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Separation

How to Get One's Ex-Girlfriend Back?
Maturity
How to Get One's Ex-Girlfriend Back?
9min
1.6kreads
24
5

Acharya Prashant: ‘How can I get my ex-girlfriend back?’ The question comes from Shubham. Shubham you will have to die (audience bursts into laughter). There is no other way, you will have to die.

You know, it was Kabir Sahab who said: ये तो घर है प्रेम का, खाला…

Attachment - the Absence of Love || AP Neem Candies
Relationship
Attachment - the Absence of Love || AP Neem Candies
2min
453reads
2

Acharya Prashant: Please, understand the nature of attachment. When two things get attached, do they disappear into each other ever? Attachment means continuity of separation. Attachment means that the two in spite of appearing proximate would still be separate. They would appear to be near but still they would continue…

Observation is security against hurt
Suffering
Observation is security against hurt
9min
313reads
4

Questioner: Acharya Ji, If we see things and move quickly, are we not observing them?

Acharya Prashant: See, it's like this when you're not observant and you look at something, you go back into your own world or into the thousands other worlds that you have, and then with a…

In the middle of your wounds, celebrate! || Acharya Prashant, on Saint Kabir (2017)
Bhagavad Gita
In the middle of your wounds, celebrate! || Acharya Prashant, on Saint Kabir (2017)
8min
478reads
6
1

Questioner (Q): I read some couplets by Saint Kabir and they touched me deeply. He wants to become one with God or Truth so much, but he is pained that he is unable to do that. At times I feel like meeting Him is the only thing left for me…

Tied to a bum || Neem Candies
Clarity
Tied to a bum || Neem Candies
1min
252reads

There can be nothing worse than being saddled with, being tied to, being chained to some general unworthy person in life. That’s the worst hell you can create for yourself. Don’t do that.

If life is benevolent enough to offer you a great great companion, nothing like it. But if…

