
प्रश्नकर्ता: मैं बचपन से अपने पर्पस को लेकर भी काफ़ी ज़्यादा पज़्ल्ड फील करती थी, क्योंकि मैं बहुत रिसर्च भी करती थी कि ये, वो। बहुत सारी चीज़ों के बारे में जाना, कुछ ट्राई भी किया। बट, आई थिंक एट दी एंड ऑफ द डे, सब कुछ एक सैचुरेशन पॉइंट पर इसलिए आ जाता था, बिकॉज़ आई कुड सी फॉल्सनेस, एंड ए बिट ऑफ़ करप्शन, एंड एवरीथिंग।
चाहे वो मुझे बचपन में लगता था कि मैं बोलती अच्छा हूँ। मुझे लिखने का काफ़ी शौक है, तो मैं जर्नलिस्ट बनके कुछ अच्छा करूँगी। बट थोड़ा सब जो नेम ब्रांड न्यूज़ चैनल्स हैं, उनको थोड़ा जाँच-पड़ताल किया, देखा उनमें क्या बिक रहा है, क्या बोला जा रहा है। तो मन उठ गया उन सब चीज़ों से। तो मुझे कभी समझ में ही नहीं आया कि अगर ये सिस्टम तो सारे मेनस्ट्रीम चीज़ें ऐसी हैं, जिन्हें देखकर भागने का मन करता है। सो, व्हाट्स द करेक्ट वे टू अप्रोच पर्पस इन लाइफ़? क्योंकि बहुत पज़्ल्ड और बहुत ज़्यादा इंटरनल वॉइड फील होता है। कुछ ढंग का नहीं मिले करने के लिए तो।
इस वजह से बहुत ज़्यादा एंग्ज़ायटी होती है, टू बी वेरी ऑनेस्ट, क्योंकि ये शुरू से ही कभी समझ में नहीं आया। आई थिंक, सिक्स सेवन से ये क्वेश्चन्स पूछती थी मम्मी से। तो मम्मी बोलती थी कि अभी कर लो जो है, आगे देखा जाएगा। यू नो, यू विल डू इट एंड दिस, दैट, बट आई डोंट थिंक इन दिस वर्ल्ड, वेयर फॉल्सनेस इज़ सोल्ड सो ओमनियसली एंड सो ब्लाइंडली, आई फेल टू फाइंड अ ट्रू थिंग टू डू।
सो, कैन यू जस्ट गाइड मी थ्रू इट?
आचार्य प्रशांत: देखिए, आप जो माँग रहे हैं न, वो दुनिया की सबसे ऊँची चीज़ है। अगर आप करने के लिए सही काम माँग रहे हैं, तो आपने सब कुछ ही माँग लिया है। आप जितने समय जगे रहते हो, उस समय काम ही कर रहे होते हो, ठीक है? या फिर काम करने की तैयारी कर रहे होते हो। तो काम तो ज़िंदगी होता है।
सही काम माने सही ज़िंदगी मिल गई। सही ज़िंदगी तो निर्वाण होती है, मोक्ष ही मिल गया अगर सही काम मिल गया तो।
तो इतनी बड़ी चीज़ माँग रहे हो आप। इतनी बड़ी चीज़ के लिए उतनी बड़ी साधना भी करनी पड़ती है। आपकी कुछ उम्र होगी—20, 25, 30। आपकी कुछ उम्र होगी। अब आपने एक ज़िंदगी जी है, जिसमें आपने कोई, हो सकता है अभी बहुत दुनिया को जानने, समझने की, स्वयं से परिचय करने की, स्वयं से संघर्ष करने की, बंधन काटने की कोशिश न की हो। तो ये होती है आम औसत ज़िंदगी। होती है न?
