
प्रश्नकर्ता: नमस्ते, आचार्य जी। मैं बचपन से एक ऐसी स्टूडेंट रही हूँ, जो बहुत ही ज़्यादा परफॉर्मेंस-ओरिएंटेड रही है एकेडमिक्स में भी और नॉन-एकेडमिकली भी। तो इसलिए 10वीं में मैंने टॉप किया और उस साल मैंने बैडमिंटन में नेशनल्स भी खेले। उसके बाद मैंने ये डिसाइड करा कि मैं मेडिसिन पर्स्यू करना चाहती हूँ।
जब मैंने तैयारी करना स्टार्ट किया और कॉन्सेप्ट्स और सब्जेक्ट्स थोड़े मुश्किल होने लग गए, तो मेरे मन में ये बहुत स्ट्रॉन्गली आ गया कि मैं ये एग्ज़ाम कभी भी क्लियर नहीं कर पाऊँगी, और मुझसे कभी नहीं हो पाएगा। उस समय डर की वजह से मैं ये नहीं देख पा रही थी, कि मैं हर ही सब्जेक्ट बहुत अच्छे से मन लगाकर पढ़ती थी और हर ही में अच्छा परफॉर्म कर रही थी, और सब में ही 90% मार्क्स ला रही थी।
तो मेरा उसके बाद बीएचयू में ऐडमिशन हो गया और मैंने वहाँ पर यूपीएससी की तैयारी स्टार्ट की। तैयारी धीरे-धीरे शुरू हो गई, लेकिन सेम चीज़ मेरे साथ दोबारा हुई। जब मैंने और लोगों को देखा जो पहले से तैयारी कर रहे थे या जब चीज़ें मुश्किल होने लगीं और मुझे समझने में थोड़ी कठिनाई आने लगी। तो हेल्प लेने की बजाय मेरा फियर और बहुत स्ट्रॉन्ग हो गया, कि मैं ये भी नहीं कर पाऊँगी। किसी ने ज़्यादा ध्यान भी नहीं दिया।
मास्टर्स एंट्रेंस की जब मैंने प्रिपरेशन की, तो मुझे लगा मेरा कहीं सिलेक्शन नहीं होगा। जब रिज़ल्ट आया तो मैंने देखा कि टॉप फाइव सेंट्रल यूनिवर्सिटीज़ में मैंने टॉप किया है। तब मुझे ये रियलाइज़ हुआ कि यदि मैं मेहनत करती, यदि मैं फोकस्ड रहती, तो जो मेरे लक्ष्य थे मैं उनको अचीव कर सकती थी।
फिर मैंने मास्टर्स के लिए दिल्ली यूनिवर्सिटी में क्लीनिकल साइकोलॉजी में ऐडमिशन लिया। और वहाँ पर फिर मेरी स्थिति बहुत ज़्यादा इस तरीक़े की होने लगी कि "इन लोगों को पता है इन्हें कहाँ जाना है, ये तो मेरा लक्ष्य भी नहीं है। मैं डरते-डरते यहाँ तक आ गई हूँ।" मैं आपके सत्रों से ये समझ पा रही हूँ कि मैंने उस इंटेलिजेंस को अपनी आइडेंटिटी बना लिया था।
तो वो खोने का डर इतना ज़्यादा था कि मैं अपने लक्ष्य की तरफ़ मेहनत ही नहीं कर पाई। उसके बाद मेरे अंदर ये आया कि मैं गलत हूँ, मैंने बहुत बड़ा ब्लंडर कर दिया है और मैंने बहुत बड़ी स्टूपिडिटी की है। बट अब मैं आगे अपने जीवन में क्या लक्ष्य निर्धारित करूँ? मैं क्या डिसीजन लूँ?