Excerpts from Articles
Stuck Between Job Security and Your Real Passion?
Struggling to choose between a secure job and the path you actually feel drawn to? This isn't really a question about careers. It's about why other people's opinions have so much power over you in the first place. Real clarity doesn't come from finding the 'right' choice. It comes from honestly looking at your own fear, again and again, until it stops running the decision for you.
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फ़ालतू खर्च छोड़िए, अपनी ज़िंदगी पर खर्च करना सीखिए
आचार्य प्रशांत बताते हैं कि क्यों हम सही खान-पान, स्वास्थ्य और अपने ऊपर ज़रूरी खर्च से बचते हैं, लेकिन दिखावे और फ़ालतू सामाजिक परंपराओं पर पैसा बहा देते हैं। अधिकांश लोगों के लिए समस्या सिर्फ़ पैसों की कमी नहीं, बल्कि विवेक और सही प्राथमिकताओं की कमी भी है।
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अंधविश्वास असल में झूठ को स्वीकृति पाने की चाह है
एक पुजारी जो रोज़ भूत-प्रेत, तंत्र-मंत्र और वशीकरण के नाम पर आए लोगों से मिलता है, आचार्य प्रशांत से पूछता है: जब वो ख़ुद जानता है कि कुछ भूत-चुड़ैल नहीं होता, तो लोग बार-बार इसी झूठ की शरण में क्यों जाते हैं? जवाब अंधविश्वास से कहीं गहरा निकलता है — यह हमारे भीतर के उस झूठ की कहानी है, जिसे हम हर कीमत पर बचाना चाहते हैं।
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ज्योतिष कितना सच है? कुंडली, ग्रह-नक्षत्र: इनका क्या अर्थ है?
वेदांत को केवल इसलिए सही या श्रेष्ठ नहीं माना जा सकता कि वह किसी विशेष परंपरा से आता है। विज्ञान जहाँ भौतिक जगत की वस्तुनिष्ठ जाँच करता है, वहीं अद्वैत वेदांत सीधे मनुष्य के ‘मैं’, उसके दुख, बंधन और मुक्ति की पड़ताल करता है। इसकी कसौटी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं, बल्कि अपने जीवन में इसकी सच्चाई को देख पाना है। किसी दर्शन को मान लेना नहीं, बल्कि उससे स्वयं को मुक्त करना ही उसका वास्तविक उद्देश्य है।
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प्रूफ नहीं है, तो मानें क्यों?
अंधविश्वास या किसी दावे को केवल किताबों, परंपराओं या बड़ी-बड़ी हस्तियों के कहने से नहीं मानना चाहिए। भौतिक जगत से जुड़े हर दावे के लिए प्रमाण माँगना आवश्यक है। जो बात जाँची-परखी जा सकती है, उसे तर्क, प्रयोग और उपकरणों से जाना जाए; बिना जाने नहीं माना जाए। सच्ची जिज्ञासा वही है जो हर दावे के सामने प्रश्नचिह्न रखे और प्रमाण मिलने पर ही स्वीकार करे।
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Climate Change: The Solution Is a Choice
Climate change is more than an environmental crisis—it is a crisis of human choices. Our patterns of consumption, consumerism and endless pursuit of more are putting increasing pressure on the planet. But meaningful change does not necessarily begin with new technology or stricter policies. It begins with a deeper question: what are we willing to change within ourselves?
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कद नहीं, अपनी कहानी बदलो
कई तरह के डर—अकेले पड़ने, छवि खोने या छोटा समझे जाने—की जड़ अक्सर अतीत में बनी पहचान और कहानियों में होती है। शरीर की हाइट जैसी चीज़ों को समस्या मानकर उनसे जूझने के बजाय उनकी अप्रासंगिकता को समझकर आगे बढ़ना चाहिए। अतीत को दबाने से मुक्ति नहीं मिलती; उसके करीब जाकर अपनी स्मृतियों, धारणाओं और पुराने पैटर्न को निष्पक्षता से देखना ज़रूरी है।
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सपने, सरकारी नौकरी और पेंशन: जवानी किसके लिए है?
सपनों और सामाजिक प्रतिष्ठा के पीछे भागते हुए युवा अक्सर अपनी वास्तविक क्षमता, रुचि और वर्तमान चुनौतियों को देखना भूल जाते हैं। आईआईटी, यूपीएससी, सरकारी नौकरी और पेंशन को जीवन का लक्ष्य मान लेने के बजाय ज़रूरी है आत्मज्ञान—ख़ुद को ईमानदारी से परखना। जवानी भविष्य की सुरक्षा की चिंता में नहीं, आज की वास्तविक चुनौतियों से जूझने और सार्थक कर्म में लगनी चाहिए।
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रक्षाबंधन: वो रक्षा माँग रही है - ज़रा सुनिए
रक्षाबंधन केवल भाई-बहन के रिश्ते और सुरक्षा की रस्म तक सीमित नहीं होना चाहिए। आज असली रक्षा उन चीज़ों की ज़रूरत है जो कमज़ोर और संकट में हैं—गौरैया, नदियाँ, पहाड़, पेड़, महासागर और पृथ्वी। साथ ही ईमानदारी, आत्मज्ञान और मानवीय मूल्यों की भी रक्षा जरूरी है। धर्म कर्मकांड नहीं, अपनी शक्ति और उससे जुड़ी व्यापक ज़िम्मेदारी को समझना है।
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जो खुद आज़ाद नहीं, वह लोकतंत्र को मजबूत कैसे करेगा?
लोकतंत्र, गणतंत्र और स्वतंत्रता केवल संविधान में लिखे शब्द नहीं, बल्कि जागरूक नागरिक की चेतना पर निर्भर हैं। वास्तविक स्वतंत्रता मनमानी करने की छूट नहीं, बल्कि भीतर घुसे भय, लालच, अंधविश्वास, पूर्वाग्रह और बाहरी प्रभावों से मुक्ति है। जब नागरिक अपने ही विचारों और मान्यताओं की जाँच नहीं करता, तो लोकतंत्र भीड़तंत्र और संप्रभुता खोखली बन सकती है।
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दुनिया से कट गई हूँ || आचार्य प्रशांत, वेदांत महोत्सव ऋषिकेश में (2022)
Loneliness
दुनिया से कट गई हूँ || आचार्य प्रशांत, वेदांत महोत्सव ऋषिकेश में (2022)
19min
238reads
4

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी को नमन, सर मैं आपका बहुत-बहुत धन्यवाद करना चाहूँगी कि आपने जो कुछ सिखाया है वो बहुत अमूल्य है और सर मैं बहुत बड़ी प्रशंसक हूँ, आपकी समर्पित प्रशंसक हूँ और सर मैं, जीवन में आपने जो कुछ सिखाया है वो पहले किसी ने बताया होता तो…

ईश्वर कैसे मिलेंगे? || आचार्य प्रशांत (2020)
Truth
ईश्वर कैसे मिलेंगे? || आचार्य प्रशांत (2020)
6min
348reads
1
1

प्रश्नकर्ता: नमस्ते सर, बहुत लम्बे समय तक कई वर्ष मैंने ध्यान की विधियों का प्रयोग करा, उसके बाद ईश्वर ने मुझे ओशो जी के पास भेज दिया और अन्ततः ओशो जी से ईश्वर ने मुझे आपके पास भेज दिया। तो अब आप ही मुझे बताइए कि मुझे ईश्वर कैसे मिलें।…

सच इतना डरा हुआ क्यों है? || आचार्य प्रशांत (2020)
Truth
सच इतना डरा हुआ क्यों है? || आचार्य प्रशांत (2020)
11min
99reads