और फिर हम पहुँच जाते हैं 20 या 30 की उम्र में, और अब बारी आ जाती है नौकरी करने की, काम करने की। और हम अचानक से कहते हैं कि मुझे काम ऐसा चाहिए, जहाँ मेरा दिल लग जाए, जहाँ मुझे कहीं झुकना न पड़े, जो काम बिल्कुल मुझे आज़ादी दिलवा दे। कैसे मिल जाएगा? इतनी बड़ी चीज़ आप माँग रहे हो, और आपने ज़िंदगी आज तक एकदम औसत जी है। तो उस औसत ज़िंदगी के साथ अचानक से आपको उच्चतम काम कैसे मिल जाएगा? उच्चतम काम भूलिएगा नहीं, वो निर्वाण होता है बिल्कुल, और निर्वाण कुछ नहीं होता। कोने में बैठकर पालथी मार के निर्वाण नहीं मिलता। सही ज़िंदगी में, सही काम में, सही संघर्ष करते हुए जो मिलता है, वो निर्वाण है।
और निर्वाण कैसे मिल जाएगा, बताओ न। आपने अभी ग्रेजुएशन पूरी की। आप मुश्किल से 21, 22, 23 साल के हो, और आप कह रहे हो, नहीं, मुझे तो सही काम मिल जाना चाहिए। क्यों नहीं मिल रहा? और मुझे बहुत अजीब लग रहा है कि इंडस्ट्री में तो सब शार्क्स हैं, और गंदा काम होता है, और ये है, और खा जाएँगे, और मुनाफाख़ोर हैं, और इन्वायरनमेंट को ख़राब कर रहे हैं, और बहुत ज़्यादा जेंडर बायस भी हैं। मुझे ऐसी वर्कप्लेस पर काम नहीं करना है। आप कहते हो न, सब ये?
आपकी माँग बिल्कुल वाजिब है पर पूरी होने से रही। आपकी माँग बिल्कुल सही चीज़ है पर आपकी माँग पूरी नहीं होगी। क्योंकि आप जो चीज़ माँग रहे हो, वो बहुत बड़ी चीज़ है। वो उतनी बड़ी चीज़ जिसको चाहिए, वो फिर 20–25 साल तैयारी करके बैठा होता है।
हम सोचते हैं, एक साधारण ज़िंदगी जीते-जीते, साधारण घर में रहे, साधारण शिक्षा ले ली, साधारण पड़ोसियों के बीच में रहे, साधारण संस्कार पड़ गए, साधारण दसवीं, बाहरवीं, ग्रेजुएशन कर लिया। और अब अचानक से मुझको वो काम मिल जाएगा, जो मुझे बिल्कुल किसी और लोक में पहुँचा देगा। कैसे पहुँचा देगा?
ज़िंदगी का सबसे बड़ा वरदान, उपहार, तोहफ़ा, भेंट, नियामत होता है — सही काम — उससे बड़ा कोई उपहार ज़िंदगी आपको दे नहीं सकती है।
कुछ भी नहीं। और अगर वो इतनी बड़ी चीज़ है, तो मैं आपसे पूछ रहा हूँ कि आपको मुफ़्त या इतने सस्ते में कैसे मिल जाएगा? अभी तक आपने करा क्या है? आप बस ग्रेजुएशन करके आ गए हो और आप कह रहे हो, गिव मी अ जॉब इन व्हिच आई हैव टू एक्सप्रेस माय इनर सेल्फ, एंड नॉट जस्ट एक्सप्रेस इट। एक्चुअली, एलिवेट इट। ऐसा काम दो जहाँ कोई बंधन न हो, जहाँ दिन-रात मेरे लिए भीतरी रोशनी बढ़ती जाए। कैसे मिल जाएगा ऐसा काम? ऐसी माँग करना भी दुस्साहस जैसा है।
मैंने तो बहुत तैयारी करी थी कि ऐसा काम मिले। और मैंने जिस जगह निशाना लगाया था कि शायद यहाँ ऐसा काम होता है, मैंने वहाँ भी जाकर देख लिया। उसके पाँच और आसपास की जगहों पर भी जाकर देख लिया, कहीं नहीं था। मैं और पूरी ज़िंदगी क्या कर रहा हूँ? मैं अपने लिए पिछले 30-40 साल से एक काम तैयार कर रहा हूँ, क्योंकि मुझे वो काम देने वाला कोई नहीं था। वो चीज़ ऐसी नहीं है जो कोई मुझे आकर के बस यूँ ही दे देता। कोई देने वाला नहीं था, तो मुझे ख़ुद ही तैयार करनी पड़ी, वही तो कर रहा हूँ 30-40 साल से। और आप लोग कहते हो कि नहीं, बस हमें आसानी से मिल जाए। कैसे मिल जाएगा?
