
प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी। मेरा नाम पीयूष है। आपके जीवन में आने से मेरे जीवन में बहुत बदलाव हुआ है। और मैंने अभी रिसेंटली नालंदा यूनिवर्सिटी से हिंदू स्टडीज में मास्टर्स भी किया है। उसके पहले मैं सॉफ्टवेयर इंजीनियर भी था। तो बिहार को मैं थोड़ा ऑब्ज़र्व करता हूँ। तो मैं देखता हूँ , यहाँ पर हर चीज़ का फाउंडेशन गलत है। जैसे जॉब कोई किसी को करना चाहिए तो क्रिएटिविटी के फाउंडेशन पर करना चाहिए, शादी लव के फाउंडेशन पर करना चाहिए, पॉलिटिक्स इनलाइटेंड चॉइस के फाउंडेशन पर करना चाहिए। बट मैं देखता हूँ कि सब कुछ ही उल्टा है क्योंकि आम जनमानस का चेतना बहुत ही गिरा हुआ है, बहुत ही निचले स्तर का है।
जैसे जितने भी पॉलिटिकल लीडर्स हैं, और आचार्य जी, आप इंडिया के वन ऑफ द बेस्ट स्पिरिचुअल लीडर हैं, सभी लोग यह बोलते हैं कि यूथ क्रांति कर सकती है, यूथ को आगे आना चाहिए। और आप भी यह बात बोलते हो और मैं भी यह मानता हूँ कि दुनिया बल पर चलती है। सत्य पर्सनल लाइफ में सत्य पर चल सकती है, बट दुनिया बल पर चलती है। तो इनविज़िबल एक्टर्स बहुत ही स्ट्रॉन्ग हैं।
लाइक बिहार में कोचिंग इंडस्ट्री बहुत स्ट्रॉन्ग है। सभी लोग सरकारी नौकरी की तैयारी करते हैं। तो अधिकतर लोग तैयारी करते नहीं हैं, उनको करवाया जाता है क्योंकि जो कोचिंग इंडस्ट्री है वो लाखों, हजारों करोड़ की इंडस्ट्री है। वो डेली आचार्य जी अगर आप पटना का न्यूज़पेपर देखो, तो हर न्यूज़पेपर के फ्रंट पेज में सिर्फ़ कोचिंग इंडस्ट्री का ऐड आता है, सिर्फ़ कोचिंग इंडस्ट्री का। वैसे ही पॉलिटिक्स में इनविज़िबल एक्टर्स हैं, शादी के इंडस्ट्री में भी जो पूरा मैरिज इंडस्ट्री है वो बहुत ही स्ट्रॉन्ग है। यहाँ पर मतलब किसी को खाने के पैसे नहीं होंगे, लेकिन वो शादी पर करोड़ों खर्च कर देंगे।
तो जो मेजर डिसीजन होते हैं, वो बहुत यूथफ़ुल ईयर्स में होते हैं, लाइक कब पढ़ाई करनी है, कौन सा वर्क करना है, किससे शादी करनी है, वो बहुत यंग एज में होता है। और यह जो इनविज़िबल एक्टर्स हैं, ये पूरी तरीके से बाज़ी को पलट देते हैं। कितने भी कोई सतर्क रहे। मैं अपने आईआईटी के दोस्तों को जानता हूँ , जो कि जब इलेक्शन आते हैं तो वो सामाजिक दबाव में कास्ट बेसिस पर ही वोट करते हैं।
लोग इन इनविज़िबल एक्टर्स को कैसे पहचानें जब उनको बिल्कुल उस समय डिसीजन लेना होता है? क्योंकि यूथ को हम लोग बोलते हैं कि वो कर सकते हैं सब कुछ, क्रांति कर सकते हैं। बट उनको कभी भी फ्रीडम नहीं मिलता है। यह इंडिविजुअल लेवल पर हो सकता है, बट मास लेवल पर बहुत ही ज़्यादा मैं देखता हूँ यहाँ पर आचार्य जी कि प्रेशर रहता है।
तो एक आम जनमानस की सामूहिक चेतना कैसे बढ़े? और दूसरा मैं आपसे यह जानना चाहता हूँ कि यह जो इनविज़िबल एक्टर्स हैं, इनको पहचान कर इनको पावरलेस कैसे करें? इनको पावर देना बंद कैसे करें? यह मैं आपके थ्रू जानना चाहता हूँ ।
आचार्य प्रशांत: इनको पावर मिला कहाँ से है? इन्हें पावर दिया किसने है?
