
प्रश्नकर्ता: नमस्कार आचार्य जी। कई महीनों से — मेरी इच्छा थी कि मैं एक ऑफलाइन सेशन करूँ, और आज मैं बैठी हूँ।
भारत में, द प्रपोर्शन ऑफ़ अनएम्प्लॉइड यूथ बिलो द ऐज ऑफ 30 इयर्स — 54% इन 2009 से — 65% इन 2022। तो अब रीज़न पता चला कि हाइली एजुकेटेड लोग इसी चक्कर में फँस जाते थे कि — "जितनी बड़ी डिग्री, उतनी बड़ी नौकरी।" और दूसरी तरफ़, अमंग द इलिटरेट पीपल पता चला कि अनएम्प्लॉयमेंट रेट्स मैक्सिमम 3.5% तक ही जाते हैं। तो रीज़न हमें पता है, पर इसका सोल्यूशन क्या है?
आचार्य प्रशांत: इसका सोल्यूशन ये है कि — इम्प्लॉइड लोगों को जो झुनझुना हम देकर रखते हैं न, वो हटाने पड़ेंगे। भारत में जो सबसे बड़ा झुनझुना होता है, वो सरकारी नौकरी का होता है। और जो हमारी सामाजिक और पारिवारिक व्यवस्था है, वो उस झुनझुने के समर्थन के लिए बनी है। झुनझुना बजेगा, बच्चा नाचेगा, और समाज और परिवार ताली बजाएगा। दुनिया के किसी देश में ऐसा नहीं होगा कि आप 30–32 साल के हो गए हो, और आप बेरोज़गार हो, और आप शान से बोलो कि — “अभी तो हम कॉम्पिटिशन की तैयारी कर रहे हैं।” बिल्कुल चौड़े होकर बोलो — “अभी तो हम तैयारी कर रहे हैं।” भारत में ये बहुत बड़ा झुनझुना है। तो बस यही बात है, और कुछ भी नहीं है।
देखो, आपने कहा कि जो कम पढ़े-लिखे लोग हैं, उनमें बेरोज़गारी की दर भी कम है। कारण सीधा है — उनके पास झुनझुना नहीं है न। उनमें से कोई बिल्कुल बे-पढ़ा है, कोई चौथी पास है, कोई आठवीं। उसको पता है कि बाहर निकल के कोई बड़ी नौकरी तो वैसे भी नहीं मिलनी है। तो क्या करते हैं? उनको जो काम मिलता है, वो करना शुरू कर देते हैं, और कच्ची उम्र से शुरू कर देते हैं — कोई 16 से शुरू कर देता है, कोई 18 से, कोई 20–21 से। इसके आगे कोई बेरोज़गार बैठता ही नहीं। क्या करेगा बेरोज़गार बैठ के? तो शुरू कर देता है।
और आप जानते हो बहुत मज़ेदार बात? — आप लोग निकालो कि कहाँ का सर्वे है — 35 की उम्र में जितना इनकम डिफरेंस होना चाहिए, एक हाइली एजुकेटेड और एक सेमी एजुकेटेड में — अनएजुकेटेड की मैं बात नहीं कर रहा। आपने अनएजुकेटेड की करी थी, मैं सेमी एजुकेटेड ले रहा हूँ जितना डिफरेंस होना चाहिए। हाइली एजुकेटेड से यहाँ पर आशय है — जो ग्रेजुएशन कर चुके हैं। और सेमी एजुकेटेड माने — शायद उस स्टडी में था, कि छठी या आठवीं, जो मिडिल पास कर चुके हैं। वो डिफरेंस, इंडिया में मिनिमम है, बड़े देशों में। इसका मतलब समझना।
अभी हम क्या सोचेंगे? — किसी ने बैचलर्स कर रखा है, फिर पी.जी. कर रखा है पोस्ट ग्रेजुएट है; और कोई सिर्फ़ छठी पास है। हम क्या सोचेंगे कि 35 की उम्र में उनकी आमदनी में कितना अंतर होगा? बहुत सारा अंतर होगा। और दुनिया के बाक़ी देशों में होता भी है, वहाँ पर शिक्षा के हिसाब से आय में काफ़ी बड़ा अंतर दिखाई भी देता है। लेकिन भारत में जब एग्रीगेट लेवल पर लिया जाता है — कि, "ये साहब, हमने 10 लाख लोगों का सैम्पल ले लिया — उनमें से कोई छठी पास था, कोई आठवीं पास था। और ये हमने 10 लाख लोगों का और सैम्पल ले लिया — उसमें कोई बी.एस.सी. वाला है, कोई एम.टेक वाला है, कोई पी.एच.डी. वाला भी है, उसको भी ले लिया। और 35 की उम्र में इन दोनों सैम्पल्स की एवरेज इनकम कंपेयर करी गई — तो उसमें डिफरेंस आता है, वो वर्ल्ड में मिनिमम है। इसका मतलब समझ रहे हो क्या? इसका मतलब क्या है?
