दुनिया से कट गई हूँ || आचार्य प्रशांत, वेदांत महोत्सव ऋषिकेश में (2022)

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी को नमन, सर मैं आपका बहुत-बहुत धन्यवाद करना चाहूँगी कि आपने जो कुछ सिखाया है वो बहुत अमूल्य है और सर मैं बहुत बड़ी प्रशंसक हूँ, आपकी समर्पित प्रशंसक हूँ और सर मैं, जीवन में आपने जो कुछ सिखाया है वो पहले किसी ने बताया होता तो जो गलतियाँ की हैं वो न की होती।
और सर, मेरा एक छोटा सा प्रश्न है कि जबसे मैं आपकी आइडियोलॉजी (विचारधारा) फोलो (अनुसरण) कर रही हूँ तबसे मुझे लग रहा है कि समाज से थोड़ा कट गयी हूँ और डिफरेंस ओफ ओपिनियन (मतभेद) जो है वो थोड़ा ज़्यादा हो गया है, तो इसके बारे में मैं क्या कर सकती हूँ, थोड़ा मार्गदर्शन दिजिए।
आचार्य प्रशांत: समाज से कट गयी हैं तो बधाई — इसमें समस्या क्या है? समाज से तो आप वास्तव में तब ही कट पाएगी जब समाज से कटना समस्या न लगे मुक्ति लगे। आप जिससे दूर हो रहे हैं, उससे दूर होना आपको अखर रहा है तो कितने दिन दूर रह पाएँगे?
अध्यात्म कोई विचारधारा, आइडियोलॉजी (विचारधारा) वगैरह नहीं होता। बात सच्चाई की होती है। दिक्क़त ये है कि अहंकार इस शब्द को ही नहीं पसंद करता — ‘सच्चाई’।
तो वो कहता है, हाँ वो किसी आदमी की बात है, ये उस आदमी का व्यक्तिगत विचार है। हम कहते हैं, ‘तुम्हारा सच तुम्हारा सच है और मेरा सच मेरा सच है’। जब तुम्हारा सच और मेरा सच की बात होने लग जाए तो वो सच नहीं है फिर वो अहंकार है, सच तो एक ही होता है। और सच वो है जो किसी विचार में अभिव्यक्त नहीं हो सकता, जो सब विचारों के मूल पर जाता है और विचारक की बदमाशी को पकड़ लेता है।



