
Acharya Prashant: ‘How can I get my ex-girlfriend back?’ The question comes from Shubham. Shubham you will have to die (audience bursts into laughter). There is no other way, you will have to die.
You know, it was Kabir Sahab who said: ये तो घर है प्रेम का, खाला…

Acharya Prashant: Please, understand the nature of attachment. When two things get attached, do they disappear into each other ever? Attachment means continuity of separation. Attachment means that the two in spite of appearing proximate would still be separate. They would appear to be near but still they would continue

Questioner: Acharya Ji, If we see things and move quickly, are we not observing them?


There can be nothing worse than being saddled with, being tied to, being chained to some general unworthy person in life. That’s the worst hell you can create for yourself. Don’t do that.
If life is benevolent enough to offer you a great great companion, nothing like it. But if…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी को नमन, सर मैं आपका बहुत-बहुत धन्यवाद करना चाहूँगी कि आपने जो कुछ सिखाया है वो बहुत अमूल्य है और सर मैं बहुत बड़ी प्रशंसक हूँ, आपकी समर्पित प्रशंसक हूँ और सर मैं, जीवन में आपने जो कुछ सिखाया है वो पहले किसी ने बताया होता तो


आचार्य प्रशांत: सच इतना डरा हुआ क्यों है? सच इतना डरा हुआ इसलिए है, क्योंकि घपला कर बैठा है। “लागा चुनरी में दाग़ छुपाऊँ कैसे”।
किसी को जब मारना होता है तो आमतौर पर उसको मारने के लिए शुद्ध ज़हर का इस्तेमाल नहीं किया जाता। काला, दहकता, गरल हो विष,…



प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मेरी प्रेमिका मुझे कल ही छोड़कर चली गयी। दर्द में हूँ। क्या करूँ?

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी एक प्रश्न है, “आसक्ति से कैसे बचा जाए?”


Many of us interrupt, rush to make our point, or change the topic when a conversation comes too close. We call it a lack of patience or discipline. But impatience in a conversation is often fear: when what we hold within is borrowed belief, every question could shatter it. The same confusion makes us take our instincts and feelings as ourselves, though they are only the body’s chemistry. If we looked honestly at what we hold, would a question still feel like an attack?
Questioner (Q): I read some couplets by Saint Kabir and they touched me deeply. He wants to become one with God or Truth so much, but he is pained that he is unable to do that. At times I feel like meeting Him is the only thing left for me…
प्रश्नकर्ता: नमस्ते सर, बहुत लम्बे समय तक कई वर्ष मैंने ध्यान की विधियों का प्रयोग करा, उसके बाद ईश्वर ने मुझे ओशो जी के पास भेज दिया और अन्ततः ओशो जी से ईश्वर ने मुझे आपके पास भेज दिया। तो अब आप ही मुझे बताइए कि मुझे ईश्वर कैसे मिलें।…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, कहा जाता है कि मीरा जी को कृष्ण मिल गये थे, फिर भी वो वियोग के गीत क्यों गाती थीं?
आचार्य प्रशांत: क्योंकि शरीर है अभी भी। क्योंकि मीरा अभी मीरा है। जब तक शरीर रहेगा उनके पास, तब तक पूर्णतया कृष्ण न हो पाएँगी। तो जब…
प्रश्नकर्ता: संसार में प्राणी मरने के लिए ही उत्पन्न होता है और उत्पन्न होने के लिए ही मरता है। उत्पन्न होने के लिए मरना क्या है?
आचार्य प्रशांत: मरते नहीं न पूरा, रीचार्जिंग (पुनः ऊर्जा प्राप्त करना) पर जाते हैं। हमारी मौत थोड़े ही होती है। हमारा तो ऐसा होता…
जब प्रश्न के केंद्र पर प्रेमिका बैठी है, तो तुम्हारी उत्सुकता प्रेमिका से आगे की है ही नहीं न। ये खेल चलता रहेगा – कभी एक से जुड़ोगे, कभी…
आचार्य प्रशांत: क्यों बचा जाए?
श्रोता१: क्योंकि वो नुकसान दे सकती है आपको।
आचार्य प्रशांत : कैसे नुकसान देती है?
श्रोता१: जब आपसे अलग हो जाएगी।
आचार्य प्रशांत : इसमें ये कहाँ पर है कि आसक्ति का मतलब है…
श्रोता: मैं जब बारहवीं क्लास में था तो उस समय मैंने पढाई में दिलचस्पी नहीं रखी, न ही परिवार से बहुत मतलब रखा। मतलब उस समय मैं कुछ भी नहीं सोचता था। जो मन में आता था वो करता था। और उस समय मुझे लगता था कि सब लोग…

