यूट्यूबर बनना आसान है या कठिन?

Acharya Prashant

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यूट्यूबर बनना आसान है या कठिन?
कुछ नहीं होता उस कंटेंट में। इसीलिए सबको लगता है कि वो जो बकवास है, वो तो हम भी बना सकते हैं। तो हम भी यूट्यूबर बन जाएँ। वो वहाँ बैठा हुआ है, वो फूहड़ *कॉमेडी* कर रहा है। उससे अच्छी तो मैं कर सकता हूँ, तो मैं ही कर देता हूँ। यह सारांश प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन के स्वयंसेवकों द्वारा बनाया गया है

प्रश्नकर्ता: नमस्कार आचार्य जी। मुझे आपसे इंट्रोड्यूस मेरे देवर ने कराया था। तो वो कभी नहीं आए अब की सेशन में, लेकिन मैं ज़रूर आई हूँ, क्योंकि मैं बैंगलोर से हूँ। मेरा आपसे प्रश्न है कि जो आज की नई पीढ़ी है, वो अपना करियर यूट्यूबर बनने में ज़्यादा देखती है, क्योंकि उसमें पैसा है और फेम है।

तो फेम कहाँ तक जायज़ है, या पैसा कहाँ तक जायज़ है उनके करियर के लिए? कुछ नहीं है, ये भी पाँच, दस, बीस होंगे जिनका आज के लड़कों ने देख लिया है यूट्यूब पर तो कितने करोड़ चैनल हैं, उनको कहाँ पैसा मिल रहा है, कहाँ फेम मिल रही है?

प्रश्नकर्ता: नहीं, जैसे वो दिखाते हैं, व्लॉगर्स वग़ैरह अपनी गाड़ियाँ हैं। जो फेमस ओरिजिन के बहुत सारे सब्सक्राइबर्स हैं।

आचार्य प्रशांत: जो फेमस हैं, वो तो किसी भी क्षेत्र में पैसा कमा रहे हैं। कोई भी क्षेत्र हो, उसमें जो ऊपर के 10-15 लोग होते हैं, वो तो पैसा कमाते ही हैं और प्रसिद्धि भी पाते हैं। कोई भी क्षेत्र हो।

प्रश्नकर्ता: उसको देख कर काफ़ी ऐसे लोग जिन्होंने ब्लॉग्गिंग शुरू की है।

आचार्य प्रशांत: तो किसी और क्षेत्र में क्यों नहीं चले जाते?

प्रश्नकर्ता: ब्लॉग्गिंग शुरू की है और वो सारा यूट्यूब से भरा पड़ा रहता है।

आचार्य प्रशांत: आप किसी भी क्षेत्र में हैं, अगर उसमें शीर्ष पर हैं, तो पैसा-प्रसिद्धि मिल ही जाएगा। यूट्यूब उससे कुछ भिन्न नहीं है। यहाँ भी पैसा-प्रसिद्धि मिल रही है, लेकिन सिर्फ़ उनको जो शीर्ष पर बैठे हुए हैं।

आप आज एक नया चैनल खोलिए, अपने वीडियो पर 50 व्यूज़ लाना भी मुश्किल हो जाएगा। एक-एक सब्सक्राइबर के लिए लोग हाथ जोड़ रहे होते हैं, लड़के। इतने तो कमेंट आते हैं, “आचार्य जी, बस एक दिन के लिए आप हमें सब्सक्राइब कर लीजिए, बस एक दिन के लिए।”

प्रश्नकर्ता: नहीं, फिर भी उनका कंटेंट या क्रिएटर, जो अपने आपको बोलते हैं, उनका कंटेंट।

आचार्य प्रशांत: कुछ नहीं होता उस कंटेंट में। इसीलिए सबको लगता है कि वो जो बकवास है, वो तो हम भी बना सकते हैं। तो हम भी यूट्यूबर बन जाएँ।