इसका मतलब ये है कि — भारत में जो कम पढ़ा-लिखा है, वो चूंकि पहले से ही काम करना शुरू कर देता है, तो 35 की उम्र तक एक अच्छी जगह पर पहुँच जाता है। स्किल्ड हो जाता है, धीरे-धीरे अपने काम में बढ़ जाता है — वो कहीं पहुँच जाता है। और ये जितने सरकारी नौकरी वाले हैं, ये सब 30–35 साल तक झुनझुना बजाते रहते हैं। ये उससे भी पीछे हो जाते हैं — जो छठी पास है, या बस उसके समकक्ष हो जाते हैं।
और इस पूरी प्रक्रिया में सहारा बनते हैं — माँ-बाप। और इस प्रक्रिया में सहारा बनते हैं, पूरे जो सामाजिक तत्व होते हैं, सरकार भी सहारा बनती है, नहीं तो सरकार इतने सारे अटेम्प्ट्स क्यों अलाउ करेगी सब नौकरियों में? और सरकार ऐसा क्यों करेगी कि ये जो एंट्रेंस एग्जाम होते हैं — सरकारी — इनमें कईयों में तो फॉर्म निकलने से लेकर के फाइनल रिज़ल्ट आने तक दो-दो, तीन-तीन साल लग जाते हैं! एक एग्जाम ही तो है ना, एग्जाम लेकर के दो या तीन महीने में समाप्त करो ना, रिज़ल्ट दे दो।
पर ख़ास तौर पर जो स्टेट लेवल में एंट्रेंस होते हैं, उनमें कई बार तीन-तीन साल लग रहे होते हैं। कई बार तो कोर्ट में जाकर के कहना पड़ता है कि — "कब हुआ था एग्ज़ाम, अभी तक उसका रिज़ल्ट क्यों नहीं डिक्लेयर किया है?" लेकिन रिज़ल्ट अगर डिक्लेयर नहीं हुआ है — तो क्या बचा रह जाता है? आशा का झुनझुना। आशा का झुनझुना लटका हुआ है, अब ये जो लड़का है जिसने एग्ज़ाम दिया था — ये बीच में जाकर के कहीं किसी दुकान में कोई साधारण काम थोड़ी शुरू करेगा। ये बोलेगा — "साहब, मैंने तो बैंक का एग्ज़ाम दिया है", या — "मैंने पी.सी.एस. का एग्ज़ाम दिया है। मैं किसी जगह जाकर साधारण सेल्समैन थोड़ी बन जाऊँगा बीच में।" और जो बन गया था साधारण सेल्समैन — वो धीरे-धीरे इन तीन सालों में बढ़ता जा रहा है, वो बढ़ता जा रहा है।
भारत का जो अनएम्प्लॉयमेंट है न — वो बहुत अंडरस्टेटेड है बेटा। भारत में हमें जो मिलता है — अच्छे से समझना — वो है अंडरएम्प्लॉयमेंट, हिडन अनएम्प्लॉयमेंट, वी आर ऑल अंडरएम्प्लॉयड। भारत का जो अनएम्प्लॉयमेंट है वो हिडन है, समझ रहे हो? जो आपके सामने आँकड़ा भी आता है न — कि इतने हैं — वो उससे ज़्यादा है, जो अनएम्प्लॉयड हैं, डिसगाइज़्ड हैं। वो अपने आप को घोषित कर देता है — "साहब, मैं भी कर रहा हूँ..." पर वो कर कुछ नहीं रहा है।
