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वासना और वैराग्य || (2017)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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प्रश्नकर्ता: संसार में प्राणी मरने के लिए ही उत्पन्न होता है और उत्पन्न होने के लिए ही मरता है। उत्पन्न होने के लिए मरना क्या है?

आचार्य प्रशांत: मरते नहीं न पूरा, रीचार्जिंग (पुनः ऊर्जा प्राप्त करना) पर जाते हैं। हमारी मौत थोड़े ही होती है। हमारा तो ऐसा होता है कि एक बार को जितनी बैटरी लेकर आए थे वो चुक गई, तो फिर थोड़ी देर के लिए मोबाइल बंद हो जाता है। वो लग जाता है रीचार्जिंग में, थोड़ी देर में फिर उसमें प्राण आ जाएँगे और भीतर की जो सारी व्यवस्था है, हार्डवेयर , सॉफ्टवेयर , सब वही। ऊपर-ऊपर से कवर (आवरण) बदल जाता है, क्या बोलते हैं उसे, गोरिल्ला-ग्लास (शीशे का एक प्रकार) लगा देते हैं। क्यों भई? सॉफ्टवेयर थोड़ा बदल दिया, नई ऐप (अनुप्रयोग) डाल दी, मूलतः मामला वही है।

प्र: अच्छा ये जैसे बार-बार मरना-जीना, इसका एक ही लाइफ (जीवन) में क्या रेलेवेंस (प्रासंगिकता) है? इसका मतलब ये तो नहीं है कि नई-नई उम्मीदें पैदा होती हैं?

आचार्य: इसका मतलब ये है रोज़ सुबह दोबारा खड़े हो जाते हो।

प्र१: वही हरकत करने के लिए।

प्र२: फिर नई चीज़ से शुरुआत के लिए।

आचार्य: फिर रोज़ रात में गिरते हो, फिर अगले दिन फिर खड़े हो जाते हो, मानते ही नहीं। वैराग्य का मतलब होता है कि दुःख से बचने के लिए जिसको तलाश रहे हो, जिसको पकड़ रहे हो, जिसके पीछे भागे हो, वो और बड़ा दुःख है। समझ रहे हो?

वैराग्य संसार से नहीं होता, वैराग्य अपनी हरकतों से होता है। इस दीवार से वैराग्य लेकर क्या करोगे? संसार तो यही है न? पत्थर-पानी, पत्थर-पानी से वैराग्य लेकर क्या करोगे? हाँ, पत्थर-पानी के प्रति जो भावना है तुम्हारी, वो दु:ख देती है। वो दु:ख इसलिए देती है कि तुम्हें लगता है दु:ख का विकल्प सुख है। इसीलिए अक्सर वैराग्य उन लोगों के लिए ज़्यादा सहज हो जाता है जो सुख के करीब जा पाते हैं। जिन्होंने सुख देख लिया, उनके लिए वैराग्य कई बार अपेक्षाकृत सरल हो जाता है।

अर्थ समझ रहे हो वैराग्य का? दुःख से बचने के लिए जिसकी ओर भाग रहे हो वो और बड़ा दुःख है, ये वैराग्य है, कि, “अब किससे राग रखें भाई?” फिर राग-विराग दोनों एक साथ तिरोहित होते हैं, ये वास्तविक वैराग्य है। जाएँ तो जाएँ कहाँ? कोई उम्मीद नहीं, कोई आसरा नहीं, अब वैराग्य है। अब दीवार दीवार है, पत्थर पत्थर है, पानी पानी है।

चीज़ें थोड़े ही तुम्हारा कोई नुक़सान करती हैं। आदमी, औरत ये तुम्हारा थोड़े ही कोई नुक़सान करते हैं। इनके प्रति जो रुख रखते हो न, भावना, ऐटिट्यूड (रवैया), जब उससे पीछा छूटता है, जब उसकी व्यर्थता दिखती है तो उसे वैराग्य कहते हैं। कि प्रसन्ना (पास बैठे एक श्रोता) जाए जंगल, और बंदर दौड़ा ले। तो बंदर से बचने के लिए...

प्र: पेड़ पर चढ़ जाए।

आचार्य: पेड़ पर चढ़े। बंदर से बचने के लिए पेड़ पर चढ़ रहा है। और वहाँ क्या मिले?

श्रोतागण: और बंदर।

आचार्य: तो ऐसा होता है आम संसारी।

श्रोता: ऊपर बंदर नीचे बंदर।

आचार्य: कि कोई छोटा-मोटा गीदड़-सियार दौड़ा ले, उससे बचने के लिए, कहे,“ ये बढ़िया गुफा मिली, इसमें सुरक्षा है।" अंदर गीदड़ का बागूची बैठा हुआ है। ये होता है संसारी, जो बंदर से बचने के लिए पेड़ पर चढ़ता है और गीदड़ से बचने के लिए शेर की गुफा में घुसता है। दु:ख से बचने के लिए सोचता है सुख की ओर जा रहा है, वास्तव में छोटे दु:ख से बचने के लिए बड़े दु:ख की ओर जा रहा होता है। बड़ा दु:ख चूँकि अभी दूर है इसीलिए उसका नाम होता है?

