
सपनों और सामाजिक प्रतिष्ठा के पीछे भागते हुए युवा अक्सर अपनी वास्तविक क्षमता, रुचि और वर्तमान चुनौतियों को देखना भूल जाते हैं। आईआईटी, यूपीएससी, सरकारी नौकरी और पेंशन को जीवन का लक्ष्य मान लेने के बजाय ज़रूरी है आत्मज्ञान—ख़ुद को ईमानदारी से परखना। जवानी भविष्य की सुरक्षा की चिंता में नहीं, आज की वास्तविक चुनौतियों से जूझने और सार्थक कर्म में लगनी चाहिए।











अगर हमने सही गोल चुना है, तो उसमें पूरी जान लगा देना। अब जो होगा सो होगा। अगर तैयारी नहीं पूरी होगी, तो रिज़ल्ट वैसे भी ठीक नहीं आएगा। और अगर तैयारी अच्छी है, तो वो रिज़ल्ट में दिखाई दे जाएगी।




कोचिंग, नौकरी, शादी, समाज, परिवार—जीवन के बड़े फैसलों पर कई तरह के दबाव होते हैं। लेकिन क्या इन्हीं के कारण हमारी ज़िंदगी तय होती है? यह चर्चा बताती है कि इंसान की सबसे बड़ी शक्ति उसका जागरूक चुनाव है। जो अपने चुनावों की जिम्मेदारी लेता है, वही सच में स्वतंत्र जीवन जीना शुरू करता है।
NEET घोटाले केवल परीक्षा की गड़बड़ी नहीं, बल्कि युवाओं की रीढ़ तोड़ने वाली व्यवस्था है। समस्या किसी परीक्षा पद्धति में नहीं, इंसान की बेईमान नीयत में है। तकनीक, फोन या सिस्टम अच्छे-बुरे नहीं होते; असली प्रश्न यह है कि उनका उपयोग करने वाला व्यक्ति भीतर से कितना ईमानदार और जागरूक है।
आप कहते हैं, “मुझे अपने काम से गिल्ट होता है,” लेकिन साथ ही अपने पुराने चुनावों को भी अटल सच मानकर पकड़े रहते हैं। फिर समाधान कैसे मिलेगा? ज़िंदगी तब बदलती है जब आदमी अपने अतीत, डिग्री, नौकरी और सुरक्षित पहचान को भी चुनौती देने का साहस करे। वरना हम बस दर्द कम करने की गोली माँगते रहते हैं, जबकि भीतर पूरा जीवन बदलने की पुकार चल रही होती है।
आप कहते हैं मेरी मर्ज़ी, मेरे फैसले, मेरी दौड़। पर क्या सच में? अगर हर बार वही नौकरी, वही पैसा, वही तुलना, वही बेचैनी चुन रहे हैं, तो यह मर्ज़ी है या पुरानी आदत? हम नई मंज़िल चाहते हैं, पर चलते पुराने रास्तों पर हैं। जो पहले भी चैन न दे पाया, उसी के नए रूप के पीछे भागते रहते हैं। जीवन तब बदलता है, जब आदमी पहली बार पूछता है, मैं सच में चाहता क्या हूँ?
क्या आपकी नौकरी आपको मुक्ति की ओर ले जा रही है या बंधन की ओर? मुक्ति की ओर जाना माने बंधनों को कम करना। ऐसे में देखना पड़ता है कि ज़्यादा बड़ा बंधन क्या है। पिताजी का पैसा लेना एक बंधन है और दफ़्तर में काम करके पैसा लेना भी एक बंधन है। जो थोड़ा हल्का बंधन हो, उसे स्वीकार करना पड़ता है। धीरे-धीरे करके एक-एक बंधन काटना पड़ता है।
मामला ख़तरनाक हो जाता है, अगर कोई कह रहा है कि फलाना काम करते-करते मेरा मन थक गया है। इससे यह पता चलता है कि वो काम आपके लिए हार्दिक था नहीं। दिल से जो काम किया जाता है, उसमें तो आनंद होता है। दिल से मेरा आशय कामना नहीं, बोध है। समझो कि तुम कौन हो, और तुम्हारे लिए ज़िंदगी में ज़रूरी क्या है? सही काम क्या है? उस दिशा में आगे बढ़ो। काम वो चुनना, जिसमें कभी रिटायर न होना पड़े। उसके बाद बर्नआउट नहीं होगा, काम ही मनोरंजन बन जाएगा।
कुछ नहीं होता उस कंटेंट में। इसीलिए सबको लगता है कि वो जो बकवास है, वो तो हम भी बना सकते हैं। तो हम भी यूट्यूबर बन जाएँ। वो वहाँ बैठा हुआ है, वो फूहड़ *कॉमेडी* कर रहा है। उससे अच्छी तो मैं कर सकता हूँ, तो मैं ही कर देता हूँ।