A young athlete says she knows she should not be attached to winning, yet she is, because her coach, family and country are invested in it. Wanting to win on the court is fine; that is what a contest is for. But we never know who the next opponent will be, and the one opponent always present is ourselves. She also fears that starting at 14 was too late. The past is fixed, so what is left is to play the cards we are dealt. Where does our real contest lie?

Many of us promise our parents high marks, and when the result falls short, the guilt can feel heavier than the exam itself. But no one controls results; they depend on far too many things outside us. What is in our hands is our intent, our effort and our honesty with what we study. The Bhagavad Gita says the same: our right is to action alone, never to its fruit. What if the only promise we made was to study honestly and with love?

We often defend a bad choice by pointing to a worse one: stay dishonest or starve, keep the wrong grip or stop playing. But the real trouble is not the option we picked. It is the option we never let ourselves see. Action does not need greed or attachment to find its energy. The third way begins by rejecting both false choices, without knowing what comes next. Which of our everyday choices are really false dilemmas?

Sisyphus pushes a rock up a hill forever, knowing it will always roll back down. A regular workman does the same thing inside a job: he keeps pushing too, except he hopes it will eventually pay off, a promotion, a house, a better life. This hope is often just a comfortable lie. Sisyphus, who expects nothing and still keeps going, is actually more honest than we are. The real question is not whether the effort is worth it, but whether we can stop lying to ourselves about it.

Struggling to choose between a secure job and the path you actually feel drawn to? This isn't really a question about careers. It's about why other people's opinions have so much power over you in the first place. Real clarity doesn't come from finding the 'right' choice. It comes from honestly looking at your own fear, again and again, until it stops running the decision for you.

कई तरह के डर—अकेले पड़ने, छवि खोने या छोटा समझे जाने—की जड़ अक्सर अतीत में बनी पहचान और कहानियों में होती है। शरीर की हाइट जैसी चीज़ों को समस्या मानकर उनसे जूझने के बजाय उनकी अप्रासंगिकता को समझकर आगे बढ़ना चाहिए। अतीत को दबाने से मुक्ति नहीं मिलती; उसके करीब जाकर अपनी स्मृतियों, धारणाओं और पुराने पैटर्न को निष्पक्षता से देखना ज़रूरी है।

भूतों का डर अक्सर किसी वास्तविक भूत से नहीं, बल्कि हमारी कल्पना, डर और सस्ते रोमांच की चाह से पैदा होता है। भूतिया फ़िल्में और कहानियाँ मन में ऐसी धारणाएँ बना देती हैं कि साधारण चीज़ें भी डरावनी लगने लगती हैं। डर से भागने के बजाय उसके आधार पर प्रश्न करना चाहिए। सस्ते रोमांच के बजाय ज्ञान, इतिहास और सार्थक चुनौतियों में वास्तविक आनंद और उत्साह खोजना अधिक उपयोगी है।

Spirituality does not replace the fear of ghosts with belief in God. It asks us to question the mind that creates both fear and belief. Ghosts, gods, and stories can all become projections of imagination. The spiritual path begins by dropping assumptions, investigating “Who am I?” and understanding the source of suffering. With attention, right knowledge, and self-inquiry, fear loses its power and one becomes inwardly free.

A true relationship is not built on need, possession, or emotional dependence, but on a shared commitment to Truth and inner growth. A worthy companion reflects your reality like a mirror rather than performing a role to please you. Real love is effortless, rooted in one's nature, not expectations. When your highest commitment is to excellence and Truth, relationships become a natural outcome—not the purpose of life itself.