वो वहाँ बैठा हुआ है, वो फूहड़ कॉमेडी कर रहा है। उससे अच्छी तो मैं कर सकता हूँ, तो मैं ही कर देता हूँ। या वो बैठा हुआ है, वो रोस्टिंग करता है, गाली-गलौज देता है। गाली देने में हम पीछे हैं? हम भी दे सकते हैं, हम भी बन जाते हैं। अब नहीं बन पाओगे। वजह है, ये सब उस समय बन गए, जिस समय भारत में यूट्यूब और ट्विटर नए-नए थे। आज हर व्यक्ति वहीं पर है। कोई बता रहा था, एक गाँव है, जहाँ के 30% युवा यूट्यूबर हैं। एक कोई ऐसा गाँव है, जहाँ पर युवाओं की जितनी आबादी है, उसमें से 30% यूट्यूबर ही हैं। उन्हें क्या प्रसिद्धि मिलेगी? क्या पैसा मिलेगा?

पहली बात तो अभी हमने चर्चा ही नहीं करी कि यूट्यूबर होना भला क्या है? ये चीज़ क्या है, यूट्यूबर? ठीक है? वो एक अलग मुद्दा है कि वह एक अलग लेवल की बेवकूफी है कि “हम यूट्यूबर हैं।”

लेकिन जिस चीज़ की अभी बात हो रही है, कि उससे पैसा मिलता है, प्रसिद्धि मिलती है, मैं कह रही हूँ आपको वह भी नहीं मिलने वाली। आज अगर कोई जवान लड़का कहता है कि मैं नया चैनल बनाऊँगा और यह करूँगा, वो सब सैचुरेट हो चुका है। उसमें अब आपके लिए संभावना नहीं बची है। हाँ, आप कुछ बहुत ही करिश्माई कंटेंट लेकर के आ जाएँ, तो अलग बात है।

प्रश्नकर्ता: और सर, मेरा आग्रह है कि जैसे वेदान्त आप बोलते हैं बच्चों को भी देना चाहिए। तो मेरा दस साल का बेटा है। तो मैं चाहती हूँ, आप जैसे उनके समर कैंप्स वग़ैरह होते हैं, तो आप भी अपना एक सेशन ऐसा शुरू करिए कि वो बच्चों तक भी पहुँच सके।

क्योंकि हम तो मान लीजिए पक्के खड़े हैं। हमारी बात वो उतना सुनते नहीं हैं आजकल के बच्चे। मतलब, हम बताएँगे तो, आपने एक सेशन में बोला है कि वो बहुत बोर लगता है उनको। तो शायद वो आपके पास आएँ, या वो बच्चे। क्योंकि समर कैंप मोस्टली स्कूल ही कंडक्ट कराते हैं, तो उसी में जाते हैं वो लोग। और वहाँ पर जो भी सिखाते हैं, उतना नहीं। तो मैं स्पेशली ये रखना चाहती हूँ कि आप ऐसा कुछ सेशन करें, जो बच्चे हैं, जो 8 से 15 साल के बच्चे हैं, वो आपके सेशन अटेंड करें।

समर कैंप मतलब 40-50 दिन वो आपके साथ रहें। तो जीवन में कुछ मतलब, क्योंकि वो नई पीढ़ी है। और आप बोलते हैं, हम तो आधे में होते हैं, कभी इधर, कभी उधर।

आचार्य प्रशांत: ये कुछ समझ ही नहीं रही कि कितना ख़तरा है। एकदम भोलेपन की बात कर दी। 40 दिन मेरे पास रहने के बाद वो आपके पास जाएगा?