और आसानी से जब मिल जाता है, तो फिर आप उसकी क़द्र नहीं कर पाते। मैं भी कभी 20 साल का जवान था और मैं भी परेशान हो जाता था, धड़कनें बढ़ जाती थीं। मुझे पसीने आ जाते थे कि ये सब तो ठीक है। पढ़ाई बहुत अच्छी है। अच्छा चल रहा है। सब है। रिज़ल्ट, सर्टिफ़िकेट बढ़िया है। पर मैं काम क्या करूँगा? पर मेरे लिए ये बहुत बड़ा मुद्दा था। ये सुनने में आपको पता नहीं कैसा लगेगा, बहुत अजीब लग सकता है।
मैं एकदम छोटा था, तो पापा स्कूटर पर ऑफिस से घर आए और वो फ़ाइलें लेकर आए थे, स्कूटर में बहुत सारी। मैं एकदम छोटा था। मैं पहली क्लास में था, या केजी में रहा होऊँगा, पाँच साल का। रुद्रपुर की बात है। तो मैं वहीं बाहर खड़ा हुआ हूँ। गर्मी के दिन हैं, बनियान चड्डी डाल के गेट पर खड़ा हूँ। पापा आए, गेट खुला, वो अंदर आए, उन्होंने स्कूटर खड़ी की और इतनी सारी फ़ाइलें थीं। तो वो अंदर चले गए फ़ाइलें लेकर, और मैं वहाँ खड़ा होकर रोने लग गया। थोड़ी देर में दिन ढल गया और मैं वहीं बाहर खड़ा हूँ और गेट पकड़ लिया है और रो रहा हूँ। तो मम्मी आई, पूछी, रो क्यों रहे हो? तो मैंने कहा, मैं बड़ा हो जाऊँगा, तो इतनी फ़ाइलों का काम करना पड़ेगा।
ये एक बहुत प्रेज़ेंट मुद्दा था। ये कोई दूर की बात नहीं थी, ये बहुत ज़रूरी चीज़ है। बहुत-बहुत गहरी, महत्त्वपूर्ण, हार्दिक बात है कि आप काम क्या करने जा रहे हो? क्या तैयारी की है आपने उसके लिए? बस यही औसत नंबरों से दसवीं-बाहरवीं पास कर ली, तो अब आप कह रहे हो कि मुझे बिल्कुल जन्नत-नुमा काम मिल जाए। क्यों मिल जाए? सबने की है दसवीं-बाहरवीं पास और सब जाकर कसाईखानों में काम कर रहे हैं। ऐसे कसाईखानों में, जहाँ ख़ुद कटते हैं। आप भी जाओ, उन्हीं कसाईखानों में काम करो न और कटो। क्यों आप घर, परिवार, शिक्षा, समाज के फुसलाने में आ गए? कि *यू विल गेट अ जॉब एंड द जॉब विल पे यू।
द जॉब डज़न्ट पे यू। इट सक्स। अमंग अदर थिंग्स, योर ब्लड। और कोई नहीं देने वाला। कोई देने इसलिए नहीं वाला क्योंकि किसी के पास है नहीं। कम से कम 25 साल तो मुझे भी लगे हैं ये जगह तैयार करने में, जहाँ मुश्किल से 300-400 लोगों को कुछ दे पाया हूँ। और आप लोग आकर के बहुत आसानी से बड़ी कैज़ुअली कह देते हो, यू नो, आई वांट अ जॉब दैट ऑफर्स दिस, दिस, दिस, इल्यूमिनेशन, लिबरेशन, एलिवेशन। नहीं मिलेगी भाई, क्योंकि नहीं होती है। और एक जवान आदमी की पूरी ताक़त के साथ, पूरे जोश के साथ, मैंने खूब खोजा था। मुझे कोई चस्का नहीं लगा था आन्त्रप्रेनरशिप का।
