कद नहीं, अपनी कहानी बदलो

Acharya Prashant

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कद नहीं, अपनी कहानी बदलो
कई तरह के डर—अकेले पड़ने, छवि खोने या छोटा समझे जाने—की जड़ अक्सर अतीत में बनी पहचान और कहानियों में होती है। शरीर की हाइट जैसी चीज़ों को समस्या मानकर उनसे जूझने के बजाय उनकी अप्रासंगिकता को समझकर आगे बढ़ना चाहिए। अतीत को दबाने से मुक्ति नहीं मिलती; उसके करीब जाकर अपनी स्मृतियों, धारणाओं और पुराने पैटर्न को निष्पक्षता से देखना ज़रूरी है। This summary is AI-generated. Please read the full article for complete understanding.

प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी। आज जैसे डिस्कशन हो रहा था, तो उसके साथ अवलोकन भी चल रहा था। बहुत सारे, बहुत सारे अलग-अलग डर हैं। जैसे कभी अकेले हो जाने का डर, कभी साइडलाइन हो जाने का डर, कभी एक जो इमेज बनी हुई है, उसके खो जाने का डर। पर अभी कुछ रोज़ पहले जब मैं बैठी थी गीता कम्युनिटी स्टूडेंट्स के साथ ही, तो उस दौरान भी समझ आ रहा था और आज भी अगर अच्छे से देखूँ, तो गहराई में देखूँ तो एक ही डर है और वो डर पास से ही आ रहा है। जैसे बचपन से ही मुझे एक टाइनी, ये टैग दिए जाने का, कहलाने का या कोई सोचे इस चीज़ का बहुत डर रहता था।

जैसे-जैसे बड़ी हुई, 9th, 10th, 8th तक तो समझ ही नहीं आता था कि ये चीज़ क्या है। तो अपना मस्त रहती थी। पर धीरे-धीरे, धीरे-धीरे कभी पेरेंट्स, कभी सिबलिंग, कभी रिलेटिव, कभी स्कूल, सब जगह से इस तरह से आता था कि टाइनी हो, छोटे हो। तो धीरे-धीरे वो चीज़ अब मुझे आज भी कहीं न कहीं मैंने ही ख़ुद को छोटा मान रखा है। मेरे जो भी पैटर्न आ रहे हैं, वो सारे उसी गहरे डर से आ रहे हैं। कभी डिफेंसिव हो जाना, कभी अटैक मूड में आ जाना, पज़ेसिव होना या फिर ईवन जिम भी जाती हूँ, तो इसी चीज़ से दूर जाने के लिए जा रही हूँ।

तो कुछ डर थे, जो हट गए। जैसे पहले मुझे ड्राइविंग से डर लगता था। जब तक घर में प्रोटेक्टेड एनवायरमेंट में थी, मम्मी-पापा सब मना करते थे, नहीं करना। बट अब मैंने स्कूटी ख़ुद खरीदी, ख़ुद सीखी। कार खरीदी, ख़ुद सीखी। ऐसे, बट जहाँ मेरी आइडेंटिटी बहुत ज़्यादा इन्वेस्टेड है, जैसे डॉक्टर होने की आइडेंटिटी, उस पे मैंने बहुत मेहनत करी और वो मेहनत भी अब मुझे कहीं न कहीं दिख रही है कि प्रूफ करने के लिए थी कि मैं नहीं, मैं छोटी नहीं हूँ। उस चीज़ को नकारने के लिए था कि मैं मस्ती से भी पढ़ सकती थी और उससे भी मेरे अच्छे नंबर आते थे। पर मैं बहुत ज़्यादा मेहनत करती थी कि मुझे ऑल इंडिया रैंक टॉप 10 ही लानी है। इस तरह से वो आइडेंटिटी अभी भी नहीं हट रही। वहाँ कैसे काम करूँ?

आचार्य प्रशांत: आपकी हाइट कितनी है?

