कुछ नहीं हो रहा। 24 के हुए हो, मरे नहीं जा रहे। बैठ लो थोड़ी देर बेरोज़गार। कुछ नहीं हो गया। तुम्हारे खर्चे ही कितने हैं? खाली भी बैठोगे तो क्या हो जाएगा? कोई पहाड़ नहीं टूट पड़ा। लेकिन गलत दिशा में मत बहक जाना। फ़ालतू के किसी प्रोफ़ेशन में प्रवेश मत ले लेना। ज़िंदगी को फ़ैसला करने का वक़्त दो। ज़िंदगी करती है। ज़िंदगी फ़ैसला करेगी, माने ये नहीं कि आप ऐसे हाथ पे हाथ रखकर बैठ गए।
यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।
प्रश्नकर्ता: नमस्ते, आचार्य जी। मैं बचपन से एक ऐसी स्टूडेंट रही हूँ, जो बहुत ही ज़्यादा परफॉर्मेंस-ओरिएंटेड रही है एकेडमिक्स में भी और नॉन-एकेडमिकली भी। तो इसलिए 10वीं में मैंने टॉप किया और उस साल मैंने बैडमिंटन में नेशनल्स भी खेले। उसके बाद मैंने ये डिसाइड करा कि मैं मेडिसिन पर्स्यू करना चाहती हूँ।
जब मैंने तैयारी करना स्टार्ट किया और कॉन्सेप्ट्स और सब्जेक्ट्स थोड़े मुश्किल होने लग गए, तो मेरे मन में ये बहुत स्ट्रॉन्गली आ गया कि मैं ये एग्ज़ाम कभी भी क्लियर नहीं कर पाऊँगी, और मुझसे कभी नहीं हो पाएगा। उस समय डर की वजह से मैं ये नहीं देख पा रही थी, कि मैं हर ही सब्जेक्ट बहुत अच्छे से मन लगाकर पढ़ती थी और हर ही में अच्छा परफॉर्म कर रही थी, और सब में ही 90% मार्क्स ला रही थी।
तो मेरा उसके बाद बीएचयू में ऐडमिशन




