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सच इतना डरा हुआ क्यों है? || आचार्य प्रशांत (2020)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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आचार्य प्रशांत: सच इतना डरा हुआ क्यों है? सच इतना डरा हुआ इसलिए है, क्योंकि घपला कर बैठा है। “लागा चुनरी में दाग़ छुपाऊँ कैसे”।

किसी को जब मारना होता है तो आमतौर पर उसको मारने के लिए शुद्ध ज़हर का इस्तेमाल नहीं किया जाता। काला, दहकता, गरल हो विष, कड़वा, और शायद दुर्गन्धयुक्त भी, उसका इस्तेमाल करके आप किसी को मार ही नहीं पाएँगे; झूठ वैसा होता है। झूठ शुद्ध ज़हर जैसा होता है, वो इतना ज़्यादा घिनौना होता है और उससे इतनी आपको जुगुप्सा जगेगी कि आप हाथ हटाकर उसे दूर कर देंगे।

तो इसीलिए झूठ, शुद्ध झूठ बहुत नुक़सानदेह हो ही नहीं सकता। वो आपके सामने लाया जाएगा, आप तुरन्त उसको अस्वीकार कर देंगे। उसका घिनौना, बर्बर और गर्हित रूप देखकर ही आप समझ जाएँगे कि ये चीज़ बड़ी गड़बड़ है। इसीलिए दुनिया में कभी आपको शुद्ध झूठ दिखाई नहीं देगा। ठीक वैसे ही जैसे कि शुद्ध ज़हर कौन इस्तेमाल करता है! किसी को जब हानि करनी होती है किसी की, तो वो उसको दूध में या शरबत में या अच्छे, बढ़िया, स्वादिष्ट, सुगन्धित भोजन में ज़हर की एक-आध बूँद मिलाकर देता है। अब ज़हर बहुत ज़बरदस्त रूप से घातक हो गया!

समझ रहे हैं?

तो झूठ में कोई ताक़त नहीं है जब तक उसको सच न मिल जाए। और सच जैसे ही सौ से घटकर निन्यानवे प्रतिशत हुआ, वो अति घातक ज़हर बन जाता है! सच में आप थोड़ा सा झूठ मिला दीजिए, दूध में आप थोड़ा सा ज़हर मिला दीजिए, अब वो ज़बरदस्त रूप से घातक हो गया, और वही घातक है! शुद्ध ज़हर घातक नहीं था। व्यावाहारिक रूप से, किताबी मत करिए कि शुद्ध ज़हर भी तो कोई लेगा तो मर जाएगा। शुद्ध ज़हर कोई लेगा ही क्यों? शुद्ध ज़हर चीज़ ऐसी है कि उसे कोई लेगा ही नहीं। तो ज़हर को बस एक प्रतिशत होना पड़ता है निन्यानवे प्रतिशत दूध को या शरबत को भी अति घातक ज़हर बना देने के लिए।

तो ये तो हुई सच की तरफ़ की कहानी, कि सच अगर सौ प्रतिशत शुद्धता से घटकर निन्यानवे प्रतिशत पर आ गया तो अब वो सच निन्यानवे प्रतिशत सच होते हुए भी अति ज़हरीला हो गया। सच की मजबूरी समझिए, उसको या तो सौ प्रतिशत होना है, नहीं तो वो मृत्युकारक है। सच अगर हो तो सौ प्रतिशत हो, उसमें एक प्रतिशत का घपला हुआ नहीं कि उससे ज़्यादा ख़तरनाक ज़हर अब दूसरा नहीं होता।

और अब झूठ की तरफ़ आकर देखिए। झूठ अपने पैरों पर चल नहीं सकता, है न? तो झूठ को हमेशा सच चाहिए। झूठ को हमेशा सच चाहिए, कम-से-कम वो अपना नाम तो किसी को प्रदर्शित नहीं कर सकता। झूठ अगर बोल दे खुलेआम कि मैं झूठ हूँ, तो कौन उसको स्वीकार करेगा, कौन उसको इज़्ज़त देगा? तो झूठ को कम-से-कम इतना सच तो चाहिए ही कि वो सच का नाम पहन सके।

समझ रहे हैं?

