
प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। मेरा नाम आकांक्षा है। मेरे मन में काफ़ी टाइम से कुछ प्रश्न चल रहे थे, बट मैं आपसे पूछ नहीं पा रही थी, संकोच था। आज हम ऋषिकेश में हैं, तो मैं सोच रही हूँ इस मौक़े पर मैं आपसे पूछ ही लेती हूँ। तो मैं लिख के लाई हूँ, वन बाय वन। क्या मैं आपसे पूछ सकती हूँ?
आचार्य जी, आप कहते हैं कि ज्योतिष का कोई वैज्ञानिक सबूत नहीं है इसलिए वह ठीक नहीं है। ऐसे तो अद्वैत वेदांत का भी कोई साइंटिफिक प्रूफ नहीं है, तो विज्ञान की कसौटी पर सिर्फ़ ज्योतिष को क्यों परखा जा रहा है? आपके अपने दार्शनिक दावों को क्यों नहीं?
आचार्य प्रशांत: आप कह रही हैं कि आचार्य जी, आप ज्योतिष को ख़ारिज करते हैं क्योंकि वह अवैज्ञानिक है और उसका कोई वैज्ञानिक सबूत नहीं होता। तो वैज्ञानिक सबूत तो अद्वैत वेदांत का भी नहीं है, तो आप उसको क्यों नहीं ख़ारिज कर देते?
अरे बाबा, दो अलग-अलग आयाम हैं, दो बहुत अलग क्षेत्र हैं। दो अलग कोटियाँ हैं, कैटेगरीज़ हैं। इनको आपस में क्यों मिला रहे हो? ज्योतिष जो बोलता है, उसकी परख विज्ञान को करनी पड़ेगी क्योंकि ज्योतिष भौतिक दावे करता है, मटेरियल को लेकर के कुछ बोलता है, जगत को लेकर के भविष्यवाणियाँ करता है और दावे रखता है। और वो क्षेत्र किसका है? विज्ञान का। तो विज्ञान कहेगा, अच्छा, ठीक है, तुम कह रहे हो कि शनि की फलानी अवस्था से मनुष्य पर यह प्रभाव पड़ेगा, तो हम नापे ही लेते हैं कि शनि से मनुष्य पर कितना पड़ता है। वो क्षेत्र विज्ञान का है, भाई। तो इसीलिए ज्योतिष जो कुछ कह रहा है, उसको विज्ञान की कसौटी पर परखना पड़ेगा।
और वेदांत जो कह रहा है, वह बात अहंकार के लिए है मात्र। और अहंकार विज्ञान की परिभाषा से ही बाहर का है। भूलना नहीं कि विज्ञान परिभाषा से ही ऑब्जेक्टिव होता है। और अहंकार क्या है? सब्जेक्ट है। विज्ञान बात करता है इसकी, इसकी, इसकी (बाहर की) और अहंकार यहाँ (अपने भीतर) है। विज्ञान की किसी भी किताब में, किसी परिभाषा में, किसी साइंटिफिक इक्वेशन में सेल्फ नाम का वेरिएबल देखा है? आई नाम का कोई वेरिएबल या कॉन्स्टेंट कुछ भी देखा है? आई? आई, डिनोटिंग द सेल्फ, देखा है क्या?
