नौकरी या अपना काम? — तुम्हें चाहिए कुछ और!

Acharya Prashant

17 min
81 reads
नौकरी या अपना काम? — तुम्हें चाहिए कुछ और!
मैंने कहा है, “सत्य एम्प्लॉइड” होने को। सेल्फ भी हम आप पढ़ते हो अंग्रेज़ी में, छोटा सेल्फ, बड़ा सेल्फ। सेल्फ एम्प्लॉइड मतलब “सत्य एम्प्लॉइड” भी हो सकता है और “अहम् एम्प्लॉइड” भी हो सकता है। उसमें बात ये नहीं होती कि आपके पे-चेक पर आपका साइन है या किसी और का साइन है, बात ये नहीं होती। बात ये होती है कि उस काम के माध्यम से सेवा किसकी हो रही है। किसकी सेवा हो रही है, ये देखना होता है। यह सारांश प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन के स्वयंसेवकों द्वारा बनाया गया है

प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी। तो आपने बताया कि जैसे आपने अपनी जॉब में सिंहासन को नमन नहीं किया ऐंड यू लेफ्ट द जॉब। तो अभी मेरे मन में द्वंद आ रहा है, लाइक मैं स्कूल में हूँ और मतलब जिस तरीके से मैं संस्था से जुड़ी हुई, अपने अंदर मैंने बदलाव देखा बच्चों के प्रति भी और प्रेम भाव पैदा हुआ। तो मुझे एक कॉन्फ्लिक्ट ये आ रहा है कि मैनेजमेंट की अपनी एक्टिविटीज़, जो होती हैं, नाच-गाना ये सब, वो एक जगह मैं होते हुए देखती हूँ और दूसरी जगह मैं बच्चों के पास जा रही हूँ, कबीर साहब को लेकर या उनको अवगत कराती हूँ, रिगार्डिंग एनवायरमेंट, क्लाइमेट चेंज।

तो मुझे ये लग रहा है कि जो मैं कर रही हूँ, शायद वो करुणा कर्तव्य है, तभी मैं वहाँ रहना चाहती हूँ क्योंकि मैंने बहुत ज़्यादा चेकलिस्ट भी बनाई ये देखने के लिए कि यहाँ पर कोई मेरी कामना तो नहीं जिसकी वजह से मैं टिकी हुई हूँ।

और दूसरा प्रश्न है, ये कि शायद मैंने आपकी बातें, मतलब मिसअंडरस्टैंड की हैं कि हम सबको सेल्फ एम्प्लॉइड हो जाना चाहिए। मतलब ऐसी जगह पर नहीं रहना चाहिए जहाँ पर सत्य को छोड़कर दूसरी जगहों को नमन किया जा रहा है। तो मुझे समझ नहीं आ रहा है, कि मैं सही जगह पर हूँ की नहीं।

आचार्य प्रशांत: आज सारी बात क्या हुई? सबसे ऊपर क्या है?

श्रोता: सत्य है।

आचार्य प्रशांत: तो मैंने कहा है, “सत्य एम्प्लॉइड” होने को। सेल्फ भी हम आप पढ़ते हो अंग्रेज़ी में, छोटा सेल्फ, बड़ा सेल्फ। सेल्फ एम्प्लॉइड मतलब “सत्य एम्प्लॉइड” भी हो सकता है और “अहम् एम्प्लॉइड” भी हो सकता है। उसमें बात ये नहीं होती कि आपके पे-चेक पर आपका साइन है या किसी और का साइन है, बात ये नहीं होती। बात ये होती है कि उस काम के माध्यम से सेवा किसकी हो रही है। किसकी सेवा हो रही है, ये देखना होता है।

ये बिल्कुल हो सकता है कि आप सेल्फ एम्प्लॉइड हो, आंत्रप्रेन्योर हो, अपनी दुकान चलाते हो, कुछ भी करते हो, बड़ा व्यापार कर लिया है। आईपीओ ला रहे हो, और आगे चले गए, वो हो गए यूनिकॉर्न। तो भी उससे क्या साबित होता है? उससे क्या होता है?