श्रोता: हम लोगों ने।
आचार्य प्रशांत: ठीक है? और जो पावर है वो कलेक्टिव पावर है, सामूहिक पावर है। ये मान लो यहाँ इतने लोग बैठे हैं, ये मान लो समूचा बिहार है। ये इतने सब जो यहाँ बैठे हैं, सब समूचा बिहार हो गया ये। तुम्हें बात आ गई समझ में? तुम्हें आ गई समझ में न? तो तुम क्या करोगे? यह सब मिलकर के एक व्यवस्था चला रहे हैं, और तुम्हें दिखाई दे रहा है कि वो व्यवस्था अज्ञान पर, दमन पर, शोषण पर आधारित है। तो अब तुम्हें क्या करना है?
विकल्प तुम्हारे हाथ में है। तीन तरह के विकल्प होते हैं। जो व्यवस्था चल रही है, चल इसी लिए रही है क्योंकि उसमें जो शोषित भी है उसके लिए भी कुछ है। जो शोषित है, अगर उसके लिए बिल्कुल कुछ न हो तो जो शोषित होता है वो क्रांति कर देता है। आप एक गधे को भी हाँ रहे हो तो कुछ न कुछ तो खिलाना पड़ता है उसको। जिसको आप कुछ भी नहीं दोगे, बिल्कुल, वो फिर विद्रोह कर देगा।
तो एक तो यह है कि कुछ न कुछ तो मुझे भी मिल जाएगा इस व्यवस्था में साझेदार होकर के। तो जैसे इतने सारे लोग, यह पूरा ऑडिटोरियम भर के इस व्यवस्था में शामिल हैं, मैं भी हो जाता हूँ । ये सब क्या मर रहे हैं? नहीं मर रहे ना, तो मैं भी नहीं मरूंगा। ये सब भी मज़े में जी रहे हैं। दूसरी बात, ये फिर एक समाज है और उस समाज में शामिल होने से जो सुरक्षा मिलती है, मैं उसका भी सुख भोगूँगा। बाहरी नहीं कहलाऊँगा, बहिष्कृत नहीं हो जाऊँगा, एक ढाँचे, एक भीड़ में सम्मिलित रहूँगा। तो ये एक विकल्प होता है तुम्हारे सामने। ये सबसे निचला विकल्प है।
उससे ऊपर का विकल्प होता है नहीं कोई बात दिख गई है, तो अब अंदेखा नहीं कर पाऊँगा, इस भीड़ में मैं शामिल तो नहीं रह सकता। ये जा है, जैसे जी रहे हैं नहीं जी पाऊँगा, दम घुट जाएगा। तो फिर क्या करा? वो जो दरवाज़ा है वो जाता है बंगलौर की तरफ़, और ये जाता है us की तरफ़। उधर जाने के लिए एक जॉब ले ली, या इधर जाने के लिए वीज़ा ले लिया और कहा, इन लोगों के साथ तो अब नहीं जी सकता। मैं अपना प्रांत छोड़ के चला जाऊँगा। पलायन कर जाऊँगा। निकलूँगा यहाँ से।
यह सबसे नीचे वाले विकल्प से बेहतर विकल्प है, क्योंकि कम से कम तुमने दासता स्वीकार नहीं करी। तुमने निजी तौर पर तो विद्रोह करा। तुमने कहा, "जैसे यह लोग जी रहे हैं, ऐसे तो नहीं जी सकता। मैं जा रहा हूँ यहाँ से।" बीच में लगा भी कि यहाँ जो थे, बचे पीछे, उनमें मेरे दोस्त हैं, यार हैं, बचपन के बंधु हैं, रिश्तेदार हैं, मेरी जमात के लोग हैं। फिर तुमने कहा, "होंगे, इतना भी नहीं प्यार है कि इनकी खातिर यहाँ पड़ा रहूँ। मैं चला।" और फिर एक विकल्प और होता है, "न दैन्यं, न पलायनम्।" न इनके जैसा बनूँगा, न भागूँगा, यहीं रहूँगा, लट्ठ गाड़ के। ख़ुद भी खरी ज़िंदगी जिऊँगा और इनके कान में भी शंख फूँकूँगा। बदले में जो होता हो, सो हो।