प्रश्नकर्ता: सर कोई बात नहीं। पर कुछ अच्छा तो करेगा अपने जीवन में कुछ ऊँचाई तो पाएगा।

आचार्य प्रशांत: देखिए, इतनी निस्वार्थ सब माँओं में नहीं होती न, बच्चे की भलाई अगर आचार्य जी के पास है, तो उन्हीं के पास रुक जाए। माँएँ आक्रामक हो जाती हैं।

प्रश्नकर्ता: नहीं-नहीं, ऐसा कुछ नहीं है। ज्ञानी क्योंकि गुरुओं के पास तो हमारे श्रीकृष्ण जी और राम जी, ये सब भी गुरुकुल में ही पड़े हुए हैं, सर। तो वहाँ पर इतने अच्छे-अच्छे तरीके से अगर बच्चे का हर उसका चौतरफ़ा विकास होगा, तो क्यों नहीं जाना चाहिए?

आचार्य प्रशांत: ये साधुवाद है आपको, अगर आप में इतना प्रेम है अपने बच्चे के लिए, पर अधिकतर ऐसा पाया जाता नहीं। पर बहुत अच्छा भाव है आपका, कल्याण हो आपका। बहुत अच्छी बात है।

मैंने आप लोगों से, वयस्कों से, बात करनी शुरू की। उससे दस साल पहले से मैं बच्चों से बात कर रहा हूँ। तो उनको शिविरों में भी ले जा चुका हूँ। वो नाचे भी हैं, गाए भी हैं, सीखा भी है उन्होंने, पढ़ा भी है खूब। ये सब पहले हो चुका है। उनके लिए लंबे-चौड़े क्लासरूम कोर्सेज भी चले हैं। कम से कम डेढ़-दो लाख छात्रों ने। यह 10-15 साल के तो नहीं थे, लेकिन 17 से 22-24 की उम्र तक के। उन्होंने एचआईडीपी कोर्स था, अद्वैत लाइफ एजुकेशन का, वो कोर्स करा हुआ है।

युवा वर्ग और किशोर, समझिए, थोड़े, तो उन्हीं कोर्सेज के जो उत्पाद हैं, उनमें से कई लोग अभी संस्था में महत्त्वपूर्ण पदों पर पहुँच गए हैं। काम कर रहे हैं। आज से 10-12 साल पहले मुझे मिले थे ऐसे-ऐसे। अब वो संस्था में ज़िम्मेदारियाँ निभा रहे हैं। तो वह सब कर चुके हैं, लेकिन उसमें समस्याएँ आती थीं बच्चों के साथ। समस्या यह आती थी कि बच्चा आश्रित होता है। तो एक बार वह आ गया, अगली बार आएगा या नहीं आएगा वह उसके मम्मी-पापा पर है।

तो पहले तो आवश्यकता होती है मम्मी-पापा को शिक्षित करने की न। वो मम्मी-पापा जैसे ही देखते हैं कि बच्चा सुधर रहा है, वह उसे फिर घर में बैठा लेते हैं। कहते हैं, “सुधर गया, तो फिर हम जैसों के साथ थोड़ी ये टिकेगा।” तो यह दिख गया कि मैं कैसे काम करूँ उन बच्चों पर। अगले दिन वो आएगा ही या नहीं आएगा, यह निर्धारण करने वाले उसके अभिभावक हैं। अभिभावक उसको भेजते ही नहीं।

अद्वैत में, “अद्वैत लाइफ एजुकेशन,” जो हमारी पहली संस्था थी, उसको लेकर के मेरी एक फैकल्टी थी। उसने एक बार कहा, “अभी-अभी मुझे एक बात समझ में आई है, सर।” मैंने कहा, “क्या?” बोला, “आप दुनिया का सबसे मुश्किल काम कर रहे हो।” एक सरदार जी थे, वो आए थे। मैंने कहा, “कैसे?”