तुम जो पढ़ाई करना चाहती हो, अगर वो तुम्हारी नज़रों में सबसे कीमती चीज़ है, तो फिर उसके लिए कुछ भी छोड़ा जा सकता है। कोई तुम्हारा कर्तव्य नहीं है कि तुम वहाँ मौजूद रहो जहाँ तुम्हारे मन को मलिन किया जा रहा हो। लेकिन अगर पूरे तरीके से उस माहौल से दूर न हो पाओ, तो जितना ज़्यादा बाहर शोरगुल बढ़े, उतना ज़्यादा तुम अपने भीतर याद करने लग जाओ कि तुम्हें क्या करना है। जो चीज़ वाक़ई महत्त्वपूर्ण है, उसमें ज़ोर लगाओ तो ज़िंदगी बन जाती है।
जो मुझे ठीक लगता गया, मैं करता गया। और चूंकि जो मैं कर रहा था, वो औरों के भी काम आ रहा था, तो उनसे मुझे फिर समर्थन मिलता गया। आप भी देखिए ना कि क्या ठीक है ज़माने में करने के लिए, और उसको करिए। और ये भरोसा रखिए कि भूखे नहीं मरेंगे। हाँ, ऐय्याशी की चाह हो, बैठे-बैठे खाना हो, तो फिर कोई उपाय नहीं है। सही संघर्ष करने निकलो, कोई बेरोज़गारी नहीं रहेगी।
मैंने कहा है, “सत्य एम्प्लॉइड” होने को। सेल्फ भी हम आप पढ़ते हो अंग्रेज़ी में, छोटा सेल्फ, बड़ा सेल्फ। सेल्फ एम्प्लॉइड मतलब “सत्य एम्प्लॉइड” भी हो सकता है और “अहम् एम्प्लॉइड” भी हो सकता है। उसमें बात ये नहीं होती कि आपके पे-चेक पर आपका साइन है या किसी और का साइन है, बात ये नहीं होती। बात ये होती है कि उस काम के माध्यम से सेवा किसकी हो रही है। किसकी सेवा हो रही है, ये देखना होता है।
काम ज़िंदगी का हिस्सा नहीं होता, काम ज़िंदगी होता है। सही काम ज़िंदगी का सबसे बड़ा वरदान होता है। सार्थक काम जिसको मिल गया वो तर गया। तुम्हारा काम अगर ऐसा नहीं है कि जिसको प्यार कर सको, तो तुम अपनी ज़िंदगी से भी प्यार नहीं कर सकते। और सबसे बड़े अभागे वो हैं जिन्हें वो काम मिल गया, जो प्यार के क़ाबिल है, फिर भी उनसे प्यार किया नहीं गया।
Gaming Industry का अपना एक बहुत बड़ा आकार है, और भारत में अधिकांश लोग employable उम्र के हैं। कुछ युवाओं को निश्चित रूप से रोज़गार मिल जाएगा, पर भारतीय युवा Gaming Industry के दम पर रोज़गार पा जाएगा—यह बहुत बड़ी अतिशयोक्ति है। Agriculture और Allied Industries: Manufacturing, Transportation—यहाँ पर रोज़गार निकलते हैं, Services में नहीं।
जब आप युवा होते हो, तो आपके लिए बहुत ज़रूरी होता है कि आपको दिखाई दे कि दुनिया एक इंसाफ़-पसंद जगह है। पर वो जो बच्चा है, उसके सामने अगर तुम ये हालत पैदा कर दोगे कि 'तेरी मेहनत अर्थ नहीं रखती, तरह-तरह की कुटिलताएँ अर्थ रखती हैं', तो क्या वो ज़िंदगी में कभी मेहनत और ज्ञान को सम्मान देगा? एक अच्छा राष्ट्र अपने लोगों को भरोसा देता है कि योग्यता का सम्मान होगा, श्रम को मूल्य मिलेगा। जो समाज ज्ञान को इज़्ज़त नहीं देता फिर उस समाज में अंधविश्वास पनपता है।
कुछ नहीं हो रहा। 24 के हुए हो, मरे नहीं जा रहे। बैठ लो थोड़ी देर बेरोज़गार। कुछ नहीं हो गया। तुम्हारे खर्चे ही कितने हैं? खाली भी बैठोगे तो क्या हो जाएगा? कोई पहाड़ नहीं टूट पड़ा। लेकिन गलत दिशा में मत बहक जाना। फ़ालतू के किसी प्रोफ़ेशन में प्रवेश मत ले लेना। ज़िंदगी को फ़ैसला करने का वक़्त दो। ज़िंदगी करती है। ज़िंदगी फ़ैसला करेगी, माने ये नहीं कि आप ऐसे हाथ पे हाथ रखकर बैठ गए।