प्रश्नकर्ता: अभी एग्जैक्टली नहीं पता।

आचार्य प्रशांत: जितनी भी है, वो तो है न? वो तो है। फ़ैक्ट है। वो तो फ़ैक्ट है। तो उसमें अच्छा-बुरा क्या है?

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, यह बात मैं सोचती हूँ, बट वो टेंपरेरी हटता है।

आचार्य प्रशांत: वो टेंपरेरी इसलिए लगता है, क्योंकि आपका उस फ़ैक्ट से बहुत लेना-देना है। वो लेन-देन कम करो न। हाइट तो जितनी है, उतनी है; चाहे 5 फीट हो, चाहे 4.5 फीट हो, चाहे 4 फीट हो, वो तो अब है, उतनी भाई। एक आँकड़ा है, है उतना तो उसका आप क्या करोगे। वह एक इर्रेलेवेंट आँकड़ा है। आपको पता होना चाहिए कि मेरी इतनी हाइट है। बस, हो गया।

यह एक शरीर है, इससे संबंधित बहुत सारी संख्याएँ होती हैं। आप डॉक्टर हैं, आप मुझसे सौ गुना ज़्यादा, हज़ार गुना ज़्यादा संख्याएँ बता देंगी, शरीर से संबंधित। ठीक है? एक लाख आँकड़े होते होंगे मेडिकल साइंस में शरीर से संबंधित। आपको पता है? तो हाइट इज़ वन ऑफ़ दोज़ फ़िगर्स। अनदर मैट्रिक हो गया है। अब अपना काम करिए। आप जो काम कर रहे हो, अगर उसमें शरीर का कुछ महत्त्व होता तो मैं ज़रूर कहता कि भाई, थोड़ा सोचना पड़ेगा। ये शरीर का मसला गंभीर है, गड़बड़ है।

आप बास्केटबॉल प्लेयर हो, तो आप हाइट का करोगे क्या? भाई, हाइट है। हाँ, बिल्कुल है। कोई पूछे, आपकी क्या हाइट है? तो बता दीजिए, इतनी है। यह भी बता दीजिए कि जो एवरेज हाइट होती है फीमेल की इंडिया में, वो इतनी है। मेरी उससे इतने परसेंट कम है। व्हिच इज़ फ़ाइन, व्हिच इज़ नॉट ईवन फ़ाइन। व्हिच इज़ एक्चुअली इर्रेलेवेंट। है तो है। क्या करोगे? और क्या करना है? कुछ करने की ज़रूरत क्या है?

भाई, आप एक डॉक्टर हैं। यहाँ आप एक गीता स्टूडेंट हैं। तो गीता पढ़ने के लिए लंबाई निकालोगे क्या? डॉक्टर हैं आप, तो आपको आपके काम में लंबाई से क्या होना है? न आध्यात्मिक काम में लंबाई से कुछ होना है, न आपके व्यवसायिक, प्रोफ़ेशनल काम में लंबाई से कुछ होना है। बास्केटबॉल प्लेयर आप हो नहीं, तो आप लंबाई का करोगे क्या? नहीं, जिनकी ज़्यादा है लंबाई उनकी ज़्यादा भी है, ठीक है। मैं उनसे भी यही कहूँगा कि आपकी हाइट इर्रेलेवेंट है। कोई 6 फीट की महिला भी आ सकती है, तो उससे भी यही, तुम्हारी 6 फीट है, वो एक आँकड़ा है। अच्छी बात है, रखो उसको। हाँ, उसको मैं ज़रूर कहूँगा, जाओ बास्केटबॉल ट्राई कर लो।

भाई, इतनी अच्छी तुम्हारी हाइट है। 6 फीट की हो, जाओ बास्केटबॉल खेल लो, अच्छी बात है। भारत में बहुत ज़रूरत है, मेडल ही नहीं आते। रेलेवेंस नहीं है इस मुद्दे की। मैं इसको सप्रेस करने को नहीं कह रहा। मैं चाह रहा हूँ कि आप उस मुद्दे को वैसा देखें जैसा वो है। उसमें न कोई झिझकने की बात है, न शर्म की बात है, न कमजोरी की बात है। सो जाओ। इतना इर्रेलेवेंट मुद्दा है ये बोर हो कर सो गया।