आचार्य प्रशांत: देखिए, आपका जो पूरा सवाल है ना, वो 10 जगह पर बिखरा हुआ है। वो 10वीं से लेके अभी तक यहाँ बिखरा, वहाँ बिखरा। बात बहुत सीधी है, किसी भी लक्ष्य के लिए मेहनत तो तब होती है ना, जब अपना और उस लक्ष्य का रिश्ता पता हो। 10वीं के नंबरों पर मत जाइएगा, वो बहुत आसानी से आ जाते हैं। 10वीं के नंबर किसी भी तरीक़े से जीवन में स्पष्टता का द्योतक नहीं होते हैं। बहुत लोगों के 10वीं में एकदम बिना कुछ करे, ऐसे ही नंबर आ जाते हैं। बहुत एकदम साधारण किस्म के, बल्कि मेरे जैसे मूर्ख के भी आ गए थे। तो वो उसमें कुछ नहीं है।
लेकिन जब आप बात करती हैं प्रतियोगी परीक्षाओं की, जीवन में क्या करना है और उसमें किस तरीक़े के अपने एफर्ट और टाइम का इन्वेस्टमेंट करना है। तो इसके लिए अपने लक्ष्य से अपना बड़ा प्रेम का रिश्ता होना चाहिए। तभी मेहनत हो पाती है। और वो जो प्रेम है, वो आपको कोई साइकोलॉजिस्ट नहीं बता देगा। आप यूँही किसी चीज़ की तैयारी करेंगे, चाहे मेडिकल एंट्रेंस एग्ज़ाम की, चाहे सिविल सर्विसेज़ की तो उसमें कुछ हो नहीं पाना है।
हम जब प्रेम में रहते हैं ना, तो ये भी स्पष्ट होता है कि कितना करना है। आदमी डूब के करता है, और प्रेम ही ये भी बता देता है कि अब और करने की ज़रूरत नहीं है। प्रेम की अगली सीढ़ी चढ़ने का वक़्त आ गया है, अब इसी सीढ़ी पर और बैठे रहने की ज़रूरत नहीं है। वहाँ सब स्पष्टता आ जाती है। नहीं तो आप जो सवाल कह रही हैं, वो तो हज़ारों लाखों लोगों का है, कि “क्या करें, क्या न करें? इसकी बात सुनी तो कन्फ्यूज़ हो गए, उस चीज़ में लगे तो डर गए। उस चीज़ में कुछ दिन तक मेहनत करी, उसके बाद डिस्ट्रैक्ट हो गए।” है ना?
डिस्ट्रैक्शन, लैक ऑफ कंसंट्रेशन, लैक ऑफ क्लैरिटी। इन सबका एक ही जवाब होता है — लव। प्रेम होता है तो कंसंट्रेशन अपने-आप बन जाता है। और क्लैरिटी के बिना लव हो नहीं सकता। क्यों जाना है भाई मेडिसिन में? क्या वजह है? आपका मेडिसिन के फ़ील्ड से क्या रिश्ता है? क्यों जाना है? अब क्यों साइकोलॉजिस्ट बनना है, क्यों? और जो आपने पाँच-सात विकल्प और भी गिना दिए, वो क्यों करने हैं?
बहुत समय पहले की बात है। उसकी पढ़ी होगी रिकॉर्डिंग, आप सुनिएगा। "योर टारगेट्स आर नॉट योर टारगेट्स।" मेरे ख़्याल से आईआईटी दिल्ली के स्टूडेंट्स थे, 2011 की बात होगी कि "योर गोल्स आर नॉट योर गोल्स।" कुछ इस तरीक़े से करके था। तुम्हारे लक्ष्य, तुम्हारे लक्ष्य हैं ही नही, तो तुम उनके पीछे कितने समय तक चल लोगे?
हाँ, जो छोटे-मोटे होते हैं, वो चल लेते हैं। उदाहरण के लिए, आप बैठी हो — मम्मी ने कहा, "बेटा, एक गिलास पानी ले आ दे।" वो पानी आपको नहीं पीना है। लेकिन फिर भी पानी कुछ नहीं है रसोई में रखा है। आप जाओगे, ले आकर माँ को दे दोगे। ठीक है? उतना चल जाता है।
पर अब आप कहो कि इसी तरीक़े से आपको यूपीएससी की तैयारी करनी है, तो नहीं चलेगा ना। क्योंकि वहाँ बात रसोई से पानी लाकर देने की नहीं है। वहाँ आपको कम से कम 2 साल लगाना पड़ेगा। पूरी जो प्रक्रिया ही है, वो एक साल से ज़्यादा चलती है। और कुछ महीने आप कम से कम तैयारी के भी मानो, तो कुल मिलाकर के शुरू से अंत तक 2 साल लग जाता है। 2 साल किसी ऐसी चीज़ में कैसे दे लोगे जिससे प्यार ही नहीं है?
