्कदे सी, नित्त खिद्दो वांङ कुट्टदे सी,

बीमारी का पता चलना इलाज की शुरुआत है || आचार्य प्रशांत, बाबा बुल्लेशाह पर (2019)
बीमारी का पता चलना इलाज की शुरुआत है || आचार्य प्रशांत, बाबा बुल्लेशाह पर (2019)
4 min

प्रश्न: आचार्य जी, प्रणाम। विचारों का प्रवाह पहले से अधिक अनुभव होता है। कहाँ-कहाँ की सारहीन बातें मन को घेरे हैं। मन को निरंतर चलता देखकर खीज-सी उठती है, कि ये विचार क्यों और कहाँ से आ रहे हैं। पहले इतना शोर अनुभव नहीं होता था। अब मन यह देखकर

बाज़ी ले गए कुत्ते! || आचार्य प्रशांत, संत बुल्लेशाह पर (2014)
बाज़ी ले गए कुत्ते! || आचार्य प्रशांत, संत बुल्लेशाह पर (2014)
33 min

आचार्य प्रशांत: पूरी प्रकृति में आदमी अकेला है जो भटक गया है। और सब जितने भी हैं, वो अपने घर में हैं। वो वहीं हैं, जहाँ उन्हें होना था। वो अपने घर से कभी बाहर निकले ही नहीं।

चारों और देखोगे तो पाओगे कि हर तरफ एक निर्विकल्पता है।

रोज़ अज़ल दा || संत बुल्लेशाह पर (2014)
रोज़ अज़ल दा || संत बुल्लेशाह पर (2014)
4 min

मैनूं लगड़ा इश्क़ अवलड़ा अव्वल दा, रोज़ अज़ल दा।

विच कड़ाही तिल-तिल पावे, तलिआं नूं चा तलदा।

मोइआं नूं एह वल-वल मारे, दलियां नूं एह दलदा।

की जाणां कोई चिणग कखी ए, नित सूल कलेजे सलदा।

बुल्ल्हा, शौह दा न्योंह अनोखा, ओह नहीं रलाइआं रलदा।

~ बुल्ले शाह

प्रश्नकर्ता: मुझे

अब लगन लगी की करिये || आचार्य प्रशांत, बाबा बुल्लेशाह पर (2014)
अब लगन लगी की करिये || आचार्य प्रशांत, बाबा बुल्लेशाह पर (2014)
5 min

अब लगन लगी की करिये

अब लगन लगी किह करिए? ना जी सकीए ते ना मरीए।

तुम सुनो हमारी बैना, मोहे रात दिने नहीं चैना, हुन पी बिन पलक ना सरीए। अब लगन लगी किह करीए?

इह अगन बिरहों दी जारी, कोई हमरी प्रीत निवारी, बिन दरशन कैसे तरीए? अब

सच मिट्ठा आशिक प्यारे नू || आचार्य प्रशांत, संत बुल्लेशाह पर (2014)
सच मिट्ठा आशिक प्यारे नू || आचार्य प्रशांत, संत बुल्लेशाह पर (2014)
3 min

चुप्प कर के करीं गुज़ारे नूं

सच्च सुणदे लोक ना सहिंदे नी, सच्च आखिए तां गल पैंदे नी, फिर सच्चे पास ना बहिंदे नी, सच्च मिट्ठा आशक प्यारे नूं । चुप्प करके करीं गुज़ारे नूं ।

सच्च शर्हा करे बरबादी ए सच्च आशक दे घर शादी ए, सच्च करदा नवीं

मैं इतनी चिंता क्यों करता हूँ? || आचार्य प्रशांत, संत बुल्लेशाह पर (2015)
मैं इतनी चिंता क्यों करता हूँ? || आचार्य प्रशांत, संत बुल्लेशाह पर (2015)
7 min

भरवासा की आशनाई दा, डर लगदा बेपरवाही दा।

~ बुल्लेशाह

आचार्य प्रशांत: आशिकी का क्या भरोसा; बेपरवाही से डर लगता है। वो बेपरवाह है, बुल्लेशाह हों, नानक हों, और कोई भी ‘जानने’ वाला हो, सभी ने यही जाना है: बेपरवाही उसका स्वभाव है। बुल्लेशाह कह रहे हैं, ‘भरोसा की आशनाई