डर वास्तविकता से नहीं, बल्कि अस्पष्टता और कल्पना से ताक़त पाता है। वह कभी स्पष्ट नहीं बताता कि किस बात का भय है, बल्कि धुंधले संकेतों से मन को विचलित करता रहता है। डर से भागने के बजाय उसे सामने बुलाकर उसके हर दावे से स्पष्टता माँगनी चाहिए। जैसे ही भय को सटीक होने के लिए मजबूर किया जाता है, उसकी शक्ति समाप्त होने लगती है, क्योंकि उसका पूरा अस्तित्व भ्रम और धुंध पर टिका होता है।

अहंकार भावनाओं से नहीं, बल्कि उनके उपयोग से पहचाना जाता है। आँसू, मुस्कान या कोई भी भावना अपने आप में न अच्छी होती है, न बुरी। समस्या तब शुरू होती है जब अहंकार उन्हें लाभ, छवि या स्वार्थ के साधन में बदल देता है। यदि रोना किसी परिणाम, सहानुभूति या लाभ से जुड़ा है, तो वह प्रोग्राम्ड इमोशन है। शुद्ध भावना सहज होती है; अहंकार हर भावना को अपने हित के अनुसार मोड़ देता है।

समझदारी याददाश्त से नहीं, समझ से आती है। जीवन हर पल नए प्रश्न पूछता है, इसलिए रटे हुए उत्तर नहीं चलते। जानकारी बाहर से मिल सकती है, पर सही उत्तर तभी जन्म लेते हैं जब मन वर्तमान में पूरी तरह उपस्थित हो। जो समझ में न आए उसे रटने के बजाय प्रश्न करो, जिज्ञासु बने रहो। सीखने का सार स्मृति नहीं, जागरूकता, समझ और वर्तमान क्षण में जीने की क्षमता है।

डर बोलने से नहीं, बल्कि दूसरों की राय और अपनी छवि खोने के भय से पैदा होता है। जब हम अपनी पहचान को लोगों की स्वीकृति पर टिका देते हैं, तब साधारण काम भी कठिन लगने लगता है। गलती करना गलत होना नहीं है; गलती सीखने का अवसर है, पहचान नहीं। आत्मनिर्भरता, आत्मसम्मान और दूसरों की राय से मुक्त होकर ही व्यक्ति निडर होकर बोल सकता है और आत्मविश्वास के साथ जीवन जी सकता है।

मन को संसार, लोगों और वस्तुओं से नहीं, सत्य में स्थिर रखना ही वास्तविक एकांत है। अकेलापन शरीर का नहीं, मन का होता है। जब मन दुनिया से पाने की आशा छोड़ देता है, तभी वह मुक्त होता है। वस्तुओं और रिश्तों का आकर्षण भी अंततः भोग की इच्छा से ही पैदा होता है, जबकि सच्चा प्रेम केवल सत्य, मुक्ति या श्रीकृष्ण के प्रति हो सकता है। संसार से आशा दुःख देती है, इसलिए मन को केवल सत्य की ओर लगाना ही योग है।


Sixty million followers do not necessarily indicate a transformation in consciousness. Large numbers may reflect persistent outreach rather than deep commitment. Truth is often avoided not through opposition but through indifference, convenience, and self-deception. Real change requires sustained effort, inner honesty, testing one's understanding, and the courage to face uncomfortable truths instead of seeking comfort, validation, or easy inspiration.

Fear, social conditioning, and painful memories often shape how people live and make choices. True growth begins by questioning inherited beliefs, refusing to remain trapped by past wounds, and acting from understanding rather than conformity. What appears to be sacrifice is often just the abandonment of conditioned habits. Freedom comes not from external systems, but from the courage to see clearly, learn, and move beyond fear.