बोले, “देखो, आप जिन बच्चों को पढ़ा रहे हो, वो पढ़ना नहीं चाहते। आप उन्हें जो पढ़ा रहे हो, वो वो पढ़ना नहीं चाहते। पहली बात तो वो कुछ भी पढ़ना नहीं चाहते। दूसरी बात, आप जो पढ़ा रहे हो, उसको तो ख़ास तौर पर नहीं पढ़ना चाहते। तीसरी बात, जिस कॉलेज में आप उनको पढ़ा रहे हो, उस कॉलेज की फैकल्टी नहीं चाहती कि आप जो पढ़ा रहे हो, वो पढ़ाया जाए। चौथी बात, उस कॉलेज का मैनेजमेंट नहीं चाहता कि इस तरह की कोई चीज़ वहाँ पढ़ाई जाए। पाँचवीं बात, वो जो बच्चे पढ़ रहे हैं, उनके पेरेंट्स भी नहीं चाहते कि उनको ये चीज़ पढ़ाई जाए। लेकिन आप तब भी पढ़ा रहे हो।”

तो मुझे लगा, ये बिल्कुल इस पर सारे राज़ खुल गए। ये तो आत्मज्ञान ही हो गया। मुझे नहीं पता था, वो यह सब इसलिए बता रहा था क्योंकि अगले दिन उसे इस्तीफ़ा देकर भागना था। उसने यह सब बताया और भाग गया। बोला, “इतना मुश्किल काम आप ही कर लो, ये हमसे नहीं होगा।”

प्रश्नकर्ता: ज़्यादा आत्मज्ञान से इंसान भाग जाता है।

आचार्य प्रशांत: ज़्यादा आत्मज्ञान की बात नहीं है। ये दुनिया ऐसी नहीं है कि इसमें आप कोई भी अच्छा काम बड़ी सरलता से कर लोगे। लोगों को वही दे दो जो वह चाहते हैं, तो आपका काम बहुत आसान है। नशेड़ी को नशा दे दो, वो खूब बिकेगा, खूब बिकेगा। यह संसार नशे पर चलता है, भांति-भांति के नशे। लेकिन उसको कुछ ऐसा दे दो जो उसके वास्तव में उपयोग का है, तो यह तो छोड़ दो कि आपको धन्यवाद मिलेगा, गालियाँ और मिलती हैं।

तो वह एक लंबा-चौड़ा प्रयोग था, दस साल तक चला। उसमें बहुत कठिनाइयाँ थीं। चलता रहा, उसमें सफलता भी मिली, आगे बढ़े, बहुत लोगों तक पहुँचे। लेकिन अभी जैसे कर रहे हैं, इसमें ज़्यादा लोगों तक बात पहुँच पा रही है। जा- जाकर प्रत्यक्ष खड़े होकर वर्कशॉप में, क्लासरूम में, या कि कैंप्स में हिमालय पर ले जाकर बात सीमित लोगों तक पहुँच पाती थी।

तो बाक़ी वह कोर्स अभी भी कोई ऐसा नहीं है कि समाप्त हो गया है। अभी पिछले महीने से ही वह पुनः आरंभ हुआ है, और उसको चलना चाहिए। पर वो तभी चल सकता है जब स्कूल का मैनेजमेंट है और जो पेरेंट्स हैं, उनमें थोड़ी सद्बुद्धि हो। क्योंकि इतनी ऊर्जा अब हमारे पास नहीं है कि जाकर के ख़ुद खड़े होकर ज़ोर-आजमाइश करें। तो उसको करने के लिए, जो काम हम बच्चों और किशोरों पर करना चाहते थे, वो काम करने के लिए हमें स्कूलों का और अभिभावकों का बड़ा, बड़ा गहरा सहयोग चाहिए। छोटा-मोटा भी नहीं।

प्रश्नकर्ता: आपने बोला न पाठ्यक्रम में भी सम्मिलित करना चाहिए वेदानेत को। तो सर, वो कब तक होगा, वो तो नहीं पता। लेकिन अगर वो, मतलब वो चलकर आपके पास ही आ जाए, जिनको ज्ञान चाहिए।

