काम ज़िंदगी का हिस्सा नहीं होता, काम ज़िंदगी होता है। सही काम ज़िंदगी का सबसे बड़ा वरदान होता है। सार्थक काम जिसको मिल गया वो तर गया। तुम्हारा काम अगर ऐसा नहीं है कि जिसको प्यार कर सको, तो तुम अपनी ज़िंदगी से भी प्यार नहीं कर सकते। और सबसे बड़े अभागे वो हैं जिन्हें वो काम मिल गया, जो प्यार के क़ाबिल है, फिर भी उनसे प्यार किया नहीं गया।
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प्रश्नकर्ता: मैं बचपन से अपने पर्पस को लेकर भी काफ़ी ज़्यादा पज़्ल्ड फील करती थी, क्योंकि मैं बहुत रिसर्च भी करती थी कि ये, वो। बहुत सारी चीज़ों के बारे में जाना, कुछ ट्राई भी किया। बट, आई थिंक एट दी एंड ऑफ द डे, सब कुछ एक सैचुरेशन पॉइंट पर इसलिए आ जाता था, बिकॉज़ आई कुड सी फॉल्सनेस, एंड ए बिट ऑफ़ करप्शन, एंड एवरीथिंग।
चाहे वो मुझे बचपन में लगता था कि मैं बोलती अच्छा हूँ। मुझे लिखने का काफ़ी शौक है, तो मैं जर्नलिस्ट बनके कुछ अच्छा करूँगी। बट थोड़ा सब जो नेम ब्रांड न्यूज़ चैनल्स हैं, उनको थोड़ा जाँच-पड़ताल किया, देखा उनमें क्या बिक रहा है, क्या बोला जा रहा है। तो मन उठ गया उन सब चीज़ों से। तो मुझे कभी समझ में ही नहीं आया कि अगर ये सिस्टम तो सारे मेनस्ट्रीम चीज़ें ऐसी हैं, जिन्हें देखकर भागने का मन करता है। सो, व्हाट्स द करेक्ट वे टू अप्रोच पर्पस इन लाइफ़? क्योंकि बहुत पज़्ल्ड और बहुत ज़्यादा इंटरनल वॉइड फील होता है। कुछ ढंग का नहीं मिले करने के लिए तो।