भाई, आप अपने बारे में, आपकी बॉडी को लेकर के आपको एक फ़ॉर्म दे दिया जाए। उसमें 50 चीज़ें आप भर सकते हो। हाइट इज़ जस्ट अनदर मैट्रिक। आप भर दोगे वहाँ पे? भर दी। अब क्या करोगे उसके बाद? क्या करना है? कुछ नहीं। फिर बोल रहा हूँ, आप बास्केटबॉल प्लेयर होते, तो हाइट का मुद्दा कुछ अर्थ रखता है। पर भीतरी तौर पर आप एक मनुष्य हो, आप एक बेचैनी हो, आप मुक्ति तलाश रहे हो। आप उपनिषद् पढ़ रहे हो। आप लाओत्ज़ू को पढ़ रहे हो। भीतरी तौर पर आप वो हो। अब बताओ, लाओत्ज़ू को पढ़ने के लिए क्या कद निकालना पड़ेगा? तो वहाँ पर भी हाइट इर्रेलेवेंट हो गई, अप्रासंगिक हो गई। प्रोफ़ेशनल तौर पर आप एक डॉक्टर हो और आपका मरीज़ आपसे हाइट पूछने नहीं आता, इलाज पूछने आता है, तो वहाँ भी आपकी हाइट इर्रेलेवेंट है।

यहाँ सबसे लंबा कौन है? खड़े हो जाओ। आप ही खड़े हो जाओ। आप हैं, ये हैं बड़े लंबे। ये नहीं, बहुत लंबे नहीं हैं। और कौन है? वो रहा, बढ़िया लंबा, वो देखो पीछे। ठीक है। अभी तुम्हें हार्ट अटैक पड़ा। वो उधर जाओगे कि क्या बढ़िया कद निकाला या इनके पास आओगे आप? बताओ, क्या आपकी हाइट की क्या रेलेवेंस है?

हाँ, ये रेलेवेंस ज़रूर है कि आप दिखनी चाहिए। नहीं तो बेचारा पेशेंट, वो मारा जाएगा। तो उसके लिए मेडिकल साइंस ने पहले ही इंतज़ाम कर दिया है। डॉक्टर का कोट आप डाल लो। क्या ले के फिर रहे हो आप? क्या है? इर्रेलेवेंट क्वेश्चन है, जिस पर आप शायद आज तक इसीलिए टिके हुए हो, क्योंकि जहाँ आपको चले जाना चाहिए था, जहाँ आपकी केयर, कंसर्न, अटेंशन पहुँच जाने चाहिए थे वहाँ आप नहीं पहुँचे।

तो एक छोटी-सी बात है। बचपन में किसी ने टाइनी बोल दिया, कुछ बोल दिया, दोस्तों ने कुछ कह दिया है। वो अभी मौजूद है, जिसकी कोई, कोई प्रासंगिकता नहीं। और अगर है, तो बात ख़तरे की है। ख़तरा बताऊँ क्या है? इसका मतलब यह है कि आप अभी शरीर से कुछ चीज़ें तलाश रहे हो और आपको लग रहा है कि शरीर अगर एक कद का होगा, कम कद का, तो वो चीज़ें मिलेंगी नहीं। शरीर इतना कुछ किसी को दे नहीं सकता है। शरीर स्वस्थ रहे, इतना ही काफ़ी है।

शरीर में हम कुछ उठपटांग हरक़त न कर दें, शरीर मानसिक दुख का कारण न बन जाए। इतना ही पर्याप्त होता है।

कद निकालने के लिए नहीं होता शरीर। हाँ, तोंद न निकले, ये ज़रूरी है। वो ठीक है। ठीक है?

