




































समुद्र के लिए ही यहाँ आया समुद्र से ही मेरा आखिरी नाता
पर आज सुबह से व्यस्त रहा रेतीले मसले ये गिनती वो घाटा
साँझ अब जब तट पर आया समुद्र लहराता बोला मुस्कुराता
रेत के कणों में मन फँस जाता रेत गिनते सूरज ढ़ल जाता
रेत का कण विशाल…
Brother, I have seen some astonishing sights. A lion keeping watch over pasturing cows; a mother delivered after her son was; a guru prostrated before his disciple; fish spawning on treetops; a rooster is eating a cat; a gunny sack driving a bullock cart; a cat carrying away a dog;…
आचार्य प्रशांत: जो बातें मैं कह रहा हूँ अगर उनमें कुछ दम, कुछ फ़ौलाद समझ में आता है तो उसको अपनी ज़िंदगी में उतार लें, मेरा उद्देश्य पूरा हो जाएगा। और अगर वो फ़ौलाद आप ज़िंदगी में नहीं उतार रहे हो और बस “गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णु” कर रहे हो, तो करते…
How do you, ask the chief of police, patrol a city, where the butcher shops are guarded by vultures, where bulls get pregnant, cows are barren, and calves give milk three times a day, where mice are the boatmen, and tomcats row the boats, where frogs keep snakes as watchdogs,…
Questioner: My question is, why is creativity, like poetry, dying these days? And poetry is a part of literature. And how much contribution of literature is there on the way to Adhyatma?
Acharya Prashant: See, the more you will lose touch with yourself, the more material your world will get.…
Questioner: Pranam Acharya ji. I am Ritu Tiwari. I am an alumnus of this college. My question is related to defamation of mental health problems. I’ll give you three examples – first comes from a recent murder case that happened in the capital of our country where a man named…
Are you looking for me?
Look a little closely!
Am I in the Stupa, am I in the Shrine?
You really want me, or just images of mine?
… a little closely!
The crowds in the Ashram are all misled,
What you call as Yoga is such a dread,…
Gatay, Gatay, Paragatay….
I will miss you so much, Pardon me, I will have to die. We played together for long, Now I’m going home to the Sky.
I will miss you so much, I’m going to where I belong. It breaks my heart to leave you, I tried hard…
प्रश्नकर्ता: नमस्कार आचार्य जी! आचार्य जी, आज के सत्र में आपने कहा कि सिर्फ़ जानने भर से बात नहीं बनेगी। हम जो जानते हैं, उसे हमको जीना भी पड़ेगा। और इस बात का मतलब जब मैं आत्मवलोकन करती हूँ कि मैं अपनी ज़िन्दगी में इस बात पर कितने हद तक…
“मदिरालय जाने को घर से चलता है पीने वाला, ‘किस पथ से जाऊँ’ असमंजस में है वह भोला-भाला; अलग-अलग पथ बतलाते सब पर मैं यह बतलाता हूँ... ‘राह पकड़ तू एक चला चल', पा जाएगा मधुशाला।“
~ हरिवंशराय बच्चन (मधुशाला)
प्रश्नकर्ता: “मदिरालय जाने को घर से चलता है पीने वाला,…
अपने पर्व पर मुझे जन्म दिया लगा मुझे मैं कृतकृत्य हुआ
पर जैसे-जैसे समझ बढ़ी वैसे-वैसे प्रश्न उठा जो जगत तुमसे ही छल करता उसमें मुझे भेजा क्यों भला
जिस संसार में दुर्पयुक्त होता तुम्हारा ही निशान है उस संसार में बोलो फिर मेरा क्या स्थान है?
हे अचिन्त्य!