तो बात क्या साफ़ नहीं है कि विज्ञान सेल्फ की बात ही नहीं करना चाहता? विज्ञान सिर्फ़ किसकी बात करना चाहता? बहुत ईमानदारी से बात करता है विज्ञान। मैं हूँ और यह टेबल है। ठीक है? विज्ञान सीधे-सीधे कह देगा कि आप दोनों के बीच में एक बल लगेगा और साधारण-सी उसकी वो इक्वेशन दे देगा, Gm1m2/r²।
मान लो कि मेरा वज़न है 80 किलो और मान लो कि इनका वज़न भी है 80 किलो। यह टेबल है। इसका कुछ मास है, कॉन्स्टेंट है। मैं खड़ा हूँ, तो विज्ञान के लिए मैं भी एक मास हूँ, सेल्फ नहीं हूँ। मैं खड़ा हूँ, तो जितना फ़ोर्स होगा, इनको यहाँ खड़ा कर दिया जाए, ये भी 80 किलो की हैं, उतना ही होगा। भले ही यहाँ पर आई इनके आई से बहुत अलग हो, कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता।
बुद्ध 80 किलो के हों और अंगुलिमाल भी 80 किलो का हो, दोनों पर ग्रेविटेशनल पुल बराबर लगेगा, क्योंकि विज्ञान को क्वालिटी ऑफ़ सेल्फ से कोई मतलब नहीं है। बात समझ में आ रही है? विज्ञान सिर्फ़ मटेरियल की बात करता है और ज्योतिष भी चूँकि मटेरियल की बात करता है, तो इसलिए वो विज्ञान के दायरे में आता है। अद्वैत वेदांत वो बात बोल रहा है, जो विज्ञान की परिभाषा के बाहर की है।
यहाँ पर एक पेंडुलम लटक रहा है, आप सब उस पेंडुलम को देख पा रहे हो, घडी है यहाँ पर। घडी है घडी में नीचे पेंडुलम है। आप सब के अहंकार को स्थिति कुछ अलग-अलग होगी आपस में? होगी कि नहीं होगी? पर आप जितने भी लोग हों वहाँ पर जो टाइम पीरियड है वो 2π√(l/g) ही रहेगा। उसमें कहीं आई आएगा? क्योंकि ऑब्जेक्टिव है। आप क्या हो, विज्ञान ये देखना भी नहीं चाहता। आप आनंद में थे, तो भी कितना था टाइम पीरियड? 2π√(l/g). आप घोर दुख में हो, तो भी टाइम पीरियड कितना है? 2π√(l/g). सेल्फ की अवस्था पूरी बदल गई। जो ज़बरदस्त आनंद में था, सच्चिदानंद में था, वो नारकीय दुख में चला गया। तो वो तब भी 2π√(l/g) ही रहा। तो अद्वैत वेदांत जो बात कर रहा है, वो विज्ञान की परिभाषा के बाहर की है।
तो अगर कोई कहे कि आचार्य जी, आप जितने दावे कर रहे हो, विज्ञान तो उनका समर्थन नहीं करता। अरे, विज्ञान न उनका समर्थन कर सकता है, न विरोध कर सकता है। जो दावे करे जा रहे हैं, वह विज्ञान की परिधि के बाहर के हैं। और जो दावे करे जा रहे हैं, वह किसी आकाशीय सत्ता से नहीं करे जा रहे। वो दावे प्रति व्यक्ति के जीवन के अपने अनुभव हैं। वेदांत बात करता है दुख की, बंधन की, छल की, भ्रम की और फिर आनंद और मुक्ति की। क्या यह आप सबके अपने अनुभव नहीं हैं? बोलिए।
तो इसमें दावे जैसी क्या बात है? यह कोई यह थोड़ी कहा जा रहा है कि सिर्फ़ मैं अमेरिका गया था और सिर्फ़ मैंने स्टैच्यू ऑफ़ लिबर्टी देखी है, तो मैं तुमको दावे के साथ बता रहा हूँ कि वो संगमरमर की है और तुम सबको मानना पड़ेगा, क्योंकि जो मैंने देखा है, वो सिर्फ़ मैंने देखा है। तुम में से किसी ने नहीं देखा है। वेदांत जो बात कर रहा है, भाई, वो आप सबकी है। उसमें कोई दावा क्या करेगा, अथॉरिटी बन के? आपको सुख-दुख, बंधन नहीं पता है क्या? आप नहीं छटपटाते हो क्या मुक्ति के लिए? तो सारी बातें आपकी हैं।
तो वेदांत के दावों को विज्ञान तो नहीं परख सकता, पर इंसान परख सकता है।
और यह बात बड़ी विचित्र है। मतलब, ये आपसे कुछ नहीं कह रहा हूँ, आप सारे प्रश्न पूछिएगा। पर अगर कोई यह कहता है कि वेदांत की बात भी तो वैज्ञानिक नहीं है, तो यह लगभग ऐसी-सी बात है कि कोई कहे कि पेंडुलम से प्यार नापना है। भाई, तुम ऐसी चीज़ को ऐसी चीज़ से जोड़ रहे हो, जो जुड़ ही नहीं सकते। थर्मामीटर से ज्ञान नापना है। आचार्य जी, हमने थर्मामीटर लगाया, आपका भी 98.4 आया। इसका मतलब आप में भी उतना ही अज्ञान है, जितना सब में है। ये क्या पागलपन है? तुम किस चीज़ की तुलना किस चीज़ से कर रहे हो?