अब तुम्हें चुनना है कि तुम्हें कौन-सा विकल्प चाहिए। ये तुम जानो। विकल्प तीनों उपलब्ध हैं और तीनों में ही कुछ-न-कुछ सुख-सुविधा बिल्कुल है। सबसे जो नीचे वाला विकल्प है, उसमें क्या मिलती है? बिलॉन्गिंगनेस, सुरक्षा, सिक्योरिटी। जो सब कर रहे हैं, वही मैं कर रहा हूँ। इनकी नज़रों में मैं सिर्फ़ सम्मिलित ही नहीं रहूँगा, सम्माननीय रहूँगा। कोई मुझे आकर नहीं कहेगा कि, "यह देखो, यह आ गए हैं क्रांतिवीर बिगुल फूँकने के लिए। अलग ही रास्ता इनका चलता है, पागल आदमी।”
बिल्कुल, गंदे पानी में जाकर के बूँद की तरह घुल जाऊँगा। मेरी अपनी कोई निजी अलग हस्ती ही नहीं बचेगी। जैसे चारों तरफ़ गंदगी है, वैसे ही वह सारी गंदगी मैं अपने भीतर भी सोख लूँगा, ताकि मैं कम-से-कम सबकी तरह तो बन जाऊँ। सुख यहाँ भी है, ख़तरे से बचने में सुख होता है न कुछ? तो वह सुख है, इस तल पर सुख है। ख़तरा तो बचा, ख़तरा टला, सुख मिला थोड़ा, राहत मिली। जो मध्यम तल है, उसमें भी खूब सुख है। कौन बिहार में सड़े? हम चले। कहीं चले, बेंगलोर, हैदराबाद, यूरोप, अमेरिका, कहीं भी चले जाएँगे। कौन यहाँ सड़े? निकलो, निकलो। जो जितनी जल्दी निकल सकता है, बाहर निकलो। वह भी ठीक है।
जिन जगहों पर जाओगे, वहाँ बेहतर माहौल है, बेहतर लोग हैं, बेहतर धन-धान्य हैं, बेहतर व्यवस्थाएँ हैं। शायद बेहतर रिश्ते भी बना पाओगे। बढ़िया है, ठीक है। वहाँ भी सुख है। और फिर जो आख़िरी विकल्प है, उसमें भी सुख है।
ऐसी भी क्या भूख, यारों, जिधर चारा मिला, चल दिए। देखो, खड़ा हूँ मैं अपनी धरती पर। देखो, खड़ा हूँ मैं अपनी मिट्टी पर, अपने हाथों में अपना हल लिए।
तुम्हें चुनना है। और मिट्टी अगर गंदी हो गई हो और तुम खोदोगे, खनोगे, हल चलाओगे, तो पता नहीं उसमें से क्या-क्या निकल पड़े। साँप-बिच्छू तो ठीक है, लैंडमाइन भी हो सकती है। तुम चले थे मिट्टी बदलने, हो गया विस्फोट और मारे गए। कुछ भी हो सकता है। लेकिन इस पहले तल का भी अपना एक सुख है। ये तुम पर निर्भर करता है कि तुम्हें किस तल का सुख चाहिए जीवन में। सुख तो सभी चाहते हैं, मनुष्य का स्वभाव ही है सच्चिदानंद। आनंद के बिना चेतना छटपटाती है। पर मनुष्य और मनुष्य में अंतर यह होता है कि कौन किस तल का सुख चुन रहा है। सुख तो पशु भी चुनता है। अंग्रेज़ी भाषा में इसलिए तीन अलग-अलग शब्द हैं, प्लेज़र, हैपिनेस और जॉय। तीन अलग तल हैं सुख के। चुन लो, जो चुनना है तुम्हें।
प्रश्नकर्ता: हाँ, आचार्य जी, इस पर थोड़ा मैं एक काउंटर क्वेश्चन पूछना चाहूँगा। आपने बोला कि हमारे पास चॉइस होता है। वह बिल्कुल सही है। बट वह चॉइस होता है, जब मैं अवेयर रहूँ, मैं कॉन्शस रहूँ। बट मैं बिहार में यह देखा हूँ कि जो दो सबसे इंपॉर्टेंट चीज़ें हैं, एक है वर्क, दूसरा है मैरिज, ये दोनों चूज़ करने के पहले इतना इग्नोरेंट रखा जाता है लड़कियों को।
आचार्य प्रशांत: तुम लोग भी इग्नोरेंट रहोगे अब शादी करने से पहले या काम चुनने से पहले? पूछ रहा हूँ, ईमानदारी से बोलना, मेरा दिल रखने के लिए नहीं।
श्रोता: नहीं।
प्रश्नकर्ता: और जैसा, आचार्य जी, बृहदारण्यक उपनिषद् में भी है, याज्ञवल्क्य-मैत्रेयी संवाद।
आचार्य प्रशांत: अभी इस ललकार से क्या समझ में आया?