हमारा रीयूनियन हुआ तो उसमें कैंपस में बाक़ी जो सब धूम मची तो मची, फैंटेसी कार्स की परेड भी निकली। क्योंकि मेरा बैच इस मामले में थोड़ा ज़्यादा लकी है, पाँच-सात यूनिकॉर्न्स हैं मेरे बैच से। कईयों ने तो अपनी, किसी ने बेंटली, किसी ने वो रोल्स-रॉयस, पिक करवा-करवा के मँगाई, एयरड्रॉप करवाई कैंपस में। अच्छा लगता है, आप दोस्तों से मिल रहे हैं पचीस साल बाद, तो दिखना भी चाहिए कि, तो पूरे वहाँ पर काफिले निकल रहे हैं। ये सब हुआ।

उसके बाद मैं बैंगलोर गया, अभी गया था। तो वहाँ पर ऑडियंस में से किसी ने कहा, कि “मैं आपके एक बैचमेट की मदर हूँ और मुझे शिकायत ये है कि मेरे बेटे को जुए की लत लग गई है, और वो दूसरों को भी जुआ खेलना सिखा रहा है।” मुझे पता नहीं कौन है, मैं क्या जानूँ। मैंने कहा, हाँ, ये तो गड़बड़ बात है, और अलग से बात करेंगे क्योंकि मामला थोड़ा व्यक्तिगत है। मेरा ही बैचमेट है, जुआ खेल रहा है औरों को जुआ खेलना सिखा रहा है। और उसके आसपास एक-दो लोग और बैठे हैं मेरे बैच के, मैं उनको देख रहा हूँ, वो हँस रहे हैं। समझ में न आए हँस क्यों रहे हैं, मैं तो मंच पर था। बाद में बताया कि ये एक यूनिकॉर्न वाले की मदर हैं, वही जो वहाँ पर परेड चल रही थी कैंपस में। उसने बेटिंग ऐप बनाई है बहुत बड़ी, जिसका बिलियन डॉलर में वैल्यूएशन है।

तो इनको नहीं समझ में आता। वो तो अपनी दृष्टि से देख रही हैं और बिल्कुल ठीक देख रही हैं। वो बोल रही हैं, ख़ुद भी जुआ खेलता है, दूसरों को भी खिलवाता है।

तो क्या निकल गया ये आईटी से पढ़कर? सेल्फ एम्प्लॉइड होना कोई अपने आप में ज़रूरी है कि अच्छी बात हो? ज़रूरी है। इतनी बार तो मैंने बोला है कि मुझे अगर मेरे जैसा कोई मिल गया होता, मैं तो लग जाता उसकी सेवा में। मुझे क्या ज़रूरत पड़ी थी फिर कि मैं ख़ुद ये काम करूँ और दिन-रात के पचड़े में फंसूँ।

तो ये कोई क्राइटेरिया मानक नहीं होता है, कि आप ओनर हैं या ओनर कोई और है। क्राइटेरिया ये होता है कि वो (ऊपर की ओर इंगित करते हुए) ओनर है कि नहीं है। मेरा ओनर होना ज़रूरी नहीं है, उसका ओनर होना ज़रूरी है। समझ रहे हो बात को?

सेल्फ एंप्लॉयमेंट के लिए मैं इसलिए बोलता हूँ क्योंकि ऐसी जगहें बहुत कम हैं जहाँ आप सार्थक काम कर सको। चूँकि ऐसी जगह कम हैं, तो मैं बोलता हूँ कोई और नहीं मिल रहा, तो ख़ुद ही शुरू कर लो। “एकला चलो रे।” पर इसका अर्थ ये नहीं है कि मेरा काम है कि मैं आंत्रप्रेन्योरशिप को प्रोत्साहन दूँ। ज़्यादातर जो आंत्रप्रेन्योरशिप होती है वो तो, ज़्यादातर नहीं सारी की सारी, जो नौकरी करते हैं वो लालची होते हैं। जो आंत्रप्रेन्योर बनते हैं, वो महालालची होते हैं। यही तो है, कि भाई, छोटी तनख्वाह से मज़ा नहीं आ रहा और पैसे चाहिए, तो अपना काम करेंगे।

अपना काम माने क्या होता है? जिस दिन तुम शुरू करते हो, उसी दिन तुमने प्लान में लिख रखा होता है एग्जिट। एग्जिट किस दिन करूँगा, ये तुम्हें पहले दिन से पता होता है क्योंकि आजकल कोई बिना फंडिंग के तो शुरू करता नहीं, और जो फंडिंग करता है, माने पैसे लगाता है, वो तुम्हारे ऊपर पूरा दबाव बना के रखता है कि एग्जिट किस दिन होगी। क्योंकि बिना एग्जिट के उसको अपने इन्वेस्टमेंट पर रिटर्न नहीं मिलेगा न।