समुद्र के लिए ही यहाँ आया समुद्र से ही मेरा आखिरी नाता
पर आज सुबह से व्यस्त रहा रेतीले मसले ये गिनती वो घाटा
साँझ अब जब तट पर आया समुद्र लहराता बोला मुस्कुराता
रेत के कणों में मन फँस जाता रेत गिनते सूरज ढ़ल जाता
रेत का कण विशाल…

माता-पिता को, दोस्त-यारों को, परिवार के जो भी लोग हों, इनसे अगर प्रेम है, तो इन्हें जो ऊँची से ऊँची चीज़ है, वही देना चाहोगे न। उच्चतम क्या है? बोध है, चेतना है, ज्ञान है। वो दीजिए न घर वालों को। माँ-बाप ने आपको शारीरिक जन्म दिया। अब आप अपने माँ-बाप को आध्यात्मिक जन्म दीजिए। ये हुई बराबरी। तुम जो मेरे लिए अधिकतम कर सकते थे, तुमने किया। और अपनी चेतना के तल पर, जो मैं तुम्हारे लिए अधिकतम कर सकता हूँ, वो मैं करूँगा।

दुनिया में मुझे बताना, कौन-सी चीज़ है जो कभी नष्ट नहीं हुई? सभ्यताएँ मिट गईं, संस्कृतियाँ बह गईं, धर्म ख़ाक हो गए; आदमी का बनाया कुछ भी नहीं बचता। जो चीज़ हमें पता है कि मरण-धर्मा है, वह मिट ही जाएगी; उससे पहले उसका उपयोग चेतना को बढ़ाने के लिए कर डालो। हर पल में ऐसे सतर्क रहो, जैसे यही बस एक पल हो। जिसने मृत्यु और मृत्यु की अनिवार्यता को स्वीकार कर लिया, जो मौत के होश में जीने लगा, उससे ज़्यादा मस्त कोई नहीं जीता। मौत को लगातार याद रखो, तब मौज आएगी!

कोई रिश्ता गड़बड़ है, यह जानने के लिए बस यह देख लो कि क्या उसमें मुखौटे पहनने पड़ते हैं। और यदि मुखौटे उतारने पर रिश्ता टूटने लगे, तो समझ लीजिए वह रिश्ता वास्तविक नहीं था। उसने आपसे रिश्ता बनाया, उसने आपकी छवि से रिश्ता बनाया है। और आपकी छवि आप हैं नहीं, तो माने, उसका आपसे कोई रिश्ता है नहीं। फिर तो डर में ही जीना पड़ेगा, क्योंकि छवियाँ काल्पनिक होती हैं। जैसे ही यथार्थ आकर एक धक्का मारेगा, सारी छवियाँ टूट जाएँगी। इससे बेहतर यही है कि बेबाकी से सच में जिएं ।

आदमी कहता है, “मैं ठीक हूँ। बस हालात कुछ ऐसे बने कि मैं फिसल गया।” ग्लानि सिद्ध करती है कि तुम आदमी बढ़िया हो; बस संयोग से असफल रह गए। तुम्हारी ग्लानि ये थोड़ी है कि तुम आदमी ही गड़बड़ हो। तुम्हारा केंद्र ही गड़बड़ है। तुम्हारी ग्लानि तो धोखे से मिस्टेक वाली होती है। वास्तविक ग्लानि तो अग्नि होती है। तुम बचोगे ही नहीं जैसे हो, अगर ग्लानि हो जाए तो।

अगर एक कमरा खाली है, उसमें मुझे घुसने से डर लग रहा है, तो इसका मतलब ये है कि कमरा अज्ञात नहीं छोड़ा मैंने। मैंने उसके ऊपर अपनी ज्ञात कल्पनाएँ डाल दीं, और अब मैं कह रहा हूँ कि इस कमरे के भीतर शेर है, या चोर है, या भूत है, या कुछ है। अगर आप भविष्य को अज्ञात का अज्ञात ही रहने दें, तो डर कहाँ से आएगा? ये होता है आत्म-अवलोकन, कि पीछे जाकर देखना कि ये जो एंड प्रॉडक्ट निकला है, फियर नाम का, ये किन-किन चीज़ों के कॉम्बिनेशन से आ रहा है। और आप जैसे ही ये देख लेते हो, आज़ाद हो जाते हो।