प्रश्नकर्ता: हाँ, आचार्य जी, समझ में आया कि अभी लोग स्वीकार कर रहे हैं, चेंज करेंगे।
आचार्य प्रशांत: कर सकते हैं।
प्रश्नकर्ता: कर सकते हैं। पॉसिबल है। तो, आचार्य जी, मतलब वह मैं समझ रहा हूँ, पॉसिबल है। बट यहाँ होता क्या है कि बहुत बार मैं देखा हूँ कि 21–22 साल की लड़कियाँ, उनको फैमिली जानबूझकर, जैसे याज्ञवल्क्य-मैत्रेयी संवाद में भी बोलते हैं कि 'अदर इज़ लव्ड फ़ॉर वन्स ओन सेक।' तो जब फैमिली वाले ही उनको इग्नोरेंट रखें, और वह इग्नोरेंस में रख के चूँकि उनका…।
आचार्य प्रशांत: 21–22 साल के यहाँ कितने बैठे हैं, उस आयु-वर्ग के? हाथ खड़ा करो। गीता समागम में आने से पहले बड़े ज्ञानी थे? पूछ रहा हूँ। और आने का फैसला क्या दबाव में लिया?
श्रोता: नहीं।
आचार्य प्रशांत: रखा होगा दुनिया ने इग्नोरेंट। जागृत होना अपना चुनाव होता है न? तुमने वह चुनाव करा न? तो करा जा सकता है वह चुनाव।
प्रश्नकर्ता: और, आचार्य जी, आपके इंस्पिरेशन से अभी मैं गांधी रिसर्च फ़ाउंडेशन में ऐज़ अ कंसलटेंट भी काम कर रहा हूँ और मैं स्कूल लेवल पर लाइफ़ एजुकेशन को इंट्रोड्यूस करने की भी कोशिश कर रहा हूँ, और उनके जो एजुकेशन आउटकम्स हैं, उनको भी *बेटर *करने की कोशिश कर रहा हूँ कि टियर-2 सिटीज़ में जो एजुकेशनल आउटकम्स हैं, वो उतने अच्छे नहीं हैं।
आचार्य प्रशांत: और कोई चारा भी नहीं है। देखो, जगत तो संयोगिक है। प्रकृति का, ब्रह्मांड का तंत्र इतना विशाल है कि उसमें क्या होता है, कब होता है, क्यों होता है, इसका कोई हिसाब ही नहीं रखा जा सकता। हम यहाँ बैठे बात कर रहे हैं। अभी भूकंप आ सकता है, बिल्कुल आ सकता है। हम यहाँ बैठे बात कर रहे हैं। पता नहीं क्या हो जाए, ट्रंप क्या कर दे। उसका असर चीन पर क्या पड़ जाए, चीन भारत के ख़िलाफ़ युद्ध छेड़ दे, यहाँ बम गिरा दे। आप कहोगे, "ये क्या है?" लेना-देना कुछ नहीं, बम खा गए। कुछ भी, कभी भी हो सकता है। आप यहाँ खड़े हो, आपको क्या पता, किसी के शरीर में कौन-सी बीमारी पल रही है। अभी आप यहाँ पर हो, दो दिन बाद हो सकता है कैंसर निकल आए। क्या पता?
तो आप जितना गिनाओगे बाहर के हालात, उतनी गिनती अभी बाक़ी रह जाएगी। जितना गिनाओगे, कम है। अभी और भी बहुत कुछ हो सकता है। अनुकूल, प्रतिकूल; अनुकूल, प्रतिकूल; संयोग, संयोग। गिनते रहो, क्या मिलेगा? यह बात आपके भीतर उतर क्यों नहीं रही है भीतर बिल्कुल, कि आपके पास बस आपका चुनाव है, और कुछ नहीं, और कुछ नहीं। मत बताओ कि कितना कोहरा है घना, देखो कि अब तुम्हें क्या करना है। शिकायत करने से, रोने से, ये करने से, यह बताने से क्या हो जाएगा? और ज़िंदगी तो कटने की चीज़ है।
ज़िंदगी काटने के लिए इससे सुंदर कोई बहाना मिल सकता है क्या कि किसी सार्थक संघर्ष में कट गई, पता भी नहीं चला कब कट गई।
जी रहे थे, जी रहे थे, लड़ रहे थे, लड़ रहे थे, लड़ रहे थे। फुर्सत ही नहीं थी अपने सुख-दुख गिनने की। एक दिन भैंसे वाला आया। उसको भी बोला कि, "तू दो मिनट रुक पहले। काम है कुछ, आख़िरी हस्ताक्षर कर दूँ।" और बोला, "चल।" और किसलिए परेशान हो? इसीलिए तो कि ज़िंदगी में दुख न रहे। इसीलिए परेशान हो न?