अब झूठ है बहुत सारा, लेकिन उसने सच का नाम पहन लिया। जैसे ही उसने सच का नाम पहन लिया तो वो अब स्वीकार्य हो गया। अब आप उसको अपने जीवन में अनुमति दे देंगे, क्योंकि झूठ होते हुए भी उसने सच का नाम पहन लिया है, कम-से-कम ऊपर-ऊपर से अब वो अपनेआप को सच बोल रहा है।

तो सच को ज़रा सा झूठ मिल गया था तो सच ज़हरीला हो गया था, किसी काम का नहीं बचा था; और झूठ को ज़रा सा सच मिल गया तो झूठ अब बहुत ज़्यादा कारगर हो गया उसकी दृष्टि में। झूठ अब बहुत तेज़ हो गया, झूठ अब बहुत प्रभावी हो गया। अब झूठ हावी हो जाएगा, झूठ का वर्चस्व हो जाएगा।

ये तुलना साफ़-साफ़ समझो और बिलकुल भीतर तक बैठ जाने दो — सच को ज़रा सा झूठ मिल गया तो सच से बड़ा ज़हर दूसरा नहीं, और झूठ को थोड़ा सा सच मिल गया तो झूठ की बल्ले-बल्ले! अब झूठ बिलकुल मस्त-मगन होकर नाचेगा! क्योंकि झूठ अगर ये बोल देता कि मैं झूठ हूँ तो उसका खेल ही ख़राब हो जाता। लेकिन सच का नाम पहनने के बाद अब झूठ अपना काम बेखटके, बेरोकटोक कर सकता है।

अब अपने सवाल पर आओ कि सच इतना डरा हुआ क्यों है। सच इतना डरा हुआ इसलिए है, क्योंकि घपला कर बैठा है। बार-बार पुरानी आदत के वशीभूत होकर वो झूठ की कुछ बूँदें अपने भीतर ले लेता है। और इस बात के चलते सहानुभूति मत करने लग जाना सच से कि अरे! सच बेचारा निन्यानवे प्रतिशत तो शुद्ध ही है न, एक प्रतिशत का ही तो उसने घपला किया है। नहीं! नहीं! नहीं! उसका ये जो एक प्रतिशत का घपला है, ये सबके लिए प्राणघातक हो गया! उसने किसी को कहीं का नहीं छोड़ा, क्योंकि झूठ से तो किसी को कोई उम्मीद ही नहीं होती है। झूठ पर कौन भरोसा करना चाहता है अगर पता ही हो वो झूठ है? सच पर हमारी उम्मीद भी होती है, सच पर हमारा भरोसा भी होता है।

तो वहाँ पर शरबत रखा हुआ है, बढ़िया शरबत है पुदीने का। और आपका भरोसा है उस पर कि ये तो पुदीने का शरबत है। और उसने क्या कर दिया? उसने मिश्रण कर दिया, घपलेबाज़ी कर दी। बढ़िया गिलास भरकर शरबत रखा हुआ था, बस उसमें दो बूँद की उसने ख़यानत कर दी, धोखाधड़ी कर दी! और आप जाएँगे और बड़े विश्वास के साथ उस शरबत को उठाएँगे और पी जाएँगे। आपको क्या पता कि आप जिस पर यक़ीन करते थे, उसने उसमें दो बूँद मिला दीं हैं!

और इतना ही नहीं है, वो अपने बचाव में दलील दे रहा है कि मैंने सिर्फ़ दो बूँद का ही तो घपला किया है! अरे! तू दो बूँद का नहीं, दो किलो का घपला कर लेता, मुझे कोई नुक़सान नहीं होता। लेकिन तूने सच का नाम पहनकर दो बूँद का घपला किया है, इसलिए मैं तेरे धोखे में आ गया, तेरे फ़रेब में आ गया। नहीं तो हम बेवकूफ़ थोड़े ही हैं कि ज़हर पी लेते! वो तो तुम पर यक़ीन करके हमने जाँच-पड़ताल नहीं की और हमारे भीतर ज़हर चला गया। नहीं तो किसी की मजाल थी कि हमें ज़हर पिला देता!