श्रोतागण: सुख।

आचार्य: सुख। तो जो दु:ख निकट हो वो दु:ख हुआ, और जो दु:ख दूर हो?

श्रोतागण: वो सुख हुआ।

आचार्य: वो सुख हुआ।

प्र: वही है, “ग्रास इज़ ग्रीनर ऑन दि अदर साइड।“ (दूर के ढ़ोल सुहावने)

आचार्य: “ ग्रास इज़ ग्रीन ऑन दि अदर साइड।“ वैराग्य का अर्थ होता है कि चीज़ चीज़ है, वो तुम्हें कुछ दे नहीं पाएगी। चीज़ आत्मा नहीं बन सकती, उससे राग मत रखो, उससे उम्मीद मत रखो, उससे जुड़ कर तुममें कुछ जुड़ नहीं जाएगा, उससे जुड़ कर तुममें कोई संवर्धन नहीं आ जाना है। चीज़ चीज़ है, चीज़ की ख़िलाफ़त का नाम नहीं है वैराग्य, वस्तुओं के विरोध में खड़े होने का नाम वैराग्य नहीं है। वस्तु सिर्फ़ वस्तु है, ये वैराग्य है। वस्तु आत्मा नहीं बनेगी, वस्तु तुम्हारे दिल की भरपाई नहीं कर देगी।

प्र: वस्तु से उम्मीद वासना है।

आचार्य: वस्तु शब्द बड़ा प्यारा है। वस्तु शब्द का अर्थ होता है, "वो जो है।" संतों से पूछो तो कहेंगे, “एक ही वस्तु होती है, सद्वस्तु, परमात्मतत्व।" वही वास्तविक है, वास्तविक, वस्तुतः है। बाकी सबको तो कहते हैं, “तुम इन्हें असली मानोगे तब न इन से राग-द्वेष करोगे, हम इन्हें मानते ही नहीं कि इनमें कुछ है। इनका क्या है? आज हैं, सोए, सुबह उठे, देखा दीवार ही गायब है। अब बेवकूफ़ बने कि नहीं? किसकी मुहब्बत में पड़े थे? सुबह वो ईंट-ईंट हो गया, रेत पड़ी हुई है। कहाँ दिल लगा रहे थे?”

प्र: सर मार रहे थे।

आचार्य: सर मारने के लिए भी नहीं बची। उसने इतनी भी लाज नहीं रखी कि सर मारने के लिए तो थोड़ी-सी बचे।

प्र: यहाँ पर दूसरे अध्याय में, चौथे श्लोक में है कि वासना शुभ और अशुभ होती है। सद्वासना, मतलब जो परमार्थ के लिए जो वासना होती है।

आचार्य: राम की ओर भी दिल भागता है। संत कहेंगे कि, "अच्छा तो ये होता कि स्थिर ही हो जाता, पर स्थिर होने लायक तुमने उसे छोड़ा नहीं। तो अब अगर राम की ओर भागे तो ठीक है, कम-से-कम वहाँ जाकर स्थिर हो जाएगा।" और दूसरी चीज़ें भी होती हैं, उनकी ओर भी भागता है। वहाँ तक़लीफ़ ये है कि वहाँ चला भी गया, पहुँच भी गया, तो भी स्थिर नहीं हो पाएगा।

प्र: तो यहाँ पर उसी के लिए बताया है कि वासना-रहित?

आचार्य: वासना-रहित तो तब होगा न जब जो चाहिए था वो मिल जाए, उसके बिना वासना-रहित नहीं हो पाने का है, उसके बिना तो वासना बनी ही रहनी है। वासना-रहित होने के लिए भी ज़रूरी है कि सद्वासना की ओर पूरी ताक़त से दौड़ लगा दो। एक बार तो अपने-आपको पूरा भरना पड़ेगा न? जब तक इसी भावना में बैठे हो कि, “खाली हैं, खाली हैं”, तब तक स्थिरता-पूर्णता शब्द मात्र हैं बस।

देखिए, व्यावहारिक रूप से जितना ज़रूरी है एक आम आदमी के लिए अपने आपको कुत्सित वासनाओं से बचाना, उतना ही ज़रूरी है राम की वासना में पड़ना। क्योंकि तुम अगर सच्चाई के पास नहीं हो, राम के, आत्मा के पास नहीं हो, तो तुम अपने-आपको दूसरी चीज़ों से बचा भी कब तक लोगे? अपने बूते पर बचाओगे? कैसे बचाओगे? जिस घर का कोई मालिक नहीं हो, उस घर में कितनी देर तक तुम सफ़ाई रख लोगे? उस घर को कितनी देर तक तुम चोर-लुटेरों से, आक्रांताओं से बचा लोगे?