हाँ तो चुन लो कोई सार्थक संघर्ष। दुख होगा भी, तो दुख को भाव देने की फुर्सत नहीं मिलेगी। है दुख, पर दुख की तरफ़ देखने की फुर्सत ही नहीं है। दुख तो बहुत है, पर दुख के बारे में सोचे कौन? काम बहुत है। और काम ऐसा है कि हम जानते हैं कि आवश्यक है। युद्ध ऐसा है, जिससे एक पल के लिए पीछे नहीं हट सकते। अब कौन गिने कि कितना दुख है। होगा, पड़ा रहे। और कौन गिने कि कितना सुख है। सुख भी आता है, संयोग है दोनों।
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, एक छोटी-सी बात और बोलना चाहूँगा आपको। बिहार में कोचिंग इंडस्ट्री बहुत ही मज़बूत है। यहाँ पर फ़ोर्थ, फ़िफ्थ से बच्चे आईआईटी वग़ैरह की तैयारी करने लगते हैं। तो आपके थ्रू मैं चाहता हूँ, आचार्य जी, कि आप यहाँ के पेरेंट्स को संदेश दें कि लाइफ़ में लाइफ़ एजुकेशन भी उतना ही इंपॉर्टेंट है और उसको वो लोग थोड़े खुले विचार से अडॉप्ट करें।
आचार्य प्रशांत: इनको संदेश की ज़रूरत ही नहीं है, इनके सामने मैं खड़ा हूँ। क्या जिन चीज़ों की कोचिंग होती है, उन्हीं को छोड़कर तो आपके सामने और आपके बीच खड़ा हूँ। काहे की कोचिंग करते हो? इसी चीज़ की तो, आईआईटी की, आईआईएम की, यूपीएससी की। इसी की तो करते हो। तो अब मैं अलग से संदेश क्या दूँ? ये जो यहाँ खड़ा हूँ, यही संदेश है।
प्रश्नकर्ता: बहुत-बहुत धन्यवाद, आचार्य जी।
आचार्य प्रशांत: मुझे पता होता है कि सत्र तब मेरे लिए आनंदपूर्ण रहा है, और आपके लिए भी मूल्यवर्धक रहा है, जब मुझे कोई और आकर बताए कि तीन घंटे बीत गए। मुझे फुर्सत ही न हो घड़ी गिनने की भी। तब आश्वस्ति रहती है कि आज जो हुआ, उसमें मेरे लिए आनंद और आपके लिए मूल्य था। हाँ, पता ही नहीं चला। क्या बोला, क्या सुना गया, क्या कह दिया, क्या रह गया। कौन गिने, जो भी बात थी वह हार्दिक थी। हृदय समय का उल्लंघन कर जाता है। घड़ी पीछे टिक-टिक कर रही होगी, हमें नहीं पता चला। अगर तीन घंटे ऐसे गुज़ारे जा सकते हैं, तो पूरी ज़िंदगी ऐसी क्यों नहीं गुज़ारी जा सकती?
प्रश्नकर्ता: प्रणाम, आचार्य जी। मेरा नाम नंदिनी है। मेरा सवाल यह था, हम सब जो बिहार के यूथ हैं, लगभग जो यहाँ पर गवर्नमेंट एग्ज़ाम की तैयारी कर रहे हैं। जो लोग यहाँ पर बहुत टाइम से, ये हब भी है, गांधी मैदान के आसपास का सारा एरिया, मैक्सिमम लोग यहाँ पर स्टूडेंट होंगे। सर, सब लोग यहाँ पर मैक्सिमम गवर्नमेंट एग्ज़ाम की तैयारी कर रहे हैं। और हम लोग के पास और कोई ऑप्शन इसलिए भी नहीं है, क्योंकि इस समय, जब हम लोग अपने 20–30 में, मतलब तैयारी कर रहे थे, उस समय एजुकेशन सिस्टम इतना अपडेटेड नहीं था, जितने अभी ऑप्शंस हैं।
हमारे जो 11th–12th के बच्चे लोग हैं, उन लोगों के पास अभी ऑप्शन है। बट जब हम लोग तैयारी कर रहे थे और पढ़ रहे थे, अंडरग्रेजुएट्स लोग, तो उतना ऑप्शन नहीं था, सर। तो हम लोग के पास कोई ऑप्शन नहीं बचता है, सिवाय गवर्नमेंट एग्ज़ाम की तैयारी करने के, कि हम लोग का आगे का फ़्यूचर क्या होगा?