आचार्य प्रशांत: सच इतना डरा हुआ क्यों है? सच इतना डरा हुआ इसलिए है, क्योंकि घपला कर बैठा है। “लागा चुनरी में दाग़ छुपाऊँ कैसे”।

किसी को जब मारना होता है तो आमतौर पर उसको मारने के लिए शुद्ध ज़हर का इस्तेमाल नहीं किया जाता। काला, दहकता, गरल हो विष,…

देह है तो वियोग रहेगा || आचार्य प्रशांत, भक्त मीराबाई पर (2017)
Suffering
देह है तो वियोग रहेगा || आचार्य प्रशांत, भक्त मीराबाई पर (2017)
9min
889reads
6
2

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, कहा जाता है कि मीरा जी को कृष्ण मिल गये थे, फिर भी वो वियोग के गीत क्यों गाती थीं?

आचार्य प्रशांत: क्योंकि शरीर है अभी भी। क्योंकि मीरा अभी मीरा है। जब तक शरीर रहेगा उनके पास, तब तक पूर्णतया कृष्ण न हो पाएँगी। तो जब…

वासना और वैराग्य || (2017)
Lust
वासना और वैराग्य || (2017)
10min
463reads
4
1

प्रश्नकर्ता: संसार में प्राणी मरने के लिए ही उत्पन्न होता है और उत्पन्न होने के लिए ही मरता है। उत्पन्न होने के लिए मरना क्या है?

आचार्य प्रशांत: मरते नहीं न पूरा, रीचार्जिंग (पुनः ऊर्जा प्राप्त करना) पर जाते हैं। हमारी मौत थोड़े ही होती है। हमारा तो ऐसा होता…

प्रेमिका छोड़ कर चली गयी? || (2019)
Separation
प्रेमिका छोड़ कर चली गयी? || (2019)
2min
328reads
4

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मेरी प्रेमिका मुझे कल ही छोड़कर चली गयी। दर्द में हूँ। क्या करूँ?

आचार्य प्रशांत: दूसरी खोज लो!

जब प्रश्न के केंद्र पर प्रेमिका बैठी है, तो तुम्हारी उत्सुकता प्रेमिका से आगे की है ही नहीं न। ये खेल चलता रहेगा – कभी एक से जुड़ोगे, कभी…

सतह पर जुड़ते हो, इसलिए बिछुड़ने में दर्द होता है || आचार्य प्रशान्त (2016)
Suffering
सतह पर जुड़ते हो, इसलिए बिछुड़ने में दर्द होता है || आचार्य प्रशान्त (2016)
20min
257reads
1

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी एक प्रश्न है, “आसक्ति से कैसे बचा जाए?”

आचार्य प्रशांत: क्यों बचा जाए?

श्रोता१: क्योंकि वो नुकसान दे सकती है आपको।

आचार्य प्रशांत : कैसे नुकसान देती है?

श्रोता१: जब आपसे अलग हो जाएगी।

आचार्य प्रशांत : इसमें ये कहाँ पर है कि आसक्ति का मतलब है…

रात गयी बात गयी || आचार्य प्रशांत, युवाओं के संग (2013)
Relationship
रात गयी बात गयी || आचार्य प्रशांत, युवाओं के संग (2013)
5min
356reads
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1

श्रोता: मैं जब बारहवीं क्लास में था तो उस समय मैंने पढाई में दिलचस्पी नहीं रखी, न ही परिवार से बहुत मतलब रखा। मतलब उस समय मैं कुछ भी नहीं सोचता था। जो मन में आता था वो करता था। और उस समय मुझे लगता था कि सब लोग…

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Struggling to choose between a secure job and the path you actually feel drawn to? This isn't really a question about careers. It's about why other people's opinions have so much power over you in the first place. Real clarity doesn't come from finding the 'right' choice. It comes from honestly looking at your own fear, again and again, until it stops running the decision for you.

कद नहीं, अपनी कहानी बदलो
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कई तरह के डर—अकेले पड़ने, छवि खोने या छोटा समझे जाने—की जड़ अक्सर अतीत में बनी पहचान और कहानियों में होती है। शरीर की हाइट जैसी चीज़ों को समस्या मानकर उनसे जूझने के बजाय उनकी अप्रासंगिकता को समझकर आगे बढ़ना चाहिए। अतीत को दबाने से मुक्ति नहीं मिलती; उसके करीब जाकर अपनी स्मृतियों, धारणाओं और पुराने पैटर्न को निष्पक्षता से देखना ज़रूरी है।

क्या सच में भूत होते हैं?
Fear
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भूतों का डर अक्सर किसी वास्तविक भूत से नहीं, बल्कि हमारी कल्पना, डर और सस्ते रोमांच की चाह से पैदा होता है। भूतिया फ़िल्में और कहानियाँ मन में ऐसी धारणाएँ बना देती हैं कि साधारण चीज़ें भी डरावनी लगने लगती हैं। डर से भागने के बजाय उसके आधार पर प्रश्न करना चाहिए। सस्ते रोमांच के बजाय ज्ञान, इतिहास और सार्थक चुनौतियों में वास्तविक आनंद और उत्साह खोजना अधिक उपयोगी है।

God vs Ghosts: Truth or Imagination?
Fear
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Spirituality does not replace the fear of ghosts with belief in God. It asks us to question the mind that creates both fear and belief. Ghosts, gods, and stories can all become projections of imagination. The spiritual path begins by dropping assumptions, investigating “Who am I?” and understanding the source of suffering. With attention, right knowledge, and self-inquiry, fear loses its power and one becomes inwardly free.