इसका कोई समाधान नहीं है, बस इसकी इर्रेलेवेंस है। आप ये नहीं कह सकते कि आई हैव सॉल्व्ड दिस प्रॉब्लम। आप बस यह कह सकते हो, आई हैव आउटग्रोन दिस प्रॉब्लम। आउटग्रोइंग का मतलब समझते हो? वो प्रॉब्लम अब मेरे लिए प्रॉब्लम रही नहीं, मैं आगे निकल गई। थी कोई छोटी-सी बच्ची, जिसको बुरा लगता था, किसी ने उसका नाम टाइनी रख दिया। थी कोई छोटी बच्ची थी। मैं उससे आगे निकल गई भाई, ये मेरे लिए कोई प्रॉब्लम नहीं है।

और बाक़ी, आपको अपने आप को वो मोटिवेट वग़ैरह करना हो, तो गूगल सर्च या AI सर्च कर लीजिए कि दुनिया में कितनी कम कद-काठी की महिलाएँ हुई हैं, जिन्होंने कुछ उल्लेखनीय कर दिखाया है। तो आपको ऐसे 10-20 नाम मिल जाएँगे, तो आप खुश हो जाएँगी। अच्छी बात है। आपको आप इतना ही कह दीजिए कि महिलाएँ, जिनका कद 5 फीट या 5 फीट से कम था, जिन्होंने लेकिन ज़िंदगी में कुछ बढ़िया काम करके दिखाया, तो आपको ऐसे बीस नाम मिल जाएँगे। वो बीस नाम आप याद कर लीजिए, तो थोड़ी देर के लिए सहारा हो जाएगा। लेकिन मैं कह रहा हूँ, सहारा भी पर्याप्त नहीं होगा। बात तो पर्याप्त तब होगी, जब आपके लिए यह मुद्दा मुद्दा ही न रहे। नॉन-इशू बन जाए। नॉन-इशू।

यह कोई मुद्दा ही नहीं है। जिसके लिए होगा, उसके लिए होगा, मेरे लिए नहीं है। जिसके लिए है यह मुद्दा, ये उसकी परेशानी है। तुम्हें मेरा कद दिख रहा है, तो इट्स योर प्रॉब्लम, नॉट माइन। तुम परेशान रहो। तुम खूब सोचो कि ये लड़की है, इसका कद क्यों ऐसा है? तुम सोचो न। मुझे, भाई, ज़िंदगी में करने के लिए दूसरे काम हैं। आई एम देयर। आई एम नॉट ईवन प्रेज़ेंट टू दिस मैटर। आई हैव आउटग्रोन, आई हैव लेफ़्ट, आई हैव प्रोसीडेड। आई हैव मूव्ड ऑन। मूव ऑन। आउटग्रो।

शरीर तो शरीर है, हाँ स्वस्थ रखिए उसको, वो ज़रूरी है। बाँह में ताक़त रखिए। आप डॉक्टर हैं, आप तो जानते ही हैं जितनी भी चीज़ें होती हैं शरीर की, उनको चकाचक रखिए बिल्कुल। बाक़ी तो और उनको इसलिए नहीं चकाचक रखना है कि कोई आकर्षित हो जाएगा या कुछ, कोई प्रभावित होकर आपको भला बोल देगा। उनको बढ़िया इसलिए रखना है कि शरीर जब बढ़िया रहता है, तो अहंकार को एक और कहानी फिर नहीं मिलती। नहीं तो वो जो भीतर बैठा है न, गपोड़ी, वह कहानियों की तलाश में रहता है। उसको एक कहानी और मिल जाती है: मैं ऐसी हूँ, मेरे साथ बुरा हो गया। फिर मेरी बॉडी में यह हो गया। फिर यह रोग लग गया, फिर उसने ऐसा कह दिया, फिर मैंने ऐसा सोचा। फिर मैं डिप्रेस हो गई।