जहाँ-जहाँ जितने दरवाज़े हो सकते थे, सब खटखटाए। सरकार से लेकर कॉर्पोरेट सेक्टर से लेकर यूनाइटेड नेशंस तक। हर जगह जाकर टटोल कर देखा। मैंने कहा, ना-ना, ये सब एक ही थाली के चट्टे-बट्टे हैं। और एक इंडस्ट्री नहीं, चार अलग-अलग इंडस्ट्रीज़ और उसमें भी एक नौकरी ऐसी थी जिसमें अलग-अलग इंडस्ट्रीज़ में जाकर कंसल्टिंग करनी होती थी। तो उसमें और कुछ जोड़ लो संख्या और सब जगह एक ही काम रहता है, और काम मैंने कहा, ज़िंदगी होती है। और घटिया काम माने बर्बाद ज़िंदगी।
तुम्हारा काम अगर ऐसा नहीं है कि जिसको प्यार कर सको, तो तुम अपनी ज़िंदगी से भी प्यार नहीं कर सकते।
और सबसे बड़े अभागे वो हैं जिन्हें वो काम मिल गया, जो प्यार के क़ाबिल है, फिर भी उनसे प्यार किया नहीं गया। मुझसे पूछो न, मुझे नहीं मिला, बनाना पड़ा। बड़ी मेहनत लगी। बाप रे बाप! बड़ी तकलीफ़ हुई। वो तकलीफ़ आज भी चल रही है क्योंकि वो एक वर्क इन प्रोग्रेस है।
जैसे लिखा होता है न सड़कों पर, सावधान, कार्य प्रगति पर है। वैसे ही अभी भी वो तराशने का काम चल ही रहा है, इमारत कोई खड़ी थोड़ी हो गई। लगाइए, जान लगाइए, ठोकरें खाइए, खून बहाइए। बस गलतफ़हमी मत पालिएगा कि आप कहीं जाएँगे, एचआर वालियों के धोखे में तो एकदम मत आ जाइएगा। “यू नो, वी ऑफ़र अ फ़ैन्टास्टिक वर्क इनवायरनमेंट।” तेरी शक्ल पर लिखा है, तू कितनी फ़ैन्टास्टिक है। वैसे ही तेरी कंपनी और ये रोल फ़ैन्टास्टिक होगा।
हाँ, पैसा मिल जाएगा। वो भी सबको नहीं मिलता। पर जोड़तोड़, जुगाड़ करोगे, इधर-उधर मेहनत करोगे और मुँह मारोगे, पाँच-सात जगह जॉब हॉपिंग करोगे, धीरे-धीरे तनख़्वाह बढ़ जाएगी पैसा मिल जाएगा। वो फिर भी ठीक है। उतना चाहिए, तो उतना हो जाता है। पर अगर काम में मीनिंग चाहिए तो मीनिंग नहीं मिलेगी। मीनिंग बड़ी ज़बरदस्त चीज़ होती है। मीनिंग। “मैन’स सर्च फॉर मीनिंग।” विक्टर फ्रांक्ल।
नाज़ी कैंप में थे, होलोकास्ट का समय था। पूरा परिवार मारा गया, उनके दोस्त मारे गए, सब मारे गए। उन्हें नहीं पता था कि अगले दिन वो भी मारे जाएँगे। बहुत लंबे समय तक वहाँ नाज़ी यातना सही बाहर निकले। 9 दिन के अंदर उन्होंने किताब लिख डाली, “मैन’स सर्च फॉर मीनिंग।” वो किताब आज भी क्लासिक मानी जाती है। और उसमें उन्होंने कुल एक ही बात बोली, छोटी सी किताब है। बोले, आदमी को जीने के लिए कुछ भी नहीं चाहिए, हमें जीने के लिए मीनिंग चाहिए। बोले, रोटी, कपड़ा, मकान ये बेकार की बात है। सबसे गरीब, सबसे मुर्दा आदमी वो है जिसके पास मीनिंग नहीं है। और अगर मीनिंग है तो तुम कंसन्ट्रेशन कैंप से भी ज़िंदा बाहर आ जाओगे।