देखो…
एक बार फिर,
हाँ, फिर से एक बार,
नफरत हो गई है
अपनी कल्पनाओं से,
उन्मुक्त उड़ने, स्वच्छन्द सोचने वाले हृदय को
सीना फाड़ कर निकलने
और सामनें रख कर,
उस की उद्दंडता के लिए
उस के टुकड़े कर देने
की इच्छा है एक बार फिर
(पर क्या यह काम…
जो कुछ लिखा तूने, उसे मिट के मिटा
जो पास है तेरे, उसे खुद से बचा
जो बोया है तूने, उसे जड़ से हटा
जो बोया नहीं तूने, उसे अपना खून पिला
जो तेरी कमाई है, उसे आग दे लगा
जो कमाया नहीं तूने, उसे कभी न गँवा
जो याद…
और धन्यवाद
बताने का
कि कविता
रजनीगंधा का फूल
हो सकती है
पर
अभी
‘आप की फरमाइश’ पर
कविता
लिखूँ कहाँ से
जब
घड़ी के काँटे भी सो जाना चाहते हैं
और
नल से गिरता पानी
ध्यान जमने
देता नहीं
पहले तो
ज़रा यह नल बंद…
पाते स्वयं को विचित्र युद्ध में
रक्षा करते शत्रु जनों की
टूटते न नींद न संग्राम
मोहलत नहीं चार पलों की
इधर भटकते उधर जूझते
गिरते पड़ते आगे बढ़ते
जब गीत न अर्पित कर पाओ
तो ग्लानि न लेना ओ मन
तुम्हारी व्यथित साँसों का
शोर ही संगीत है
हरिताभ…
मेरे लिए यही है मेरा काम।
हर वीडियो, हर ब्लॉग एक चुम्बन है निरभ्र आकाश का अपनी धरा को।
इसीलिये बरसात चाहता हूँ। चंद बूँदों से मन नहीं भरता। हर नया पोस्टर, एक मत्त उच्छ्वास। देखो कि पृथ्वी के भाल पर अंकित हुआ तुम्हारा कोमल स्पर्श, और फिर निहारते रहो…
मन शांत
सब के सोने पर मेरा एकांत
एक बार फिर वही आदिम नींद पलकों पर आए
एक बार फिर वही इच्छा मन पर छाए
कि सोऊँ ऐसे कि फिर जागूँ न जगाए ।
पर मेरा नीरव चैन जागृति की भेंट चढ़ जाना है
तुमने सदा सूरज और सुबह को…
बेकार ही है
एक कविता से बहुत अपेक्षा करना।
पहले तो
बामुश्किल अस्तित्व में आएगी
आनंद पीड़ा के दुष्प्राप्य क्षणों से प्रजात
इस पल से निकला अनंत का टुकड़ा अज्ञात
अकुलायेगी, बेचैन…
आहिस्ता से उभर आएगी।
तपते युद्धरत दिवस का सांध्य-विश्राम
परिचितों की भीड़ में एक अपरिचित अनाम
कभी एक…
मैं बड़ी लगन से
जतन कर रहा हूँ
खूब छुप-छुप के,
इसीलिए अब
कविता काफी कम लिखता हूँ ।
मैं पैने कर रहा हूँ
चुपके से
अपने हथियार
तुम्हारे ही बीच रह कर
रंग-बिरंगा वेश पहन कर
हूँ तुम में से एक
(अभी)
सतर्क हूँ मैं
खुद को भी नहीं…
मेरे ऑफ़िस में रोशनी खूब है
सफ़ेद,
जैसे चाँद की होती है ।
कई चाँद निकले रहते हैं दिन में भी,
हमारी आज्ञा पर।
आँखें जलती हैं।
और मज़े की बात तो यह है कि
दरवाज़ों और खिडकियों के काले शीशों से बाहर देखो
तो लगता है कि
चाँद निकला…
यहाँ विशुद्ध अंधकार भी तो नहीं है ।
गौर से देखो तो मालूम पड़ता है
कि- हाँ कुछ चीज़ें हैं, यहाँ आसपास ।
दिखाई बस इतना पड़ता है
कि और दिखाई देने की व्यग्रता
या इतना दिखाई पड़ जाने का अवसाद
तुम्हें लिखने पर विवश कर दे ।
देखते रहो…
मुश्किल है
खाने की मेज़ पर, बस के अन्दर
या बस टहलते हुए
बतियाना
दिशाओं से फूट-फूट पड़ते
अंधेरों की चर्चा में
आँख यूँ चमकाना
जैसे
हमने (बस तुमने और मैंने)
इन्हें अभी-अभी पकड़ा हो ।
कभी मायूस होना
और चर्चा को गंभीरता के साथ
मौका देना
आपसी निगाहों को…
आज
तुम सोती हो
यहाँ मेरे सामने
मैं
तुम्हें बहुत ध्यान से देख रहा हूँ
तुम जानोगी भी नहीं
कि
तुम्हारी आँखों में नींद है
और मेरी आँखों में
तुम्हारे लिए
सपने ।
आज
बुरा होकर भी
बहुत अच्छा है
क्योंकि
कल आज में ही तो छुपा है ।
मैं…
कब तक घिसटूँ
ढ़ोते हुए
अपने मस्तक पर
बोझ तुम्हारे पाँवों का
(तुम्हारे चरण तो मेरा उद्धार करने वाले थे, है न?)
तुमने मुझे सहारा दिया,