हैरत की बात ये है कि लोग 2 नहीं, 10 साल भी दे लेते हैं। और 10 साल देकर भी उन्हें कुछ नहीं मिलता। और वो जो 10 साल देने वाले हैं, मात्र संयोग से उनमें से किसी का लाख में से किसी का चयन हो भी जाता है। जब किसी का हो जाता है चयन, तो बहुतों को ये ग़लतफ़हमी हो जाती है कि बिना प्रेम के भी अगर सफलता मिल सकती है, तो हमें भी मिल सकती है। तो उस एक की देखा-देखी, उसके पीछे-पीछे न जाने कितने चल देते हैं — बिना प्यार के।
बिना प्यार के जिस दिशा में जा रहे हो, उस दिशा में कुछ हासिल नहीं होना है। आप सारे वही विकल्प बता रहे हो जो मेनस्ट्रीम हैं। जो बहुसंख्यक छात्र चुनते हैं। आप भी उन्हीं की बात कर रहे हो।
आपको क्यों चुनना है?
आपने कहा, आप बैडमिंटन में नेशनल खेल के आई थीं। मैंने बैडमिंटन का उसके बाद आपसे नाम ही नहीं सुना। कहाँ चला गया बैडमिंटन?
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, वो इसलिए क्योंकि मैं एक बहुत छोटे शहर से थी। तो जब ट्रेनिंग की बात हुई, तो इस शहर में कोई कोच नहीं था। और पेरेंट्स को ये था कि आप पढ़ाई पे फोकस करें।
आचार्य प्रशांत: प्रेम में ये थोड़ी देखा जाता है। अभी-अभी हम सत्र में क्या बोल रहे थे? "अब चाहे माँ रुठे या बाबा, यारा तेरी बाँह पकड़ ली!"
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी वो नहीं, मतलब जो मेरे कोच यहाँ पर भी जो मुझे सिखाते थे। मतलब एक असेसमेंट के बाद उनको ये था, कि आप इस लेवल तक जो स्कूल नेशनल गेम्स होते हैं — एसजीएफआई नेशनल्स, वहाँ तक आपने करा। मतलब वहाँ तक करने में भी बहुत ही ज़्यादा…
आचार्य प्रशांत: आप ना मेरा असेसमेंट करके बता दो कि, “गीता आपने जहाँ तक पढ़ा ली है वहाँ तक कर सकते हो, उससे आगे नहीं कर सकते” आप बोल के दिखा दो मुझे। आप मेरा असेसमेंट करके मुझे बता दो। “आचार्य जी, आपने जितनी किताबें करवा दी-करवा दी, उसके आगे मत करवाओ। आपका लेवल नहीं है।” आप बोल के रोक लो मुझे।
ये कौन-सा प्यार है जो दूसरों के असेसमेंट पर आश्रित है? और जो इस पर आश्रित है कि मैं छोटे शहर से हूँ कि बड़े शहर से हूँ? मैं आपको बैडमिंटन प्लेयर बनने के लिए अब नहीं बोल रहा हूँ। अब तो आप, आपकी क्या उम्र हो रही होगी अब?