हमारे पेरेंट्स के भी मन में वही है। चाहे लड़की हो, चाहे लड़का, गवर्नमेंट एग्ज़ाम की तैयारी करो। बिहार, यूपी में रिलेटिवली ये ज़्यादा है, और इसके चक्कर में यहाँ के यूथ, सर, बहुत टाइम अपना वेस्ट कर चुके हैं। और हमारे पास कोई ऑप्शंस भी नहीं हैं।
आचार्य प्रशांत: बड़ी मजबूरी है।
*प्रश्नकर्ता: *सर, हम लोग के पास कोई टेक्निकल डिग्री नहीं रही, जिस कारण से अभी यदि कोई नया स्टार्ट करें, कुछ नया कोर्स करने का, तो सर, इतना सपोर्ट भी नहीं मिलता है घर से कि अब कुछ इतना पैसा लगा..."
आचार्य प्रशांत: कैसी बातें कर रहे हो? आपको क्या ईमानदारी से यह नहीं पूछना चाहिए कि कहीं ऐसा तो नहीं कि दूसरे विकल्प हैं, पर हमारे दिमाग में कुछ ऐसा बैठा है जो उन दूसरे विकल्पों को स्वीकार नहीं करना चाहता? मैं पूछ रहा हूँ। मुझे नहीं मालूम, मैं तो पूछ रहा हूँ।
प्रश्नकर्ता: बेशक है, सर। लेकिन ये है माइंडसेट कि गवर्नमेंट एग्ज़ाम के लिए...
आचार्य प्रशांत: तो ये बोलो न कि माइंडसेट है, यह मत बोलो, मजबूरी है। माइंडसेट है, माने फिर तो चुनाव है अपना। आप कुछ भी चुन सकते हो, उसमें कोई क्या करेगा?
प्रश्नकर्ता: सर, यहाँ पर है ये चीज़, ज़्यादा लोग बीपीएससी, यूपीएससी।
आचार्य प्रशांत: हम उसकी बात करेंगे न कि ज़्यादा लोग यूपीएससी, बीपीएससी क्यों कर रहे हैं। वही प्रश्न है न?
प्रश्नकर्ता: यही, यही प्रश्न है।
आचार्य प्रशांत: हाँ, कि वहाँ ऐसा क्या मिलता है, जो बाक़ी विकल्पों को ठुकराकर सरकारी परीक्षा के लिए दस- दस साल भी लगाने को तैयार है? क्या मिलता होगा ऐसा? बेटियों के बाप कितने बैठे हैं यहाँ पर, जिन्होंने शादी की हो? और शादी की, तो दहेज तो दिया ही है। क्या मिलता है ऐसा सरकारी नौकरी में? मुझे नहीं मालूम, पुत्रियों के सब पिता लोग बताएँ। अच्छा, अच्छा, अच्छा, मजबूरी है बहुत। मजबूरी की बात है। पर यह तो सब बेटियों के जो बाप बैठे हैं, वो कह रहे हैं, बात दहेज की भी है। बात टेबल के नीचे से जो घूस मिलती है, उसकी भी है।
बिल्कुल, आप जो बात कह रही हैं उसमें सच्चाई होगी, पर मेरा काम है उसमें जितना झूठ है उसको हटाना। बाक़ी आपकी बात हो सकता है सच हो, मैं उसका सम्मान करता हूँ। जब हवाओं में यह फैल गया हो कि ज़िंदगी के मज़े तो इसमें हैं कि सरकारी गाड़ी हो और एक टाँग बाहर निकाल के उसमें बैठे हैं, और किसी अविकसित कस्बे में बिल्कुल धूम मचा रहे हैं, चौड़ दिखा रहे हैं, और जिसको चाहते हैं, उसी को डंडा जमा देते हैं, यही तो है असली बात।
मैं आज जहाँ रुका हुआ हूँ, उसके पास में ही मॉल है एक। तो पैदल ही गया अपना, देखने के लिए कि हमारे बिहार की हालत क्या है, अच्छा लगा। वहाँ पर मुझे लोग दिखाई दिए, जो कैफ़े में बैठे हुए हैं। लैपटॉप पर काम कर रहे हैं। मैं किताबों की दुकान में गया, वहाँ पर मैंने कुछ देर बात भी करी लोगों से। अच्छा लगा कि लोग किताबें पढ़ने के लिए उत्सुक हैं। यद्यपि, उसी के सामने, जैसे कहा कि उसी के सामने, मैं बहुत सारी अशिक्षा, ग़रीबी भी देख रहा था, वह अच्छा नहीं लग रहा था।
तो वहाँ मॉल से मैं पैदल ही वापस लौट रहा था। ऐसे ही साधारण कपड़े, पैदल ही। पहले निकली एक लैंड क्रूज़र होटल के अंदर, उसके बाद निकली फ़ॉर्च्यूनर, उसके बाद निकली इनोवा। और मतलब, इन्होंने मुझे मार नहीं दिया, यह बड़ी बात है। कोई नेताजी थे। आगे-आगे चल रही थी लैंड क्रूज़र, पीछे फ़ॉर्च्यूनर, उसके पीछे इनोवा। तीनों सफ़ेद रंग की। और धनधना के, धन-धन-धन, बिल्कुल ऐसे छूते हुए मुझे निकल रहे हैं। अब ये सब मेहनत की नौकरी, एंटरप्रेन्योरशिप या प्राइवेट में कहाँ मिलेगा? कहाँ मिलेगा?