तो अपना काम कैसे हो गया अगर पहले ही एग्जिट की तैयारी है? अगर मेरा काम होता, तो पहले ही दिन से एग्जिट की तैयारी कैसे होती? एग्जिट समझते हो न, कि ये काम मैं किसी को बेच दूँगा। किसी एक को भी बेच सकते हो या पब्लिक को बेच सकते हो आईपीओ वग़ैरह से, पर किसी को बेच दूँगा। एग्जिट तो करूँगा। अपना काम कहाँ है वो फिर? अपना काम माने क्या? मेरा कौन है, ये स्पष्ट होना चाहिए न।

देखो, आंत्रप्रेन्योरशिप में भी सवाल आ गया। मैं कौन? मेरा कौन? उसका (ऊपर की ओर इंगित करते हुए) काम करना है। उसका काम करने के लिए अगर ख़ुद कुछ शुरू करना पड़े, तो कर लो। उसका काम करने के लिए कहीं और जाकर किसी के साथ कुछ करना पड़े, तो वो भी कर लो। राम बन सकते हो, तो राम बन जाओ। राम नहीं बन सकते, तो राम की गिलहरी बन जाओ। हाँ, ये मत करना कि जहाँ काम कर रहे हो, वहाँ गड़बड़ चल रहा है और आप उसमें साथ दे रहे हो।

रावण का तोपची बनने से अच्छा है राम की गिलहरी बन जाना।

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। आज ये बिल्कुल समझ आया कि जो सत्य के साथ नहीं है, उसकी सेवा नहीं करनी है। ये चर्चा जब हम करते हैं किसी से, तो एक तर्क बहुत मिलता है कि अगर उसकी सेवा नहीं कर रहे हो, तो उससे सेवा लो भी मत। जैसे उदाहरण के लिए, कई ऐसे नेता हैं जिनके कॉलेजेस हैं, विद्यालय हैं और हॉस्पिटल्स हैं। तो अब हमारे पास कोई और विकल्प नहीं है, तो क्या हम वहाँ पढ़ाई भी न करें या वहाँ से चिकित्सा सेवा भी न लें? और आजकल तो बाबा जी भी ऐसे बहुत आ गए हैं जो कुछ आश्रम चला रहे हैं।

आचार्य प्रशांत: नहीं, नेताजी ने वो कॉलेज किस लिए शुरू करा है? दान-दक्षिणा के लिए। सबसे ज़्यादा जो पैसा बनता है, वो तो एजुकेशन सेक्टर में ही बनता है। ये इतने प्राइवेट कॉलेज किस लिए खुले हुए हैं? दान करने के लिए? बहुत पैसा बनता है इनमें। तो तुम उनसे सेवा ले कहाँ रहे हो? सेवा कहाँ ले रहे हो? पैसा दे रहे हो उनको। ये क्या तर्क है? आप किसी प्राइवेट कॉलेज में पढ़ रहे हो, जो किसी पॉलिटिशियन ने फंड कर रखा है, तो आप क्या वहाँ सेवा ले रहे हो? बल्कि आप तो बहुत ज़्यादा फीस दे रहे हो, जितनी वहाँ देनी भी नहीं चाहिए।

तो ये क्या तर्क है, कि उनसे सेवा लो मत? ले नहीं रहे हो सेवा दे रहे हो आप तो। ये जो उल्टे-पुल्टे कॉलेज खुले पड़े हैं सब, ग्रेटर नोएडा में ही देखो इंजीनियरिंग के इतने कॉलेज हैं, इसमें जाकर तुम इतने-इतने लाख दे आते हो। वो इस लायक हैं कि उनको इतनी फीस दो? और ज़्यादातर के साथ पॉलिटिशियन जुड़े हुए हैं। तो ये क्या है कि उनसे सेवा लो भी मत? कहाँ ले रहे हो सेवा, ले कहाँ रहे हो?