प्रश्नकर्ता: 24।
आचार्य प्रशांत: बना तो अभी भी जा सकता है।
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मतलब खेलना तो मैंने फिर से ही शुरू कर दिया है। बिकॉज़ आप खेलते हो तो आपकी पढ़ाई भी अच्छी होती है, मैंने ये देख लिया है। तो इसीलिए मैं खेलती तो हूँ। और मुझे स्ट्रेंथ ट्रेनिंग करने का बहुत समय से मन था, तो मैंने जिम भी जॉइन किया है।
आचार्य प्रशांत: अपन ने भी गोल बनाया है कि अगर टाँगे चलती रहीं तो टेनिस में टूर्नामेंट खेलने जाएँगे और कम्युनिटी पर उसका लाइव करेंगे। कौन आकर हमें बताएगा? कौन-सा डॉक्टर आकर कहेगा कि नहीं, मत करो? कौन-सा कोच आकर कहेगा कि नहीं, तुम्हारी प्रतिभा नहीं है? करना है तो करना है।
आप जितनी बातें बोल रहे हो ना, वो सारी बिल्कुल एकदम सदी-सदी हैं। मेनस्ट्रीम है। सब ऐसे करते हैं। मैं भी करूँगी। ऐसी बातों में प्यार कहीं नहीं होता बेटा। और ज़िंदगी ना ऐसे गणित पर नहीं चलती है। उसके लिए प्यार चाहिए होता है।
और मुझे बहुत ज़्यादा कोफ़्त होती है जब मैं किसी जवान व्यक्ति को देखता हूँ, जिसके पास प्यार से ज़्यादा डर होता है। पूछता हूँ बार-बार, बेधड़क जीने में समस्या क्या है? चल लो ना किसी भी दिशा। क्या है? मतलब करियर माने क्या होता है? कितने पैसे चाहिए ज़िंदगी में?
अभी आपका कितना खर्चा है महीने का?
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, बहुत ही कम। तीन महीने में 10,000।
आचार्य प्रशांत: मान लो महीने का 10,000 का भी है, तीन महीने का नहीं। तो इतना क्या कमा नहीं लोगे? करियर माने क्या होता है? करियर माने प्यार होना चाहिए ना। प्यार है तो ये 10,000-20,000, मैं कहता हूँ 40-50,000 भी बहुत आसानी से आ जाते हैं। कौन-सी बड़ी बात है इतना पैसा?
और एक आदमी जो अभी-अभी अपनी यात्रा पर निकल रहा है। अपनी अभी वो 20 की वय में है या 30 तक पहुँच रहा है, उसको इससे ज़्यादा पैसे चाहिए भी क्यों? तुम्हें और किसी तरीक़े से बड़े खर्चे करने हैं? कुछ करने हैं? उसके लिए पूरी ज़िंदगी पड़ी है।
तो करियर का मतलब तो होना चाहिए — प्यार। अन्वेषण, घूमना, फिरना, जानना, अनुभव एकत्रित करना। है ना? उसकी जगह हम करियर का पैमाना बना लेते हैं कि सब लोग कहें, "बहुत बड़ा एग्ज़ाम क्रैक कर दिया। बहुत बड़ी नौकरी लग गई। बहुत सारे पैसे मिल गए।" बहुत बड़ी नौकरी का भी हमारा यही पैमाना है कि उसमें पैसे खूब मिलते हैं। करियर को लेकर चिंता है ही क्यों? बताओ तो। पैसे तो तुमको मिल ही जाएँगे।
आप तो अभी बोल रहे हो कि महीने का 3,000 ख़र्च करते हो। मैं कह रहा हूँ, 3 की जगह अगर आप 20-30 भी करते हो, तो उतना भी आपको मिल जाएगा। ये आज के समय में कोई बड़ी बात नहीं है। तो ध्यान पैसे की ओर तो होना ही नहीं चाहिए ना। ध्यान तो किसी और दिशा में होना चाहिए। जिस दिशा में होना चाहिए, उधर दिल ही नहीं है।
अपने आप से पूछो — मैं कैसी हूँ?
बैठो, और जैसे तुम्हारे सामने तुम्हारी कोई हमशक्ल बैठ गई हो, उससे बात करो। फिर उससे पूछो, "तू दिल से बता तुझे क्या चाहिए? दिल से बता।" और फिर ये मत देखो कि मामला प्रैक्टिकल कितना है। ये जो शब्द है ना, “प्रैक्टिकल” ये बहुत बड़ी मूर्खता है।
जब प्यार होता है, तो सब प्रैक्टिकल हो जाता है। समझ में आ रही है बात?