सार्थकता, मीनिंग। सार्थक काम जिसको मिल गया वो तर गया। काम ज़िंदगी का हिस्सा नहीं होता, काम ज़िंदगी होता है। काम ऐसा नहीं है कि मैं कमाती हूँ ताकि मैं उसको बाद में आगे उड़ा सकूँ। काम अगर आपको पैसा देता है तो वो पैसा क्यों दिया जाता है, समझिए। काम आपको पैसा मुआवज़े के तौर पर नहीं देता। मैं सार्थक काम की बात कर रहा हूँ। सार्थक काम आपको पैसा मुआवज़े के तौर पर नहीं देता। वो इसलिए देता है ताकि तुम काम में और ज़्यादा गंभीरता से, निष्ठा से, गहराई से डूब सको, ताकि तुम्हें ज़िंदगी की छोटी-छोटी साधारण ज़रूरतों के लिए परेशान न होना पड़े, तो पैसा दे दिया।
लो, पैसा दे दिया। जाकर के कुक रख लो ताकि तुम्हें अब पकाने में समय ख़राब न करना पड़े। इसलिए पैसा दिया जाता है। वो कंपनसेशन नहीं है, वो मुआवज़ा नहीं है। वो फैसिलिटेटर है। लो, पैसा दे दिया ताकि कपड़े धोने में तुम्हारा समय ख़राब न हो। जाकर खूब सारे कपड़े ख़रीद लो ताकि एक के बाद एक पहनते रहो, नहीं भी धुले तो भी अभी बचे हुए हैं, अभी और बचे हुए भी पहन लेंगे। फिर जब 15 दिन, 20 दिन, महीने भर बाद फुर्सत मिलेगी, तब इकट्ठे कहीं धोने को दे देंगे। लॉन्ड्री में देंगे। पैसा है, लॉन्ड्री में धुलवाएँगे, ख़ुद नहीं बैठ के उसको पीटेंगे कपड़े को। पैसा इसलिए दिया जाता है।
पैसा इसलिए दिया जाता है ताकि पब्लिक बस में समय न ख़राब करना पड़े। अपना वाहन ख़रीद सको, जल्दी पहुँच सको। और एक दिन ड्राइवर भी रख सको ताकि जब गाड़ी में भी बैठे हो, तब भी काम कर सको। पैसा इसलिए दिया जाता है।
पैसा काम के उत्पाद के तौर पर नहीं मिलता तुमको, काम के परिणाम के तौर पर नहीं मिलता है। मैं सार्थक काम की बात कर रहा हूँ। बाक़ी जगहों पर क्या होता है, वो तो जानते ही हो। सार्थक काम में क्या होता है, ये समझा रहा हूँ। सार्थक काम में भी सैलरी मिलती है, पैसा मिलता है, पर वो पैसा इसलिए मिलता है ताकि तुमको पैसे के बारे में सोचना न पड़े, ताकि तुम पूरे तरीक़े से आकंठ सिर्फ़ काम में डूबे रहो। सोचना न पड़े कि “अरे, मकान का किराया कैसे देंगे?” किराया छोटी चीज़ हो गया। इतना पैसा देंगे कि किराया आराम से दे लो। कोई दिक़्क़त नहीं है।
सही काम पैसे के लिए नहीं करा जाता पर वो पैसा देता है, खूब देता है।
बात समझ में आ रही है? पैसा क्यों मिलता है आपको? आपने मेहनत की है तो ये गिन के नहीं, अच्छा, इतनी मेहनत की है, तो ठीक है इसकी इतनी मजदूरी बनी। चलो, दिहाड़ी बाँट दो इनकी। ऐसे नहीं दिया जाता पैसा। लेकिन बाक़ी जगहों पर ऐसे ही दिया जाता है पैसा। जस्ट ऐज़ कंपनसेशन। कंपनसेशन माने क्या होता है, जानते हो? क्षतिपूर्ति, मुआवज़ा। हमने तुम्हारा नुकसान करा है न, तो हम तुम्हें कंपनसेट करेंगे। असली काम तुम्हारा कोई नुकसान थोड़ी करता है। सार्थक काम नुकसान नहीं करता, सार्थक काम ज़िंदगी होता है। हमने कहा, निर्वाण होता है। वो नुकसान क्या करेगा?