पर मेरे पाँव काट कर
तुमने मुझे शब्द दिए
पर उनके अर्थ छीन कर
तुमने मुझे रास्ता दिखाया
पर उस रास्ते में कांटे भी…
विजयादशमी का डंडा
हर साल संभालता है
अनगिनत शरीरों को।
विजयादशमी का डंडा बनाये रखता है भीड़ का प्रवाह
बस एक ही दिशा में
वह पूरा ध्यान रखता है
छिटक न जाए एक भी श्रद्धालु
दाएँ या बाएँ।
विजयादशमी का डंडा
मैला हो चुका है
इतना हाथों के स्पर्श से…
आकाश,
टुकड़ों में मेघाच्छन्न है
या तो पूरी तरह
या बिल्कुल नहीं।
खुले आकाश का सबसे चमकदार सितारा
मेघों को दूर से निहारता है
जैसे पड़ोस का बच्चा मुझको-
भय, संदेह से व्याकुल आँखों से,
कुछ दूरी पर खड़े रहकर।
आषाढ़ के काले बादलों का छोर
बस उनके पीछे चमकती…
मैंने पूछा डूबते हुए सूरज से
तुम्हें देख वह पक्षी क्यों घर लौटता है ?
मैंने पूछा उड़ते हुए पक्षी से
क्यों तुम व्यर्थ गगन गुंजाते हो?
मैंने पूछा विस्तृत श्याम गगन से
क्यों तुम मेघों के पीछे मुँह छुपाते हो ?
पूछा मैंने मेघों से
क्यों तुम धरती पर…
प्रेरणास्पद लगा,
मुझे भी, तुम्हें भी ।
चींटी का अथक परिश्रम,
मन भाया,
मेरे भी, तुम्हारे भी ।
तिनके का डूबते को सहारा देना,
हौसला बँधा गया,
मेरा भी, तुम्हारा भी ।
इतिहास के पन्नों पर छपी,
संघर्षों की गौरवशाली गाथाएँ,
पिघला गईं,
मुझे भी,…
मुझ से तुम्हारा परिचय,
सिमट कर रह गया
बस एक क्षण तक का,
और बसी है मेरी आँखों में,
बस उसी क्षण की,
एक,
छवि तुम्हारी ।
और,
संतुष्ट हूँ मैं।
उस एक क्षण से
आगे जाना भी नहीं चाहता
क्योंकि डरता हूँ
आगे जाने में
छिन न जाए मुझ…
वह
हँसने की चाह में कितना रोता है
वह
समझता है कि
हँसा जा सकता है
हर बात पर और हमेशा
कुछ यही बात
समझाता है
वह सब को
लोग नहीं समझते
पर वह
समझाता रहता है
तब तक
जब तक
या तो लोग हँस नहीं देते
या
वह
वह…
तुम प्रणाम करते हो
उसे रोज़ सवेरे
सर झुका कर
क्योंकि
डर है तुम्हें
झुलसा न दे तुम्हें वह कहीं।
तुम्हारा प्यारा चन्द्रमा
हो जाता है अदृश्य,
तारे अस्तित्वहीन
उस के समक्ष ।
फिर भी
वह तुम्हें कुछ भला नहीं लगता
क्योंकि
तेज बहुत है उस में
और
दोपहर को…
जाड़े की सुबह को,
बैठा हूँ मैं बाहर धूप में,
जब एक भूरा कुत्ता और काला कौवा
आकर कुछ इस तरह बैठ जाते हैं-
मेरे ठीक सामने तो नहीं-
पर किसी कोण से लगातार दिखाई देते रहते हैं।
भूरा कुत्ता बहुत कुछ सड़क पर पड़ी
गंदगी जैसा लगता है-
जिसे…
उदासी सी छा गयी थी,
सूरज के डूबने के साथ ही,
और मैं – मुरझाया, उदास
देखता था गहरा रही रात को
तारों की उभर रही जमात को ।
प्रत्येक पल युग सा प्रतीत होता था,
परितः मेरे सारा जग सोता था,
पर मैं, यूँ ही…
लगता है बहुत आक्रामक होते जा रहे हो तुम,
गिद्ध सी तुम्हारी पैनी नज़र
तेंदुए सा तुम्हारा हमला,
सिंह सा प्रहार,
अपराजेय तुम,
शक्तिशाली, सामर्थ्यवान ।
सिद्धांत?
मात्र दो :
सफलता का कारक बहुधा अविश्लेषित रहता है।
प्रहार करे जो प्रथम, सफल भी बहुधा वही रहता है।
अतः हे…
Oil companies’ own scientists predicted the warming in the 1970s. Carbon isotopes now prove the extra CO2 is ours. And still, in the country that has emitted the most, many call climate change unreal. This is not a gap in knowledge. Denial is a defence: every doubt we keep alive gives us a safe place to hide, because accepting the carbon means accepting that our own desire is heating the planet. What are we protecting when we refuse to know?