वैसे ही ये लोग आ जाते हैं। कहते हैं, आप बार-बार कहते हो आत्मा, आत्मा, ब्रह्म, ब्रह्म। ये ब्रह्म और आत्मा बोलते रहते हैं, सत्य बोलते रहते हैं। अरे, ब्रह्म का कोई ठोस साइंटिफिक सबूत है क्या? और अगर ब्रह्म का कोई साइंटिफिक सबूत नहीं है, तो ब्रह्म भी तो सुपरस्टिशन है। झुन्नू वैज्ञानिक हो गया, ग़ज़ब! कह रहे हैं कि अगर आत्मा का कोई ठोस वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है, तो ये आचार्य जी, जो आप आत्मा-आत्मा करते रहते हो, वो भी तो अंधविश्वास ही हुआ।
बाबा, विज्ञान प्रमाण सिर्फ़ किसका दे सकता है? पदार्थ के होने या न होने का। आत्मा पहली बात, पदार्थ नहीं; दूसरी बात, आत्मा वो जो कुछ भी नहीं, तो विज्ञान उसका प्रमाण कहाँ से लाएगा? आत्मा तो एक अनुपस्थिति का नाम है। एक एब्सेंस का नाम है। विज्ञान उसका प्रमाण कहाँ से ले आएगा? कुछ हो, तो उसका प्रमाण दिया जा सकता है। आत्मा की बात तो हमेशा नकार की भाषा में, नेति-नेति की भाषा में होती है। तो आत्मा का कौन प्रमाण ले आएगा? लड्डू होती आत्मा, तो उसका प्रमाण ले आते। या छाती में कोई गाँठ होती, कोई सिस्ट होता, कोई ट्यूमर होता, तो उसका प्रमाण भी विज्ञान लेगा।
अहंकार को ही नहीं खोज सकता विज्ञान, तो आत्मा को कहाँ से खोजेगा? विज्ञान सिर्फ़ किसको खोज सकता है? वो जिसकी मटेरियल प्रॉपर्टीज़ हों, जिसका मास हो, जिसकी टाइम में कुछ स्टेबिलिटी, ड्यूरेबिलिटी हो, जिसको किसी इंस्ट्रूमेंट से मेज़र करा जा सकता हो। सिर्फ़ उसको विज्ञान कहेगा कि वो है।
ऐसे समझ लो कि जो कुछ तुम्हारी इंद्रियों में आता है न, बस वही विज्ञान का क्षेत्र है। तुम्हारी इंद्रियों में भौतिक पदार्थ आते हैं और तुम्हारे मन में परिभाषाएँ आती हैं। तो यही विज्ञान का क्षेत्र है। विज्ञान और इंद्रियाँ, इंद्रियों में मन को भी शामिल कर रहा हूँ, मन, बुद्धि, सब अंतःकरण। विज्ञान और इंद्रियाँ एक साथ चलते हैं। आत्मा क्या इंद्रियों का विषय है? जब आत्मा इंद्रियों का विषय नहीं, तो आत्मा विज्ञान का विषय कहाँ से हो गया पागल। यह कैसा बुद्धू जैसा सवाल है?
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मेरा अगला सवाल यह है कि कई बार आपने सेशंस में कहा है कि अगर आपकी फेवरेट फिलॉसफी पूछी जाए, तो वेदांत है और संयोग से आप हिंदू परिवार में जन्मे हैं। अगर आप मुस्लिम या ईसाई परिवार में पैदा होते, तो क्या वेदांत आपकी फेवरेट फिलॉसफी होती? और अगर नहीं, तो फिर वेदांत की सर्वश्रेष्ठता के दावे की निष्पक्षता की पुष्टि मैं कैसे करूँ?