इंसान होने का मतलब ही है बहुत कुछ होगा जो तुम्हारे सामर्थ्य से बाहर का होगा। एक चीज़ है तुम्हारे हक़ में। क्या? घटना कुछ भी घट रही हो, उस घटना को उत्तर क्या देना है। तुम्हारा प्रतिसाद, तुम्हारी प्रतिक्रिया, ये तुम्हारे अधिकार में हो सकते हैं। बिल्कुल संभव है कि बाहर बड़ी से बड़ी कठिनाई हो, कष्ट हो; भीतर तुम्हारे एक अस्पर्शित शांति बनी ही रहे। जो ऐसा कर ले गया, वो न सिर्फ़ जी गया, वो जीवन के पार निकल गया। सिर्फ़ उसी का जीवन सार्थक हुआ।

The other must exist in your life, and vice versa, only for the sake of internal elevation, to make you into a better person. Don't you see the impact the other one is having on your life? Seeing is the key. What does seeing mean? Seeing implies understanding. See and ask yourself: What is the impact upon me? And if you see that, you'll just push it aside. It will be spontaneous. You won't even require to think, because now you have seen.

छोटे बच्चे हैं; मिर्ची लग गई। मम्मी भाग के आती है तो क्या करती है उसके मुँह में? ले, चीनी खा। ये सुख है। यह जीवन जीने की हमारी आम विधि रहती है। हमें सुख चाहिए ही इसीलिए होता है क्योंकि हम दुख में हैं। पर हम यह नहीं करते कि दुख के कारणों को ही समझ लें। जब दुख हो तो सुख की तरफ़ भागने की अपेक्षा दुख के कारणों की तरफ़ भागो, दुख के भीतर की ओर भागो। और वहाँ पता चलेगा दुख किसलिए है। पता चलते ही दुख घटना शुरू हो जाएगा। तुमने कुछ करा नहीं; तुमने सिर्फ़ जाना और जानने भर से दुख मिट गया।

As a doctor, can we limit our responsibility to the one particular body or to the set of few bodies that come to us for treatment? Or is the patient actually a representative of an entire society, an entire ecosystem? Can I really be a good doctor of the lungs, if I support a society that pollutes the environment in the name of development? So, if I'm a doctor, then health is my responsibility in the holistic sense, not just one patient.

दुख रोकना है, सुख को पकड़ो; वहीं दुख छिपा हुआ है। धोखा रोकना है, भरोसे को पकड़ो; वहीं धोखा छिपा हुआ है। चोट से बचना है, तो सहलाने वालों से बचो; वहीं से चोट आने वाली है। और चालाकी से बचना है, तो अपने भोलेपन को ध्यान से देखो; वहीं चालाकी छुपी हुई है। अज्ञान से बचना है, तो अपने ज्ञान को देखो; वहीं मूर्खता बैठी हुई है। और दुश्मनों से बचना है, तो दोस्तों से बचो। लूटने से बचना है, तो इकट्ठा करने से बचो।

It’s not going to be right when the patient starts playing the doctor. We need to grow up; and having a kid, in that sense, is an opportunity. You want to be of some use to the kid, then grow up with the kid.

ये समझना होता है कि past has a way of becoming the present. जो हमारी शरीर और मन की पूरी संरचना है, इस तरह से डिज़ाइन्ड नहीं है कि ये पास्ट को पास्ट में छोड़ दे। अगर पास्ट ही प्रेज़ेंट बन रहा है तो फ्रीडम कहाँ है? अतीत की कठपुतली बनने से मुक्त होने के लिए आपको चैतन्य प्रयास करना पड़ेगा। जो लोग वो चैतन्य प्रयास नहीं कर रहे, उन्हें ये दावा करने का कोई हक़ नहीं है कि वो फ़्री लाइफ़ जी रहे हैं। मुक्ति और क्या है? जो भी कीमत देनी पड़े, दो; पर जो स्वभाव नहीं है, उसको बर्दाश्त मत करो।