कईयों ने अस्पताल भी खोले हुए हैं। तो अस्पताल में क्या मुफ़्त में इलाज हो रहा है? सेवा थोड़ी कर रहे हैं, वो तुम्हारी भाई।

प्रश्नकर्ता: जी, ये बात तो आपकी ठीक है कि हम उनको पैसा दे रहे हैं। लेकिन इसका एक और मैं अभी शुरू कर रहा था, जो बाबा जी आजकल बहुत ऐसे काम करते हैं कि या तो कोई वो आश्रम बनाएँगे या कोई चिकित्सालय बनाएँगे जहाँ मुफ़्त इलाज होगा या कोई विद्यालय/गुरुकुल बनाएँगे जहाँ मुफ़्त पढ़ाई होगी। तो क्या वहाँ पर भी हम न जाकर के इलाज कराएँ?

आचार्य प्रशांत: देखो बेटा, बहुत साधारण सा सिद्धांत है संसार का, व्हेन द प्रोडक्ट इज़ फ्री, देन यू आर द प्रोडक्ट। बाबा जी तुम्हें कुछ मुफ़्त में नहीं दे रहे हैं। तुम वहाँ जाते हो, बाबा जी से मुफ़्त में पाते हो और फिर बाबा जी की चरण वंदना करते हो। वहाँ पर तुम्हें कुछ मुफ़्त में नहीं मिल रहा है।

जाया मत करो, बाबा जी का अस्पताल है पता नहीं वहाँ क्या तुमको खिला-पिला दें। जाना वहाँ नहीं चाहिए, पर दूसरे कारण से। बाबा जी कोई विज्ञान में तो विश्वास रखते नहीं हैं कि कटिंग-एज मेडिकल रिसर्च का कोई वो इंस्टीट्यूशन शुरू करेंगे। वो जहाँ जाओगे, वहाँ तुम्हें भस्म, भभूत, राख, पता नहीं क्या खिला दें चिकित्सा के नाम पर। तो इसलिए नहीं जाना चाहिए। लेकिन वो तुम्हें जो भी कुछ खिला रहे हैं मुफ़्त नहीं है। तुम्हारी समस्या ये है न कि तुम्हें समझ में नहीं आता कि तुम लूट कहाँ रहे हो। जैसे ज़िंदगी भर तुम पर लोगों ने एहसान जताया है, तुम किसी का भी एहसान बहुत जल्दी मान लेते हो।

जो तुम्हें कुछ नहीं दे रहा, वो तुम्हें सफलतापूर्वक जता जाता है कि तुम्हें बहुत कुछ दे रहा है। और जो सचमुच तुम्हें कुछ दे रहा होता है, वहाँ तुम देख ही नहीं पाते कि वहाँ मुझे क्या मिल रहा है।

“तन मन जोए तोको दियो, तासे नहुं न कीन।।”

जिससे सब कुछ मिल रहा होता है, वहाँ नहीं दिखाई पड़ता कि सचमुच तो यहाँ उपकार हो रहा है। वो नहीं दिखाई पड़ता। जहाँ कुछ नहीं दिख रहा, वहाँ पर एहसान मान लेते हो। क्यों मान रहे हो भाई, एहसान? तुम्हें क्या मिल रहा है वहाँ पर? तुम्हें क्या मिल रहा है? यू आर द प्रोडक्ट। तुम न हो तो क्या बताएँगे कि तुम हो किस लिए? कोई पूछेगा कि क्या करते हो? तो क्या बताएँगे? यही तो बताएँगे। ये देखो, ये है, ये गौशाला खोली है। उसमें गाय हैं और ये बैलशाला खोली है। इसमें बैल-बुद्धि वाले इंसान आते हैं और बाहर जाकर मेरा यशोगान गाते हैं। तीन सौ, चार सौ, पाँच सौ हो गया। या भंडारा चला दिया है, तो लोग आकर खा-पी लेते हैं।

इतनी जल्दी उपकार मत मान लिया करो किसी का। व्यापार में तो ये बहुत पुरानी नीति होती है न। इसको मैनेजमेंट जब पढ़ाया जाता है तो इसको बोलते हैं लॉस-लीडर कांसेप्ट। लॉस-लीडर, जैसे मैकडॉनल्ड्स का आलू टिक्की बर्गर ₹20, अब पता नहीं कितना, अब कितने का आता है, पता नहीं, जितने का भी है। जब मैं पढ़ाई कर रहा था, उस समय ₹20 का आता था और बाक़ी बर्गर ₹100-80 से शुरू होते थे। तो ये लॉस-लीडर कहलाते हैं।