कहते हैं — प्यार होता है ना, तो जो लंगड़ा होता है वो चलना शुरू कर देता है। वो भी प्रैक्टिकल हो जाता है। प्यार होता है तो अंधे को दिखाई देना शुरू हो जाता है, सब प्रैक्टिकल हो जाता है। बीमार आदमी उछलना शुरू कर देता है, सब प्रैक्टिकल हो जाता है। वो चीज़ होनी चाहिए। और वो कोई बाहर से लाने वाली चीज़ नहीं है, वो सब में होता है। पर प्यार, डर के नीचे छुपा रहता है। जो आदमी जितना डरपोक होगा, वो प्यार के लिए उतना कम काबिल होगा। प्रेम की सारी पात्रता ही डर के नीचे समाप्त हो जाती है।
तो वो सब में होता है।
एक बार को ऐसे पूछो अपने आप से, अगर मैं डरी ना होती तो मैं क्या फ़ैसला लेती? ये पूछा करो। किसी भी मुकाम पर ये सवाल है, "अगर मैं डरी नहीं हूँ तो मैं क्या फ़ैसला लूँगी?" एकदम डर ना हो, मुझे डराने वाला कोई नहीं है, मेरे ऊपर कोई डर नहीं है। मेरे ऊपर अब डर नहीं है तो लालच भी नहीं होगा। लालच होता है तो डर होता है। तो मेरे ऊपर कोई डर नहीं है, तो बताओ अभी मेरा फ़ैसला क्या होगा? लिख लो।
ऐसे ही कह दो, बस लिख तो रहे हैं। कोई इस फ़ैसले पर चलना थोड़ी है। और फिर उस फ़ैसले पर चल जाओ। अगर पहले ही बता दोगे ना अपने आपको कि जो फ़ैसला लिखेंगे, उस पर चलना पड़ेगा। तो भीतर जो बैठा हुआ है ना, वो लिखने ही नहीं देगा सही बात। पहले कहो अच्छा, अगर हाइपोथेटिकली, जस्ट अस्यूमिंग। फर्ज़ कीजिए, कल्पना कीजिए, अगर मैं डरी नहीं हूँ तो मैं इस जगह पर क्या करूँगी? वो लिख डालो और फिर कर डालो। करियर ऐसे बनता है।
अच्छा जिससे सवाल पूछ रही हो, उसको कुछ समझती होगी तभी तो उससे सवाल पूछ रही हो। मेरा क्या करियर है? कहे नहीं — “आपने तो आईआईटी, आईआईएम।” अच्छा एक बात बताओ, आईआईटी, आईआईएम करके ये करना ज़्यादा आसान है या ज़्यादा मुश्किल है? ईमानदारी से बोलना।
प्रश्नकर्ता: मुश्किल।
आचार्य प्रशांत: मुश्किल है ना? क्योंकि कितने रास्ते खुल जाते हैं, और बहुत सारी लालच की चीज़ें खड़ी हो जाती हैं। मैं कुछ ना हूँ बिल्कुल बेरोज़गार हूँ, सड़क का आदमी हूँ, कुछ आता जाता नहीं, ज़िंदगी है एकदम बर्बाद मेरी, तो बाबा बनना आसान है? या वो सब छोड़ के बाबा बनना आसान है?
प्रश्नकर्ता: सब आसान है।
आचार्य प्रशांत: ज़्यादातर जो तुम बाबे देखते हो, इनके पास कुछ था भी छोड़ने के लिए? ये अपने आप को त्यागी बोलते हैं। इन्होंने काहे का त्याग किया है? तुम्हारे पास था क्या? ना तुम्हारे पास शिक्षा थी, ना तुम्हारे पास नौकरी थी, ना तुम्हारे पास व्यापार था, ना तुम्हारे पास कोई ज्ञान था। तुमने क्या त्यागा है? तुम काहे के बाबा हो? ठीक।
अब मैं आपके सामने बैठा हूँ। बहुत सारी चीज़ें थीं जो बुला रही थीं। सब तरीक़े के लालच बाहें फैलाए खड़े थे — “आओ, आओ!” स्वागत कर रहे थे। और ये जो कर रहा हूँ, ये करियर है। प्यार सबसे बड़ी बात है। और जब आप ये करते हो, फिर बताना। अब तो आप मिड-ट्वेंटीज़ में हो। इतना समझते हो कि बिज़नेस प्लान तो जानते हो। जो मैं कर रहा हूँ, क्या ये काम किसी भी तरीक़े के बिज़नेस प्लान से हो सकता है या किसी भी तरह के प्लान से हो सकता है?