किस-किस की ज़िंदगी से कोई विदा हुआ है, जिसकी विदाई पर रोए थे? वो अभी भी उतना ही याद आता है जितना विदाई के चार महीने तक आता था? शरीर नहीं, तुम्हारी याद भी मिट जाएगी। तुम भी किसी को याद नहीं आने वाले, पागल। यही है भविष्य। खूबसूरत फंदों में फँसना सीखो। बस फंदा इस लायक होना चाहिए कि फँसा जाए। भगत सिंह ने भी फंदा ही तो चुना था, फंदा माने बंधन। पर वैसा बंधन चुनो तो क्या बात है! फिर उसके बाद शिकायत नहीं रह जाएगी कि ज़िंदगी रुखी है, बेरौनक है, ‘जिया नहीं जाता।’

हम सोचते हैं, हमारी जैसी चाहत है, ये सामने वाला व्यक्ति वैसा व्यवहार करे। वो आपकी चाहत के हिसाब से नहीं चलने वाला। आप चाहते रहो कुछ भी, कुछ भी चाहते रहो। एक ही बार में टूट जाने दो न दिल को, जग की मरनी क्यों मरे दिन में सौ-सौ बार। किसी को कुछ देना चाहते हो तो दे दो, उम्मीद क्यों कर रहे हो? और जहाँ आप सचमुच चाहते हो कि बदल जाए बंदा, अब लग गया है दिल, है कोई बात, नहीं छोड़ सकते ये कहकर कि जैसा पहले था, आगे भी वैसा ही रहेगा। जहाँ पर ये आपने रुख ले लिया हो, वहाँ पर साधन बस एक है। क्या? अध्यात्म।

ये मत कहिए कि पीछे से कुछ आ जाता है और आपको ले जाता है। जो सामने है, आप अपने आप को उससे बचा लेते हो। अगर आपने अपने आप को पूरा-पूरा जीवन को सौंप दिया होता, तो फिर कुछ बचता ही नहीं, जिसको भूत या भविष्य ले जाए। 'लैक ऑफ इंटरेस्ट' चाहिए और वो तब होता है, जब सामने कुछ होता है जो आपका पूरा अटेंशन ले ले। ज़िंदगी में जो ज़रूरी है, उसको स्वीकार करिए और उसमें कूद जाइए, फिर इधर-उधर की झंझटें ख़ुद ही याद आनी बंद हो जाएँगी।

पीछे हटने का मन क्या होता है? मन क्या होता है? मैंने कभी बोला मन करता है? मैंने कहा, पीछे हटने का फ़ैसला लेना चाहते हो स्वार्थवश। चाहते हो। “मन करता है,” तो बहुत छुपा-छुपाई वाला मुहावरा है। “मन कर रहा है,” मन क्या कर रहा है, बोलो, फ़ैसला ले रहा हूँ। “मन कर रहा है,” तो ऐसा लगता है जैसे किसी और के प्रभाव में आ गए हो, मन कोई और है। आप ही मन हो, बोलो, फ़ैसला ले रहा हूँ।

आकाश से कोई प्रत्यक्ष प्रेम नहीं कर सकता। आकाश से प्रेम है कि नहीं, वो बस इसी से पता चलेगा कि पिंजरे को देखकर आग उठती है कि नहीं, पिंजरे के प्रति विरोध, विद्रोह उठता है कि नहीं। वही प्रेम का सूचक है।

शराब पीने से, मूवी देखने से, कोई भी एंटरटेनमेंट से क्या होता है? आप थोड़ी देर के लिए सब भूल जाते हो, यही तो होता है। इसका मतलब आपके पास कुछ है भूलने लायक, अपनी ज़िंदगी बर्दाश्त नहीं हो रही। जब तक आप व्यक्तित्व और पूरे माहौल को ही नहीं बदलोगे, तब तक जो भी लत लगी हुई है, वो लगी रहेगी। कोई आपका बहुत-बहुत गहरे आनंद का क्षण हो, उसमें आप बेहोश होना चाहोगे क्या? उसमें तो आप नींद को भी भगा देते हो, भगाते हो कि नहीं?