तुम वो खाने के लिए घुसोगे और और भी कुछ खा लोगे। ₹20 दिखा के कहा जाएगा, "अंदर तो आओ।" और फिर अंदर जाओगे तो कोक भी तो पियोगे, और भी चीज़ें लोगे। वो इतना सा होगा तो उससे पेट तो भरेगा नहीं, और खाना शुरू कर दो, लगेगा, "चले यार, निकालो सौ का पत्ता, कुछ दूसरी चीज़।”

अविद्या इसलिए ज़रूरी है ताकि पता हो कि ये खेल चलता कैसे है। जहाँ कहीं तुमसे कुछ नहीं लिया जा रहा, वहाँ समझ लो बहुत ज़्यादा लिया जा रहा होगा। “वो बाबा जी तो गीता मुफ़्त पढ़ाते हैं। आचार्य जी ने क्यों कहा है कि कम-से-कम ₹300 का तो अनुदान कर दो? क्यों बोला है? क्योंकि तुमसे ₹300 ही देने को कहा जा रहा है, तुम्हें पता भी नहीं है बाबा जी के यहाँ तुम लाखों दे आ रहे हो मुफ़्त के चक्कर में। यहाँ बात सीधी है। संस्था चलती है तुम्हारे ही लिए चलती है, तुम्हारा ही पैसा लौट कर तुम तक ही जाता है। एकदम ही ग़रीब हो तो भी ₹300 तो कर लोगे खर्च।

और आप ही लोगों से बात करते-करते एक बार बात शुरू होती थी, मैं कहता था, "अरे, कम-से-कम हज़ार तो कर लोगे, फिर पाँच सौ।” कम ही तो होता जा रहा है, पर जितना भी होता जा रहा है, उतना बताकर होता जा रहा है। ये है, क्योंकि भाई, यहाँ कोई नेता आकर पोटली नहीं रखने वाला, कि “चुपचाप नेता जी को वोट दिलवा देना। आचार्य जी, आपका प्रभाव हो गया है कुछ ऐसा कर दो।” चुनाव तो लगातार चलते ही रहते हैं कि नेता जी के वोट बढ़ जाएँ। और ऐसा तो नहीं है कि आचार्य जी के पास नेता जी आते नहीं होंगे। पर चूँकि वहाँ से कोई पोटली नहीं लेनी है, तो इसीलिए आप लोग ही रुपया दोगे। नहीं तो आपके लिए मुफ़्त करा जा सकता है। बोलो, कर दें सबके लिए?

मुझे कुछ नहीं है। सेठ जी, नेताजी दोनों से बड़ी पोटलियाँ आ जाएँगी। लेकिन फिर गीता के नाम पर मैं कुछ और पढ़ा दूँगा आपको। बोलो, चाहिए? और आप जाकर मेरा गुणगान भी करोगे कि आचार्य जी तो मुफ़्त गीता पढ़ा रहे हैं।

मुफ़्त कुछ नहीं होता, जहाँ कुछ मुफ़्त दिया जा रहा हो, बिल्कुल सतर्क हो जाओ कि बहुत बड़ी धांधली हो रही है कोई। कोई उपकार नहीं कर रहा।

हाँ, यहाँ पर जो खर्चा है, वो सामने बता दिया जाता है कि है। आ रही है बात?

एक और तो कहते हो कि निष्काम कर्म बड़ी मुश्किल बात है। दुनिया में सब सकामी होते हैं। कहते हो न? ख़ुद ही कहते हो। ख़ुद को भी बड़ा मुश्किल पड़ता है किसी के लिए निष्काम कुछ भी कर देना, पड़ता है न आपको मुश्किल? और दूसरी ओर, दूसरों का एहसान भी जल्दी मान लेते हो। “उसने तो मेरे ऊपर बड़ा उपकार किया।” जब निष्काम कर्म इतना मुश्किल है, तो उसने तुम पर उपकार कैसे किया होगा? ज़रूर उसके काम में उसकी कामना है। पर वो तुम्हें दिखाई नहीं देती। बताओ क्यों? क्योंकि तुम्हें अपनी ही कामनाएँ आज तक दिखाई नहीं दी। इसलिए आत्मज्ञान ज़रूरी है।

जब आत्मज्ञान जरूरी होता है ना, तो आदमी अपनी कामनाएँ पकड़ लेता है। जब अपनी पकड़ लेता है, दूसरों की भी दिखाई देती हैं। जब दूसरों की दिखाई देती है कि उसकी तो कामना है, तो आदमी उसका एहसान मानना बंद कर देता है। कहता है, "एहसान, एहसान, कुछ नहीं कर रहे हो। अपनी कामनाएँ पूरी कर रहे हो। मुझको मोहरा बनाकर के एहसान मत जताओ।" आ रही है बात, समझ में?