शरीर का स्वस्थ रहना, तगड़ा रहना ज़रूरी है। इसलिए नहीं कि शरीर अपने आप में कोई बहुत बड़ी बात है, इसलिए क्योंकि आप अहंकार हो। और आपने अपना नाता जोड़ा हुआ है। शरीर गड़बड़ हुआ तो आपको रोने के लिए एक कहानी और मिल जाएगी। आप वो अहंकार हो जिसने अपना नाता किससे जोड़ रखा है? अगर शरीर गड़बड़ हुआ, तो आपको रोने के लिए एक कहानी और मिल जाएगी। और वही हमारा मनपसंद काम है क्या? रोना, बहाने बनाना, रोना, विक्टिम प्ले करना। तो इसलिए शरीर बढ़िया रखो, ताकि रोने के बहाने कम मिले। बाक़ी कुछ नहीं रखा है।

प्रश्नकर्ता: थैंक यू, आचार्य जी।

आचार्य प्रशांत: इर्रेलेवेंट? क्या?

प्रश्नकर्ता: इर्रेलेवेंट

आचार्य प्रशांत: इर्रेलेवेंट। न अच्छा न बुरा, न प्रॉब्लमसॉल्यूशन, कुछ नहीं है इसमें, इर्रेलेवेंस है। अप्रासंगिकता। मुद्दा ही नहीं है। ठीक है? मूव्ड ऑन। आई हैव लेफ़्ट द प्रॉब्लम बिहाइंड। हैव आई सॉल्व्ड द प्रॉब्लम? आई डोंट बॉदर टू। द प्रॉब्लम हैज़ नॉट बीन सॉल्व्ड। द प्रॉब्लम हैज़ बीन लेफ़्ट बिहाइंड। मैं आगे निकल आई। प्रॉब्लम पीछे छूट गई। सॉल्व थोड़ी किया मैंने प्रॉब्लम को। पीछे छोड़ दिया। वो पड़ी हुई है, वहीं प्रॉब्लम। अब वो मेरे लिए नहीं है न, मैं तो आगे निकल आई। ठीक है?

कोई भी सिचुएशन प्रॉब्लम बन जाएगी अगर उसको पकड़ कर रखोगे और कई प्रॉब्लम्स का सॉल्यूशन बस यही होता है कि तुम आगे निकल जाओ।

तुम आगे निकल गए। तो अब वो प्रॉब्लम प्रॉब्लम नहीं है। वो एक सिचुएशन है बस। वह एक स्थिति है, एक तथ्य है। जैसे ऊँचाई एक तथ्य होता है, कद, हाइट एक तथ्य है। हाइट इज़ अ फ़ैक्ट, नॉट अ प्रॉब्लम। आप आगे निकल जाइए। आप कहिए, दुनिया में करने के लिए और इतने काम हैं। मैं कौन हूँ? मैं जानना चाहती हूँ। एक सही, सार्थक, सुंदर जीवन जीना चाहती हूँ, मुझे वह सब देखना है। लीव इट बिहाइंड।

आपको तो उस मुद्दे को इतना इर्रेलेवेंट बना लेना चाहिए कि आप, आप ख़ुद ही कई बार सेल्फ-रेफ़रेंशियल जोक्स भी मार लें, जैसे कि किसी और की बात हो रही हो। क्योंकि मैं तो आगे निकल गई न। मैं आगे निकल गई, मेरे लिए वो मुद्दा है ही नहीं। तो कभी मुझे लगा कि लोगों को हँसाना है। लोग बैठे हुए हैं उदास, मायूस, अब मुझे लग रहा है ऐसे बेकार बैठे हैं, इन्हें हँसाएँ किसी तरीके से, तो हमने ख़ुद ही अपनी ही हाइट पर एक जोक सुना दिया सबको। सब हँसने लगे। हमने कहा, अच्छी बात है। ठीक है।

ये तो दूर की बात है कि किसी और ने हम पर जोक मार दिया, तो हम हर्ट हो गए। हमें बुरा लगा। हम इतना आगे निकल गए हैं कि अब हम ख़ुद ही अपनी हाइट पर जोक मार लेते हैं। सबको हँसा देते हैं, ख़ुद भी हँस लेते हैं। हम इतना आगे निकल गए। द मैटर हैज़ बिकम इर्रेलेवेंट, आई एम समवेयर एल्स। मैं आसमान की हूँ, मुझे बहुत आगे जाना है। ये कद-वद वगैरह बहुत मिट्टी की बातें हैं। मिट्टी का शरीर मिट्टी हो जाना है। मैं इसी में थोड़ी उलझी रहूँगी?