वो, वो काम कर रहा है जो दिन के एक या दो घंटे में हो सकता है। बाकी समय निकाल के कुछ और कर रहा है। क्यों? क्योंकि उसके भीतर ये मूल्य स्थापित ही नहीं किया गया है कि — जवानी के साल, 20 से लेकर 35 के साल — जी-तोड़ मेहनत करके ज़िन्दगी संवारने के लिए हैं। उसको ये बताया ही नहीं गया। उसे लाज ही नहीं आती कि — "मैं कुछ करता नहीं हूँ।" वो आराम से पड़ा हुआ है, और क्या बोल रहा है? — "मैं तो अभी तैयारी कर रहा हूँ।" बहुत मुश्किल नहीं है, सच पूछो तो — ये जितने भी एग्ज़ाम्स हैं, इन्हें निकालना बहुत मुश्किल नहीं है। कारण बता देता हूँ।
अगर किसी एग्ज़ाम में 1000 सीटें हैं, तो उसके लिए सचमुच तैयारी करने वाले पाँच से सात हज़ार होते हैं बस। बाक़ी बस अपना वक़्त ख़राब कर रहे होते हैं। तो बहुत कॉम्पिटिशन है नहीं। बाक़ी सब बस हिडन अनएंप्लॉयमेंट वाले होते हैं — जो कॉम्पिटिशन के नाम पर अपना समय ख़राब कर रहे हैं। ये एक बहुत यूनीक फिनॉमेना है — जो भारत में ही पाया जाता है। दुनिया के किसी देश में सरकारी नौकरी को या ब्यूरोक्रेसी को इतनी तवज्जो नहीं दी जाती।
पर भारत का जो फ़्यूडल पास्ट है न — भारत में इसको तवज्जो क्यों दी जाती है, समझना। क्योंकि हमारा एक फ़्यूडल पास्ट है — ज़बरदस्त तरीक़े से। और हमारे यहाँ पर वैचारिक क्रांति अभी पूरी तरह हुई नहीं है। फ़्यूडलिज़्म का क्या मतलब होता है? फ़्यूडलिज़्म के आपने सैलिएंट फ़ीचर्स पढ़े होंगे — अपनी सोशियोलॉजी वग़ैरह में। क्या होता है? ये होता है कि — जो फ़्यूडल लॉर्ड है, वो करता कुछ नहीं है — दूसरे काम करते हैं, जो फ़्यूडल लॉर्ड है — वो बैठ के?
श्रोता: खा रहा है।
आचार्य प्रशांत: सबको वही बनना है। और वो बनने के लिए अगर 10 साल ख़राब करने पड़ें — तो क्या हो गया? ये बात हमारी मूल्य-व्यवस्था में आ गई है — कि सर्वोच्च आदमी वो है जो मेहनत नहीं करता, बैठ के खाता है। हम उससे रश्क़ करते हैं, हमें ईर्ष्या होती है उससे — जिसको हम पाते हैं कि वो कुछ नहीं करता, बैठ के खा रहा है। हम ये नहीं कहते कि — “धिक्कार है इस आदमी पर, करता कुछ नहीं बैठ के खा रहा है!” हमें लगता है — "वाह यार, सही मज़े हैं तेरे तो!"