Why Does Love Hurt So Much?
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Why Does Love Hurt So Much?
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A true relationship is not built on need, possession, or emotional dependence, but on a shared commitment to Truth and inner growth. A worthy companion reflects your reality like a mirror rather than performing a role to please you. Real love is effortless, rooted in one's nature, not expectations. When your highest commitment is to excellence and Truth, relationships become a natural outcome—not the purpose of life itself.

क्या डर को हराया जा सकता है?
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डर वास्तविकता से नहीं, बल्कि अस्पष्टता और कल्पना से ताक़त पाता है। वह कभी स्पष्ट नहीं बताता कि किस बात का भय है, बल्कि धुंधले संकेतों से मन को विचलित करता रहता है। डर से भागने के बजाय उसे सामने बुलाकर उसके हर दावे से स्पष्टता माँगनी चाहिए। जैसे ही भय को सटीक होने के लिए मजबूर किया जाता है, उसकी शक्ति समाप्त होने लगती है, क्योंकि उसका पूरा अस्तित्व भ्रम और धुंध पर टिका होता है।

बाहर निकली तो बच्चों का क्या होगा?
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अहंकार भावनाओं से नहीं, बल्कि उनके उपयोग से पहचाना जाता है। आँसू, मुस्कान या कोई भी भावना अपने आप में न अच्छी होती है, न बुरी। समस्या तब शुरू होती है जब अहंकार उन्हें लाभ, छवि या स्वार्थ के साधन में बदल देता है। यदि रोना किसी परिणाम, सहानुभूति या लाभ से जुड़ा है, तो वह प्रोग्राम्ड इमोशन है। शुद्ध भावना सहज होती है; अहंकार हर भावना को अपने हित के अनुसार मोड़ देता है।

आप दुखी नहीं… आपको दुख में मज़ा आता है!
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आप दुखी नहीं… आपको दुख में मज़ा आता है!
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समझदारी याददाश्त से नहीं, समझ से आती है। जीवन हर पल नए प्रश्न पूछता है, इसलिए रटे हुए उत्तर नहीं चलते। जानकारी बाहर से मिल सकती है, पर सही उत्तर तभी जन्म लेते हैं जब मन वर्तमान में पूरी तरह उपस्थित हो। जो समझ में न आए उसे रटने के बजाय प्रश्न करो, जिज्ञासु बने रहो। सीखने का सार स्मृति नहीं, जागरूकता, समझ और वर्तमान क्षण में जीने की क्षमता है।

बच्ची का सवाल: मुझे इतना डर क्यों लगता है?
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डर बोलने से नहीं, बल्कि दूसरों की राय और अपनी छवि खोने के भय से पैदा होता है। जब हम अपनी पहचान को लोगों की स्वीकृति पर टिका देते हैं, तब साधारण काम भी कठिन लगने लगता है। गलती करना गलत होना नहीं है; गलती सीखने का अवसर है, पहचान नहीं। आत्मनिर्भरता, आत्मसम्मान और दूसरों की राय से मुक्त होकर ही व्यक्ति निडर होकर बोल सकता है और आत्मविश्वास के साथ जीवन जी सकता है।

मन को एकाकी रखने से क्या आशय है?
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मन को एकाकी रखने से क्या आशय है?
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मन को संसार, लोगों और वस्तुओं से नहीं, सत्य में स्थिर रखना ही वास्तविक एकांत है। अकेलापन शरीर का नहीं, मन का होता है। जब मन दुनिया से पाने की आशा छोड़ देता है, तभी वह मुक्त होता है। वस्तुओं और रिश्तों का आकर्षण भी अंततः भोग की इच्छा से ही पैदा होता है, जबकि सच्चा प्रेम केवल सत्य, मुक्ति या श्रीकृष्ण के प्रति हो सकता है। संसार से आशा दुःख देती है, इसलिए मन को केवल सत्य की ओर लगाना ही योग है।

सुबह के लिए प्रार्थना
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सुबह के लिए प्रार्थना
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Truth Behind Acharya Prashant’s 60 Million Subscribers
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Truth Behind Acharya Prashant’s 60 Million Subscribers
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Sixty million followers do not necessarily indicate a transformation in consciousness. Large numbers may reflect persistent outreach rather than deep commitment. Truth is often avoided not through opposition but through indifference, convenience, and self-deception. Real change requires sustained effort, inner honesty, testing one's understanding, and the courage to face uncomfortable truths instead of seeking comfort, validation, or easy inspiration.