गहरा प्रेम, गहरा विरोध || आचार्य प्रशांत, संत बुल्लेशाह पर (2014)
गहरा प्रेम, गहरा विरोध || आचार्य प्रशांत, संत बुल्लेशाह पर (2014)
19 min

अपणे संग रलाँई पिआरे, अपणे संग रलाँई।

पहलां नेहुं लगाया सी तैं, आपे चाँई चाँई; मैं पाया ए या तुध लाया, आपणी तोड़ निभाईं।

-बुल्ले शाह

वक्ता: बुल्ले शाह प्रार्थना कर रहे हैं कि ‘निभाना’। ‘अपणे संग रलाँई प्यारे, अपणे संग रलाँई’- निभाना। ऋचा पूछ रही हैं कि बात थोड़ी

इश्क़ दी नवियों नवीं बहार || आचार्य प्रशांत, संत बुल्लेशाह पर ( 2014)
इश्क़ दी नवियों नवीं बहार || आचार्य प्रशांत, संत बुल्लेशाह पर ( 2014)
13 min

बुल्हे नूं समझावण आइयां

*बुल्हेनूं समझावण आइयां,*भैणा ते भरजाइयां | टेक |

*“मन्न लै बुल्लिहआ साडा कहणा,छड दे पल्ला, राइयां,आल नबी औलादि अली नूं,*तूं क्यों लीकां लाइयां?”

*“जेहड़ा सानूं, सैयद आखे,दोज़ख़ मिले सज़ाइयां,जो कोई सानूं राईं आखे,*भिश्तीं पींघां पाइयां |”

*राईं साईं समनीं

हम गुम हुए || आचार्य प्रशांत, संत बुल्लेशाह पर (2014)
हम गुम हुए || आचार्य प्रशांत, संत बुल्लेशाह पर (2014)
15 min

की जाणां

*की जाणां मैं कोई रे बाबा,*की जाणां मैं कोई | टेक |

*जो कोई अन्दर बोले चाले,*ज़ात असाडी सोई |

*जिसदे नाल मैं नेहुं लगाया,*ओहो जिहा मैं होई |

*मिहर करीं ते फ़ज़ल करीं तू,*मैं आज़ज़ दी ढोई |

*नचण लगी तां घुंघट केहा,*

इक्को रंग कपाई दा || आचार्य प्रशांत, संत बुल्लेशाह पर (2014)
इक्को रंग कपाई दा || आचार्य प्रशांत, संत बुल्लेशाह पर (2014)
11 min

इक्को रंग कपाई दा

सब इक्को रंग कपाई दा,

इक आपे रूप वटाई दा | टेक |

अरूड़ी ते जो गदों चरावैं,

सो भी वांगी गाईं दा |

सभ नगरां विच आपे वस्से,

ओहो मेहर गराईं दा |

हर जी आपे हर जा खेले,

सदिआ चाईं चाईं दा |

बाग़

उठ जाग घुराड़े मार नहीं || आचार्य प्रशांत, संत बुल्लेशाह पर (2014)
उठ जाग घुराड़े मार नहीं || आचार्य प्रशांत, संत बुल्लेशाह पर (2014)
12 min

उठ जाग घुराड़े मार नहीं,

एह सौण तेरे दरकार नहीं | टेक |

कित्थे हैं सुलतान सिकंदर,

मौत न छडिया पीर पगम्बर,

सबमें छड़-छड़ गए अडम्बर,

कोई एथे पायेदार नहीं |

जो कुछ करसैं सो कुछ पासैं,

नहीं तां ओड़क पच्छो तासैं,

सुंजी कूंज वांग कुरलासैं,

खभां बाझ उडार नहीं

मैंनू कौन पछाणै  बुल्ले शाह
मैंनू कौन पछाणै बुल्ले शाह
5 min

मैनूं कौन पछाणे,

मैं कुझ गो गई होर नी | टेक |

हादी मैनूं सबक़ पढ़ाया,

ओत्थे होर न आया-जाया,

मुतलिक ज़ात जमाल विखाया,

वहदत पाया ज़ोर नी |

अव्वल होके लामकानी,

ज़ाहर बातन दिसदा जानी,

रही न मेरी नाम निशानी,

मिट गया झगड़ा-शोर नी |

प्यारे आप जमाल विखाली,

बस कर जी || आचार्य प्रशांत, संत बुल्लेशाह पर (2014)
बस कर जी || आचार्य प्रशांत, संत बुल्लेशाह पर (2014)
4 min