अभी भी लड़कियाँ होती हैं, छोटी — उनमें ये मूल्य डालने की कोशिश की जाती है कि — "अच्छे से अपने आप को बना, सँभाल के रख, तुझे डॉक्टर-इंजीनियर मिल जाएगा, तेरी ज़िन्दगी बन जाएगी।" तुम देख रहे हो — उसमें क्या मूल्य डाला जा रहा है? यही — बैठ के खाएगी। यही बात हमारी जाति-प्रथा में भी दिखाई देती है, इसलिए मैंने कहा कि दिस फेनॉमेना इज़ यूनिक टू इंडिया।
जाति-प्रथा का भी क्या मतलब है? सबसे ऊपर पहुँच जाओ — जहाँ करना कुछ नहीं है, बैठ के खाना है, और इज़्ज़त भी ख़ूब मिलेगी। तुम वो हो जाओ — जिसे कुछ नहीं करना है, बस बैठ के खाना है। इज़्ज़त भी ख़ूब पाओगे। बस ऑथॉरिटी बन जाओ, पावर सारा तुम्हारे पास आ गया — अब करना थोड़ी कुछ है, बैठ के खाओ। यही बात ये भी स्पष्ट करती है कि भारत की ब्यूरोक्रेसी, दुनिया की सबसे भ्रष्ट ब्यूरोक्रेसीज़ में क्यों है — क्योंकि उसमें आप इसलिए प्रवेश करते हो कि — करना कुछ नहीं है, बैठ के खाना है।
तो जो-जो हमारा फ़्यूडल पास्ट है, हम उससे मुक्त नहीं हो पा रहे हैं। रेनेसांस जैसी कोई चीज़ भारत में हुई ही नहीं है अभी तक। हमारे लिए जीवन की सबसे ऊँची बात यही हो सकती है कि — “भाई, करता कुछ नहीं है, खाता है।” और भले ही डिज़र्व नहीं करता, पर उसके पास पावर और ऑथॉरिटी पूरी है। राजा जी हैं! यहाँ सबको राजा बनना है। यहाँ पर किसी को भी श्रम नहीं करना है, यहाँ सबको बस ऐश करनी है। ऐश्वर्य चाहिए सबको।
हम क्या लोगों की मेहनत को पूजते हैं भारत में? नहीं पूजते ना। हम कहते हैं — बस एक ऐसी जगह पा लो जहाँ पहुँच गए एक बार, तो फिर कोई मेहनत नहीं करनी पड़ेगी। चाहे वो जगह एक ट्रॉफी वाइफ़ की हो, चाहे वो जगह पॉलिटिकल पावर की हो, चाहे वो वजह अनअर्न्ड मनी की हो, चाहे वो वजह ब्यूरोक्रैटिक ऑथॉरिटी की हो — बस किसी ऐसी जगह पहुँच जाओ, जहाँ एक बार पहुँच गए — फिर बल्ले-बल्ले!
उस जगह पहुँचने के लिए अगर जवानी के 10 साल ख़राब करने पड़ें — तो कर दो! ये है अनएम्प्लॉयमेंट। सारा खेल मूल्यों का है — वैल्यू सिस्टम का है। किसी भी समाज में कुछ भी हो रहा हो — तो बस ये देख लेना कि उस समाज में वैल्यू सिस्टम क्या है। भारत के जो लोक-मूल्य हैं, जो हमारी कॉमन प्रिवेलेंट वैल्यूज़ हैं — उनमें बहुत कुछ सड़ा हुआ है और हम उसको हटाने को तैयार नहीं हैं। हम जिनको अपना आदर्श मानें, हम जिनको अपने गॉड्स मानें — वो श्रमशील क्यों नहीं हैं, बताओ ना?
मेरा महापुरुष, मेरा अवतार, मेरा देवता तो वो होगा जो मेहनत कर रहा है, संघर्ष और श्रम कर रहा है।
लेकिन हमारे जो प्रचलित सब आदर्श हैं — चाहे वो सामाजिक हों या धार्मिक — उनमें श्रम कहाँ दिखाई देता है? कहीं-कहीं दिखाई देता है, जहाँ-जहाँ दिखाई देता है, वहाँ सौंदर्य है। पर अधिकांशता श्रम नहीं दिखाई देगा। अधिकांशता ये रहता है कि — ‘ये बस है। भाई, फलाने देव हैं वो स्वर्ग में क्यों राज कर रहे हैं? क्योंकि वो देव हैं।’ तो हर आदमी बस…., कभी मेहनत करके उनको दिखाया गया?
मैं नहीं कह रहा कि ऐसी चीज़ें दूसरे देशों में या दूसरे समाजों में होती ही नहीं, पर भारत में ज़्यादा है। मुझे क्या बन जाना है? ‘द फ़्यूडल लॉर्ड।’ तो हमने अपने सब आदर्श भी उसी तरीक़े से बना दिए हैं — ‘द फ़्यूडल लॉर्ड्स।’ और इसीलिए 'हीरो वर्शिप' का भी हमारे यहाँ बहुत चलन है। कोई एक है जो वहाँ पहुँच गया, और अब वो वहाँ से सारा पावर कमांड कर रहा है। कोई एक है...