मैं अभी जब ‘मैं’ कह रहा हूँ तो चेतना बनकर कह रहा हूँ, उस दृष्टि से, उस बिन्दु से कह रहा हूँ। चेतना इस तरीक़े से फ़रेब में आ जाती है — जिनपर यक़ीन करती है, वो बस थोड़ा सा घपला कर देते हैं, और वो जो थोड़ा सा घपला है वो ज़िन्दगी भर के लिए हमें बर्बाद कर देता है। और दूसरा जो तरीक़ा है हमारी बर्बादी का, वो झूठ वाला है, कि झूठ घूम रहा है लेकिन ऊपर-ऊपर से वो राम-नाम जप रहा है और माला फेर रहा है। और वो ज़रूरी है, नहीं तो वो दुनिया के बाज़ार में बिकेगा नहीं, आगे बढ़ेगा नहीं।

आज आप देखते हो कि सच बिलकुल चौड़ी छाती के साथ घूम रहा है, मस्तक उसका उठा हुआ है, रीढ़ तनी हुई है। क्यों? क्योंकि झूठ ने थोड़ा सा सच ले लिया है। झूठ ने जैसे ही थोड़ा सा सच लिया, झूठ को ज़बरदस्त शक्ति प्राप्त हो जाती है। झूठ ने थोड़ा सा सच ले लिया तो झूठ की ताक़त हज़ार गुना बढ़ जाएगी; और सच ने जैसे ही थोड़ा सा झूठ ले लिया तो सच कहीं का नहीं रहेगा, एकदम बर्बाद हो जाएगा। इन दोनों में अन्तर समझना। सच जब थोड़ा सा झूठ ले लेगा, शरबत जब थोड़ा सा ज़हर ले लेगा तो ख़ुद भी बर्बाद हुआ और सबकी बर्बादी का कारण बना। और झूठ जब थोड़ा सा सच ले लेगा तो वो झूठ जो दो कौड़ी का था, जो धूल बराबर था, जिसकी कोई पूछ नहीं थी, वो झूठ अब अचानक बिकने जैसा लगेगा, उसका मूल्य लगने लगेगा, वो भी ज़रा अभिमान के साथ दुनिया के सामने खड़ा होने लगेगा, कुछ बात करने लगेगा, दलीलें देने लगेगा, अपनेआप को सभाओं में, बाज़ारों में प्रस्तुत करने लगेगा, कहने लगेगा कि देखो! हमारी भी बात सुनो, हम भी सच हैं!

आ रही है बात समझ में?

तो जो लोग झूठ के कायल हों, झूठ के रास्ते पर चलना है, उनके लिए आसानी है। उनको तो बस वैसे ही चलना है जैसे वो भीतर से बने हुए हैं — झूठे! और ऊपर-ऊपर से उन्हें कुछ दो-चार सच्ची बातें कर देनी हैं ताकि उनके भीतरी मंसूबे किसी पर प्रकट न हो जाएँ। उनका काम आसान है।

समझ रहे हो?

उन्हें अपनी अशुद्धियाँ हटानी नहीं हैं, वो तो ऊपर से लेकर नीचे तक अशुद्ध हैं। बस उन्हें अपनी अशुद्धियों के ऊपर तमगा लगा देना है, एक लेबल लगा देना है कि मैं शुद्ध हूँ। ठीक है? भीतर से जितने भी अशुद्ध हो, बने रहो, कोई बहुत अनुशासन नहीं करना है, श्रम-साधना नहीं करनी है कि अपनी सारी अशुद्धियाँ हटानी हैं। ऐसा उन्हें कुछ नहीं करना, उनका काम बहुत आसान है। उनको बस क्या करना है अपने ऊपर? एक नाम लगाना है, एक चिट लगानी है — मैं शुद्ध हूँ। और उनका अपना काम चलने लग जाएगा।