किसी बड़ी जीत के बाद मन करता है कि अब बस, जो पाने लायक था, पा लिया, अब सब कुछ ऐसा ही बना रहे। पर रुकने की यह चाह उस पहचान से उठती है जो जीत के साथ हमने ओढ़ ली है और जिसे हम बचाए रखना चाहते हैं। जीवन में कुछ भी ठहरा हुआ नहीं है, और चलती राह पर जो रुक जाता है, वह घिसने लगता है। पिछली चुनौती जीती ही इसलिए जाती है कि उससे बड़ी उठाई जा सके। क्या हम देख पाएँगे कि सेटल होने की चाह में हम असल में क्या बचा रहे हैं?

Many of us interrupt, rush to make our point, or change the topic when a conversation comes too close. We call it a lack of patience or discipline. But impatience in a conversation is often fear: when what we hold within is borrowed belief, every question could shatter it. The same confusion makes us take our instincts and feelings as ourselves, though they are only the body’s chemistry. If we looked honestly at what we hold, would a question still feel like an attack?

Physical weakness does not stay physical. It becomes mental weakness, and the ego, which turns everything into an identity, starts saying “I am weak” because that line brings support and spares it responsibility. Visible strength works even unused: it keeps the opponent outside wary and silences the one within, who can no longer claim to be helpless. Keeping the body strong is therefore a spiritual matter, not vanity. Are we holding on to weakness because it is convenient?

सच की राह पकड़ते ही अक्सर अपने ही लोग बदल जाते हैं, और हम मान लेते हैं कि शायद हम ठीक से समझा नहीं पा रहे। पर सामने वाला समझ तो रहा होता है, उसे बस सौदा नहीं जँचता। अहंकार लेन-देन से चलता है, इसलिए अकेले तर्क उसे नहीं हिलाते। हमारा अपना अहंकार भी यही करता है: थोड़े-से स्वार्थ के लिए हम झूठे रिश्तों में मिठास का स्वांग करते हैं, मजबूरियाँ गिनाते हैं और पीछे हट जाते हैं। जिसे हम मजबूरी कहते हैं, क्या वह सच में मजबूरी है?

Many Indian parents keep their children, and especially their daughters, away from sport, even where coaches and facilities exist. The barrier is often not outside but in the parent’s own ideas: poor returns, uncertainty, and fixed notions of what a girl’s life must be. Blaming our own parents does not help either; our life is now our responsibility. Parenting is a decision of the greatest responsibility, and it begins with self-love. Can we love a child if we cannot love ourselves?