Why We Cling To What Hurts Us?
Fear
Why We Cling To What Hurts Us?
18min
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Fear, social conditioning, and painful memories often shape how people live and make choices. True growth begins by questioning inherited beliefs, refusing to remain trapped by past wounds, and acting from understanding rather than conformity. What appears to be sacrifice is often just the abandonment of conditioned habits. Freedom comes not from external systems, but from the courage to see clearly, learn, and move beyond fear.

कितनी रेत
Poems
कितनी रेत
1min
264reads
314
1

समुद्र के लिए ही यहाँ आया समुद्र से ही मेरा आखिरी नाता

पर आज सुबह से व्यस्त रहा रेतीले मसले ये गिनती वो घाटा

साँझ अब जब तट पर आया समुद्र लहराता बोला मुस्कुराता

रेत के कणों में मन फँस जाता रेत गिनते सूरज ढ़ल जाता

रेत का कण विशाल…

माँ-बाप के प्रति कर्तव्य
Family
माँ-बाप के प्रति कर्तव्य
10min
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माता-पिता को, दोस्त-यारों को, परिवार के जो भी लोग हों, इनसे अगर प्रेम है, तो इन्हें जो ऊँची से ऊँची चीज़ है, वही देना चाहोगे न। उच्चतम क्या है? बोध है, चेतना है, ज्ञान है। वो दीजिए न घर वालों को। माँ-बाप ने आपको शारीरिक जन्म दिया। अब आप अपने माँ-बाप को आध्यात्मिक जन्म दीजिए। ये हुई बराबरी। तुम जो मेरे लिए अधिकतम कर सकते थे, तुमने किया। और अपनी चेतना के तल पर, जो मैं तुम्हारे लिए अधिकतम कर सकता हूँ, वो मैं करूँगा।

मौत याद रखो, मौज साथ रखो
Fear
मौत याद रखो, मौज साथ रखो
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दुनिया में मुझे बताना, कौन-सी चीज़ है जो कभी नष्ट नहीं हुई? सभ्यताएँ मिट गईं, संस्कृतियाँ बह गईं, धर्म ख़ाक हो गए; आदमी का बनाया कुछ भी नहीं बचता। जो चीज़ हमें पता है कि मरण-धर्मा है, वह मिट ही जाएगी; उससे पहले उसका उपयोग चेतना को बढ़ाने के लिए कर डालो। हर पल में ऐसे सतर्क रहो, जैसे यही बस एक पल हो। जिसने मृत्यु और मृत्यु की अनिवार्यता को स्वीकार कर लिया, जो मौत के होश में जीने लगा, उससे ज़्यादा मस्त कोई नहीं जीता। मौत को लगातार याद रखो, तब मौज आएगी!

अतीत की गलतियों को कैसे सुधारें?
Guilt
अतीत की गलतियों को कैसे सुधारें?
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कोई रिश्ता गड़बड़ है, यह जानने के लिए बस यह देख लो कि क्या उसमें मुखौटे पहनने पड़ते हैं। और यदि मुखौटे उतारने पर रिश्ता टूटने लगे, तो समझ लीजिए वह रिश्ता वास्तविक नहीं था। ​ उसने आपसे रिश्ता बनाया, उसने आपकी छवि से रिश्ता बनाया है। और आपकी छवि आप हैं नहीं, तो माने, उसका आपसे कोई रिश्ता है नहीं। फिर तो डर में ही जीना पड़ेगा, क्योंकि छवियाँ काल्पनिक होती हैं। जैसे ही यथार्थ आकर एक धक्का मारेगा, सारी छवियाँ टूट जाएँगी। इससे बेहतर यही है कि बेबाकी से सच में जिएं ‌।

वास्तविक ग्लानि हमें कहाँ होती है?
Guilt
वास्तविक ग्लानि हमें कहाँ होती है?
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आदमी कहता है, “मैं ठीक हूँ। बस हालात कुछ ऐसे बने कि मैं फिसल गया।” ग्लानि सिद्ध करती है कि तुम आदमी बढ़िया हो; बस संयोग से असफल रह गए। तुम्हारी ग्लानि ये थोड़ी है कि तुम आदमी ही गड़बड़ हो। तुम्हारा केंद्र ही गड़बड़ है। तुम्हारी ग्लानि तो धोखे से मिस्टेक वाली होती है। वास्तविक ग्लानि तो अग्नि होती है। तुम बचोगे ही नहीं जैसे हो, अगर ग्लानि हो जाए तो।