आचार्य प्रशांत: नहीं, वो जितनी हमने 2006 से भी जो एक्टिविटीज़ बनाई थीं, वो वेदान्त पर ही थीं। उसमें नाम वेदान्त का नहीं लिख रहे थे, वो सब वेदान्त ही था। तो वो सब कर चुके हैं। वो सब तैयार है।

जो सिलेबस की बात कर रहा हूँ, तैयार करके रखा हुआ है बहुत-बहुत सालों से। लेकिन उसको पाठ्यक्रम में लागू करने वाला भी तो कोई होना चाहिए न। अपने तल पर जो मैं कर सकता हूँ, कर रहा हूँ। लेकिन स्कूल में, या कॉलेज में, या कि सीबीएसई-एनसीआरटी में वो चलेगा या नहीं चलेगा, वह तो मेरे हाथ में नहीं है न। वो तो स्कूल मैनेजमेंट को करना है या सरकार को करना है। सरकार, आप देखिए आप कैसी चुनते हो, मैं क्या बताऊँ।

प्रश्नकर्ता: वो तो हमारे हाथ में ही है, क्योंकि सबके हाथ में है। क्योंकि आजकल, बैंगलोर में ये बहुत प्रचलित है कि पेरेंट्स अपने बच्चों को किसी न किसी एक्टिविटीज़ में भेजते ही भेजते हैं, कि उनका मतलब उनका विकास हो हर तरीके से। तो अगर जैसे स्कूल से कांटेक्ट करके आप लोग वैसे ही रन कर दें, या बच्चों को वैसे ही, उससे ज़्यादा लोगों तक आप पहुँच भी सकेंगे।

आचार्य प्रशांत: देखिए, ये विचार, आइडिया अपने आप में बहुत अच्छा है। इसमें लेकिन जो व्यवहारिक बाधाएँ आती हैं, उनको स्कूलों को हटाना पड़ेगा। हम आज भी कर सकते हैं। समस्या क्या आती है?

52 हफ्ते होते हैं साल में। अब अगर स्टूडेंट से जो कांटेक्ट है, वह सिर्फ 20-25 हफ्ते मिल रहा है, तो जो उसने सीखा था, वह बात अगले तक आते-आते धुल जाती है। और स्कूल या कॉलेज बता देंगे, “अभी हमारा सेमेस्टर ब्रेक हो गया है।” “अब हमारे एग्ज़ाम्स आ रहे हैं।” “अब प्री-बोर्ड आ गए हैं।” अब आपकी क्लासेस अभी नहीं चल सकतीं, क्योंकि हमारी क्लासेस से उस बच्चे की मार्कशीट तो प्रभावित होती नहीं है। तो बच्चा, स्कूल और पेरेंट्स सब ज़्यादा ध्यान किस पर देते हैं? उन चीज़ों पर न, जिनके मार्क्स उसकी मार्कशीट में लिखे जाएँगे।

तो जब तक यह जो लाइफ एजुकेशन है, यह एक क्रेडिट कोर्स नहीं बन जाता, क्रेडिट कोर्स समझते हैं, जिसके अंक आपकी अंक-तालिका पर अंकित होते हैं, तब तक उसको लोग गंभीरता से नहीं लेते। ये सब समस्याएँ आती हैं। फिर उसके लिए न तो ठीक से समय देते हैं, न यह होता है। तो बहुत सारी व्यवहारिक अड़चनें आती थीं।

अब आप लोग यहाँ बैठे हुए हो, ये एक बात है। और एक ऐसा माहौल जिसमें हम किसी दूसरे पर निर्भर हैं कि छात्र यहाँ बैठे हों, बिल्कुल दूसरी बात हो जाती है। निर्भरता नहीं होनी चाहिए।

प्रश्नकर्ता: स्वेच्छा से आना होना चाहिए।

आचार्य प्रशांत: स्वेच्छा भी नहीं चलेगी। स्वेच्छा-वग़ैरह का कोई खेल नहीं है ये, स्वेच्छा से ही अगर होता तो किसी ने आज तक दसवीं भी ना पास करी होती।