लेकिन कहीं ज़्यादा कठिन रास्ता है उनका जो सच्चा जीवन जीना चाहते हैं। जो सच्चा जीवन जीना चाहते हैं, उनको शत-प्रतिशत सच्चा होना पड़ेगा। उन्होंने झूठ को अगर थोड़ी सी भी अनुमति दे दी जीवन में, तो मैं कह रहा हूँ कि एक प्रतिशत ज़हर का घोल सौ प्रतिशत ज़हर के घोल से हज़ार गुना ज़्यादा घातक होता है। ये बात बार-बार सुनो और समझो।

जिन्हें सच की राह पर चलना है, उन्हें सौ प्रतिशत शुद्ध होना पड़ेगा। अगर वो निन्यानवे प्रतिशत शुद्ध हो गये और उन्होंने एक प्रतिशत अशुद्धि अपने भीतर आने दी, तो वो महाअपराध करेंगे जिसकी कोई माफ़ी नहीं है। वो दुनिया भर के लिए घातक होंगे और ख़ुद भी जीवन भर तड़पेंगे अपराधभाव में। तो सारी ज़िम्मेदारी ले-देकर उस पर आ जाती है जो साफ़ जीवन जीना चाहता है। जिसे गन्दा जीवन जीना है, उसके लिए चीज़ें बहुत आसान हैं।

सच डरा हुआ क्यों है? सच इसीलिए डरा हुआ है, क्योंकि उसने थोड़ा सा मिश्रण स्वीकार कर लिया है। सच का और झूठ का कोई मेल, कोई सम्मिलन हो नहीं सकता। और ये दलील — दोहराकर कह रहा हूँ — कभी मत दीजिएगा कि साहब, हम निन्यानवे प्रतिशत तो सही ही काम करते हैं न, एक प्रतिशत ग़लत कर गये। अरे! उसी एक प्रतिशत में तो तुमने आग लगा दी!

तुम एक प्रतिशत ग़लत करने की जगह अगर दस प्रतिशत ग़लत कर रहे होते तो तुम कम ख़तरनाक होते, क्योंकि तब हमको पता होता कि ये आदमी गड़बड़ करता है और गड़बड़ करने की इसकी सम्भावना है, तो हम ज़रा सावधान रहते। तुम अगर पचास प्रतिशत घपला कर जाते तो तुम बिलकुल भी ख़तरनाक नहीं रहते हमारे लिए, क्योंकि हमें साफ़ पता होता कि ये आदमी पचास प्रतिशत बेईमान है। तो हम तुम पर यक़ीन करते ही नहीं, हम तुम्हारी एक-एक बात को जाँचते रहते, पकड़-पकड़कर तुमसे पूछते रहते।

दिक्क़त तब होती है जब तुम निन्यानवे प्रतिशत सच्चे और एक प्रतिशत झूठे होते हो। तब तुम दुनिया का सबसे ख़तरनाक ज़हर बन जाते हो, क्योंकि अब तुम पर यक़ीन कर लिया जाता है। तुम पर यक़ीन कर लिया जाता है, उठाकर शरबत पी लिया जाता है कि शरबत ही तो है। निन्यानवे प्रतिशत वो शरबत ही है, एक प्रतिशत ज़हर है। मार गया! ख़त्म कर गया!

आ रही है बात समझ में?

सच इसीलिए डरा हुआ है, और सच डरा ही रहेगा जब तक कि वो सच होने की पूरी क़ीमत अदा नहीं करता। निन्यानवे प्रतिशत तक जाना बहुत आसान है, निन्यानवे प्रतिशत तक तो बहुत लोग पहुँच गये। उसके आगे की यात्रा ही तो असली है, वहीं पर तो जाँचे-परखे जाते हो। वो यात्रा जिसने की वो सच्चा, नहीं तो फिर अपनेआप को बस तुम तस्सली देते रहो कि निन्यानवे प्रतिशत तो आ गये न हमारे! सीबीएसई थोड़े ही है, जीवन है! यहाँ निन्यानवे प्रतिशत वाला कतार में सबसे पीछे खड़ा नज़र आता है, क्योंकि वो विश्वासघाती है, वो श्रद्धाभंजक है। जो सबसे बड़ा धोखा हो सकता है, उसने वो किया है।

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