मूल बीमारी ये है कि मन अपने ठिकाने पर नहीं है, मन अपने सही आसन पर नहीं है। इसी कारण सब कुछ बुझा-बुझा सा, रूठा-रूठा सा लगता है। गा रहे थे ना तुम, ‘ये आस्मां, ये बादल, ये रास्ते, ये हवा, हर एक चीज़ है अपनी जगह, ठिकाने पे, कई दिनों से शिकायत नहीं ज़माने से’। जब मन सही जगह पर होता है तो बाकि सब अपनी सही जगह पर दिखाई देने लगता है। शिकायतें बंद हो जाती हैं। वही कह रहे हैं बुल्ले शाह, कि तुम मुझे अब सताओगे क्या, जो कुछ सता रहा था, उसको मैं जान गया हूँ और मेरा अब पूरा ध्यान उसी पर है। मैं समझ गया हूँ कि वही एक मात्र महत्वपूर्ण चिंता है, अब मैं उसी की चिंता करता हूँ, और कोई चिंता करता ही नहीं।