यहाँ तो बात यह है कि करना पड़ेगा। स्वेच्छा तो आपको हमेशा वेदान्त से दूर ही ले जाएगी। यह तो आपको उसको महत्त्व देकर कहना पड़ेगा कि अगर यह वाला कोर्स नहीं पास किया, तो डिग्री नहीं पाओगे। तब वह पढ़ेगा। नहीं तो कहेगा, “यह पढ़कर क्या होगा? इतने में मैं जाकर फुटबॉल खेलता हूँ बाहर।”

प्रश्नकर्ता: नहीं, पर आपके साथ तो वो फुटबॉल भी; आप भी कहते हैं न कि “मैं खेलता हूँ।”

आचार्य प्रशांत: मैं कितनों के साथ फुटबॉल खेलूँगा?

प्रश्नकर्ता: मतलब, उनका हर तरीके से वो एक ऐसे माहौल में रहे हैं न, जहाँ उनका हर तरीके से।

आचार्य प्रशांत: ये सब अच्छी बातें हैं कि हम उनका मनोरंजन भी कर सकते हैं। उनको हम तरीके-तरीके से उत्साहित और उत्सुक भी बनाए रख सकते हैं।

लेकिन अंततः सीखना तो परिश्रम और कष्ट का काम होता है। और कोई भी छात्र तब तक नहीं सीखेगा, परिश्रम नहीं करेगा, कष्ट नहीं झेलेगा, जब तक या तो उसके ऊपर दबाव न हो, या उसके सामने एक लालच न हो कि इसमें जो नंबर आएँगे, वो भी मेरी मार्कशीट में दर्ज किए जाएँगे। व्यवहारिक बात यह है।

आप अगर यह कहेंगे कि आपका कोर्स ही इतना अच्छा होना चाहिए कि सब छात्र स्वेच्छा से आ जाएँ, स्वेच्छा से तब न छात्र आते थे, स्वेच्छा से आज न सब्सक्राइबर आते हैं। न स्टूडेंट,सब्सक्राइबर। आज भी हम क्या कर रहे हैं? हाँ, परेशान करते हैं आपको। सौ बार मेरा मुँह देखो, तब तक देखते रहो, तब सब्सक्राइब बटन न दबा दो।

लोग पूछते हैं कि हम क्या करें, कि हमें आपका मुँह बार-बार ना देखना पड़े। एक ही तरीका है, सब्सक्राइब कर लो, विज्ञापन आएगा नहीं तुम्हारे पास फिर।

तो ये जो हमारे अंदर भ्रांति है कि कोई अच्छी चीज़ होगी तो हम ख़ुद ही उसकी ओर चले जाएँगे। ये सबसे गहरी भ्रांति है। हम लोग ही बुरे हैं। हम अच्छी चीज़ की ओर अपने आप कैसे चले जाएँगे?

आपने यह मान लिया है कि हम तो गुण और ज्ञान के ग्राहक बैठे हुए हैं, और जहाँ कहीं हमें गुण-ज्ञान दिखाई देगा, हम उधर को ही चल देंगे। ऐसा होता है क्या? अभी यूट्यूब की बात आप कर रहे थे। यूट्यूब पर जिनके सबसे ज़्यादा सब्सक्राइबर्स हैं, वो उन्होंने ज्ञान देकर सब्सक्राइबर इकट्ठा किए हैं? जहाँ ज्ञान होता है, वहाँ से हम दूर भागते हैं। ज्ञान की ओर तो हमें धकेलना पड़ेगा।