आचार्य प्रशांत: तो मैं ये कह रहा हूँ कि वेदांत को मान लो, क्योंकि मैं हिंदू हूँ? तुम्हें मानना पड़ेगा, क्योंकि मैं हिंदू हूँ और हिंदू ही नहीं हूँ। अरे, ब्राह्मण हूँ। और ब्राह्मण ही नहीं हूँ, शांडिल्य गोत्र है, ब्राह्मणों में भी उच्च गोत्रीय हूँ। मानो! मानना पड़ेगा! ये बोल रहा हूँ? ये बोल रहा हूँ? या आपके सामने आपके दिल की बात रख रहा हूँ? आपको अपना वंश बता रहा हूँ या आपके जीवन में आपके साथ आकर बैठ रहा हूँ? बोलिए।
श्रोता: साथ आकर बैठ रहे हैं।
आचार्य प्रशांत: मेरे हिंदू होने या न होने से मेरी बात पर क्या फ़र्क़ पड़ जाता है? ये ऐसी-सी बात है कि अगर आप न्यूटनस् इक्वेशंस का इस्तेमाल कर रही हैं, तो मैं आपसे कहूँ, ईसाई हो गई क्या? अरे भाई, न्यूटन की इक्वेशंस का न्यूटन की जात से क्या लेना-देना। वो आपके सामने प्रमाण के साथ कुछ तर्क रख रहा है, वो आपसे यह थोड़ी कह रहा है, मेरी बात इसलिए मानो क्योंकि मैं क्रिश्चियन हूँ। वो यह कह रहा है क्या? वो आपको अपनी ईसाइयत नहीं दे रहा। वो आपको अपनी डिराइव्ड इक्वेशंस दे रहा है, फ्रॉम फंडामेंटल प्रिंसिपल्स, व्हिच कम फ्रॉम जनरल ऑब्ज़र्वेशंस।
सेब सिर्फ़ न्यूटन के लिए नहीं गिरता है, आपके लिए भी गिरता है। ग्रेविटी सिर्फ़ न्यूटन को नहीं खींचती, आपको भी खींचती है। कैलकुलस में बात जो न्यूटन ने समझाई है, वो कोई डिवाइन रेवेलेशन नहीं है। वो फर्स्ट प्रिंसिपल्स का डेमोंस्ट्रेशन है। ऐसा डेमोंस्ट्रेशन, जिसको आप भी इंडिपेंडेंटली वेरीफ़ाई कर सकते हो। मैं भी आपसे जो बात बोल रहा हूँ, वो मेरे हिंदू होने से थोड़ी आ रही है। मैं आपसे वो बात बोल रहा हूँ, जो जनरल है, सार्वजनिक है। आपके जीवन की है, आप ख़ुद उसकी पुष्टि कर सकते हो।
अब आप पूछो कि अच्छा, ठीक है। चलिए, ये सब बातें तो आपने बोल दीं। तो वेदांत ही क्यों चुना है? कारण बहुत सीधा है, आत्मा। और कितनी बार तो यह बोल चुका हूँ। दिखा दो कोई और दर्शन, जिसके केंद्र में आत्मा हो।
अच्छा, तो आत्मा वेदांत के केंद्र में है, तो ऐसी क्या ख़ास बात हो गई? ख़ास बात ये हो गई कि जो तड़पता है, उसका नाम मैं है। तो इसीलिए मुझे उस मैं तक जाना है जो दुख से मुक्त है।
वेदांत को सर्वोच्च दर्शन इसलिए मानता हूँ, क्योंकि वो दुनिया-जहान की बातें बाद में करता है। सबसे पहले इस तड़पते हुए मैं की बात करता है। और कोई वजह नहीं है।
बल्कि मुझे ये सुन के बड़ा अद्भुत लग रहा है कि आचार्य जी वेदांत की बात इसलिए करते हैं, क्योंकि हिंदू हैं। हाँ, आचार्य जी ने फलाने बैंक में इंटर्नशिप इसलिए करी, क्योंकि वो यहूदी है। तो ग़ज़ब हो गया। तो ऐसे में जो साहब हैं मेरे जिनके सामने सर झुकाता हूँ, उनको ले क्या बोलोगे? नीरू-नीमा तो दोनों मुसलमान थे। बोलो? और हमने तो जब संत रविदास को गाया है, तो वहाँ भी पूरी तरह डूबे हैं। जब गुरु नानक की वाणी पढ़ते हैं, तो हम वहाँ भी अपने आप को बचाते नहीं हैं, पूरा ही आप्लावित हो जाते हैं। और बाबा बुल्ले शाह! और बात तो मैंने बाइबल पर भी करी है। वो सब गायब हो गया? तो गीता मैं इसलिए बता रहा हूँ, क्योंकि मैं हिंदू हूँ?