वैसे हमारे पास न और भी पर्याप्त कारण हैं, ये अनुदान लगातार घटाने के। ये थोड़ी सी उससे अलग बात है। हमारे पास अब प्रत्यक्ष प्रमाण आ रहे हैं कि भारत ग़रीब होता जा रहा है। भारत ग़रीब होता जा रहा है, तो लोगों से अनुदान माँगना तो और कम करना पड़ेगा न।

कैसे पता गरीब होता जा रहा है? हम पहले कहा करते थे कि कम से कम आप पाँच हज़ार का अनुदान करिए, जब एकदम शुरुआत हुई थी, तो लोग पाँच हज़ार करते थे। फिर हमने कहा तीन हज़ार। जैसे ही हमने तीन हज़ार कहा, लोग ग़रीब हो गए। जो पाँच हज़ार करते थे, उन्होंने तीन हज़ार करना शुरू कर दिया, ग़रीब हो गए बेचारे। फिर हमने कहा एक हज़ार, तो बेचारे और ग़रीब हो गए, भारत ग़रीब होता जा रहा है।

जैसे ही हमने एक हज़ार करा, तो पाँच हज़ार वाले भी एक हज़ार पर आ गए। अब बेचारे पाँच हज़ार वाले तीन सौ पर आ गए हैं। सोचो, भारत की दुर्दशा, आम जनता कितनी ग़रीब होती जा रही है, और तीन सौ पर ही नहीं आ गए। उन्हें ये भी पता चल गया कि संस्था को चिट्ठी लिखो, मेल लिखो, आवेदन करो, तो फ्री में हो जाता है।

तो हम तो उनकी पीछे की कुंडली देखते हैं। देखते हैं, अच्छा, बीस हज़ार ऋषिकेश में आया था और करते-करते अब तीन सौ पर आया है। उसके बाद चिट्ठी लिख रहा है कि मेरे पास तीन सौ भी नहीं है, मुफ़्त में कर दो। हम कर भी देते हैं। अब ग़रीब होता जा रहा है देश, तो बेचारों की मदद तो करनी पड़ेगी न। कोई भीख ही माँगे तो उसकी गरिमा भले न हो, अपनी तो रखनी पड़ेगी न।

पर बाबा जी महान हैं। लूटो आचार्य जी को, महान बाबा जी हैं। न जाने कितनों के दिमाग में तो आईडिया कौंध गया होगा। “तीन सौ चल रहा है क्या रेट?” ये तो पता ही नहीं था कि तीन सौ हो गया है। तुरंत अभी फोन मिलाएँगे काउंसलर को। कहेंगे, "मेरी छठी दादी भी मर गई, कम कर दो।"

आपका गणित बहुत उल्टा चलता है। न जाने कहाँ सर झुका आते हो, न जाने किसका एहसान मान आते हो। “साधो, ये जग बौराना।” बौरे ही हो। शिकायत में नहीं कह रहा, प्यार में कह रहा, क्यूट बौरे हो, पर हो तो बौरे ही बहुत पागल हो। एहसान या तो उसका (ऊपर की ओर इंगित करते हुए) या उसके बंदे का, बाक़ी दुनिया को तो चढ़ने आए तो आँख दिखाओ और उठने आए तो हाथ बढ़ाओ। ये जो जगत है न, इसके साथ यही दो रिश्ते ठीक हैं। आके तुम पर चढ़े, तो हड़का के भगा दो। हाँ, तुम्हारे सामने विनम्र हो के कहे कि सहारा दो, तो करुणा के नाते हाथ बढ़ा दो।

This article has been created by volunteers of the PrashantAdvait Foundation from transcriptions of sessions by Acharya Prashant
Comments
LIVE Sessions
Experience Transformation Everyday from the Convenience of your Home
Live Bhagavad Gita Sessions with Acharya Prashant
Categories