अज्ञात भविष्य का डर?
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अगर एक कमरा खाली है, उसमें मुझे घुसने से डर लग रहा है, तो इसका मतलब ये है कि कमरा अज्ञात नहीं छोड़ा मैंने। मैंने उसके ऊपर अपनी ज्ञात कल्पनाएँ डाल दीं, और अब मैं कह रहा हूँ कि इस कमरे के भीतर शेर है, या चोर है, या भूत है, या कुछ है। अगर आप भविष्य को अज्ञात का अज्ञात ही रहने दें, तो डर कहाँ से आएगा? ये होता है आत्म-अवलोकन, कि पीछे जाकर देखना कि ये जो एंड प्रॉडक्ट निकला है, फियर नाम का, ये किन-किन चीज़ों के कॉम्बिनेशन से आ रहा है। और आप जैसे ही ये देख लेते हो, आज़ाद हो जाते हो।

ज़िंदगी में मुश्किलें रहेंगी, कोई बात नहीं
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ज़िंदगी में मुश्किलें रहेंगी, कोई बात नहीं
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इंसान होने का मतलब ही है बहुत कुछ होगा जो तुम्हारे सामर्थ्य से बाहर का होगा। एक चीज़ है तुम्हारे हक़ में। क्या? घटना कुछ भी घट रही हो, उस घटना को उत्तर क्या देना है। तुम्हारा प्रतिसाद, तुम्हारी प्रतिक्रिया, ये तुम्हारे अधिकार में हो सकते हैं। बिल्कुल संभव है कि बाहर बड़ी से बड़ी कठिनाई हो, कष्ट हो; भीतर तुम्हारे एक अस्पर्शित शांति बनी ही रहे। जो ऐसा कर ले गया, वो न सिर्फ़ जी गया, वो जीवन के पार निकल गया। सिर्फ़ उसी का जीवन सार्थक हुआ।

One Realization That Ends All Attachment
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The other must exist in your life, and vice versa, only for the sake of internal elevation, to make you into a better person. Don't you see the impact the other one is having on your life? Seeing is the key. What does seeing mean? Seeing implies understanding. See and ask yourself: What is the impact upon me? And if you see that, you'll just push it aside. It will be spontaneous. You won't even require to think, because now you have seen.

दुख के कारण को समझो
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छोटे बच्चे हैं; मिर्ची लग गई। मम्मी भाग के आती है तो क्या करती है उसके मुँह में? ले, चीनी खा। ये सुख है। यह जीवन जीने की हमारी आम विधि रहती है। हमें सुख चाहिए ही इसीलिए होता है क्योंकि हम दुख में हैं। पर हम यह नहीं करते कि दुख के कारणों को ही समझ लें। जब दुख हो तो सुख की तरफ़ भागने की अपेक्षा दुख के कारणों की तरफ़ भागो, दुख के भीतर की ओर भागो। और वहाँ पता चलेगा दुख किसलिए है। पता चलते ही दुख घटना शुरू हो जाएगा। तुमने कुछ करा नहीं; तुमने सिर्फ़ जाना और जानने भर से दुख मिट गया।

What Is A Doctor’s Responsibility?
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As a doctor, can we limit our responsibility to the one particular body or to the set of few bodies that come to us for treatment? Or is the patient actually a representative of an entire society, an entire ecosystem? Can I really be a good doctor of the lungs, if I support a society that pollutes the environment in the name of development? So, if I'm a doctor, then health is my responsibility in the holistic sense, not just one patient.

प्यार, मासूमियत, भोलापन - या छिपी हुई चालाकी?
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प्यार, मासूमियत, भोलापन - या छिपी हुई चालाकी?
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दुख रोकना है, सुख को पकड़ो; वहीं दुख छिपा हुआ है। धोखा रोकना है, भरोसे को पकड़ो; वहीं धोखा छिपा हुआ है। चोट से बचना है, तो सहलाने वालों से बचो; वहीं से चोट आने वाली है। और चालाकी से बचना है, तो अपने भोलेपन को ध्यान से देखो; वहीं चालाकी छुपी हुई है। अज्ञान से बचना है, तो अपने ज्ञान को देखो; वहीं मूर्खता बैठी हुई है। और दुश्मनों से बचना है, तो दोस्तों से बचो। लूटने से बचना है, तो इकट्ठा करने से बचो।

You Want to Save Your Child? First, Let It Hurt – Children’s Day Special
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It’s not going to be right when the patient starts playing the doctor. We need to grow up; and having a kid, in that sense, is an opportunity. You want to be of some use to the kid, then grow up with the kid.