आपने देखा होगा कि जो ऊँचे पदों के लोग होते हैं, सरकार वग़ैरह में, उनकी गाड़ी चलती है तो उनके साथ-साथ में एक क्लियरिंग स्काउट रहता है। वो सड़क खाली कराते चलते हैं और पहले से ही बता दिया जाता है कि गाड़ी आ रही है, तो ट्रैफिक लाइट वग़ैरह भी उस हिसाब से एडजस्ट हो जाती है कि इनकी गाड़ी सीधे निकल जाए। क्यों कर दिया जाता है? क्योंकि उनका समय बचे। समय क्यों बचे? ताकि वो समय वो काम में लगा सकें। उनका समय इसलिए नहीं बचाया जा रहा है ताकि उनका रोला बना रहे, अकड़ बनी रहे, धूम बनी रहे। जलवा है भाई, जलवा है, मंत्री हो गए। देखा, गाड़ी निकलती है तो सड़क साफ़ करा देते हैं। उनके लिए सड़क इसलिए नहीं साफ़ कराई जाती। सड़क इसलिए साफ़ कराई जाती है कि टाइम बचाओ इनका, तब ये जाए काम करें। इनका समय बचाओ ताकि ये जाके काम करें, ये सार्थक काम की निशानी होती है।
मैं नहीं कह रहा कि मंत्री का काम सार्थक है। उदाहरण के तौर पर कहा है, जान लगाओ, ढूँढो। आमतौर पर जहाँ मिलेगा, वहाँ इतना ही पर्याप्त होगा कि अच्छा काम मिल गया। फिर वहाँ पैसा मत माँगना, वहाँ काम करने के लिए पैसा देना पड़े, तो दे भी देना। माँगना मत कि पैसा दे दो, एहसान मानना कि काम करने दिया। यही बहुत बड़ी बात है कि आपने हमें काम करने दिया। एहसान आपका।
और अगर दिखाई दे कि कहीं कुछ नहीं मिल रहा। एकदम ही संभव नहीं हो रहा, तो फिर मेरा रास्ता पकड़ लो। कुछ निर्मित करो, लगाओ फिर दो-तीन दशक जान। हम तो ऐसे ही थे अभागे हमें तो नहीं मिला कुछ। तो एकदम बुनियाद से शुरू करके, एक-एक गिट्टी, पत्थर तोड़कर फिर इमारत खड़ी करनी पड़ी है। वो धीरे-धीरे हो रही है अभी। आप लोगों को जो ज़िंदगी का मॉडल दे दिया गया है न, वो बड़ा हास्यस्पद है।
आपको बता दिया गया, ऐसे आप पढ़ लेते हो, पढ़ लेते हो फिर जॉब लग जाती है। ये जॉब माने क्या होता है? ये आपने कभी गहरा सवाल पूछा ही नहीं। कैसे पूछोगे गहराई, ज़िंदगी में कहीं है ही नहीं, तो गहरा सवाल भी कैसे पूछोगे? ये जॉब माने क्या होता है? कोई क्यों करें? जॉब नहीं होती, वो ज़िंदगी की सार्थकता होती है। जॉब ख़राब है, माने ज़िंदगी ख़राब है। और अगर ज़िंदगी ख़राब है, तो फिर जॉब ख़राब है। दोनों इकट्ठे चलते हैं। लाइवलीहुड नहीं, लाइफ़। वर्क लाइवलीहुड नहीं होता, लाइफ़ होता है। और मनी नहीं, मीनिंग। ये दो बातें, एफ़ोरिज़्म सूत्र की तरह याद रख लो — लाइवलीहुड नहीं लाइफ़, और मनी नहीं मीनिंग।
दो इट इज़ प्रोबेबल दैट मनी विल फॉलो। पैसा आ जाएगा, लेकिन आपको सार्थकता की तलाश करनी है।
प्रश्नकर्ता: थैंक यू सो मच। दिस मीन्स अ लॉट।