निश्चित और आखिरी उपाय तो एक ही है न, कि घर उसके सुपुर्द करदो जिसका है, घर में मालिक को बैठा दो, अब कोई नहीं घुसेगा। अन्यथा तुम एक व्यर्थ लड़ाई लड़ रहे हो। कुछ समय तक तुम्हें ऐसा लग सकता है कि तुम सफल हो,पर तुम थक जाओगे, तुम्हें हारना पड़ेगा।

जितना ज़रूरी है व्यर्थ से लड़ना, उतना ही ज़रूरी है सत्य के प्रेम में भी पड़ना। क्योंकि अंततः वो लड़ाई तुम्हारी अपनी नहीं होने वाली, तुम जीत नहीं पाओगे। उस लड़ाई को भी अगर तुम्हें लड़ना है और जीतना है, तो तुम्हें लड़ने के सारे अधिकार मालिक को देने पड़ेंगे, कि, “मालिक, अब तुम लड़ो मेरी जगह, क्योंकि जीत तो तुम ही सकते हो। मैं कुछ समय के लिए प्रतिरोध कर सकता था, मैं चौकीदारी कर सकता था, वो मैंने करली, पर पूरा खेल तो तुम्हीं खेलोगे, पूरी जीत तो तुम्हीं जीतोगे।“

इसीलिए जो शून्यवादी हैं, उन्हें अक्सर ज़्यादा तक़लीफ़ का सामना करना पड़ता है। वो हर चीज़ का नकार तो करे जाते हैं, बिना उसके सामने सर झुकाए जो नकार करने की ताक़त देता है। नतीजा ये निकलेगा कि नकारने की हिम्मत भी कुछ समय के बाद शिथिल पड़ने लग जाती है। कब तक “ना, ना, ना, ना,” बोलते रहोगे, बिना ये स्वीकार किए कि भीतर कोई है जो 'ना' बोलने की हिम्मत देता है? उसको तो 'हाँ' बोलना पड़ेगा न? 'वो' तो है। तो है तो हाँ तो बोलिए न उसके प्रति, “वो है, हाँ वो है।“

अब उसको 'हाँ' तो तुम बोल नहीं रहे, “ना, ना, ना, ना,” करे जा रहे हो, “ये भी झूठा, वो भी झूठा, ये भी झूठा।“ थोड़े दिनों बाद तुम पाते हो कि अब 'झूठा' बोलने का मन ही नहीं कर रहा। कौन ये एक-रस, एक-धुन जीवन जिए कि जो सामने आए, उसी को बोल रहे हो, “ना, निषेध, नेति-नेति।“ और तुम्हारी नेति-नेति कौन करेगा? ये जो “ना, ना” बोले जा रहा है इसको कौन हटाएगा? तो फिर कहते हैं, “अच्छा हमने ख़ुद को भी हटा दिया, अब मात्र मौन है।“ अच्छा, इस मौन को कौन हटाएगा? तुम्हारा तो मौन भी एक चीज़ है, एक वस्तु है, करीब-करीब इंद्रियगत है। कहीं-न-कहीं आकर 'हाँ' बोलना पड़ता है, और मैं कह रहा हूँ 'हाँ' बोलना उतना ही ज़रूरी है जितना 'ना' बोलना। 'ना' बोलने की ताकत भी 'हाँ' बोलने से आती है।

एक सज्जन से अभी बात हो रही थी। वो लंदन में बड़े डॉक्टर (चिकित्सक) हैं, बड़े परेशान हैं, बोले, "ज़ेन का कायल हूँ, ज़ेन-साहित्य पूरा पढ़ा है, पर परेशानी नहीं जाती।" मैंने कहा, "ज़ेन तो यही बताता है कि सब मूर्खता है, मन किधर को भी हिला, व्यर्थ में चला गया, कुछ भी कोई अर्थ नहीं रखता, कोई मायने नहीं रखता, तो ये परेशानी कैसे आपके लिए मायने रखती है?" पूरे संसार को तो आपने कह दिया कि, “अर्थहीन है, सारहीन है”, तो परेशानी में अर्थ कैसे है? परेशानी में सार कैसे है? बोले, “यही समझ नहीं आता।" मैंने कहा, “आप ज़ेन अभी हटाइए, ज़ेन को काम करना होता तो एक झटके में कर गया होता।" सिख थे, मैंने कहा, “आप आदिग्रन्थ की शरण में जाएँ, 'जपुजी साहिब' से शुरुआत करें।“

परमात्मा, सत्य, निर्गुण, निराकार है ठीक है, पर तुम्हारी तो साकार में आस्था है न? तुम्हारी तो अपनी देह में आस्था है, देह तो साकार है। तो तुम परमात्मा के सकारात्मक रूप को भी पूजना सीखो, 'हाँ' बोलना भी सीखो, सर झुकाना भी सीखो। पूर्ण निषेध कर रहे हो न? तो निषेध से पहले 'पूर्ण' आता है, भूलना नहीं। 'पूर्ण' नहीं आया है, तो निषेध भी नहीं होगा, और आधा-अधूरा, अधकचरा निषेध करोगे।

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