गंदगी की ओर हम अपने आप भागते हैं। तो यह कहना कि आप अपना कंटेंट अच्छा रखो, लोग अपने आप आएँगे, यह मूर्खता की बात है। इससे पता चलता है कि आप इंसान को जानते ही नहीं। कि कह रहे हो कि चीज़ अच्छी है तो लोग अपने आप आएँगे। चीज़ घटिया से घटिया हो, तो लोग अपने आप आएँगे। और जहाँ आप पाएँ कि लोग बहुत संख्या में इकट्ठा हो रहे हैं, वहाँ जान लीजिए कि कोई गंदगी बिक रही होगी।

स्वेच्छा से आप पिक्चर देखने जाते हो या अस्पताल जाते हो? अस्पताल तो तभी जाते हो जब हाय! हाय! कर रहा होता है, एकदम दर्द हो गया होता है और मजबूरी हो जाती है। बच ही नहीं सकते, तब जाते हो अस्पताल। स्वेच्छा से तो आप जाओगे कोई घटिया पिक्चर देखने। बस, ठीक है। समझ गए न बात को?

जो अच्छा होता है, वो हम कभी स्वेच्छा से नहीं करेंगे। स्वेच्छा से हम हमेशा कोई घटिया काम ही करेंगे। तो ये वाली जो बात होती है कि “भाई, फ्री विल है न, लोगों की चॉइस पर छोड़ दो।” तो लोगों की चॉइस पर छोड़ोगे, तो जो अच्छी चीज़ें हैं दुनिया में, वो कभी आगे नहीं बढ़ेंगी।

अतीत में भी जो कुछ भी ऊँचा और उत्कृष्ट था, वह तभी पनप पाया जब उसको आम जनता का बाद में और राजाओं का पहले प्रश्रय और संरक्षण मिला था। बौद्ध धर्म भी आगे नहीं बढ़ता अगर अशोक जैसे राजा न होते। जो आम आदमी था, ग्रामीण, किसान, वो थोड़ी कलाओं और साहित्य का बहुत बड़ा कदरदान था? उनको पैट्रोनाइज़ कौन करता था?

तो जब इन चीज़ों को संरक्षण मिलता है, तभी आगे बढ़ती हैं। इन चीज़ों को आप आम आदमी के भरोसे छोड़ेंगे, तो ये कभी आगे नहीं बढ़ेंगी। क्योंकि आम आदमी को ये चाहिए ही नहीं। आम आदमी को तो वही अपनी रोज़मर्रा की औसत दर्जे की गंदगी चाहिए। वो उसको जहाँ मिल जाती है, वो जाकर बैठ जाता है। वो टीवी चैनल देख लेगा, जिसमें घटिया न्यूज़ आ रहा होगा। वो घटिया तरीके का कोई और मनोरंजन जाकर देख लेगा। यही करेगा वो।

ऊँचाइयों पर हमेशा श्रम लगता है। गिरना आसान होता है। जहाँ बहुत सारे लोग दिखें, जान लीजिएगा कि यहाँ ज़रूर मामला गिरा हुआ है।

ऊँचाइयों पर तो आप पाओगे कि अकेलापन है, सूनापन है। कोई एक-आध होगा वहाँ, श्रम करके चढ़ा होगा। तो जो काम हम करना चाह रहे थे बच्चों वग़ैरह के साथ, वह तभी सफल हो सकता है जब हमारे साथ कोई और श्रम करने को तैयार हो। आप कह दोगे कि आप क्लास लगाइए और जो लोग इंटरेस्टेड होंगे बच्चे, वो अपने आप आ जाएँगे, तो क्लास में एक भी नहीं आने वाला, या एक-दो ही आएँगे। वो एक-दो बिल्कुल हीरे-मोती बनकर निकलेंगे। पर फिर, एक-दो ही आएँगे। एक-दो ही आएँगे।

अगर आप चाहते हो कि वाकई बात आगे बढ़े, तो आपको इसको कंपलसरी करना होगा। यह ऑप्शनल नहीं हो सकता कि मर्ज़ी है तो ठीक, नहीं तो।

This article has been created by volunteers of the PrashantAdvait Foundation from transcriptions of sessions by Acharya Prashant
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