बस हो जाता है।
जब प्यार होता है ना, तो आगे का रास्ता अपने आप बन जाता है। आपको पता भी नहीं होता, कैसे बनेगा। बिना योजना के बनता है।
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, जैसे आपने कहा कि आप कुछ अनुभव इकट्ठा करते हो, आप दुनिया देखते हो, तो आपको फिर पता चलता है कि मैं क्या चाहती हूँ, और मुझे क्या करना है।
तो जैसे मैंने आपको कहा कि मेरे कुछ एक्सपीरियंस रहे, जैसे कि मेडिसिन क्यों करना है। तो मेरे often मेडिकल विज़िट्स रहे, क्योंकि मैं अलग-अलग तरीक़े से बीमार रहती थी। तो वहाँ जब बेड पर लेटी हूँ या कुछ भी है, और जो मतलब इंटर्न्स हैं और जो स्टूडेंट्स, उन्हें देखती थी — तो ये चीज़ मन में आती थी कि वो जो काम कर रहे हैं, वो मैं भी करना चाहती हूँ। मतलब ये आता था।
आचार्य प्रशांत: वो जो काम कर रहे हैं, एक बार उनसे बात करी? ये करियर चुनने में महत्त्वपूर्ण बात है, इसको समझना। जब कोई चीज़ आकर्षित कर रही हो, तो उसको तुरंत करियर नहीं बना लेते। जब कोई आकर्षित कर रहा होता है ना, उसके पास जाकर समझते हैं।
नहीं तो कई बार तो बड़ा इम्प्रेसिव लगता है। आप जब 10वीं–12वीं में होते हो, तो आपने देखा, कोई हैंडसम सा इंटर्न है, वो सफेद कोट पहन के आया हुआ है। हमें इम्प्रेसिव भी लग रहा है, नॉलेजेबल भी लग रहा है। आपसे उम्र में भी बड़ा है और हैंडसम, सेक्सी भी लग रहा है। तो एकदम लगता है, “हाय हाय! मुझे भी मेडिको बनना है!
अब ठीक है, लगने में कोई दिक्कत नहीं। लग गया तो लग गया। उसकी ज़िंदगी में झांक कर देखो भी, उससे थोड़ा बात भी करो — “तुम्हारी ज़िंदगी क्या है? तुम क्या करते हो? सुबह से शाम तक क्या है? तुम्हारा मोटिवेशन क्या है? तुम क्या चाह रहे हो? लालच क्या है तुम्हारा? कामना क्या है? उद्देश्य क्या है?” ये सब बातें उससे पूछो।
कोई चीज़ आकर्षित करे, आकर्षण में बुराई नहीं है। पर जो चीज़ आकर्षित करे उसके बारे में अज्ञानी रह जाओ, इसमें तो बुराई है। जो चीज़ आकर्षित करे, उसके फिर क़रीब जाकर उसको समझो ना।
आकर्षण अगर टिका रहने लायक होगा, तो टिका रहेगा। नहीं तो जब तुम जाकर के जाँच–पड़ताल करोगे, तो आकर्षण गिर जाएगा। ठीक है?करियर ऐसे बनता है। ज़िंदगी को जानके, समझके, अपने आप स्पष्ट होता जाता है। ये नहीं ये। और जब इस तरीक़े से करियर का निर्धारण होता है ना, तो जो रास्ते आपने सोचे भी नहीं थे, आप उन रास्तों पर चलना शुरू कर देते हो।
या बैठे-बैठे सोचोगे, "व्हाट काइंड ऑफ करियर शुड आई हैव?" बैठे-बैठे सोच रहे हो। उससे नहीं होगा। ये एक ऑर्गेनिक प्रक्रिया होती है। आप ज़िंदगी के साथ एक एंगेजमेंट करते हो। जब वो करते हो, तो ज़िंदगी फिर अपने आप कुछ ऐसे रास्ते खोलती है, एकदम अनूठे रास्ते। हो सकता है उन पर पहले कभी कोई चला भी ना हो। पर आपको पता चलता है, वही रास्ते आपके हैं। वही रास्ते प्यार के हैं।