अध्यात्म के नाम पर आपको बहुत बताया जाएगा कि अतीत को मत सोचो, भविष्य को मत कल्पो। लेकिन यह तो दोनों कर्म है न? जब तक आप ठोस अहंकार हो, अतीत तो रहेगा। स्मृतियाँ रहेंगी और भविष्य की चिंता, कल्पना, बेचैनी, यह भी रहेंगे। तो इसीलिए अतीत को दबाने से, उसके दमन से कोई लाभ नहीं है।

मैं कह रहा हूँ, अतीत को ज़रूर सोचो, पर ईमानदारी के साथ, निष्पक्ष होकर के। क्यों सोचो? क्योंकि ज़्यादातर लोग बदलते नहीं हैं। आप आज क्या बने बैठे हो अहंकारिक तल पर, वह समझना है तो यह देखो कि आप कल क्या थे और परसों क्या थे और दस साल पहले क्या थे। क्योंकि हो तो आप आज भी वही। बिरला होता है कोई, जो सचमुच बदला हो। ज़्यादातर लोग तो एक उम्र के बाद ठस हो जाते हैं, जम जाते हैं और उस उम्र तक भी वह सिर्फ़ इसलिए बदलते हैं, क्योंकि प्रकृति ही उनको बदल रही होती है।

पाँच साल का बच्चा और पंद्रह साल का किशोर, ये एक नहीं होते। ये बदले होते हैं, ये मानसिक तौर पर बदले होते हैं। ये मानसिक तौर पर इसलिए बदलते हैं, क्योंकि प्रकृति पाँच से पंद्रह के बीच में इनका शरीर ही बदल देती है। अहंकार शरीर की पैदाइश है न। जब प्रकृति आपका शरीर ही बदल देती है तेजी से, तो आप मानसिक तौर पर भी बदल जाते हो। लेकिन पंद्रह के बाद वो प्रक्रिया धीमी पड़ जाती है, क्योंकि अब शरीर जैसा है, अब लंबे समय तक वैसा ही रहेगा। इसीलिए ज़्यादातर लोग मानसिक तौर पर, साइकोलॉजिकली जैसे होते हैं पंद्रह की उम्र में, आप उनको पैंतीसमें भी वैसा ही पाओगे। पचपन में भी लगभग वैसा ही पाओगे। बाहर-बाहर से बदलाव हो जाएँगे, भीतरी तौर पर उनका ढाँचा जम जाता है। उस पर बाहर से रंग-रोगन, पेंट, प्लास्टर, वो बदलता रहता है।

पीछे मुड़ना और देखना ज़रूरी है। क्या मैं आज भी वही नहीं कर रहा हूँ? मैं पैंतीस का हो गया, जो मैं पंद्रह की उम्र में कर रहा था। इसीलिए डायरी लिखना अपने आप में लाभप्रद बात है। अपने ही पुराने वक्तव्यों को पढ़ो। और पुराने वक्तव्य नहीं हैं उपलब्ध, तो पुरानी तस्वीरें देख लो। जो आपकी पीढ़ी है, उसके पास तो पुराने वीडियोज़ भी होंगे, क्योंकि आप जब तक बड़े हुए, तब तक वीडियो बाज़ी आम हो चुकी थी। और वीडियो होंगे, तो उसमें आप कुछ बोल भी रहे होंगे, कुछ कर रहे होंगे। देखो अपने आप को, सुनो अपने आपको। विचित्र लगेगा कि तुम आज भी वही हो।