वेदांत आपको आपके केंद्र तक ले जाता है, अहम् को आत्मा तक ले जाता है। इसलिए वेदांत; वेदांत भी वो जो वेदांत का लोक-धार्मिक वर्ज़न चलता है, उसकी बात नहीं कर रहा हूँ। विशुद्ध अद्वैत वेदांत कह रहा हूँ। इसलिए विशुद्ध अद्वैत वेदांत को मैं इतना सम्मान देता हूँ। और कोई बात नहीं।
और रही बात कि जाकर के मैंने किसी की बात को बिल्कुल पूरा ही मान लिया हो, वैसा भी नहीं है। अद्वैत वेदांत का भी जो भाष्यकारों ने रूप दिया है, मैं उससे भी सहमत नहीं होता। उदाहरण के लिए कह दिया जाता है, दो सत्य होते हैं: एक व्यवहारिक, एक पारमार्थिक। मैं कहाँ मानता हूँ? बार-बार कहता हूँ कि व्यवहारिक सत्य क्या होता है? सत्य दो कैसे हो सकते हैं? और दो सत्य बता करके आपने लोगों को व्यवहार पर ही रोक दिया, क्योंकि वहाँ पर भी तो सत्य है। मैं तो बार-बार बोलता हूँ कि परमार्थ को व्यवहार से जोड़ना पड़ेगा। सत्य तो एक ही जगह है। कहाँ? परमार्थ में। व्यवहार में तथ्य हो सकता है, सत्य नहीं हो सकता।
तो मैं अद्वैत वेदांत का भी कोई पारंपरिक अंधानुकरण नहीं कर रहा हूँ। मैं आपके सामने कोई पारंपरिक पंडित बनकर नहीं खड़ा हूँ कि मैं पुराने भाष्य ही लाकर के आपको रटा रहा हूँ। हम ज़िंदगियाँ हैं, हम आधुनिक युग के लोग हैं। हमारे पास हमारी आशाएँ हैं, दुख हैं, स्मृतियाँ हैं, घाव हैं, सपने हैं और मुक्त होकर उड़ने की ललक है। हम अपनी ज़िंदगी में जानना चाहते हैं कि क्या उपयोगी है। और जिस हद तक अद्वैत वहाँ उपयोगी है, उस हद तक हम अद्वैत का सम्मान क्यों न करें? और जो कुछ अनुपयोगी है, जहाँ वो जाकर के अपना उपयोग समाप्त कर देता है, वहाँ हम उसको नमस्ते कर देंगे। कोई बुराई नहीं उसमें।
हमारा उत्तरदायित्व किसी विचारधारा, किसी दर्शन के प्रति नहीं है, हमारा उत्तरदायित्व मात्र अपने प्रति है। क्या हम अपने आपको एक मुक्त जीवन दे पा रहे हैं? हाँ या ना? बस यही पहला और आख़िरी सवाल है। आपने लाख दर्शन पढ़ लिए, आप बहुत बड़े अद्वैती हो गए और जीवन आपका बँधा हुआ ही है, तो आपका अद्वैत किसी काम का नहीं।