फिर से बोल रहा हूँ — बहुत बदहाल और गई-गुज़री होती है वो ज़िंदगी, जिसमें आप पैसा कमाने के लिए वो काम कर रहे होते हो जिसमें प्यार नहीं है। और पूरी दुनिया वही काम कर रही है। इसीलिए इस दुनिया से मेरी इतनी लड़ाई है, क्योंकि ये सब फंसे हुए लोग हैं।
मैं बार-बार कहता हूँ, दो काम बिना प्यार के नहीं करने चाहिए। एक — किसी का साथ, और दूसरा — नौकरी। और दुनिया के जितने लोग हैं ना, और ख़ासकर भारत में। इन सब ने पहली बात तो बिना प्यार के साथी चुना और दूसरी, बिना प्यार की नौकरियाँ कर रहे हैं।
अब बताओ, ये मेरे साथ कैसे आएँगे? इन्हें तो घृणा है मुझसे, क्योंकि मैं इनको दिखा रहा हूँ कि इनकी ज़िंदगियाँ कितनी घृणास्पद हैं। वो काम अपने साथ मत होने देना।
दो ही जगह होती हैं न जहाँ अपना समय बिताओगे — ऑफ़िस और घर। ना ऑफ़िस में प्यार है, ना घर में प्यार है तो जियोगे कैसे? ऑफ़िस में बस ऐसे ही मगज़ मारे, कुछ कर रहे हो कि पैसा मिल जाएगा, सैलरी मिल जाएगी। तो क्या कर रहे हो? घुट रहे हो, जान दे रहे हो, बर्बाद हो रहे हो। और क्या कर रहे हो?
फिर घर आते हो, वहाँ बच्चे चिल्ल–पौं कर रहे हैं। बच्चे कहाँ से आ गए? बस ऐसे ही आ गए। ठरक! प्रेम का तो कोई रिश्ता कभी था ही नहीं।
कैसे जियोगे?
प्रश्नकर्ता: मैंने कुछ मेडिकल प्रोफेशनल्स से बात करने की कोशिश की, तो उन्होंने मुझे यही कह दिया कि, “अब तो तुम 24 के हो, अब क्या करोगी? मेडिसिन बहुत लंबी है।”
आचार्य प्रशांत: वो बात करने लायक ही नहीं थे। जो ऐसी फ़ालतू जवाब दें। तो उनसे क्या बात कर रहे हो? इतने सारे मेडिकल प्रोफेशनल्स हैं, किसी ढंग के आदमी से बात करो।
प्रश्नकर्ता: और आचार्य जी, सिमिलर एक्सपीरियेंसेज़ और सिमिलर फैसिनेशन ही यदि मुझे क्लीनिकल साइकोलॉजी और यूपीएससी के लिए हुआ है, तो उसमें भी यही उचित है कि मैं पहले उन लोगों से जाकर बात करूँ?
आचार्य प्रशांत: बिल्कुल जाकर सबसे बात करो। देखो गहराई से। जो साइकोलॉजिस्ट्स रहे हैं, उनकी किताबें पढ़ो। अप्स, डाउन, हाईज़, लो, सब अच्छे से समझो। और उसके बाद फैसला लेना नहीं पड़ता। फैसला हो जाता है।
तुम्हारा काम है सच्चाई जानना। उसके बाद तुम्हारे लिए सच्चाई खुद फ़ैसला कर देगी।
ठीक है। और डरो नहीं।
सच्चाई जो फैसले ले तुम्हारे लिए, वो हो सकता है तुम्हारी पसंद–नापसंद से मेल न खाएँ। पर एक बार तुमने सच्चाई को ऑथराइज़ कर दिया कि, "सर, यू डिसाइड ऑन माय बिहाफ़।" उसके बाद वो जो भी फ़ैसला ले, उसके आगे सर झुकाओ।
वो फ़ैसला अक्सर ऐसा होगा जो तुम्हें अटपटा लगेगा। अटपटा लगे तो लगे। भाई, मैंने जिसको दे दी थी अथॉरिटी, उसने तय किया है मेरे लिए। "द सुपर बॉस हैज़ डिसाइडेड फॉर मी। नाउ आई कांट बैक ऑफ़।"
ठीक है?