दस ही पंद्रह साल पहले की बात है। एक साधारण-सा उदाहरण है। दो क्रिकेटर हैं, आप सब जानते ही होंगे। मैदान पर एक वाक़या हुआ था, जिसको थप्पड़ मार दिया था। तो कल किसी ने मुझे एक रील भेजी, जिसमें कहा कि मुझे श्रीसंत की बेटी मिली, छोटी-सी, और उसने कहा, मैं आपसे बात नहीं करूँगी। यू हर्ट माय डैड। टूट गया भीतर से। बोले, मैंने उस वक़्त फिर से माफ़ी माँगी और उस घटना की मैं दो सौ बार माफ़ी माँग चुका हूँ।

लेकिन क्या ठीक उस समय माफ़ी माँगना संभव था, जब ये घटना घटी? बाद में आसान हो जाता है। आप लड़-भिड़ लेते हो, अगले दिन जाकर के सॉरी-वॉरी बोल आते हो। है न? पाँच साल पहले वाला बंदा आपके अनुसार ग़लत था और आप हो आज भी वही, जो आप पाँच साल पहले थे, तो आप आज भी तो ग़लत ही हो न? आप आज भी तो ग़लत ही हो न? बात आ रही है समझ में?

अतीत ग़रीबी का था, तो भविष्य अमीरी का हो सकता है। पर वो अमीरी आकर्षित इसीलिए कर रही है, क्योंकि अतीत का दुस्वप्न अभी शेष है, क्योंकि उस ग़रीबी की यादें आज भी तड़पा रही हैं। इसीलिए पैसे के पीछे भाग रहे हो। अगर भुला दिया होता उस ग़रीबी को, तो आज पैसे के पीछे भी नहीं भाग रहे होते। तुम आज भी गरीब हो और यही तुम्हारी अमीरी का कारण है। लो, अतीत ही भविष्य बन गया। ग़रीबी अमीरी बन गई, लेकिन ग़रीबी-अमीरी के केंद्र में जो बैठा है वो वैसा ही रहा। वो गरीब की ग़रीबी है।

बल्कि वह बहुत गर्व के साथ सबको बताता है। “अरे, एक समय होता था जब हमारे पास चलने के लिए चप्पल भी नहीं होती थी। आज हमारा फ़ुटवेयर का अपना ब्रांड है।”

तुम्हारे पैरों में हो सकता है बहुत बड़े, बेशकीमती जूते आ गए हों। तुम्हारी जेबें तुम्हारे ब्रांड से भर गई हों। लेकिन तुम्हारे दिल में आज भी पुराने छाले हैं। बिना जूते के चलते थे, छाले पैरों पर पड़ते थे, वो छाले तो मिट गए कब के। पर दिल पर आज भी पुरानी ग़रीबी के छाले हैं। और वही पुरानी ग़रीबी आज भी तुम्हें पैसे के पीछे भगा रही है। कुछ नहीं बदला, तुम आज भी गरीब हो।

“मुझे न बचपन में किसी से प्यार नहीं मिला, फिर मेरी ज़िंदगी में रोहन आया। ख़ासकर डैडी तो मुझे बिल्कुल प्यार करते ही नहीं थे। अब जब से रोहन आया है, उसने इतना प्यार दिया, उसने इतना प्यार दिया।”

तुम कुछ नहीं कर रही हो, तुमने रोहन को डैडी बना लिया है। यू नो, द काइंड ऑफ़ सिक्योरिटी आई फ़ील इन हिज़ कंपनी। तू अभी भी वही छोटी-सी बच्ची है, जिसको बाप का साया चाहिए। और रोहन अभी चलेगा नहीं बहुत दिन तक, वो बाप बनने नहीं आया था तेरे पास। माने दूसरे अर्थ में, तेरा बाप बनने। पर लगता है सब बदल गया। “पहले कोई था नहीं, कोई मेल फ़िगर, कोई फ़ादरली फ़िगर, जो मेरी परवाह कर सके, जो मुझे सुरक्षा दे सके। अब देखो, रोहन आ गया और रोहन मेरा कितना ख़याल रखता है।” कुछ बदला थोड़ी है। तू आज भी वही असुरक्षित और डरी हुई छोटी-सी बच्ची है। बात आ रही है समझ में?