अतीत की कठपुतली नहीं बनना है
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ये समझना होता है कि past has a way of becoming the present. जो हमारी शरीर और मन की पूरी संरचना है, इस तरह से डिज़ाइन्ड नहीं है कि ये पास्ट को पास्ट में छोड़ दे। अगर पास्ट ही प्रेज़ेंट बन रहा है तो फ्रीडम कहाँ है? अतीत की कठपुतली बनने से मुक्त होने के लिए आपको चैतन्य प्रयास करना पड़ेगा। जो लोग वो चैतन्य प्रयास नहीं कर रहे, उन्हें ये दावा करने का कोई हक़ नहीं है कि वो फ़्री लाइफ़ जी रहे हैं। मुक्ति और क्या है? जो भी कीमत देनी पड़े, दो; पर जो स्वभाव नहीं है, उसको बर्दाश्त मत करो।

जिया नहीं जाता
Suffering
जिया नहीं जाता
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किस-किस की ज़िंदगी से कोई विदा हुआ है, जिसकी विदाई पर रोए थे? वो अभी भी उतना ही याद आता है जितना विदाई के चार महीने तक आता था? शरीर नहीं, तुम्हारी याद भी मिट जाएगी। तुम भी किसी को याद नहीं आने वाले, पागल। यही है भविष्य। खूबसूरत फंदों में फँसना सीखो। बस फंदा इस लायक होना चाहिए कि फँसा जाए। भगत सिंह ने भी फंदा ही तो चुना था, फंदा माने बंधन। पर वैसा बंधन चुनो तो क्या बात है! फिर उसके बाद शिकायत नहीं रह जाएगी कि ज़िंदगी रुखी है, बेरौनक है, ‘जिया नहीं जाता।’

कोई भी आपकी उम्मीदों के हिसाब से नहीं चलेगा
Suffering
कोई भी आपकी उम्मीदों के हिसाब से नहीं चलेगा
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हम सोचते हैं, हमारी जैसी चाहत है, ये सामने वाला व्यक्ति वैसा व्यवहार करे। वो आपकी चाहत के हिसाब से नहीं चलने वाला। आप चाहते रहो कुछ भी, कुछ भी चाहते रहो। एक ही बार में टूट जाने दो न दिल को, जग की मरनी क्यों मरे दिन में सौ-सौ बार। किसी को कुछ देना चाहते हो तो दे दो, उम्मीद क्यों कर रहे हो? और जहाँ आप सचमुच चाहते हो कि बदल जाए बंदा, अब लग गया है दिल, है कोई बात, नहीं छोड़ सकते ये कहकर कि जैसा पहले था, आगे भी वैसा ही रहेगा। जहाँ पर ये आपने रुख ले लिया हो, वहाँ पर साधन बस एक है। क्या? अध्यात्म।

अतीत की यादें और भविष्य का डर
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अतीत की यादें और भविष्य का डर
6min
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ये मत कहिए कि पीछे से कुछ आ जाता है और आपको ले जाता है। जो सामने है, आप अपने आप को उससे बचा लेते हो। अगर आपने अपने आप को पूरा-पूरा जीवन को सौंप दिया होता, तो फिर कुछ बचता ही नहीं, जिसको भूत या भविष्य ले जाए। 'लैक ऑफ इंटरेस्ट' चाहिए और वो तब होता है, जब सामने कुछ होता है जो आपका पूरा अटेंशन ले ले। ज़िंदगी में जो ज़रूरी है, उसको स्वीकार करिए और उसमें कूद जाइए, फिर इधर-उधर की झंझटें ख़ुद ही याद आनी बंद हो जाएँगी।

परिवार विरोध करे तो आगे कैसे बढ़ें?
Family
परिवार विरोध करे तो आगे कैसे बढ़ें?
22min
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पीछे हटने का मन क्या होता है? मन क्या होता है? मैंने कभी बोला मन करता है? मैंने कहा, पीछे हटने का फ़ैसला लेना चाहते हो स्वार्थवश। चाहते हो। “मन करता है,” तो बहुत छुपा-छुपाई वाला मुहावरा है। “मन कर रहा है,” मन क्या कर रहा है, बोलो, फ़ैसला ले रहा हूँ। “मन कर रहा है,” तो ऐसा लगता है जैसे किसी और के प्रभाव में आ गए हो, मन कोई और है। आप ही मन हो, बोलो, फ़ैसला ले रहा हूँ।

आसमान चाहिए तो पिंजरे से नफ़रत करना सीखो!
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आसमान चाहिए तो पिंजरे से नफ़रत करना सीखो!
10min
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आकाश से कोई प्रत्यक्ष प्रेम नहीं कर सकता। आकाश से प्रेम है कि नहीं, वो बस इसी से पता चलेगा कि पिंजरे को देखकर आग उठती है कि नहीं, पिंजरे के प्रति विरोध, विद्रोह उठता है कि नहीं। वही प्रेम का सूचक है।

एडिक्शन छोड़ना मुश्किल क्यों?
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एडिक्शन छोड़ना मुश्किल क्यों?
7min
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शराब पीने से, मूवी देखने से, कोई भी एंटरटेनमेंट से क्या होता है? आप थोड़ी देर के लिए सब भूल जाते हो, यही तो होता है। इसका मतलब आपके पास कुछ है भूलने लायक, अपनी ज़िंदगी बर्दाश्त नहीं हो रही। जब तक आप व्यक्तित्व और पूरे माहौल को ही नहीं बदलोगे, तब तक जो भी लत लगी हुई है, वो लगी रहेगी। कोई आपका बहुत-बहुत गहरे आनंद का क्षण हो, उसमें आप बेहोश होना चाहोगे क्या? उसमें तो आप नींद को भी भगा देते हो, भगाते हो कि नहीं?

