प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मैं अपने मित्र को आपके पास लाना चाहता हूँ, लेकिन मन में शंका उठती है कि कहीं वो बाद में मुझे गालियाँ न दे।
आचार्य प्रशांत: तो तुम पक्का करो न कि वो गालियाँ दे ही रहा है, ताकि शंका मिट जाए पूरी। शंका का अर्थ है यकीन न होना। तथ्य का सुदृढ़ न होना शंका है। कुछ आश्वस्ति के साथ न पता हो जब, कुछ पक्का न हो जब, तो उसे कहते हैं शंका। कि अभी बात इधर है कि उधर है कुछ पता नहीं चल रहा है। गेंद किसी पाले रुक नहीं रही, तुम रोक ही दो एक पाले। गाली मीठी बात है।
शादियों में, होली पर, कृष्ण के यहाँ तो गाली गायी जाती हैं। गाली में बुराई क्या है, गाली तो आत्मीयता दर्शाती है। बेगानों को गाली देते हैं? मन जिसे अपना मानेगा उसे ही तो गरियेगा। तो दो गाली। भक्त से ज़्यादा भगवान को कोई गरियाता नहीं। बुल्लेशाह साहब की एक काफ़ी है जिसमें कह रहे हैं, “क्यों औले वैह वैह झाकीदा।” गायी है कई लोगों ने यहाँ पर, जानते हैं। अगली पंक्ति याद है?
श्रोतागण: “एह पर्दा किस तों राखी दा?”
आचार्य: ‘वहाँ बैठे-बैठे झाँक रहे हो, ये पर्दा किसके प्रति रखे हो, ये पर्दा किसके खिलाफ़ रखे हो, और वहाँ दूर बैठे-बैठे झाॅंकते क्या हो।’ ये गाली ही तो दी जा रही है और क्या है? मीठी रवायतें रही हैं। भगवान मिलते नहीं तो भक्तों ने ये भी कहा कि जाओ तुमसे बात नहीं करेंगे। इतने यदि प्यारे ही हो तो दूर क्यों बैठे रहते हो। लुका छिपी कैसी। तुमने ही अगर सब रचा है तो अपनी ही रचना से अब अलगाव कैसा।
जिस काफ़ी की मैं बात कर रहा हूँ उसमें आगे पूछते हैं सन्त कि जब तुम ही सारे-के-सारे हो, तो फिर कैसे कहते हो कि न्यारे हो। न्यारा माने जो अलग हो ज़रा, जिसमें ज़रा विशिष्टता हो। “ज्यों आप ही आये सारे हो।” याद है किसी को? तो फिर न्यारे कैसे हो गये तुम। तो ठीक है, अच्छी बात है। ऊपर-ऊपर से देखने में यही लगेगा कि जैसे जब तुम विरोध प्रदर्शित कर रहे हो तो तुम दूरी की आकांक्षा रखते हो। गाली विरोध का प्रतीक लगेगी। लेकिन जो जानते हैं उन्हें अच्छे से पता है कि विरोध करना, पर्दा रखना, अड़ना, हठ करना ये सब तरीके हैं सत्य तक पहुॅंचने के ही। हाँ, जरा आड़े-तिरछे तरीके हैं। तुम कहते हो मुझे चाहिए तो, पर अपने तरीके से चाहिए। मुझे चाहिए तो, पर जरा लम्बे तरीके से चाहिए।