प्रश्नकर्ता: जैसे यूपीएससी करने का थॉट कई बार मन में आता है। फिर तुरंत ही ये विचार भी आ जाता है, “मैं कभी नहीं कर पाऊँगी।”
आचार्य प्रशांत: यूपीएससी क्यों करनी है? पिक्चर देखी है इसलिए?
प्रश्नकर्ता: नहीं आचार्य जी।
आचार्य प्रशांत: तो क्यों करनी है? कितने सिविल सर्वेंट्स से बात की है? कितने ब्यूरोक्रेट्स की ज़िंदगी जानते हो? कितना ये जानते हो कि सिविल सर्विस एग्ज़ाम में जो अलग–अलग सर्विसेज़ होती हैं, उनमें क्या करियर पाथ्स होते हैं? ये सब पता किया है?
मान लो आप रेवेन्यू में हो, आप प्रमोट हो गए। क्या आपका करियर पाथ होगा? ये सब आपने अच्छे से पता करा है? या आप फॉरेन सर्विस में जाते हो, तो उसमें आप तुरंत ही एंबेसडर नहीं बन जाओगे। उसमें पूरा करियर पाथ क्या होता है, ये सब जानते हो?
प्रश्नकर्ता: मैंने दो-तीन ब्यूरोक्रेट्स की जो बायोग्राफीज़ हैं, उनको रीड करा है। और एक-दो से ही बस मुलाकात हुई।
आचार्य प्रशांत: ऐसे नहीं होता बेटा। ऐसे नहीं होता। मैं आपसे बात इसलिए कर पा रहा हूँ, क्योंकि मैं जिस मुद्दे पर आपसे बात कर रहा हूँ, इस मुद्दे पर मैं हजारों नहीं तो सैकड़ों किताबें पढ़ चुका हूँ।
आपसे नहीं कह रहा सैकड़ों किताबें पढ़ो। लेकिन कम से कम उतनी तो जानकारी इकट्ठा करो कि निर्णय स्वतः स्फूर्त होने लग जाए। एक ऑटोमैटिक क्लैरिटी आती है, जिससे ऑटोमैटिक डिसीज़न मेकिंग हो जाती है।
डोंट बी इन अ हरी टू डिसाइड एनीथिंग।
कुछ नहीं हो रहा। 24 के हुए हो, मरे नहीं जा रहे। बैठ लो थोड़ी देर बेरोज़गार। कुछ नहीं हो गया। तुम्हारे खर्चे ही कितने हैं? खाली भी बैठोगे तो क्या हो जाएगा? कोई पहाड़ नहीं टूट पड़ा। लेकिन गलत दिशा में मत बहक जाना। फ़ालतू के किसी प्रोफ़ेशन में प्रवेश मत ले लेना। ठीक है? ज़िंदगी को फ़ैसला करने का वक़्त दो। ज़िंदगी करती है। ज़िंदगी फ़ैसला करेगी, माने ये नहीं कि आप ऐसे हाथ पे हाथ रखकर बैठ गए।
इसका मतलब है कि, आप सक्रिय रूप से ज़िंदगी से *एंगेज्ड हो। आप जानने-समझने की कोशिश कर रहे हो। लगातार कर रहे हो। और उस कोशिश से फिर अपने आप एक रास्ता निकलता है। अनपेक्षित होता है वो रास्ता।
कोई बात नहीं, अच्छी बात है।
ठीक है?
प्रश्नकर्ता: जी, थैंक यू सो मच आचार्य जी।