क्या हम त्योहारों का असली अर्थ समझते हैं?
Shri Ramcharitra Manas
क्या हम त्योहारों का असली अर्थ समझते हैं?
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प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, आज दीवाली है, मेरे मन में ये प्रश्न आ रहा है कि क्या हम त्योहारों को उनके सही अर्थों में मनाते भी हैं या नहीं?

आचार्य प्रशांत: अगर धर्म वास्तव में ये है - ईमानदार, बोधपूर्ण, एकांत तो ये दिन (त्योहार) हमें और धार्मिक बनाते हैं या…

जिस तन लगिया इश्क़ कमाल || आचार्य प्रशांत, बाबा बुल्लेशाह पर (2018)
Baba Bulleh Shah
जिस तन लगिया इश्क़ कमाल || आचार्य प्रशांत, बाबा बुल्लेशाह पर (2018)
17min
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जिस तन लगिआ इश्क़ कमाल,

नाचे बेसुर ते बेताल | टेक |

दरदमंद नूं कोई न छेड़े,

जिसने आपे दुःख सहेड़े,

जम्मणा जीणा मूल उखेड़े,

बूझे अपणा आप खिआल

जिसने वेस इश्क़ दा कीता,

धुर दरबारों फ़तवा लीता,

जदों हजूरों प्याला पीता,

कुछ ना रहा सवाल जवाब

जिसदे अन्दर वस्स्या…

मेरे पास दुख नहीं है, तो फिर अध्यात्म में क्यों आऊँ?
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मेरे पास दुख नहीं है, तो फिर अध्यात्म में क्यों आऊँ?
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ऐसा कोई नहीं होता, जिसके जीवन में दुख न हो। हम पैदा ही दुख में होते हैं। दुख एक डिफ़ॉल्ट स्टेट है, जो सबकी ज़िंदगी में होगा ही होगा। यह और ज़्यादा ख़तरनाक बात है कि दुख है, लेकिन या तो आपने उसको दबा रखा है, या आप उसके ऑपोज़िट एंड, सुख पर जाकर किसी तरीके से बचने की कोशिश करते रहते हैं। कोई बोले, “मेरे पास दुख नहीं है, तो मैं अध्यात्म में क्यों आऊँ?” तो उसको फिर अपनी ज़िंदगी का पता ही नहीं है कि उसको कितना दुख है।

सोशल एंग्ज़ायटी कैसे दूर करें?
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सोशल एंग्ज़ायटी कैसे दूर करें?
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सोशल एंग्ज़ायटी इसलिए है क्योंकि तुम्हारे पास जो है, वो बस सोशल ही सोशल है — सोशल मीडिया, सोशल इन्फ्लुएंसर्स, सोशल लाइफ़। ये जितने लोग जो तुम्हारे रोल मॉडल बने हैं, ये सब तुम्हें जीने के गलत तरीकों से लगातार भरे हुए हैं; उनको बर्ख़ास्त करो। अपने सामान्य ज्ञान को गहरा करो। विज़डम लिटरेचर और साधारण आध्यात्मिक कहानियों से होते हुए उपनिषदों तक पहुँचो। वो डर का आख़िरी इलाज है।

जीवन का उद्देश्य: अस्तित्ववाद से अध्यात्म तक
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जीवन का उद्देश्य: अस्तित्ववाद से अध्यात्म तक
65min
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"हम बंधन में हैं, बंधन ही दुख है और जिज्ञासा उस दुख के पार जाने का उपाय है। अस्तित्ववादी विचारकों ने कहा था कि वास्तव में एक ही प्रश्न है — “To be, or not to be?” दुख इतना है कि इसके साथ जिएँ भी या न जिएँ? फिर कामू इसका उत्तर देते हैं, “जीना तो ऐसे ही पड़ेगा, बस अपनी हालत पर हँसकर जियो।” जो कुछ भी हो रहा है, उसे समझना तुम्हारा दायित्व है। जब समझकर सहते हो तो मुस्कुराहट आ जाती है। श्रीकृष्ण कहते हैं, “इस जीवन में जो इंसान प्राकृतिक वेगों को तितिक्षा से सहने में सक्षम हो जाता है, वह जीवन-मुक्त है।”

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