A world champion asks why she cannot sleep when a teammate outperforms her, and why even big wins leave her restless. The restlessness is not a problem but unspent energy, a sign that we have more to give. When every bit of our time and attention goes to what we have chosen, there is no surplus left to worry with. The right fight is never only against an opponent; it is against the ego within. What would it mean to fight so fully that nothing is left to celebrate or mourn?

कोई खिलाड़ी देश के लिए मेडल जीतकर लौटती है, और बधाई के साथ ही सवाल आता है कि खुशखबरी कब दोगी। उम्र का पैमाना और परिवार की अपेक्षा मिलकर उसकी पूरी मेहनत को एक देह की भूमिका तक सीमित कर देते हैं। पर सफलता केवल वह नहीं जिसे दूसरे गिन सकें। जब हम स्वयं को देह भर मान लेते हैं, तो हमारे विचार, लहजा और अपनी छवि तक उसी में बँध जाते हैं। इंसान बनकर जीना और किसी के हाथों न बिकना अपने आप में बड़ी और बिरली सफलता है। हमारे लिए असली खुशखबरी क्या है?

We often defend a bad choice by pointing to a worse one: stay dishonest or starve, keep the wrong grip or stop playing. But the real trouble is not the option we picked. It is the option we never let ourselves see. Action does not need greed or attachment to find its energy. The third way begins by rejecting both false choices, without knowing what comes next. Which of our everyday choices are really false dilemmas?

35 की उम्र आते ही खिलाड़ी महिला से कहा जाने लगता है कि अब खेल छोड़ो, बच्चों को मौका दो। हम मान लेते हैं कि यह उम्र और शरीर की मजबूरी है। पर ध्यान से देखें तो शरीर का तर्क टिकता ही नहीं। असल दबाव उस सिखाई गई मान्यता का है जो महिला को उसके शरीर और उससे जुड़ी भूमिकाओं से ही तौलती है, और जिसे हम अपनी ही सोच मान बैठे हैं। जो आवाज़ें हमें बताती हैं कि हमारी ज़िंदगी का क्या करना है, क्या हम ईमानदारी से देख पाएँगे कि वे आवाज़ें किसकी हैं?

Seen a bubble in the sea? That is our story.
You came with the hands empty, empty, and nothing will you carry.
So why be caught in misery? Make merry, make merry!
Who is your family? Who is a lover really?
You are deep in illusion, happily, happily fooling yourself…

अहं अगनि हिरदै जरै, गुरू सों चाहै मान। तिनका जम न्यौता दिया, हो हमरे मिहमान॥
~ कबीर साहब
वक्ता :गुरु और शिष्य की कहानी है। उनके संबंधों के विषय में है। अहं की आग सीने में धकधक जल रही है। अहं कहता है, “मुझे मान्यता मिले, स्वीकृति मिले, प्रशंसा मिले”।…

प्रेम की गहराई हमेशा प्रेमी की अपनी चेतना जितनी होती है — जो जैसा है, उसका प्रेम भी वैसा ही होगा, चाहे उसे कितना भी पावन या अनोखा क्यों न मान लिया जाए। जिस चेतना ने खुद को कभी गहराई से नहीं जाना, वह प्रेम में भी सतह से आगे नहीं जा सकती। जो कोई अपने प्रेम को गहराई से परखने से बचता है, वह असल में खुद को परखने से बच रहा होता है — और यही बचाव, प्रेम के नाम पर पाला गया एक और भ्रम है।

आचार्य प्रशांत बताते हैं कि क्यों हम सही खान-पान, स्वास्थ्य और अपने ऊपर ज़रूरी खर्च से बचते हैं, लेकिन दिखावे और फ़ालतू सामाजिक परंपराओं पर पैसा बहा देते हैं। अधिकांश लोगों के लिए समस्या सिर्फ़ पैसों की कमी नहीं, बल्कि विवेक और सही प्राथमिकताओं की कमी भी है।