जो डिग्निटी है — स्ट्रगल में, स्ट्राइफ़ में, एफर्ट में, लेबर में, अटेम्प्ट में — हमें उसकी इज़्ज़त करना सिखाया नहीं जाता। हमसे ये नहीं कहा जाता कि जो हाथ चला रहा है, सबसे ज़्यादा इज़्ज़त का वो अधिकारी है। आप अगर वर्ण व्यवस्था में देखोगे, तो जो हाथ चलाता है, मेहनत करता है, उसको हमने सबसे नीचे रख दिया है। तो कोई क्यों हाथ चलाना चाहेगा? तो फिर, हम हाथ नहीं चलाना चाहते। हम नहीं चलाना चाहते हाथ। हम श्रम को इज़्ज़त देते ही कहाँ हैं?
एक आदमी बहुत मेहनत करके कमाता है — ईमानदारी से। बताइएगा — एक आदमी है, बहुत मेहनत करके कमाता है, और एक आदमी है जो बैठ के मुफ़्त की — रिश्वत की — खाता है। ये समाज इज़्ज़त ज़्यादा किसको देता है?
श्रोता: रिश्वतखोर।
आचार्य प्रशांत: वो रिश्वतकखोर को ही ज़्यादा इज़्ज़त मिलती है। एक वर्किंग वुमन होती है — दस हाउसवाइव्ज़ मिल जाएँगी, उसको ताने मारेंगी। कहेंगी — ‘बेचारी गरीब है, इसलिए इसको मेहनत करनी पड़ती है। देखो, धूल में निकलती है, धूप में निकलती है, इसका तो मुँह काला हो गया। हमें देखो — हम खरगोश सी मुलायम खाल लेकर घर में रहते हैं, एश करते हैं। हमारा पति कोई भिखारी है क्या, कि हमें काम करना पड़े।’ डिग्निटी ऑफ़ लेबर नहीं है। बल्कि जो लेबर कर रहा है, उसको नीचे और दिखाओ। और जो मुफ़्त की खा रहा है — बिल्कुल ज़मीन की भाषा में कहूँ तो — हराम की खा रहा है, उसको इज़्ज़त मिलती है। आप शुरुआत करो — मूल्य बदलो। जिस किसी को देखो कि उसके पास अनअर्न्ड मनी है — चाहे इनहेरिटेंस से, चाहे कोइन्सिडेंस से — उसको इज़्ज़त मत दो। ऋषि अष्टावक्र क्या बोलते हैं? — “अनादरम कुरु।”
अनादर करना सीखो।" सिर्फ़ इसलिए कि तुम्हारे सामने कोई आ गया है और उसके पास एक ऑथॉरिटी है — ये नहीं कि उसको नमस्ते कर दिया और सर झुकाने लग गए और ये सब। देखो कि उसमें योग्यता कितनी है, देखो कि ये संघर्ष कितना करता है — दिन-रात।
संघर्ष को सम्मान देना सीखो — बेरोज़गारी कम हो जाएगी।
लोग कहेंगे — "क्या वो लोग संघर्ष नहीं कर रहे जो 10-10 साल तैयारी करते हैं?" नहीं साहब, नहीं कर रहे। हमने भी तैयारी करी और हम अच्छी तरह जानते हैं कि उस तैयारी में कितना संघर्ष लगता है। और हमने भी ऑन्त्रप्रेन्योरशिप करी और हम जानते हैं कि उसमें कितना संघर्ष लगता है। जब भारत संघर्ष को सम्मान देने लगेगा — आप पाओगे, बेरोज़गारी वग़ैरह गायब हो गई है। कोई बेरोज़गार हो कैसे सकता है? क्या करने को कुछ नहीं है? बिलकुल है।
पर हम उसे "छोटा काम" बोलकर करते नहीं हैं। और "छोटा काम" किस अर्थ में है? कि उसमें पैसा नहीं है। हमारे पास काम को बड़ा या छोटा कहने का और तो कोई पैमाना होता भी नहीं ना। जिस काम में पैसा न बहे, हमारी दृष्टि में वो छोटा हो जाता है। और कोई भी अच्छा काम आपको पैसा देने ही लग जाएगा — वो भी तुरंत — इसकी कोई गारंटी तो होती नहीं। तो हम फिर अच्छा काम करते भी नहीं। नहीं तो बताओ ना — आप एक जवान आदमी हो, महिला हो, पुरुष हो, कुछ भी हो, आप 21 के हो, आप 25 के हो। बेरोज़गारी का मतलब क्या है?