और यही संस्कार बन गए हों, यही जीवन का आदर्श बन गया हो कि ऐसे हो जाएँ बिल्कुल, कि जलवा रहे हमारा। गाड़ी निकले बिल्कुल दनदनाती हुई, सायरन बजाती हुई। और सब आते-जातों को ठोक दो, गिरा दो, धमका दो। कम-से-कम डर के रहें और ऐसे करें, "अरे, अरे, अरे, अरे! बड़े बाबू हैं। सरकारी आदमी हैं या नेता हैं।" अगर यही उच्चतम आदर्श बन गया हो किसी स्थान का, तो वो जगह प्रगति कैसे करेगी? कैसे करेगी? बोलो। उसके बाद नेताजी और उनका जो पूरा काफ़िला है; अब होटल में एक घुसने का द्वार है, जहाँ मेटल डिटेक्टर है। ठीक है न? जहाँ पर आपकी फ्रिस्किंग भी होती है। एक *मेटल डिटेक्टर है। वहाँ फ्रिस्किंग भी होती है। और दूसरा एग्ज़िट गेट है। एग्ज़िट गेट बड़ा-सा है, एंट्री पतला-सा है, ताकि उसमें से एक-एक करके आप घुसें और आपकी पूरी जाँच हो, उसके बाद ही आप अंदर आएँगे।
नेताजी या जो भी थे, वह मैं नहीं जानता कौन थे। ऐसे ही कोई स्थानीय व्यक्ति थे। कोई बहुत बड़े भी, ऐसा कुछ नहीं। वह एग्ज़िट गेट से अंदर घुस रहे हैं, पूरा अपना काफ़िला लेकर। और काफ़िले में शायद कुछ सरकारी लोग भी थे। कहीं ऐसा तो नहीं कि सरकारी नौकरी के आकर्षणों में एक आकर्षण यह भी है? मुझे नहीं मालूम, मैं पूछ रहा हूँ। मैं पूछ रहा हूँ, मैं तो बस पूछ रहा हूँ।
अब क्या करें, अगर ऐसी बात है तो? क्यों बोल रहे हो कि दूसरे विकल्प खुले नहीं हुए हैं? क्यों बोल रहे हो? दस- दस साल लगाकर एक क्लर्क की नौकरी के लिए भी आप राज़ी हो जाते हो। एमबीए ही कर लो, यार। उसमें कोई नहीं कहेगा कि तुमने बीए, बीकॉम करा है, तो तुम एमबीए के लिए क्वालिफ़ाइड नहीं हो। बिल्कुल दे सकते हो। कौन रोक रहा है तुमको?
एआई नया आया है, अगर आपके पास कंप्यूटर इंजीनियरिंग की डिग्री नहीं भी है, लेकिन एक साधारण लॉजिकल एबिलिटी है, तो आप एआई का कोर्स कर सकते हैं। न जाने कितने और रास्ते हैं, जो खुले हुए हैं। न जाने कितने रास्ते हैं, जो खुले हुए हैं। पर आप दिल्ली चले जाइए, मुखर्जी नगर, जिया सराय, इन सब जगहों पर चले जाइए। शायद एक-तिहाई वहाँ पर जो पूरी जमात है, वह हमारे प्रदेश से होगी। ऐसा क्या आकर्षण है? क्या आकर्षण है?
सरकार आज के समय में जनरेटिव नहीं होती है, डिस्ट्रीब्यूटिव होती है। माने, बनाती वो कुछ नहीं है। बनाने का समय तब था, जब कुछ पीएसयू वग़ैरह होते थे, जहाँ उत्पादन होता था। वह सब बंद हो गया। आज सरकार डिस्ट्रीब्यूटिव होती है, वेलफ़ेयर स्टेट है न? तो पूरी सरकारी व्यवस्था के हाथ में, जो टैक्सपेयर है, करदाता, उसका पैसा होता है। और उसके हाथ में वह पैसा होता है कि डिस्ट्रीब्यूट करो, बस यही आकर्षण है। मेरे पास पैसा आएगा। मेरे पास डिस्क्रेशनरी पावर भी रहेगी। तो उसमें से हो सकता है कि कुछ...