अहंकार के लिए, सच पूछो तो वर्तमान जैसा कुछ होता नहीं। क्यों नहीं होता? क्योंकि वर्तमान तथ्य है और अहंकार एक कहानी है। कहानी हमेशा अतीत की होती है। जो कहानियों में जी रहा है, वह तथ्यों से घबराएगा। सब कहानियाँ, कहानियाँ ही तो हैं, कल्पनाएँ। वर्तमान माने वो जो है, जो है वो तो कल्पनाओं को तोड़ देगा न। वर्तमान इसीलिए घातक लगता है अहंकार को। अहंकार को कुछ पता नहीं होता सचमुच क्या है। क्योंकि जो सचमुच है अगर उससे संपर्क में आ गया अहंकार, तो खंडित हो जाएगा।

अहंकार को ख़ुद को बचाना है। माने अपनी कहानियाँ बचानी हैं। माने अपनी कल्पनाएँ बचानी हैं। जिसको कल्पनाएँ बचानी हैं, वो यथार्थ के संपर्क में आना कैसे गवारा करेगा। अहंकार कहानियों में जीता है, अहंकार अतीत में जीता है। छोड़ दो अतीत को। “नहीं छोड़ सकते नहीं।” तो मैं कह रहा हूँ, और निकट जाओ अतीत के। जाकर देखो उसको, फिर शायद छूट जाए। नारे लगाने से, आदर्श बनाने से काम कभी होता नहीं। यह बात नैतिकता की और उसूलों की नहीं है कि मैं आपसे कह दूँ कि अतीत को छोड़ दो और आगे बढ़ो। मेरे बोलने से छोड़ दोगे क्या?

हाथों में बेड़ियाँ पड़ी हुई हैं। त्याग दो, त्याग दो उनको। कैसे त्याग दोगे? त्याग सकते हो क्या? एक कमरे में बंद हो और मैं आपको उत्साह दिला रहा हूँ, निकल जाओ, निकल जाओ, तो निकल जाओगे क्या? नहीं। दीवारों के करीब जाना पड़ेगा, दीवारों को टटोलना पड़ेगा। क्या पता कोई झिर्री, कोई झरोखा, कोई दरवाज़ा। किसी तरह की कोई कुंडी, कोई मौका पकड़ में आ जाए।

जो आपकी बेड़ी है, उस पर ज़ोर लगाने से काम नहीं चलेगा, उसको पास जाकर देखना पड़ेगा। इसकी संरचना कैसी है? जिसने तुम्हें पकड़ रखा है उसको भुलाने से काम नहीं चलता। उसको दबाने से काम नहीं चलता, उसके निकट जाना पड़ता है।

अतीत के निकट जाओगे, संभावना है कि मुक्ति मिलेगी। अतीत को दबाओगे, भुलाओगे, वो और चढ़ेगा, चुपचाप और हावी हो जाएगा। पूरी ज़िंदगी बन जाएगा, भविष्य बन जाएगा। अपनी ही कहानियों का अवलोकन करना पड़ता है और मूल्यांकन करना पड़ता है। अपनी ही कहानियों को परखना पड़ता है।

अतीत माने क्या है? कोई तथ्य तो है नहीं, मौजूद तो है नहीं। कहाँ होता है अतीत? खोपड़े में ही होता है। स्मृति मात्र है अतीत। जो कहानी बना रखी है, उसको परखो, तो कितनी खरी है। और पूछो कि कहानी में मैंने यही सब तत्त्व क्यों याद रखे हुए हैं? पहला, तथ्य कितना है? और दूसरा, यही तत्त्व क्यों याद है? जो याद है, पहली बात तो तथ्यात्मक है भी कि नहीं? और दूसरी बात, जो याद है, वही क्यों याद है? और कुछ क्यों नहीं याद है? बाक़ी क्यों भुलाया? इतना ही क्यों याद रखा?

This article has been created by volunteers of the PrashantAdvait Foundation from transcriptions of sessions by Acharya Prashant
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