बस कर जी, हुण बस कर जी,

काई गल असां नाल हस कर जी | टेक |

तुसीं दिल मेरे विच वसदे सी,

तद सानूं दूर क्यों दसदे सी,

घत जादू दिल नूं खसदे सी,

हुण आइओ मेरे वस कर जी |

तुसी मोइआं नूं मार ना मुकदे सी,

नित

पाया है कुछ पाया है || संत बुल्लेशाह पर (2017)
पाया है कुछ पाया है || संत बुल्लेशाह पर (2017)
4 min

सभी श्रोता (गाते हुए):

पाया है कछु पाया है, मेरे सतगुरु अलख लगाया है

कहूं बैर पड़ा कहूं बेली है, कहूं मजनूं है कहूं लेली है, कहूं आप गुरु कहूं चेली है, आप आपका पंथ बताया है।

कहूं महजत का करतारा है, कहूं बणिया ठाकुरद्वारा है, कहूं बैरागी जयधारा है,

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अर्जुन की विशेषता उनकी पूर्णता में नहीं, बल्कि सत्य के प्रति उनकी ईमानदारी में थी। उन्होंने अपने भ्रम, भय, मोह और संदेहों को छिपाया नहीं, बल्कि उनका सामना किया। दूसरों की तरह किसी पक्ष से चिपकने के बजाय उन्होंने निष्पक्ष होकर देखने की इच्छा दिखाई और अपने से ऊँची बुद्धि के मार्गदर्शन को स्वीकार किया। वास्तविक श्रेष्ठता त्रुटिहीन होने में नहीं, बल्कि सीखने, बदलने और सत्य के लिए अपने अहंकार से ऊपर उठने की क्षमता में है।
"I was a Hardcore Hindu - and now I don't like Religion"
"I was a Hardcore Hindu - and now I don't like Religion"
24 min
Human beings are born into uncertainty, surrounded by beliefs, identities, and social conditioning that offer ready-made answers to fundamental questions. Real spirituality begins not with accepting collective or personal beliefs, but with honestly examining one’s own suffering, fears, and false identities. The journey is not toward comforting ideas, but toward self-inquiry, where truth is discovered through questioning, observation, and the gradual rejection of illusion.
Doctors: Why Respect Is Disappearing
Doctors: Why Respect Is Disappearing
21 min
A society that loses its sense of sacredness begins to see every person and profession as merely transactional. When truth is replaced by the pursuit of happiness and consumption, trust erodes and cynicism becomes the norm. Doctors, teachers, and institutions are no longer respected but viewed with suspicion. The deeper crisis is not medical or social but philosophical: without self-understanding, people become consumers first and human beings second. True respect can return only when truth, integrity, and inner education become more important than personal gain.
‘अल्लाह में यकीन रखो’ का अर्थ
‘अल्लाह में यकीन रखो’ का अर्थ
11 min
प्रार्थना का अर्थ किसी बाहरी शक्ति से इच्छाएँ माँगना नहीं, बल्कि स्वयं को उसके सामने पूर्णतः समर्पित कर देना है। जब तक अहंकार और व्यक्तिगत कर्तापन बना रहता है, प्रार्थना अधूरी रहती है। सच्ची प्रार्थना में व्यक्ति का सीमित “मैं” मिटता है और उसके कर्म बोध तथा सत्य से संचालित होने लगते हैं। तब जीवन में सही निर्णय स्वाभाविक रूप से होते हैं और बाहरी समस्याओं का समाधान भी उसी जागरूकता से निकलता है।
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