नहीं मैं आरोप नहीं लगा रहा, मैं सवाल पूछ रहा हूँ।
प्रश्नकर्ता: सर, और एक और बात है।
आचार्य प्रशांत: पहले ये समझ में आई क्या?
प्रश्नकर्ता: यस सर। सर, इस चीज़ से कैसे लोगों का सोच बदलेगा? मतलब, कैसे इस चीज़ को बदला जाए कि सरकारी नौकरी सब कुछ नहीं है?
आचार्य प्रशांत: इतनी आसानी से मिल कहाँ रही है सरकारी नौकरी? देखो न कि आरओआई क्या है? देखो कि उससे कम मेहनत में कहीं बेहतर विकल्प मौजूद हैं। क्या करोगे वहाँ पर जाकर के? वैसा कुछ नहीं है, जैसा कि पुश्तों ने बताया है कि सरकारी बाबू बन जाओगे तो ये हो जाएगा, वो हो जाएगा।
प्रश्नकर्ता: बहुत ग्लैमराइज़ किया जाता है सर इस चीज़ को।
आचार्य प्रशांत: और ये (स्वयं को इंगित करते हुए) कौन खड़ा है? कह रहे हैं, सरकारी नौकरी में बड़ा ग्लैमर है। इधर कम है क्या?
प्रश्नकर्ता: नहीं, नहीं, बिल्कुल नहीं।
आचार्य प्रशांत: जिन सरकारी नौकरियों के लिए आप जान देते हो...
श्रोता: लड़कों की शादी नहीं होती, सर।
आचार्य प्रशांत: ऐसी लड़कियों से बच जाओ, वही बेहतर है। जो सरकारी नौकरी देखकर शादी करती हों, ऐसी से बच गए तो बला टली। क्योंकि अगर किसी दिन सस्पेंड हो जाते, तो उसने तुमसे थोड़ी, नौकरी से शादी करी थी। नौकरी गई, तो छोकरी भी गई फिर। और इतना ही नहीं है, जब उसे सरकारी नौकरी वाला चाहिए, तो तुमसे भला तो तुम्हारा बॉस हुआ न! बॉस ख़तरनाक होते हैं।
प्रश्नकर्ता: हाँ, सर। यह था कि, सर, जो लोग तैयारी कर रहे हैं, उनमें से बहुत सारे मिडिल क्लास फैमिली से बिलॉन्ग करते हैं। उन लोगों का एजुकेशन इतना नहीं हुआ कि एट लीस्ट वो इंग्लिश बहुत प्रॉपरली, ऐज़ अ सब्जेक्ट, प्रिपेयर हो रहा हो उनका। सर, उनके लिए नया स्किल सीखना...
आचार्य प्रशांत: इंग्लिश उतनी भी ज़रूरी नहीं है, जितना हमारे मन में बैठ गई है। नहीं है। और जितनी ज़रूरी है, उतनी टूटी-फूटी आती है। ज़्यादातर नौकरियों में, प्राइवेट में भी, जो असली काम होता है वो क्षेत्रीय भाषा में ही होता है। हाँ, ईमेल वग़ैरह अंग्रेज़ी में लिख दी गई, वो अलग बात है। लेकिन ऐसा नहीं है कि आप जाकर अपने बॉस से, या कलीग से, या क्लाइंट से अनिवार्यतः अंग्रेज़ी में ही बात करोगे। ऐसा नहीं होता है, कहीं नहीं होता है। आपको मानसिक तौर पर और विकल्पों को खोजने की ज़रूरत है। समस्या यह नहीं है, कि विकल्प मौजूद नहीं हैं, विकल्प हैं और बेहतर विकल्प हैं। ठीक है? अपने आप को बाँध के मत रखिए।
और मुझे सरकारी नौकरी से कोई आपत्ति नहीं है। लेकिन उससे जो आपको आसक्ति है, वह गड़बड़ बात है। अरे, ठीक है, कुछ अगर हो रहा है आसानी से मिल रहा है, और आपको दिख रहा है कि काम भी अच्छा है, और जँच भी रहा है, तो करिए। पर उसके लिए आप पाँच साल, दस साल लगा रही हैं, और कह रही हैं, "मैं मजबूर हूँ, कुछ और नहीं कर सकती।" यह बात ठीक नहीं है। ठीक है?
प्रश्नकर्ता: थैंक यू, सर।