आप बोल रहे हो — “मेरे पास करने को कुछ नहीं है।” क्यों करने को कुछ नहीं है? निकलो, देखो — जहाँ कहीं भी कुछ गलत हो, उसको ठीक करो। और जो तुम करोगे — उससे किसी न किसी को तो फ़ायदा होगा ही, तो कुछ पैसा आने लग जाएगा, तुम्हारा पेट चलने लग जाएगा। उससे ज़्यादा की कामना रखो मत। क्योंकि श्रम, संघर्ष और कार्य का स्तर मायने रखते हैं। तुम्हें उसमें से मिल क्या रहा है — वो बाद की बात है।
भाई, काम का क्या मतलब होता है? काम का मतलब होता है — मैंने कुछ करा और उसमें मेरा आनंद है, मेरा संतोष है। और जो मैंने करा, उसके फलस्वरूप मुझे कुछ पैसे भी मिल गए। पैसे मिल गए तो मेरा उससे घर चल गया — यही तो काम है। यही काम की परिभाषा है न? मैंने कुछ करा — क्यों? क्योंकि वो करना ठीक था। और जो मैंने करा, उससे दूसरे को भी फ़ायदा हो गया — तो मुझे कुछ मिल गया।
अगर तुम कोई अच्छा काम करोगे, तो उससे किसी न किसी को, कुछ न कुछ तो फ़ायदा होगा न? तुम्हें कुछ पैसे मिल जाएँगे, तुम करो न। ‘बेरोज़गारी’ शब्द का तो कोई अर्थ ही नहीं है। घर में पड़े हुए हो और कह रहे हो, “मुझे कोई जॉब देने वाला नहीं है, इसलिए घर में पड़ा हूँ।” जॉब देने वाले का क्या मतलब है? तुम्हारा मोहल्ला गंदा पड़ा हुआ है, जाओ मोहल्ला पूरा साफ़ कर दो। बोलो, “मोहल्ला मैं साफ़ करूँगा, बदले में हर घर से 50 रुपए लूंगा।” लो, मिल गया रोजगार। नहीं मिल गया?
दुनिया में इतना कुछ है जिसको ठीक किया जाना ज़रूरी है। तुम उसको ठीक करो, बदले में लोग तुम्हें पैसा दे देंगे। काम भी अच्छा करोगे और तुम्हारा खर्चा भी चलेगा। अजी साहब, इतना आसान नहीं होता है। ये जो लोग बोल रहे हैं, “इतना आसान नहीं होता।” बेटा, आप जहाँ बैठे हो, मैं वहाँ बैठ के उठ भी चुका हूँ। तो आप हमें मत बताइए कि आसान होता है कि कठिन होता है।
मैं जो काम कर रहा हूँ, ये कोई इंडस्ट्री नहीं होती है। बस मुझे ये करना था, मैंने किया। और इससे जिनको लाभ हुआ, वो मेरे साथ खड़े हो गए। उन्होंने कहा, “आप और करिए, आगे बढ़िए। आप जो कर रहे हो, उससे हमें ही लाभ हो रहा है। हम आपको संसाधन देंगे, आप आगे बढ़िए।” नहीं तो इसका कोई पहले से ब्लूप्रिंट थोड़ी उपलब्ध था, कि ऐसे-ऐसे करो, तो करियर आगे बढ़ेगा और पैसा मिलेगा। ना तो इसमें कोई करियर होता है, ना कोई इंडस्ट्री है। ना ये काम ऐसा है कि कोई और कर रहा है, तुम नकल करके कर डालो।
जो मुझे ठीक लगता गया, मैं करता गया। और चूंकि जो मैं कर रहा था, वो औरों के भी काम आ रहा था, तो उनसे मुझे फिर समर्थन मिलता गया। आप भी देखिए ना कि क्या ठीक है ज़माने में करने के लिए, और उसको करिए। और ये भरोसा रखिए कि भूखे नहीं मरेंगे। हाँ, ऐय्याशी की चाह हो, बैठे-बैठे खाना हो, तो फिर कोई उपाय नहीं है। सही संघर्ष करने निकलो, कोई बेरोज़गारी नहीं रहेगी।